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संदर्भ- अमेरिका के वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट का बच्चों पर किए शोध का नतीजा-

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भारत ही नहीं दुनिया के प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को साफ-सुथरा, सुरक्षा व कीटाणु रहित वातावरण देना चाहते हैं, जिससे उनके बच्चे गंदगी की चपेट में आकर बीमार न पड़ें। लेकिन अब माता-पिता इसे लेकर आश्वस्त हो सकते हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी बच्चों के लिए हानिकारक नहीं है, बल्कि उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं को टीम के अगुवा वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट ने मिट्टी और बच्चों पर यह शोध किया है। दो बच्चों के पिता गिलबर्ट ने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो से माइक्रोबॉयलॉजी परिस्थितिकी तंत्र की पढ़ाई की है। वे खोज कर रहे हैं कि मिट्टी और उसमें पाए जाने कीटाणु किस तरह बच्चों को प्रभावित करते हैं। गिलबर्ट ने मिट्टी में पाए जाने वाले ‘जीवाणुओं से फायदे, बच्चों का विकास और प्रतिरक्षा‘ नाम से एक किताब लिखी है। 

जी हां..., अब नई खोजों और प्रयोगों से यही हकीकत सामने आ रही है कि हाथ धोकर सफाई के पीछे पड़ना मानव जीवन के लिए खतरा है।  अब नए अनुसंधान तय कर रहे हैं कि हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से जो सूक्ष्म जीव, मसलन जीवाणु (बैक्टीरिया) और विषाणु (वायरस) प्रविष्ट होते हैं, वे बीमारियां फैलाने वाले दुश्मन न होकर बीमारियों को दूर रखने वाले मित्र भी होते हैं। इसीलिए गिलबर्ट ने कहा है कि कई बार जमीन पर खाना गिरने के बाद उसे फेंक देते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि वह गंदा हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। खाने में लगे कीटाणु बच्चे के लिए फायदेमंद होंगे। बच्चों को मिट्टी में खेलने से एलर्जी इसलिए होती हैं, क्योंकि हम उन्हें कीटाणु से बचाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। जीवाणु की कमी की वजह से बच्चे अस्थमा, फूड एलर्जी जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। 

प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव निवासरत हैं, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत व काया को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। हमारे शरीर में जितनी कोशिकाएं हैं, उनमें 10 प्रतिशत हमारी अपनी हैं, बाकी कोशिकाओं पर 9 करोड़ सूक्ष्म जीवों का कब्जा है। जो शरीर में परजीवी की तरह रहते हैं। तय है, हमें इनकी उतनी ही जरूरत है, जितनी की उनको हमारी। बल्कि अब तो वैज्ञानिक यह भी दावा कर रहे हैं कि मानव और सूक्ष्म जीवों का विकास साथ-साथ हुआ है। मनुष्य ने जीनोम को अब अक्षर-अक्षर पढ़ लिया गया है। इससे ज्ञात हुआ है कि हमारे जीनोम में हजारों जींस का वजूद जीवाणु और विषाणुओं की ही उपज है।

       नए अनुसंधान वैज्ञानिक मान्यताओं को बदलने का काम भी करते हैं और धीरे-धीरे नई मान्यता प्रचलन में आ जाती है। बीसवीं सदी के पहले चरण तक यह धारणा थी कि सूक्ष्मजीव ऐसे शैतान हैं, जो हमारे शरीर में केवल बीमारियां फैलने का काम करते हैं। इसीलिए इनसे दूरी बनाए रखने का आसान सा तरीका अपनाए जाने की नसीहत सामने आई कि यदि चिकित्सक अपने हाथों को साबुन से मल-मलकर धोने की तरकीब अपना लें तो इस एकमात्र उपाय से अस्पताल में इलाज के दौरान मर जाने वाले लाखों मरीजों की जान बचाई जा सकती है ? अलबत्ता नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी वैज्ञानिक इल्या मेचनीकोव ने अपने शोध से इस अवधारणा को बदलने का काम किया। जब 1910 के आसपास मेचनीकोव बुल्गारिया के निरोगी काया के साथ लंबी उम्र जीने वाले किसानों पर शोध कर रहे थे, तब किसानों की लंबी आयु का रहस्य उन्होंने उस दही में पाया जिसे आहार के रूप में खाना उनकी दिनचर्या में शामिल था।

              दरअसल खमीर युक्त दुग्ध उत्पादों में ऐसे सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारे जीवन के लिए जीवनदायी हैं। सूक्ष्मजीव हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण पर होते हैं। ये समूह शरीर में प्रविष्ट होकर पाचन तंत्र प्रणाली में क्रियाशील हो जाते हैं। इस दौरान ये लाभदायी जीवाणुओं की वृद्धि को उत्तेजित करते हैं और हानिकारक जीवाणुओं का शमण करते हैं। इन्हें चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘अनुजीवी‘ या ‘प्रोबायोटिक्स‘ कहते हैं। अब अनुजीवियों को सुगठित व निरोगी देह के लिए जरूरी माना जाने लगा है। इन्हें प्रतिरोधक के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह भी आहार वैज्ञानिक देने लगे हैं। ‘प्रोबायोटिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है। जिसका सरल सा भावार्थ है ‘स्वस्थ्य जीवन के लिए उपयोगी’। प्रोबायोटिक्स शब्द को चलन में लाने की सबसे पहले शुरूआत लिली एवं स्टिलवैल वैज्ञानिकों ने की थी। इसका प्रयोग उन्होंने तब किया जब वे प्राटोजोआ द्वारा पैदा होने वाले तत्वों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि इसमें ऐसे विचित्र तत्व विद्यमान हैं, जो तत्वों को सक्रिय करते हैं। हालांकि यह कोई नया पहलू नहीं था। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रंथों में जीवाणुओं के संबंध में विस्तृत जानकारियां हैं। आयुर्वेद दुग्ध के सह-उत्पादों के गुण-लाभ से भरा पड़ा है। अर्थववेद और उपनिषदों में भी सूक्ष्म जीवों के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट के फारसी संस्करण में उल्लेख है कि अब्राहम ने खट्टे दूध व लस्सी के सेवन से ही लंबी आयु हासिल की थी। 76 ईसापूर्व टिलनी नामक रोमन इतिहासकार ने जठराग्नि (गेस्ट्रोइंटीराईटिस) के उपचार के लिए खमीर उठे दूध के उपयोग को लाभकारी बताया था। इन जानकारियों से तय होता है कि अनुजीवियों के अस्तित्व और महत्त्व से आयुर्वेद के वैद्याचार्य बखूबी परिचित थे।

       सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार होने से पहले तक हम इस वास्तविकता से अनजान थे कि 10 लाख से भी अधिक जीवन के ऐसे विविध रूप हैं, जिन्हें हम सामान्य रूप से देखने में अक्षम हैं। इस हैरतअंगेज जानकारी से चिकित्सा विज्ञानियों का साक्षात्कार तब हुआ, जब लुई पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने एक दल के साथ सूक्ष्मदर्शी उपकरण को सामान्य जानकारियां हासिल करने के लिए प्रयोग में लाना शुरू किया। जब इन सूक्ष्म जीवों को पहली मर्तबा सूक्ष्मदर्शी की आंख से देखा गया तो वैज्ञानिक हैरानी के साथ परेशान हो गए और वे इन जीवों को मनुष्य का दुश्मन मानने की भूल कर बैठे। जैसे इंसान की मौत का सबब केवल यही जीव हों। लिहाजा इनसे मुक्ति के उपाय के लिहाज से दूध उत्पादों से इनके विनाश की तरकीबें खोजी जाने लगीं। और विनाश की इस प्रक्रिया को ‘पाश्चरीकरण‘ नाम से भी नवाजा गया। प्रति जैविक या प्रतिरोधी एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण और उनके प्रयोग का सिलसिला भी इनके विनाश के लिए तेज हुआ। लेकिन 1910 में इस अवधारणा को इल्या मेचनीकोव ने बदलने की बुनियाद रखी और फिर मनुष्य के लिए इनके लाभकारी होने के शोधों का सिलसिला चल निकला।

       सूक्ष्मजीव इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक ग्राम मिट्टी में लगभग दो करोड़ जीवाणु आसानी से रह लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इनकी करीब 10 हजार प्रजातियां हैं। ये हरेक विपरीत माहौल में सरलता से रह लेते हैं। इसीलिए इनका वजूद धरती के कण-कण में तो है ही, बर्फ, रेगिस्तान, समुद्र और जल के गर्म स्रोतों में भी विद्यमान है। हाल ही में स्कॉटलैण्ड के सेंट एंड्रयूज विश्व विद्यालय के शोधकर्त्ताओं ने अफरीकन जनरल ऑफ साइंस में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि नमीबिया के ऐतोशा राष्ट्रीय उद्यान में जीवाश्मविदों ने खुदाई की। इस खुदाई के निष्कर्षों में दावा किया गया है कि उन्होंने सबसे पहले अस्तित्व में आए सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों को खोज निकाला है। ये जीवाश्म 55 करोड़ से लेकर 76 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं। ये ओटाविया ऐंटिक्वा स्पंज जैसे जीव थे। जिनके भीतर ढेर सारे छिद्र बने हुए थे, जो जीवाणु, विषाणु और शैवालों को खुराक उपलब्ध कराने में मदद करते थे। शोधकर्ताओं का दावा है कि हिमयुग से पहले के समय में पनपने वाले ये बहुकोशीय जीव हिमयुग के कठोर बर्फानी मौसम को भी बर्दाश्त करने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने इन जीवों को बेहद पुराना बताते हुए कहा है कि पृथ्वी पर सभी जीवों की उत्पत्ति इन्हीं जीवों से हुई होगी ? इससे तय होता है कि इनकी जीवन रक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है।

       मानव शरीर के तंत्र में अनुजीवियों का जीवित रहना जरूरी है। क्योंकि ये सहजीवी हैं और इनका संबंध भोजन के रूप में ली जाने वाली दवा से है। दही में ‘बाइफिडो बैक्टीरियम’ वंश के विषाणु पाए जाते हैं। इन्हें ही लेक्टोबेसिलस बाईफिडस कहते हैं। ये हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण मसलन आंतों में पल्लवित व पोषित होते रहते हैं। इसे ही आहार नाल कहा जाता है। यह लगभग 30 फीट लंबी व जटिल होती है। आहार को पचाकर मल में तब्दील करने का काम जीवाणु ही करते हैं। इस नाल में जीवाणुओं की करीब 500 प्रजातियां मौजूद रहती हैं। जिन्हें 50 विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। इन सूक्ष्म जीवों की कुल संख्या करीब 1011 खरब है। मनुष्य द्वारा शौच द्वार विसर्जित मल में 75 फीसदी यही जीवाणु होते हैं। शरीर में जरूरी विटामिनों के निर्माण में भागीदारी इन्हीं जीवाणुओं की देन है। यही अनुजीवी शरीर में रोग पैदा करने वाले पैथोजनिक जीवाणुओं को नष्ट करने का काम भी करते हैं। शरीर में रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद चिकित्सक जो प्रतिरोधक दवाएं देते हैं, उनके प्रभाव से बड़ी संख्या में शरीर को लाभ पहुंचाने वाले अनुजीवी भी मर जाते हैं। इसीलिए चिकित्सक दही अथवा ऐसी चीजें खाने की सलाह देते हैं, जिससे लेक्टोबेसिलस अनुजीवियों की बड़ी तादाद खुराक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाए।

       जिन जीवाणु और विषाणुओं को शरीर के लिए हानिकारक माना जाता था, वे किस तरह से फायदेमंद हैं, यह अब नई वैज्ञानिकों खोजों ने तलाश लिया है। कुछ समय पहले तक यह धारणा प्रचलन में थी कि छोटी आंत में अल्सर केवल तनावग्रस्त रहने और तीखा आहार लेने से ही नहीं होता, बल्कि इस रोग का कारक ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु है। इस सिद्धांत के जनक डॉ. बैरी मार्शल और रॉबिन वारेन थे। किंतु न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के स्कूल अॉफ मेडिसिन के डॉ. मार्टिन ब्लेसर ने इस सिद्धांत को एकदम उलट दिया। उन्होंने अपने अनुसंधान में पाया कि ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु मनुष्य जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं। यह करीब 15 करोड़ सालों से लगभग सभी स्तनधारियों के शरीर में एक सहजीवी के रूप रोग प्रतिरोधात्मक की भूमिका का निर्वहन करता चला आ रहा है। इसकी प्रमुख भूमिका पेट में तेजाब की मात्रा को एक निश्चित औसत अनुपात में बनाए रखना है। यह पेट में बनने वाली अम्लीयता का इस तरह से नियमन करता है कि वह जीवाणु और मनुष्य दोनों के लिए ही फलदायी होता है। किंतु जब जीवाणु का ही हिस्सा बने रहने वाला सीएजी नाम का जीव उत्तेजित हो जाता है तो शरीर में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं। बहरहाल,हेलिकोबैक्टर पायलोरी की आंतों में मौजूदगी,अम्ल के नियमन की प्रक्रिया जारी रखते हुए, प्रतिरक्षा तंत्र को ताकतवर बनाने का काम करती है। इसलिए ज्यादा मात्रा में प्रतिरोधक दवाएं लेकर इन्हें मारना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

       इस बाबत् एक और बानगी देखें। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में एक महिला उपचार के लिए आई। दस्तों के चलते इसके प्राण ही खतरे में पड़ गए थे और दवाएं बेअसर थीं। तमाम नुस्खे आजमाने के बाद चिकित्सा दल ने एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया और इस महिला को निरोगी व्यक्ति के मल में मौजूद जीवाणुओं की सिलसिलेवार खुराकें दीं। प्रयोग आश्चर्यजनक ढंग से सफल रहा। 48 घंटों के भीतर दस्त बंद हो गए। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञानियों में जिज्ञासा जगी कि अनुजीवियों और प्रतिरक्षा तंत्र के सह-अस्तित्व आधारित उपचार प्रणालियां विकसित की जाएं। इस परिकल्पना को ही आगे बढ़ाते हुए दमा रोग के उपचार का सिलसिला स्विस इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एण्ड अस्थमा रिसर्च में काम शुरू हुआ। इस संस्था के प्रतिरक्षा तंत्र वैज्ञानिकों ने उपचार के नए प्रयोगों में पाया कि टी कोशिकाओं में गड़बड़ी के कारण एलर्जी रोग उत्पन्न होते हैं। अब पौल फोरसाइथ जैसे वैज्ञानिक इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, इस कोशिश में लगे हैं कि वे कौन सी कार्य-प्रणालियां हैं जिनके जरिए अनुजीवी प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नियमन रखते हुए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसी कड़ी में 2010 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि क्लॉस्ट्रडियम परफ्रिंजेंस नाम का जीवाणु बड़ी आंत का निवासी है। यह जीवाणु जरूरत पड़ने पर टी कोशिकाओं में इजाफा करता है। यही कोशिकाएं रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों से लड़कर उन्हें परास्त करती हैं।

       अनुजीवियों के महत्व पर नए अनुसंधान सामने आने के साथ-साथ चिकित्सा-विज्ञानियों की एक शाखा कीटाणुओं पर अनुसंधान करने में जुट गई। हालांकि इसके पहले शताब्दियों से यह अवधारणा विकसित होती चली आ रही है कि शरीर में मुंह के जरिए प्रविष्ट हो जाने वाले कृमि मानव समाज में बीमारियों के जनक हैं ? 1870 में तो पूरा एक ‘कीटाणु सिद्धांत’ ही वजूद में आ चुका था। जिसका दावा था की प्रत्येक बीमारी की जड़ में वातावरण में धमा-चौकड़ी मचाए रखने वाली कृमि हैं। इस सिद्धांत के आधार पर ही बड़े पैमाने पर कीटाणुनाशक प्रतिरोधक दवाएं वजूद में आईं। पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने का काम करने वाले कीटाणुओं को रोग का कारक मानते हुए, इन्हें नष्ट करने के अभियान चलाए जाने लगे। परिवेश को संपूर्ण रूप से स्वच्छ बनाए रखने के साथ मानव अंगों को भी साफ-सुथरे रखने के अभियान इसी सिद्धांत की देन हैं। लेकिन इस सिद्धांत को पलटने का काम रॉबर्ट कोच, जोसेफ लिस्टर और फ्रांस्सेको रेडी जैसे वैज्ञानिकों ने किया। इन्होंने पाया कि कृमि प्रजातियों में कई प्रजातियां ऐसी भी हैं,जो रोगों को नियंत्रित करती हैं। अब तो यह दावा किया जा रहा है कि कोलाइटिस क्रोहन और ऑटिज्म जैसे रोग अतिरिक्त सफाई का माहौल रच दिए जाने के कारण ही बढ़ रहे हैं।

       इस सिलसिले में यहां एक अनूठे उपचार को बतौर बानगी रखना जरूरी है। अयोवा विश्वविद्यालय में कृमियों के महत्व पर शोध चल रहा है। यहां एक ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे को उपचार के लिए लाया गया। ऑटिज्म एक ऐसा बाल रोग है, जो बच्चों को बौरा (पगला) देता है। वे खुद के अंगों को भी नाखून अथवा दांतों से काटकर हानि पहुंचाने लगते हैं। अपनी मां के साथ भी वे ऐसी ही क्रूरता का व्यवहार अपनाने लग जाते हैं। जब दवाएं बेअसर रहीं तो ऐसे बच्चों के इलाज के लिए अयोवा विश्वविद्यालय में जारी कृमि-शोध को प्रयोग में लाया गया। चिकित्सकों की सलाह पर इन बच्चों को ‘ट्राइचुरिस सुइस’ कीटाणु के अण्डों की खुराकें दी गईं। बालकों के पेट में अण्डें पहुंचने पर ऑटिज्म के लक्षणों में आशातीत बदलाव दिखाई देने लगा और धीरे-धीरे इनके अतिवादी आचरण में कमी आती चली गई।

       इन प्रयोगों ने तय किया है कि धवल स्वच्छता के अतिवादी उपाय मनुष्य के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं ? मनुष्य और जीवों का विकास प्रकृति के साथ-साथ हुआ है। जिस तरह से खेतों में कीटनाशकों का बहुलता से प्रयोग कर हम कृषि की उत्पादकता और खेतों की उर्वरा क्षमता खोते जा रहे हैं, उसी तर्ज पर ज्यादा से ज्यादा एंटी बायोटिकों का प्रयोग कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करते हुए उसे बीमारियों का अड्ढा बना रहे हैं। जीवाणु, विषाणु और कीटाणु मुक्त जल और भोजन को जरूरी बना दिए जाने की मुहिमें भी खतरनाक बीमारियों को न्यौत रही हैं। दुर्भाग्य से सफाई का दारोमदार अब कारोबार का हिस्सा बन गया है और मनुष्य को जीवन देने वाले तत्वों को निर्जीवीकृत करके आहार बनाने की सलाह दी जा रही है। सूक्ष्मजीवों से दूरी बनाए रखने के ये उपाय दरअसल जीवन से खिलवाड़ के पर्याय बन जाने के नाना रूपों में सामने आ रहे हैं। लिहाजा ज्यादा स्वच्छता के उपायों से सावधान रहने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्री राम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

फोन- 09425488224&9981061100Qksu 07492 404524

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने पुनर्जन्म लिया और एक बार फिर वो भारत की यात्रा पर निकल लिया. पेश है उसकी सन् 2017 की भारत यात्रा का अति-संक्षिप्त विवरण –

जैसे ही मैं इंदिरा गांधी एयरपोर्ट टर्मिनल पर उतरा, सामने दैत्याकार बोर्ड पर चीनी मोबाइल ब्रांड वीवो का विज्ञापन लगा था और लिखा था – वीवो वेलकम्स यू इन इंडिया! मुझे तब से ही लग गया था कि इस बार की भारत यात्रा भी अच्छी खासी मजेदार, दिलचस्प रहने वाली है.

मैं एक्ज़िट गेट की तरफ आगे बढ़ा. एक बेहद विशालकाय, ह्यूआवेई के 4-K टीवी स्क्रीन पर कोई भारतीय पसंदीदा शो चल रहा था. देखने वालों की भीड़ लगी थी. सोचा मैं भी देखूं. जैसे ही देखने के लिए मैंने अपना मुंह घुसाया, एक ब्रेक आया और विज्ञापन आया – ओप्पो प्रेजेंट्स द अनलाफ़्टर शो!

अचानक मुझे याद आया कि चलो इंडिया पहुँच गए हैं यह बात घर वालों को बता दी जाए. मैंने एयरपोर्ट की मुफ़्त वाई-फ़ाई सेवा का लाभ उठाने के लिए साइट खोली. वहाँ प्रकट हुआ – वेलकम टू एयरपोर्ट फ्री हाई स्पीड वाई-फ़ाई सर्विसेज. स्पांसर्ड बाई अलीबाबा एंड मैनेज्ड बाई जेडटीई.

मैंने एयरपोर्ट का लंबा गलियारा पैदल नापने के बजाय उपलब्ध इलैक्ट्रिक व्हीकल से पार करना चाहा. साफ सुथरा और आरामदायक इलैक्ट्रिक वाहन था वो. उत्सुकतावश, वाहन के नाम-पट्ट पर स्वयमेव निगाह चली गई. नाम पत्र पर शेनडांग ज़ूफ़ेंग व्हीकल कं लिमिटेड चाइन का नाम नजर आया. ओह!

मेरे सामने एक सुंदरी अपने टैब पर यू-ट्यूब पर साई का नया डांस वीडियो देख रही थी. उसके टैब का रंग बड़ा अच्छा था. कुछ-कुछ नीली आभा लिए. मैंने यूँ ही पूछ लिया – कौन सा टैब है यह?

शियामी नोट 6 – उसने गर्व से उत्तर दिया.

सामने एक गिफ़्ट और सोवेनियर शॉप दिखा तो मैं वहाँ चला गया. की-रिंग व की-चेन से लेकर रिमोट कंट्रोल्ड ड्रोन व हेलिकॉप्टर खिलौने सब कुछ थे वहाँ. मैंने एक दो पैकेट उठाए और कीमतें और निर्माता आदि का नाम देखा. कीमतें तो विविध थीं, जेब-जेब के मुताबिक, परंतु निर्माता-देश एक ही छपा नजर आया – मेड इन चाइना. शायद इनके पैकेटों में प्रिंटिंग मिस्टेक आ गया होगा जिसकी वजह से हर पैकेट पर मेड इन चाइना छपा था. खिलौने भी, चॉकलेट भी, प्रतीक चिह्न भी – सबकुछ मेड इन चाइना. वो भी भारत में?

मैं बाहर निकला तो ट्रैफ़िक जाम में फंस गया. रक्षाबंधन का समय था तो सड़कों बाजारों में वैसे भी बहुत भीड़ पहले से थी, ऊपर से एक बड़ा भारी जुलूस भी निकल रहा था. जिसमें लोगों ने पोस्टर बैनर टांग रखे थे – स्वदेशी अपनाओ, चीनी रक्षाबंधन का बहिष्कार करो!

मेरी पिछली यात्रा में दिल्ली के ठगों की खूब धूम थी. पता नहीं इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद उन बिरादरी का क्या हाल हुआ होगा. एक से यूँ ही बातों बातों में पूछा, तो उसने संसद भवन का पता बताया और टीप दी कि अब वहाँ केवल दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के ठग मिलते हैं.

मैंने अपनी भारत यात्रा वहीं समाप्त कर दी – आगे की यात्रा में मेरी दिलचस्पी खत्म हो गई. हाँ, एकमात्र दिलचस्प बात यह मिली कि भारत विचित्रताओं का देश अभी भी बना हुआ है - नाम यूँ हिन्दुस्तान है, सामान सब चीनी भरा है, और भाषा अंग्रेज़ी है!









आपके हाथों में यह वाला स्मार्टफ़ोन यकीनन आपके लिए टेस्टी ही होगा परंतु सामने वाले को यह घोर नापसंद भी हो सकता है। इसलिए, जरा संभलकर और सोच विचार कर!

अब, इसका बैंगलुरु मेट्रो में चल रहे हिन्दी कन्नड़ विवाद से कोई लेना देना है या नहीं यह तो नहीं पता, मगर गूगल मानचित्र हिन्दी अक्षरों को ढंक कर उसके ऊपर कन्नड़ अक्षर छाप रहा है।
विश्वास नहीं होता?

नीचे का स्क्रीनशॉट देखें -


मोबाइल और गूगल मानचित्र की डिफ़ॉल्ट भाषा हिन्दी में सेट है। तो फिर यहां बैंगलुरु की सड़कों पर गूगल हिन्दी में दिशानिर्देश देने के बजाय कन्नड़ में क्यों दे रहा है? ये, बग तो शर्तिया नहीं हो सकता!
अब, मैं कैसे ड्राइव करुं? या, वापस अंग्रेजी में लौट आऊं?

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दुकालू नंबर 1

30 तारीख की कत्ल की रात है. आज से दुकालू का भाग्य बदलने वाला है. उसके साथ ही उसके मुहल्ले, शहर, प्रांत, देश का भाग्य बदलने वाला है. सबकुछ बढ़िया होने वाला है. न केवल एक देश एक टैक्स सिस्टम होने वाला है, बल्कि बहुत सी चीजों पर कर यानी टैक्स भी कम होने वाला है जिससे चीजें सस्ती होंगी. वह खुश है कि सरकार को 500 तरह के एंट्री टैक्स, वेट टैक्स आदि आदि भिन्न भिन्न करों के बजाय अब उसे केवल एक ही टैक्स देना होगा. नोटबंदी के बाद यह टैक्सबंदी सरकार का देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का सबसे बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक है.

अपनी झुग्गी झोपड़ी में आराम से लेटा, अपने अनगिनत बार रिपेयर किए गए, सीआरटी – पिक्चर ट्यूब वाली 14 इंची टीवी में बिजली की कंटिया फंसा कर और केबल टीवी में जम्फर लगा कर वो संसद में अर्धरात्रि का बजने वाला घंटा उत्साह से देखता-सुनता है और उसका मन प्रफुल्लित हो जाता है. टीवी के डिबेट में जब वह सुनता है कि ऑडी और मर्सिडीज़ की लक्झ़री कारें सस्ती होंगी, हाई एंड, डिजाइनर मोटरसाइकलें सस्ती होंगी तो वो गद्गद होकर बादशाह का नया ताजा जारी रैप गुनगुनाने लगता है. वो कल्पना करने लगता है कि अब पूरा देश का टैक्स सिस्टम बेहद ईमानदार, पारदर्शी हो गया है और उसका देश भी विकसित देशों की सूची में नंबर एक की स्थिति में आ गया है. वो मन ही मन जीएसटी के विरोधियों को गरियाता है और अपने सेकण्ड हैंड स्मार्टफ़ोन, जिसकी बैटरी कब की मर चुकी है, उसे चार्जिंग में डाल कर नए सिरे से, नए उत्साह से जीएसटी के फायदे वाले संदेशों को फारवर्ड मारने में जुट जाता है.

दुकालू नंबर 2

30 तारीख की कत्ल की रात है. आज से दुकालू [जो अभिजात्य वर्ग में डी.आर. सिंह साहब के नाम (पूरा नाम दुकालू राम सिंह,) से जाने जाते हैं] का भाग्य बदलने वाला है. सबकुछ गर्त में जाने वाला है. कितना बढ़िया टैक्स सिस्टम था देश में जिसका कबाड़ा होने वाला है. सरकार ग़रीबों पर यह नया टैक्स सिस्टम लाकर जुल्म कर रही है. मैन्यूफ़ैक्चरिंग बंद हो जाएगा, बाजार में माल खत्म हो जाएगा, जिस वजह से कीमतें आसमान छूने लगेंगी. देश में महंगाई बढ़ेगी, जीडीपी का कबाड़ा होगा और देश अंधकार युग में चला जाएगा.

12 कारों की कैपेसिटी वाले ऑटोमेटिक गैराज युक्त अपने 5 बीएचके विला के टॉप फ्लोर पर स्थित पेंटहाउस में प्रीमियम एज्ड वाइन नेकेड ग्रेप की चुस्कियां मारते हुए अपने आयातित, 107 इंची, 4के डॉल्बी विज़न टीवी पर जब वो संसद में अर्धरात्रि का बजने वाला घंटा देखता-सुनता है तो उसकी आंखें नम होकर धुंधली हो जाती हैं और वो गम में डूब जाता है. टीवी के डिबेट में जब वो सुनता है कि तमाम उत्पाद करों की मार से महंगे हो जाएंगे, सिनेमा टिकट महंगे हो जाएंगे, मनोरंजन महंगा हो जाएगा, तो वो मेहंदी हसन की गाई गमगीन ग़ज़ल स्वयमेव गुनगुनाने लगता है. वो कल्पना करने लगता है कि अब पूरा देश का टैक्स सिस्टम जो अभी ढंग से चालू भी नहीं हुआ है, कोलैप्स हो जाएगा और बिजनेस का भट्ठा बैठ जाएगा क्योंकि टैक्स तो भले ही एक हो पर अनुपालन और रिटर्न तो 500 से अधिक है. वो अपने देश को कतार में सोमालिया के पीछे खड़ा पाता है. वो मन ही मन जीएसटी के समर्थकों को गरियाता है और अपने लेटेस्ट फ़्लैगशिप स्मार्टफ़ोन, जिसमें एक्सटर्नल और फास्ट, डैश चार्ज की सुविधा भी है, को उठाता है और जीएसटी के विरोध में अगले दिनों होने वाले विरोध प्रदर्शनों, लाबीइंग आदि की तैयारी में जुट जाता है.

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अब आपसे एक जेनुइन सवाल है. आप किस किस्म के दुकालू हैं? नंबर 1 के या नंबर 2 के?

एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट का मतलब आप बता सकते हैं?
मैं (या हर कोई जिसके फोन में एंड्रॉयड नूगट और उबेर इंस्टाल है और इंटरफ़ेस हिंदी में है,)
बता सकता हूं।
इसका अर्थ है उबेर।
जी, हाँ, वही उबेर - टैक्सी सेवा प्रदान करने वाला ऐप्प।
भरोसा नहीं तो नीचे का स्क्रीनशॉट देखें -

पहले तो मैं भी चकराया, एक बार ऐप्प अनइंस्टाल किया, दोबारा इंस्टाल किया तो पाया कि उबेर मतलब एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट! 😁

यह अनुवाद / स्थानीयकरण में बग का क्लासिक उदाहरण है।
एनपीसीआई सिक्यूर पेमेंट से मैं टैक्सी सेवा का बखूबी आनंद लेता हूँ।

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हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण : परिणाम हाजिर हैं

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 08, 2009

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वैसे तो किसी सर्वेक्षण की सफलता या ये कहें कि उसकी परिशुद्धता उसके सैंपलिंग की मात्रा के समानुपाती होती है, तो इस आधार पर अनुमानित 10 हजार हिन्दी चिट्ठाकारों में से कम से कम 1 हजार चिट्ठाकार इस सर्वे में भाग लेते तो आंकड़ों पर दमदारी से कुछ कहा जा सकता था. फिर भी, इस सीमित सर्वेक्षण में कुछ ट्रैंड तो पता चले ही हैं. तो प्रस्तुत है हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम:(1) हिन्दी चिट्ठाकारी में अचानक टपक पड़ने वाले अधिकांश (57.4%) का मानना है कि वे इंटरनेट सर्च के माध्यम से यकायक इस दुनिया से परिचित हुए. बहुत से चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग का हर संभव प्रचार प्रसार अपने मित्रों के बीच किया, और वे भी अपने मित्रों (27.9%) को हिन्दी ब्लॉग दुनिया में खींच लाने में सफल हुए.एक चिट्ठाकार की मजेदार प्रतिक्रिया रही : हमें तो हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में पता ही नहीं था जी, अपने आप को फन्ने खां समझ रहे थे हिन्दी ब्लॉग चालू करके जब दूसरे लोगों ने आकर भ्रम तोड़ा!! ;)(2) चिट्ठाकारों के बीच हिन्दी में लिखने का सबसे सुलभ तरीका (52.5%), जाहिर है – फोनेटिक कुंजीपट ही बना हुआ है:(3) हिन्दी में लिखने के लिए चिट्ठ…

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विश्व के शीर्ष चिट्ठाकार क्या और कैसे चिट्ठे लिखते हैं....

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 29, 2007

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(डिजिटल इंसपायरेशन में अमित अग्रवाल ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) (प्रोब्लॉगर में डेरेन रॉस ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) क्या आपको पता है कि विश्व के शीर्ष क्रम के चिट्ठाकार क्या और कैसे लिखते हैं? मेरा मतलब है कि वे अपना विषय कैसे चुनते हैं? कैसे वे सोचते हैं कि कौन सा विषय उनके पाठकों को सर्वाधिक आकर्षित करेगा? खासकर तब, जब वे नियमित, एकाधिक पोस्ट लिखते हैं. मैं पिछले कुछ दिनों से विश्व के कुछ शीर्ष क्रम के ब्लॉगरों (अंग्रेज़ी के) के चिट्ठों को खास इसी मकसद से ध्यानपूर्वक देखता आ रहा हूँ, और मुझे कुछ मजेदार बातें पता चली हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ. बड़े - बड़ों की कहानियाँ हथिया लें.इस बात की पूरी संभावना होती है कि शीर्ष क्रम के सारे के सारे चिट्ठाकार बड़ी कहानियों और बड़े समाचारों के बारे में चिट्ठा पोस्ट लिखें. बड़े समाचार को कोई भी शीर्ष क्रम का चिट्ठाकार छोड़ना नहीं चाहता. अब चाहे इससे पहले सैकड़ों लोगों ने उस विषय पर चिट्ठा लिख मारे हों, मगर फिर भी बड़े चिट्ठाकार उस विषय पर लिखते हैं कुछ अलग एंगल और अलग तरीके से पेश करते हुए – हालाकि वे कोई नई बात नहीं ब…

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ब्लॉगिंग एथिक्स बनाम कार्पेल टनल सिंड्रोम

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 09, 2007

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आप पूछेंगे कि दोनों में क्या समानता है?पहले पूरा आलेख तो पढ़िए जनाब. समानता है भी या नहीं आपको खुद-बख़ुद पता चल जाएगा.तो आइए, पहले बात करें कार्पेल टनल सिंड्रोम की. मेरे एक बार निवेदन करने पर ही फुरसतिया जी ने मेरी फ़रमाइश पूरी कर दी. उन्होंने दो-दो बार फ़रमाइशें दे कर मुझे शर्मिंदा कर दिया कि मैं कार्पेल टनेल सिंड्रोम के बारे में लिखूं. अब भले ही मैं कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में ज्यादा बोलने बताने का अधिकारी नहीं हूं, मैं स्वयं मरीज हूँ - चिकित्सक नहीं, मगर उनका आग्रह तो मानना पड़ेगा.मगर, फिर, कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में बात करने से पहले चर्चा कर ली जाए ब्लॉगों की - खासकर हिन्दी ब्लॉगों की. पिछला हफ़्ता हिन्दी ब्लॉगों के लिए कई महत्वपूर्ण मुकाम लेकर आया. एनडीटीवी पर हिन्दी चिट्ठों के बारे में नियमित क्लिप दिए जाने हेतु कुछ चिट्ठाकारों की बात अभी हुई ही थी कि याहू हिन्दी ने अपने पृष्ठ पर नारद के सौजन्य से हिन्दी चिट्ठों को जोड़ लिया. बीबीसी से भी प्रस्ताव आया है और इधर जीतू भाई बता रहे हैं कि उनकी सीक्रेट बातचीत गूगल से भी चल रही है. एमएसएन पिछड़ क्यों रहा है यह मेरी मोटी बुद…

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चिट्ठाकारों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जनवरी 02, 2008

प्रत्येक हिन्दी चिट्ठाकार को निम्न दस संकल्प लेने चाहिएँ. ये संकल्प उन्हें चिट्ठासंसार में प्रसिद्धि, खुशहाली व समृद्धि दिलाने में शर्तिया मददगार होंगे. मैं टिप्पणी करूंगा – हर तरह की, हर किस्म की, नियमित, नामी-बेनामी-सुनामी-कुनामी. शुरुआत इस चिट्ठे पर टिप्पणी देकर कर सकते हैं. प्रति दस टिप्पणियों पर एक प्रति-टिप्पणी की गारंटी, तथा साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस चिट्ठे पर टिप्पणी प्रदान करने पर सफलता की संभावना अधिक है. मैं नित्य कम से कम एक चिट्ठा पढूंगा – ठीक है, प्रतिदिन सौ दो सौ चिट्ठे प्रकाशित होने लगे हैं और इनकी संख्या 2008 में एक्सपोनेंशियली बढ़नी ही है और एक पाठक के रुप में कोई भी इनमें से सभी पोस्टों को अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पढ़ सकता मगर वो रोज कम से कम एक, इस चिट्ठे को तो पढ़ ही सकता है. तो, अच्छे प्रतिफल के लिए अपने संकल्प में इस चिट्ठे की हर प्रविष्टि को पढ़ने में अवश्य शामिल करें मैं सप्ताह में कम से कम एक पोस्ट लिखूंगा. वैसे तो कोई भी हिन्दी चिट्ठाकार नित्य न्यूनतम चार पोस्ट (अमित अग्रवाल और डेरेन रोज़ इसीलिए सफल हुए हैं, पर वो अंग्रेज़ी की बात है) ठेल सकता है, मग…

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अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 18, 2007

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पिछले दिनों चिट्ठों के आचार संहिता बनने बनाने व उन्हें अपनाने पर खूब बहसें हुईं. इसी बीच चिट्ठाकारों के अनाम -बेनाम-कुनाम मुखौटों पर भी खूब जमकर चिट्ठाबाजी हुई. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए इस ‘अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता' की रचना की गई है. सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को इन्हें मानना व पालन करना घोर अनिवार्य है. अन्यथा उन्हें चिट्ठाकार बिरादरी से निकाल बाहर कर दिया जाएगा और उनका सार्वजनिक ‘चिट्ठा' बहिष्कार किया जाएगा. चिट्ठे विवादास्पद मुद्दों पर ही लिखे जाएँ. मसलन धर्म, जाति, आरक्षण, दंगा-फ़साद इत्यादि. इससे हिन्दी चिट्ठों का ज्यादा प्रसार-प्रचार होगा. सीधे सादे सरल विषयों पर लिखे चिट्ठों को कोई पढ़ता भी है? अतः ऐसे सीधे-सरल विषयों पर लिख कर अपना व पाठकों का वक्त व नारद-ब्लॉगर-वर्डप्रेस का रिसोर्स फ़ालतू जाया न करें. इस तरह के सादे चिट्ठों की रपट ब्लॉगर और वर्ड प्रेस को एब्यूज के अंतर्गत कर दी जाएगी और उस पर बंदिश लगाने की सिफ़ॉरिश कर दी जाएगी.अखबारी-साहित्यिक-संपादित तरह की तथाकथित ‘पवित्र' भाषा यहाँ प्रतिबंधित रहेगी. हर तरह का …

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दशक के हिंदी चिट्ठाकार के लिए कृपया अवश्य वोट करें

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 15, 2012

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परिकल्पना पर दशक के हिंदी चिट्ठाकार व हिंदी चिट्ठा को चुनने के लिए एक पोल लगाया गया है. जिसमें आप अपना बहुमूल्य वोट देकर इनका चुनाव कर सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए (कृपया ध्यान दें, महज आपकी सुविधा के लिए,) वहाँ 10-10 चिट्ठाकार व चिट्ठों की सूची लगाई गई है. तो आप उनमें से चुन सकते हैं, या आपकी नजर में वे अनुपयुक्त हैं तो आप कोई अन्य उपयुक्त नाम सुझा सकते हैं, और उसे वोट दे सकते हैं. और, जैसा कि जाहिर है, इन पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही विरोध (और कहीं कहीं थोड़े बहुत समर्थन) के सुर चहुँ ओर टर्राने लगे हैं. रुदन, क्रंदन और विलाप प्रारंभ हो गए हैं. चिट्ठाकार पुरस्कारों (चिट्ठाकार क्या हर किस्म के पुरस्कारों पर यह लागू है) पर नाहक हो हल्ला और गर्दभ-रुदन की परंपरा पुरानी रही है. जो नाहक गर्दभ-रुदन करते हैं और मठाधीशी जैसी बातें करते हैं उनसे गुजारिश है कि वे भी अपने मठ तो बनाएं और ऐसा कुछ प्रकल्प प्रारंभ तो करें. ब्लॉगिंग पुरस्कार तमाम भाषाओं के ब्लॉगों में चलते हैं. अंग्रेज़ी भाषाई ब्लॉगों में तो सैकड़ों पुरस्कार हैं और सैकड़ों स्तर पर प्रदान किए जाते हैं – और, विवाद वहाँ भी होते हैं…

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आप कितने अच्छे चिट्ठा पाठक हैं?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 31, 2008

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आइए, जाँचिए अपने अंक.प्रस्तुत है आपके लिए चिट्ठाकार वर्ग पहेली
चिट्ठाकार और चिट्ठे.सीधे
3. बिस्मिल्लाहिर्रहमानुर्रहीम
5. मानसिक नॉलेज
7. अज्ञानी गुरू, दूसरे का लिखा कूड़ा समझे
8. दिल में, पेट में, मन में जहां कहीं भी हो न हो, उगलना तो पड़ेगा
9. छम्मकछल्लो
10. आदि चिट्ठाकार और वर्तमान व्यंग्यकार में समानता
12. डायरी वाला भारतीय
14. कस्बे का रहवासी
19. शब्दों के बीच सेतु बनाती हैं
20. जहां का हर सेर सस्ता होता है
21. नुकीली दृष्टि
23. आज के जमाने में ठुमरी कौन गाता है
24. हिन्दी का एक मात्र मालदार चिट्ठा
25. कह न सकने के बावजूद
नीचे
1. नेपाली हिन्दी चिट्ठाकार
2. एक यात्री जो अक्षरों का जोड़ घटाना करता है
4. लिखता तो है, कभी कभी, गाहे बगाहे
6. चिट्ठाजगत् की माता
9. इनके तो लब सचमुच आजाद हैं
11. जरा मुस्कुरा दो ब्रदर
12. कबाड़खाने का एक कबाड़िया
13. फटा मुँह, कुछ दूसरे तरीके से
15. राहुल उपाध्याय समेत हम सभी जिसमें लगे होते हैं
16. कीचड़ में मरीचिका देखने दिखाने का साहस
17. चार सौ बीस लेखक
18. चिट्ठाकार का पूरा नाम जो फुरसत में लंबी पोस्टें लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, अलबत्ता पाठकों के पास फुरसत हो न हो
19. हिन्दी ब्ल…

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करम करे तो फल की इच्छा क्यों न करे चिट्ठाकार?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava सितंबर 13, 2007

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कर्मा-फैन हमारे जैसे लोगों के लिए ही है. जो कर्म करते हैं तो लागत से दो-गुना, तीन गुना, कई-कई गुना फल की इच्छा पालते हैं. कर्मा-फैन इंटरनेट पर बेहद उम्दा, नया और नायाब विचार है. कम से कम चिट्ठाकारों के लिये तो है ही. वैसे तो यह दो तरफा  काम करता है, परंतु इसका टैग-लाइन है- गेट सपोर्ट फ्रॉम योर फैन्स!यानी अपने चिट्ठा फैनों से आप कर्मा-फैन के जरिए सहयोग व भरणपोषण स्वरूप नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं. जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें? इस काम के लिए कर्मा-फैन चिट्ठाकारों व चिट्ठापाठकों के सहयोग के लिए तत्पर है. आप कर्मा-फैन से जुड़कर अपने चिट्ठे में अपने पाठकों से सहयोग प्राप्त तो कर ही सकते हैं, आप अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों को नकद राशि देकर उनका उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं. तो, यदि आपको इस चिट्ठाकार को कुछ गिव-बैक, कुछ धन्यवाद स्वरूप वापस करना है तो कर्मा-फैन में अभी ही खाता बनाएँ. यदि आप चिट्ठाकार हैं और अपने पाठकों से कुछ आशीर्वाद (मात्र आशीर्वचन नहीं,) स्वरूप, …

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अभिकलन एवं प्रक्रमण के दौरान मुंबइया चिट्ठाकार संगोष्ठी

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 29, 2007

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पिछले दिनों वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने सीडॅक मुंबई के तत्वावधान में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैंने भी भाग लिया था. विषय था - भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के भाषाई संसाधनों का निर्माण (क्रिएशन ऑफ़ लेक्सिकल रिसोर्सेज़ फ़ॉर इंडियन लेंगुएज कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग). वैसे, शुद्ध साहित्यिक भाषा में इसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं किया गया था -भारतीय भाषी अभिकलन एवं प्रक्रमण के लिए शाब्दिक संसाधनों का सृजनकम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग की जगह अभिकलन एवं प्रक्रमण का इस्तेमाल किया गया था, जो कि न तो प्रचलित ही है और न ही सुग्राह्य. परंतु यह क्यों किया गया था या जा रहा है - इसकी कथा बाद में. शब्दावली आयोग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. बिजय कुमार ने जब अपना प्रजेंटेशन देना प्रारंभ किया तो पावर-पाइंट में बनाए गए प्रजेंटेशन ने हिन्दी दिखाने से मना कर दिया. जाहिर है, यह प्रजेंटेशन प्रो. बिजय कुमार के कार्यालय-सहायकों ने तैयार किया था, और यूनिकोड में नहीं वरन् किसी अन्य फ़ॉन्ट में था, जो कि एलसीडी प्रोजेक्टर से जुड़े कम्प्यूटर में उस फ़ॉन्ट के संस्थापित नहीं होने से चला ही नहीं. प…

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देबाशीष चक्रवर्ती से खास साक्षात्कार

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 24, 2007

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मिलिए देबाशीष चक्रवर्ती से
"भारतीय कम्प्यूटिंग व भारतीय भाषाओं में सामग्री के विस्तार की संभावनाएँ."पुणे निवासी, सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती को भारत के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में गिना जाता है. वे कई चिट्ठे (ब्लॉग) लिखते हैं जिनमें भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग से लेकर जावा प्रोग्रामिंग तक के विषयों पर सामग्रियाँ होती हैं. हाल ही में वे भारतीय चिट्ठा जगत में अच्छी खासी सक्रियता पैदा करने के कारण चर्चा में आए. उन्होंने इंडीब्लॉगीज़ नाम का एक पोर्टल संस्थापित किया है जो भारतीय चिट्ठाजगत के सभी भारतीय भाषाओं के सर्वोत्कृष्ट चिट्ठों को प्रशंसित और पुरस्कृत कर विश्व के सम्मुख लाने का कार्य करता है. देबाशीष डीमॉज संपादकहैं, तथा भारतीय भाषाओं में चिट्ठों के बारे में जानकारियाँ देने वाला पोर्टल चिट्ठाविश्व भी संभालते हैं. देबाशीष ने न सिर्फ भारत का एकमात्र और पहला बहुभाषी चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ का भी शुभारंभ किया, बल्कि भारतीय ब्लॉग-दुनिया पर वे पैनी नजर भी रखते हैं. आपने बहुत सारे सॉफ़्टवेयर जैसे कि वर्डप्रेस, इंडिकजूमला, आई-जूमला, पेबल, स्कटलइत्यादि के स्थानीयकरण (सॉफ़…

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चिट्ठाकारों की नियमित, योग्यता जाँच

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 27, 2008

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क्या खयाल है? चलिए मान लिया, यहाँ कोई न न्यूनतम और न महत्तम मापदण्ड है, मगर योग्यता के नाम पर कुछ तो होगा? पर, अब आप कहेंगे कि एक चिट्ठाकार की योग्यता आखिर क्या होनी चाहिए जो जांची-परखी भी जा सके. और यदि कुछ तो ऐसा होगा जिसे चिट्ठाकार की योग्यता कहा जा सके तो फिर उसे जांचने में कोई हर्ज है क्या?मेरे एक चिट्ठे पर हाल ही में एक टिप्पणी आई – “*तिए ये तूने क्या लिखा है?” वो तो टिप्पणी मॉडरेशन का धन्यवाद कि मैंने उस टिप्पणीकार के *तियापे को प्रकाशित नहीं किया. मगर यहाँ पर सवाल यह उठता है कि मैंने जो कुछ लिखा था, वो तो मेरी अपनी नज़रों में महान था. तमाम इंटरनेटी दुनिया में तांक झांक कर मसाला उड़ाकर निचोड़ बनाकर मैंने लिखा था. मेरे अपने हिसाब से वो एक क्लासिक था. जितनी दफा और जितनी मर्तबा और जितनी बार, बार-बार मैं उसे पढ़ता, पढ़कर मुग्ध हो जाता और सोचता कि क्या गजब लिखा है. मुझे लगता कि उसने कहा था की तर्ज पर मेरा यह मात्र एक लेख मुझे चिट्ठासंसार में स्थापित कर सकने की क्षमता रखता है. मगर उस पर आई भी तो यह टिप्पणी!मगर, फिर मैंने अपने आप को दिलासा दिया - वह पाठक और वह टिप्पणीकार अवश्य ही *तिय…

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फंसने फंसाने का दैत्याकार नेटवर्क

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 22, 2007

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हिन्दी चिट्ठाजगत में फंसने-फांसने का नेटवर्क दूसरी बार आया है. और, खुदा करे, यह तिबारा-चौबारा, फिर कभी नहीं आए. फंसने-फांसने का क्यों? यह मैं आगे बताता हूं.उन्मुक्त ने मुझे फांसा (टैग किया) तो मैं नादान बनकर कि मैंने उसकी पोस्ट पढ़ी ही नहीं, पीछा छुड़ा सकता था. और छुड़ा ही लिया था...परंतु उन्होंने मुझे ई-मेल किया, और उनका ईमेल मेरे गूगल ईमेल के स्पैम फ़िल्टर से जाने कैसे बचता-बचाता मेरे इनबॉक्स में आ गया. उन्होंने लिखा था-Hi I have a request to make. It is contained here
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/02/blog-post_18.html
I hope you will not mind.मैंने वह पोस्ट दुबारा पढ़ी (उस पोस्ट को पहले पढ़ कर नादान बन कर भूल चुका था) और यह प्रत्युत्तर लिखा:well, I DO MIND, but will reply not-so-mindfully in my post :)जाहिर है, मैं फुल्ली माइंडफुली प्रत्युत्तर दे रहा हूँ.तो, सबसे पहले फंसने-फांसने का गणित.पहले स्तर पर एक चिट्ठाकार ने फांसा - 5 चिट्ठाकारों को.दूसरे स्तर पर पाँच चिट्ठाकारों ने शिकार फांसे - 25तीसरे स्तर पर पच्चीस चिट्ठाकारों ने फांसे - 125चौथे स्तर पर 125 चिट्ठाकारों ने फांसे -…

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थकेले दिग्गजों की तरफ से आपके लिए ब्लॉगिंग टिप्स...

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava अगस्त 31, 2009

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वैसे तो अपने तमाम हिन्दी चिट्ठाकारों ने समय समय पर ब्लॉग उपदेश दिए हैं कि चिट्ठाकारी में क्या करो और क्या न करो. परंतु अभी हाल ही में दो सुप्रसिद्ध, शीर्ष के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले भारतीय अंग्रेज़ी-भाषी ब्लॉगरों की गिनती में शामिल, अमित वर्मा (इंडिया अनकट) तथा अर्नाब –ग्रेटबांग (रेंडम थॉट्स ऑफ डिमेंटेड माइंड) ने अपने अपने ब्लॉगों में कुछ काम के टिप्स दिए हैं. उनके टिप्स यहाँ दिए जा रहे हैं. अमित वर्मा से विशेष अनुमति ली गई है तथा ग्रेटबांग के चिट्ठे की सामग्री का क्रियेटिव कामन्स के अंतर्गत प्रयोग किया गया है.तो, सबसे पहले, पहली बात. पेंगुइन की एक किताब – गेट स्मार्ट – राइटिंग स्किल्स के लिए लिखे अपने लेख में अमित वर्मा कहते हैं:ब्लॉग लेखन मनुष्य की सर्जनात्मकता का सर्वाधिक आनंददायी पहलू है. एक चिट्ठाकार पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता कि वो क्या लिखे, कैसे लिखे, कितना लिखे. आप चार शब्दों में अपना पोस्ट समेट सकते हैं तो चालीस पेज भी आपके लिए कम हो सकते हैं. इसी तरह, न तो विषयों पर कोई रोक है, और न आपकी शैली पर कोई टोक.(अमित वर्मा – चित्र – साभार http://labnol.org)अमित अपने ब्ल…

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