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चिट्ठाकारी, भावुकता और व्यावसायिकता

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चिट्ठाकार मिलन समारोह की तमाम रपटें पढ़ीं. एक विशेष बात ने मुझे झकझोरा – आलोक जी की टिप्पणी पर मैथिली जी भावुक हो उठे थे. जहाँ आलोक जी का क...




चिट्ठाकार मिलन समारोह की तमाम रपटें पढ़ीं. एक विशेष बात ने मुझे झकझोरा – आलोक जी की टिप्पणी पर मैथिली जी भावुक हो उठे थे. जहाँ आलोक जी का कहना भी सत्य है और उस पर मैं भी अमल करना चाहूँगा, वहीं मैथिली जी की सोच, भले ही उन्होंने आलोक जी की बात को व्यापक अर्थ में न लेकर व्यक्तिगत तौर पर ले लिए हों, भी सही है. व्यक्ति अपने पैशन, अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर आमतौर पर भावुक तो होता ही है.

निम्न पत्र मैंने फरवरी 07 में मैथिली जी को लिखा था, और उनसे प्रकाशन की अनुमति मांगी थी. तब उन पर उनके नए नवेले कैफ़े हिन्दी साइट पर हिन्दी चिट्ठों की सामग्री अनुमति के बगैर प्रकाशित करने के आरोप लगाए गए थे. और, जाहिर है, इस चिट्ठा प्रविष्टि को प्रकाशित करने के लिए उन्होंने उस वक्त यह कह कर मना कर दिया था कि यह तो व्यक्तिगत विज्ञापन जैसा कुछ हो जाएगा. आज जब श्रीश जी की टिप्पणी से सबको मालूम हो चला है, तो मैं भी यहाँ धृष्टता करते हुए इस पत्राचार को उनसे पूछे बगैर प्रकाशित कर रहा हूँ. आशा है, वे इसे अन्यथा नहीं लेंगे और मुझे माफ़ करेंगे.

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आदरणीय मैथिली जी,
यह चिट्ठा पोस्ट मैं आपके लिए लिखना चाहता हूं. कृपया अनुमति देंगे. :)
**-**
फलों से लदा वृक्ष सदैव झुका ही रहता है...

दूसरे तरीके से, इसी बात को कहा जाता है – थोथा चना बाजे घना. यानी जिनमें तत्व होता है, वे विनम्र होते हैं, और अनावश्यक हल्ले-गुल्ले में यकीन नहीं रखते.


इस बात को यकीनन सिद्ध करते हैं मैथिली गुप्त जी. मैथिली जी ने वैसे तो हिन्दी चिट्ठा जगत में अपने पदार्पण के साथ ही समुद्र की शांत लहरों में तीव्र हलचलें पैदा कर दी थीं, परंतु वे स्वयं शांत, विनम्र और झुके-झुके ही रहे. उनके कार्यों से विनम्रता के साथ उत्कृष्टता भी झलकती रही जिससे उनके बारे में और भी जानने की इच्छा बनी रही. उन्होंने संकेत दिया था कि हिन्दी के लिए उन्होंने पहले कुछ खास कार्य किए थे. मैंने उनसे निवेदन किया कि संभव हो तो वे अपने चिट्ठे पर बताएँ ताकि हमारे ज्ञान में वृद्धि हो सके.


परंतु मैथिली जी विनम्र ही बने रहे. उन्होंने मुझे अलग से बताया कि कृतिदेव, देवलिज, आगरा, अमन, कनिका, कृतिपैड इत्यादि श्रेणी के 400 से अधिक हिन्दी, गुजराती व तमिल फ़ॉन्ट्स की रचना इन्होंने की है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया.


मैं कम्प्यूटरों पर हिन्दी में काम सन् 1987 से कर रहा हूँ – जब डॉस आधारित अक्षर पर काम होते थे. 1993-94 में विंडोज के आने के बाद धीरे से माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड पर इक्का दुक्का हिन्दी फ़ॉन्ट से काम होने लगा था. इसके कुछ समय बाद कृतिदेव श्रेणी के हिन्दी फ़ॉन्ट्स आए और वे विंडोज के हर प्रोग्राम में हिन्दी में कार्य हेतु इस्तेमाल में लिए जाने लगे. यूनिकोड के आने से पहले मेरा भी सारा कार्य भी कृतिदेव में ही होता था. आज भी विंडोज़ 98 में हिन्दी डीटीपी अनुप्रयोगों में आमतौर पर या तो श्री-लिपि इस्तेमाल में ली जाती है या फिर कृतिदेव. कृतिदेव का इस्तेमाल अत्यंत आसान और किसी अन्य प्रोग्राम के भरोसे नहीं होने के कारण (आप सिर्फ फ़ॉन्ट संस्थापित कर विंडोज के किसी भी अनुप्रयोग में काम कर सकते हैं) यह बेहद लोकप्रिय भी रहा.

कृतिदेव फ़ॉन्ट की पायरेसी को रोकने के लिए किसी अन्य सुरक्षा उपकरण मसलन हार्डवेयर डांगल या की-फ़्लॉपी/ सीडी की आवश्यकता नहीं होने से आमतौर पर विंडोज कम्प्यूटरों में यह पूर्व संस्थापित (और संभवतः पायरेटेड ही) ही आता है. अभी भी करीब सत्तर हजार सरकारी और गैर सरकारी इंटरनेट साइटों में इसी श्रेणी के फ़ॉन्ट इस्तेमाल में लिए जा रहे हैं. व्यक्तिगत इस्तेमाल की संख्या तो लाखों में है. वेब जगत् के बहुत से हिन्दी फ़ॉन्ट भी इसी के वेरिएन्ट ही है. मुझे नहीं लगता कि मैथिली जी को मेरे जैसे प्रत्येक प्रयोक्ता से उनके कार्य की कीमत (रॉयल्टी) कभी मिली हो. अगर उन्हें मेरे जैसे प्रयोक्ताओं से एक रुपए भी लाइसेंस की फ़ीस के रूप में मिलते होते तो वे निःसंदेह आज भारत के सबसे अमीर सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामरों में होते. रचनाकार की अस्सी प्रतिशत से अधिक सामग्री कृतिदेव फ़ॉन्ट से परिवर्तित सामग्री है. आज भी मेरे पास कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने संबंधी सहयोग हेतु ईमेल आते रहते हैं – जिससे यह अंदाजा होना स्वाभाविक है कि कृतिदेव ने हिन्दी के लिये कितने महान कार्य किए हैं.


यह चिट्ठा पोस्ट उनके कृतिदेव फ़ॉन्ट के मेरे द्वारा अब तक इस्तेमाल के लाइसेंस फ़ीस के एवज के रूप में समर्पित. आगे के इस्तेमाल के लिए (रेखा (पत्नी) अभी भी इसी – कृतिदेव फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करती हैं अपने नोट्स व पेपर्स तैयार करने के लिए) उन्हें लाइसेंस फ़ीस प्रदान कर हमें खुशी होगी.

मैथिली जी को सादर नमन्.
***-***
सधन्यवाद,
रवि

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चित्र - सौजन्य - दुनिया मेरी नजर से

अद्यतन # 1 - मैथिली जी का नया, वर्तमान में प्रदर्शित चित्र अमित जी के सौजन्य से .

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