बुधवार, 18 जुलाई 2007

चिट्ठाकारी, भावुकता और व्यावसायिकता




चिट्ठाकार मिलन समारोह की तमाम रपटें पढ़ीं. एक विशेष बात ने मुझे झकझोरा – आलोक जी की टिप्पणी पर मैथिली जी भावुक हो उठे थे. जहाँ आलोक जी का कहना भी सत्य है और उस पर मैं भी अमल करना चाहूँगा, वहीं मैथिली जी की सोच, भले ही उन्होंने आलोक जी की बात को व्यापक अर्थ में न लेकर व्यक्तिगत तौर पर ले लिए हों, भी सही है. व्यक्ति अपने पैशन, अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर आमतौर पर भावुक तो होता ही है.

निम्न पत्र मैंने फरवरी 07 में मैथिली जी को लिखा था, और उनसे प्रकाशन की अनुमति मांगी थी. तब उन पर उनके नए नवेले कैफ़े हिन्दी साइट पर हिन्दी चिट्ठों की सामग्री अनुमति के बगैर प्रकाशित करने के आरोप लगाए गए थे. और, जाहिर है, इस चिट्ठा प्रविष्टि को प्रकाशित करने के लिए उन्होंने उस वक्त यह कह कर मना कर दिया था कि यह तो व्यक्तिगत विज्ञापन जैसा कुछ हो जाएगा. आज जब श्रीश जी की टिप्पणी से सबको मालूम हो चला है, तो मैं भी यहाँ धृष्टता करते हुए इस पत्राचार को उनसे पूछे बगैर प्रकाशित कर रहा हूँ. आशा है, वे इसे अन्यथा नहीं लेंगे और मुझे माफ़ करेंगे.

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आदरणीय मैथिली जी,
यह चिट्ठा पोस्ट मैं आपके लिए लिखना चाहता हूं. कृपया अनुमति देंगे. :)
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फलों से लदा वृक्ष सदैव झुका ही रहता है...

दूसरे तरीके से, इसी बात को कहा जाता है – थोथा चना बाजे घना. यानी जिनमें तत्व होता है, वे विनम्र होते हैं, और अनावश्यक हल्ले-गुल्ले में यकीन नहीं रखते.


इस बात को यकीनन सिद्ध करते हैं मैथिली गुप्त जी. मैथिली जी ने वैसे तो हिन्दी चिट्ठा जगत में अपने पदार्पण के साथ ही समुद्र की शांत लहरों में तीव्र हलचलें पैदा कर दी थीं, परंतु वे स्वयं शांत, विनम्र और झुके-झुके ही रहे. उनके कार्यों से विनम्रता के साथ उत्कृष्टता भी झलकती रही जिससे उनके बारे में और भी जानने की इच्छा बनी रही. उन्होंने संकेत दिया था कि हिन्दी के लिए उन्होंने पहले कुछ खास कार्य किए थे. मैंने उनसे निवेदन किया कि संभव हो तो वे अपने चिट्ठे पर बताएँ ताकि हमारे ज्ञान में वृद्धि हो सके.


परंतु मैथिली जी विनम्र ही बने रहे. उन्होंने मुझे अलग से बताया कि कृतिदेव, देवलिज, आगरा, अमन, कनिका, कृतिपैड इत्यादि श्रेणी के 400 से अधिक हिन्दी, गुजराती व तमिल फ़ॉन्ट्स की रचना इन्होंने की है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया.


मैं कम्प्यूटरों पर हिन्दी में काम सन् 1987 से कर रहा हूँ – जब डॉस आधारित अक्षर पर काम होते थे. 1993-94 में विंडोज के आने के बाद धीरे से माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड पर इक्का दुक्का हिन्दी फ़ॉन्ट से काम होने लगा था. इसके कुछ समय बाद कृतिदेव श्रेणी के हिन्दी फ़ॉन्ट्स आए और वे विंडोज के हर प्रोग्राम में हिन्दी में कार्य हेतु इस्तेमाल में लिए जाने लगे. यूनिकोड के आने से पहले मेरा भी सारा कार्य भी कृतिदेव में ही होता था. आज भी विंडोज़ 98 में हिन्दी डीटीपी अनुप्रयोगों में आमतौर पर या तो श्री-लिपि इस्तेमाल में ली जाती है या फिर कृतिदेव. कृतिदेव का इस्तेमाल अत्यंत आसान और किसी अन्य प्रोग्राम के भरोसे नहीं होने के कारण (आप सिर्फ फ़ॉन्ट संस्थापित कर विंडोज के किसी भी अनुप्रयोग में काम कर सकते हैं) यह बेहद लोकप्रिय भी रहा.

कृतिदेव फ़ॉन्ट की पायरेसी को रोकने के लिए किसी अन्य सुरक्षा उपकरण मसलन हार्डवेयर डांगल या की-फ़्लॉपी/ सीडी की आवश्यकता नहीं होने से आमतौर पर विंडोज कम्प्यूटरों में यह पूर्व संस्थापित (और संभवतः पायरेटेड ही) ही आता है. अभी भी करीब सत्तर हजार सरकारी और गैर सरकारी इंटरनेट साइटों में इसी श्रेणी के फ़ॉन्ट इस्तेमाल में लिए जा रहे हैं. व्यक्तिगत इस्तेमाल की संख्या तो लाखों में है. वेब जगत् के बहुत से हिन्दी फ़ॉन्ट भी इसी के वेरिएन्ट ही है. मुझे नहीं लगता कि मैथिली जी को मेरे जैसे प्रत्येक प्रयोक्ता से उनके कार्य की कीमत (रॉयल्टी) कभी मिली हो. अगर उन्हें मेरे जैसे प्रयोक्ताओं से एक रुपए भी लाइसेंस की फ़ीस के रूप में मिलते होते तो वे निःसंदेह आज भारत के सबसे अमीर सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामरों में होते. रचनाकार की अस्सी प्रतिशत से अधिक सामग्री कृतिदेव फ़ॉन्ट से परिवर्तित सामग्री है. आज भी मेरे पास कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने संबंधी सहयोग हेतु ईमेल आते रहते हैं – जिससे यह अंदाजा होना स्वाभाविक है कि कृतिदेव ने हिन्दी के लिये कितने महान कार्य किए हैं.


यह चिट्ठा पोस्ट उनके कृतिदेव फ़ॉन्ट के मेरे द्वारा अब तक इस्तेमाल के लाइसेंस फ़ीस के एवज के रूप में समर्पित. आगे के इस्तेमाल के लिए (रेखा (पत्नी) अभी भी इसी – कृतिदेव फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करती हैं अपने नोट्स व पेपर्स तैयार करने के लिए) उन्हें लाइसेंस फ़ीस प्रदान कर हमें खुशी होगी.

मैथिली जी को सादर नमन्.
***-***
सधन्यवाद,
रवि

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चित्र - सौजन्य - दुनिया मेरी नजर से

अद्यतन # 1 - मैथिली जी का नया, वर्तमान में प्रदर्शित चित्र अमित जी के सौजन्य से .

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29 blogger-facebook:

  1. मैथिली जी को शत शत नमन. उनके कार्य के बारे में और ज्यादा जानना श्रेयस्कर रहेगा.आपको भी धन्यवाद उनका परिचय कराने के लिये.

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  2. मैथिली जी का योगदान, उनकी विनम्रता और सदाशयता विरले किस्म की है। मुझे वाकई बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं, जिनमें इस स्तर का काम करने के बावजूद श्रेय एवं लाभ पाने के लिए कोई ललक दिखती नहीं। ऐसा नहीं है कि मैथिली जी अव्यावसायिक किस्म के व्यक्ति हों, लेकिन उनके मन में एक आत्मिक संतोष भी है। कुछ हद तक उनके हृदय में "तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" का भाव महसूस होता है।

    कैफ़ेहिन्दी की शुरुआत के समय उनके बारे में कोई जानकारी नहीं होने और किसी चिट्ठाकार से उनका प्रत्यक्ष संपर्क पहले से नहीं होने के कारण जो अप्रिय विवाद पैदा हुआ, उसके लिए मुझे हमेशा अफसोस रहा। लेकिन जिस दिन यह विवाद सामने आया, उसी दिन मैथिली जी से मैंने फोन पर बात की और मेरा मन काफी हद तक साफ हो गया। उसके बाद मैं उनके दफ्तर जाकर भी मिला और उन्हें पहली बार दिल्ली के अन्य चिट्ठाकारों से मिलाने नीरज दीवान के घर पर हुई एक बैठक में भी ले गया। मेरा ख्याल है कि हममें से जो कोई भी उनसे मिला, उन्हें भी ऐसा ही लगा होगा। हालांकि मैं उनको पूरी तरह से नहीं जान सका हूं, लेकिन जहां तक मैं उन्हें समझ पाया, उनकी चिट्ठाकारी, भावुकता और व्यावसायिकता के बीच कोई विसंगति नज़र नहीं आई। निश्चित रूप से यदि मैथिली जी शुद्ध कारोबारी व्यक्ति रहे होते तो सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में देश के एक बड़े उद्योगपति कहला रहे होते और हम चिट्ठाकारों के लिए इतनी सुगम पहुंच में नहीं होते।

    उससे भी अधिक हर्ष की बात मुझे यह लगी कि उनके बेटे भी उनकी राह पर ही चल रहे हैं, हालांकि वे पेशेवर कुशलता और व्यावहारिकता के मामले में अधिक सजग और सक्षम जान पड़ते हैं।

    लेकिन आलोक पुराणिक जी ने ब्लॉगिंग के संदर्भ में मार्केट के सिद्धांत की जो व्याख्या की थी, और चिट्ठा जगत के विभिन्न उद्यमों को 'दुकान' की संज्ञा देते हुए "जिसकी दुकान, उसका विधान" का फंडा समझाने की कोशिश की, उससे मैथिलीजी शायद इसलिए आहत हुए क्योंकि उसे वह शायद पिछले विवाद में उनके कैफ़ेहिन्दी संबंधी प्रयास के संदर्भ में प्रयोग की गई 'दुकान' की संज्ञा से जोड़ बैठे।

    कल मुझे अहसास हुआ कि पिछले विवाद के समय जो अप्रिय टिप्पणियां मैथिली जी के बारे में की गई थीं, उनसे वे कितने मर्माहत हुए थे। लेकिन उन्होंने पहले कभी इसे महसूस नहीं होने दिया था।

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  3. मैथिली जी से व्यक्तिगत तौर पर कभी मिलना नहीं हुआ.. कई बार फोन पर बात हुई है.. और हर बार मैं उनकी विनम्रता, उदारता और सहनशीलता से प्रभावित हुआ हूँ.. किसी के प्रति कोई कटुता के दर्शन मैंने उनके व्यवहार में नहीं किए..
    आप ने उनके ऐसे व्यक्तित्व को लोगों के बीच उजागर किया.. इसके लिए आप को धन्यवाद..

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  4. शुक्रिया मैथिली की के बारे मे जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए!!

    मैथिली जी को नमन!!

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  5. बात तो सही है रवि जी. जो काम करने वाले हैं वे हल्ले-गुल्ले से बचते हैं. क्योंकि हल्ला उनका ध्यान बाँटता है और काम करना मुश्किल हो जाता है. मैथिली जी इस बात को बखूबी जानते हैं.

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  6. हिन्द-युग्म की कविताएँ जब कैफ़े-हिन्दी पर आई थीं तो मुझे काफ़ी दिनों तक इसकी ख़बर नहीं थी। मुझे बाद में राजीव जी और गिरिराज जोशी ने बताया था। हर किसी को कैफ़े-हिन्दी का उद्देश्य तुरंत स्पष्ट नहीं हुआ था और उसके पीछे लगे व्यक्ति का महानता का अंदाज़ा भी नहीं था। मगर जब सृजनशिल्पी जी की उनसे मुलाक़ात हुई थी, तब उनके माध्यम से कृतिदेव का जनक होना पता चल पाया था। तब से श्रद्धा हमारे मन में भी अपने आप पनप आई थी।

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  7. कुरेदकर हमने कभी पूछा नहीं और एकाध बार जब वे बताने ही वाले थे कि उनके फांट खूग पाइरेटेड इस्‍तेमाल होते हैं तो मैं झट चुप हो गया...1991 से तो हम ही इन्‍हें इसतेमाल कर रहे हैं- पैसे तो कभी दिए नहीं :)

    उनके इस पक्ष को सामने लाने के लिए शुक्रिया।

    आलोकजी वाले मामले में गलतफहमी दुकान/बाजार शब्‍द के साथ लोगों की नकारात्‍मक पहचान की ही वजह से है शायद।

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  8. जिस दिन मुझे मालूम हुआ था कि कृतिदेव फॉन्ट तथा हिन्दीपैड के विकास का श्रेय मैथिली जी को जाता है उसी दिन से मैं उनका प्रशंसक हो गया था।

    हमारे शहर की तरह अन्य कई छोटे शहरों में लोगों को हिन्दी टाइपिंग का एक ही तरीका पता है नॉन यूनिकोड फॉन्टों के उपयोग द्वारा, इसके लिए सर्वाधिक प्रयोग होता है कृतिदेव का।

    मैथिली जी ने नॉन यूनिकोड युग में हिन्दी की अतुलनीय सेवा की है और वह अब भी जारी है। ढेरों साधुवाद!

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  9. मैथिली जी को मेरा नमन. आशा है तुच्छ टिप्पड़ियों को दरकिनार कर वे अपनी धुन के पक्के बने रहेंगे.
    जीवन में पैसा ही सबकुछ नहीं होता.

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  10. वैसे साथ ही बता दूँ कि अधिकतर जगह उनके फॉन्ट पाइरेटिड ही प्रयोग होते हैं। जहाँ तक मैं जानता हूँ केवल KrutiDev 010 और KrutiDev 020 ही मुफ्त है बाकी सब पेड हैं, लेकिन सब जगह धड़ल्ले से प्रयोग होते हैं।

    हम आम हिन्दुस्तानी जब नया कंप्यूटर लेते हैं तो पता होता ही नहीं कि पाइरेसी क्या बला है। हमारी तरफ अक्सर अधिकतर कंप्यूटरों में हिन्दी के नॉन यूनिकोड फॉन्ट (कृतिदेव सहित) पड़े रहते हैं। ये बात अलग कि आम बंदा उनका कोई प्रयोग नहीं करता। केवल डीटीपी और ग्राफिक्स के लिए ही उनका प्रयोग होता है।

    हर बंदे की तरह शायद मेरे पास भी किसी सीडी में हिन्दी फॉन्टों में वो पड़े हों। वैसे मैंने कृतिदेव का कभी उपयोग नहीं किया क्योंकि हम तो हिन्दी से जुड़े ही यूनिकोड के युग में हैं।

    हाँ हिन्दी पहली बार शायद मैथिली जी के ही हिन्दीपैड सॉफ्टवेयर में टाइप की थी।

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  11. रवि भाई

    आपका साधुवाद :)

    आपने कृतिदेव के जनक से हमारा परिचय कराया वरना तो हम सिर्फ मैथली जी को जानते थे. और अलग से कृतिदेव फान्ट को, जो काफी लम्बे समय इस्तेमाल किया.

    गनीमत यह रही कि शुरुवाती दौर में भी जब उनके खिलाफ लहर उठ चली थी, हमने सिर्फ मजाक ही किया था तो आज नजर मिलाने में हिचकिचाहट न होगी, जब भी दिल्ली जायेंगे तभी. :)

    यूँ भी मैथली जी और उनके सुपुत्र सिरिल से मिलना हमारी अगली भारत यात्रा के अजेंडे में था, अब तो उसको बोल्ड कर दिया है.

    वैसे हमारे बोल्ड करने से भी क्या, जब तक मैथली जी हमसे मिलने को हाँ न करें. हा हा!!

    मैथली जी उनकी सेवा भावना के लिये नमन एवं साधुवाद.

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  12. हमने केवल ये ही दो इस्तेमाल किये थे:

    KrutiDev 010 और KrutiDev 020

    ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये. पता चला कि यही दो फ्री थे, इसलिये बता दिया. हा हा!!! :)

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  13. हुम्म, अपने को तो पहले से ही पता था। वो कैफे-हिन्दी वाले विवाद के दिनों ही सृजन जी ने बताया था!! :)

    वैसे रवि जी, फोटो कुछ धुंधली सी लग रही है। सिर्फ़ फोटो को काटा है या काट के बड़ा भी किया है?

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  14. सरजी
    आलोक पुराणिक ने मैथिलीजी को तब ही यानी मौका-ए-वारदात पर स्पष्टीकरण दे दिया था। मैथिलीजी के मन में उस बात को लेकर आलोक पुराणिक के प्रति कोई नकारात्मक भाव नहीं है। मैथिलीजी के प्रति मेरे मन में भारी सम्मान है।

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  15. शुक्रिया मैथिलीजी के बारे में विस्तार से बताने के लिये। मैथिलीजी के प्रति सम्मान भावना बढ़ गयी।

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  16. आलोक जी की टिप्पणी ने मन मोह लिया.आलोक जी का साधुवाद.

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  17. फ़ल से लदे पेड की इज्जत उसके झुकने से और बढती है.और ऐसा ही एक पेड है विशाल हृदय मैथिली जी .और यही अब उनके पुत्र सिरिल ने ब्लोगवानी बना कर किया है.शान्त और धीर नेपथ्य मे रह कर चुपचाप अपने कार्य मे लगे रहना ही दोनो पिता पुत्र का स्वभाव है

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  18. मैथिलीजी के बारे में जान कर इस बात में और प्रबल विश्वास हो जाता है कि इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिये उन जैसे मौन साधकों का अवदान अप्रितिम है.आज जब ज़माना बताने और जताने में लगा हुआ तो तब मैथिलीजी के लिये मन श्रध्दा से भर उठा है.उनकी शख्सि़यत के बारे में जानकर रवि भाई यह बात भी मन में आई कि हीरे दर-असल वे कोयले के टुकडे़ हैं जो खामोशी से अपने काम में लगे रहते हैं (ये मेरी अत्यंत प्रिय सूक्ति है)

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  19. लालाजी ने बहुत सही नाम का इस्तेमाल किया है, कृतिदेव.


    हमारी ऑफिस में इस फोंट का जोरशोर से उपयोग होता रहा है , और मै हमेशा इसको बनाने वाली कम्पनी का प्रशंसक रहा हुँ. अरे , ये मैथिली जी ही हैं. वाह... इनकी मेहनत और लगन को नमन. साथ ही जोडना चाहुंगा सिरिल भाई भी कम नही है.. पूत के पाँव पालने मे दिखने लगते हैं.. आगे आसमान और भी है. :)

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  20. मैथिली जी ने जो सेवा हिंदी के लिए की है वो अनुकरणीय है। दिल्ली में उनसे फोन पर और फिर व्यक्तिगत रूप से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा था। वे एक शालीन इंसान हैं और हिंदी के लिए आगे भी बहुत कुछ करने की तमन्ना रखते हैं।

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  21. आप सभी का, सहृदय टिप्पणियों के लिए धन्यवाद एवं आभार.

    @अमित जी,
    फोटो काटा है, बड़ा किया है, और इसका ब्राइटनेस भी बढ़ाया है, लिहाजा यह धुंधला हो गया है. तो फोटो की रद्दी क्वालिटी के लिए आप मुझे जिम्मेदार मानें. यदि आपके पास मैथिली जी की हाई क्वालिटी फोटो हो तो मुझे भेजें, इसे बदल दूंगा. :)

    @आलोक सर जी,
    आपकी बातों का किसी के भी मन में कभी भी कोई नकारात्मक भाव तो शर्तिया आ ही नहीं सकता. आप वैसे भी व्यंग्यकार हैं. व्यंग्य की छुरी यदा कदा चलाने की कोशिशें मैं भी करता हूँ - इसी लिए कह रहा हूँ.
    और, आपके बताए चिट्ठाबाजार की ओर कदम बढ़ाने की मेरी खुद की कोशिश भी पिछले कोई सालेक भर से जारी है... :)

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  22. प्रिय रवि,

    इस लेख को पढकर मैं दंग रह गया. हिन्दी समाज में एक से एक हीरे छिपे हुए हैं. मैथिली जी को शत शत नमन एवं इस लेख के लिये आपको अभार. आज ही हम सारथी पर इसके बारे में एक टिप्पणी देंगे.

    इस तरह के कई लोक हिन्दीजगत में हैं, एवं उनको ढूढ निकाल कर उनके बारे में लिखें तो सारे हिन्दीजगत को प्रोत्साहन मिलेगा.

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  23. मुझे तो तभी मालुम चला था पर मैंने लिखा नहीं क्योंकि शायद मैथली जी झिझकते थे।

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  24. संजय बेंगाणी3:04 pm

    हम तो मिल आये मैथलीजी. विनम्र, शांत और भावुक व्यक्ति है. हिन्दी सेवी को सलाम.

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  25. पिछले वर्ष राजस्थान से पापाजी आये थे तब मैं उन्हें बरहा६ बता रहा था पर उन्हें कुछ जचाँ नहीं और मुझसे पूछने लगे कि अगर कहीं से कृतिदेव फोन्ट मिल जाये तो मजा आये, गाँव में उनके कम्प्यूटर पर कृतिदेव लगा है और वे उसी से टंकण का काम करते हैं।
    मुझे आज तक पता नहीं था कि मैथिली जी ने इतना सारा कार्य किया है हिन्दी के लिये। और मुझे यह भी नहीं पता था कि भविष्य में इस फोन्ट को बनाने वाले मैथिलीजी से बात करने का मौका मिलेगा। आज गर्व होता है कि मैथिली जी से मैने बात की है।

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  26. हीरा तो यहां छिपा हुआ है जो तन मन धन से हिन्दी को सींच रहा है अपने तन के खून से. मेवा ले रहें है अन्य लोग जिन्होने सिर्फ गाल बजाये.
    सुना है कल न्यूयार्क के आठवें विश्व हिन्दी समीलन में 100 हिन्दी सेवियों को सम्मानित किया गया. क्या वे ही सम्मान के असली हक़दार हैं ? मैथिली जी क्यों नही.

    आइये इस बात की मुहिम चलायें कि सच्चे हिन्दी सेवियों को भी सरकार पहचाने.
    किंतु मैथिली जी जैसे व्यकति जी पहचान सरकारी सम्मानों से नही होती. जनता का प्यार ही असली प्यार है.

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  27. ये जानकारी सामने लाने के लिये शुक्रिया रवि! हममें से कई ये पहले से भी जानते थे। बड़ा आश्चर्य होता है कि धुरविरोधी ने एक दफा ताल ठोंककर वेबदुनिया के सीईओ के बनाये आईएमई के असल निर्माता होने पर शक जाहिर किया था। मैं धुरविरोधी से अब जानना चाहुंगा कि वे किस तरह साबित करेंगे कि कृतिदेव मैथिली जी का ही बनाया फाँट है?

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  28. ब्लॉगिंग की दुनिया में आये जुम्मा-जुम्मा चार ही दिन हुए हैं, कुछ ही माह पहले कैफ़े हिन्दी पर एक आलेख भेजा था और उसमें जैसा कि सामान्यतः सभी के लिये लिखता हूँ "मैथिली जी" लिखा, लेकिन मैथिली जी ने मुझे कहा कि "जी" लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है, सोचिये कितना बडे़ ह्रदय वाले व्यक्ति हैं वे.. जिसने हिन्दी के लिये इतना बडा़ काम किया हो वह इतना विनम्र.. इसी को बड़प्पन कहते हैं.. हालांकि मै तो हिन्दी टाइपिंग जानता नहीं हूँ इसलिये मैंने कभी कृतिदेव प्रयोग नहीं किया, यदि "बरहा" के बारे में पता न चलता तो शायद ब्लॉगिंग की दुनिया में भी नहीं आ पाता, लेकिन यह जानकर बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ कि हिन्दी के इतने बडे़ सेवक मुझे व्यक्तिगत रूप से मेल भी भेजते हैं...उन्हें शत-शत नमन

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  29. अपने लिये नया क्या है रवि?
    हिन्दी चिट्ठाकारी में ‘करो भी और गालियां भी खाओ’ का एहसास कईयों को अखरा है!

    चिट्ठा-विश्व और इन्डीब्लॉगीज़ के समय देबू कोसे गए.
    नारद के समय जीतू को गरियाया जाता था.
    फ़िर ब्लॉगवाणी का नंबर लगा.. आपने देखा होगा की पुरानों ने प्रतिक्रिया तक नही की - हम इस चक्र का हिस्सा रह चुके हैं.

    डेवलपर्स का जोश और संवेदनशीलता कम नही हुई, लेकिन आज समझ में आता है कि नेट पर कई लोकप्रिय सेवाओं का शुल्क मजबूरन इसलिये लिया जाने लगेगा कि गंभीर और कद्रदान प्रयोक्ता को बिना रुकावट बढिया सेवा मिले और कचरा रहे बाहर.

    यदि भावुकता के चलते निशुल्क सेवा करते हुए खिन्न करने वाले आक्षेप नही सहे जाते तो फ़िर समस्या ही क्या है व्यवसायिक हो जाने में? चाहें तो वे ब्लॉगवाणी को किसी आधार पर सशुल्क कर दें ताकी गंभीर/पुराने और सक्षम प्रयोक्ता को असुविधा तो ना हो.जानता हूं कि, ऐसे में तो मात्र खर्च कर सकने वाला ही अपने कद्रदान होने की चिप्पी लगा सकेगा, विडंबना है ना! हां शायद इसके एवज में किसी और मुफ़्त सेवा को बाईज्जत तरीके से भोगने की तमीज सीख लेंगे लोग - तो भी क्या बुरा होगा, दोबारा निशुल्क हाज़िर हो जाओ! ;-)

    बिना कोई पूर्वसूचना दिये चुपचाप एक निशुल्क सेवा का बंद किया जाना भी उसके निर्दोष प्रयोक्ताओं को तो अखरता ही है. मुफ़्तखोर होने के नाते क्या इसकी शिकायत करने का अधिकार भी नही होता उसी प्रयोक्ता के पास जो कल तक बडे प्रेम से अपने प्रिय एग्रीगेटर का लोगो ब्लाग पर चस्पा किये बैठा था?

    उत्तर देंहटाएं

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