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ल्पना कीजिए कि आप बाहर यात्रा के लिए निकले हैं, ट्रेन पकड़नी है, और समयाभाव व ट्रैफ़िक जाम की वजह से थोड़ी जल्दी में भी हैं. अचानक आपको याद आता है कि आप अपना टूथब्रश और टूथपेस्ट रखना भूल गए हैं. कोई बात नहीं, आप इसे रास्ते चलते परचून की दुकान से खरीदने के लिए रुक जाते हैं. दुकान वाला पहले ही किसी अन्य खरीदार से जूझ रहा होता है. उसे निपटाकर वह आपसे मुखातिब होता है. आप जल्दी में हैं, आपके ट्रेन छूट जाने का समय हो रहा है, मगर दुकानदार को आपकी यह अर्जेंसी पता नहीं है, तो वो अपने हिसाब से आपको सामान देता है. फिर आप खरीदी हुई वस्तु का भुगतान करते हैं तो एक और समस्या आती है. आपके पास केवल बड़े नोट हैं और दुकानदार के पास आपको देने को पर्याप्त छुट्टे नहीं हैं. इस आपाधापी में आपकी ट्रेन छूट जाती है.

अब अपनी इस कल्पना में थोड़ा सा ट्विस्ट कीजिए. आप जिस दुकान पर टूथपेस्ट लेने जा रहे हैं, वहाँ आरएफआईडी सेंसर युक्त कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की सुविधा है और आपने भी कॉन्टैक्टलैस पेमेंट वाला आरएफआईडी टैग युक्त रिस्टबैंड पहना हुआ है. आप दुकान में घुसते हैं, टूथपेस्ट, टूथब्रश उस दुकान के काउंटर से उठाते हैं, और बस वहां से बाहर आ जाते हैं. आपके दुकान में घुसते ही वहाँ का आरएफआईडी सेंसर आपको पहचान लेता है और दुकान पर स्थित विभिन्न सेंसर सक्रिय हो जाते हैं और जो जो सामान आप उठाते हैं उनकी कीमत जोड़ते जाते हैं. जैसे ही आप दुकान से बाहर आते हैं, आपके खाते में स्वचालित बिलिंग हो जाती है और स्वचालित भुगतान हो जाता है जिसकी सूचना आपको आपके मोबाइल पर एसएमएस और ईमेल के जरिए मिल जाती है. दुकान के गेट पर बैठे दुकानदार या चौकीदार के पास ग्रीन सिग्नल आता है कि भुगतान हो चुका है. वो आपका अभिनंदन करता है और आप इस तर तुरंत ही खुशी-खुशी इंस्टैंट भुगतान कर निकल लेते हैं. और आपकी ट्रेन आपको आराम से मिल जाती है. ऊपर से, न चिल्लर का चक्कर और न ढेर सारे रुपए लेकर साथ चलने की जरूरत.

कैशलेस भुगतान की यही सबसे बड़ी खूबी है. आप अपने साथ अपना बैंक लेकर चल सकते हैं, हर किस्म का चिल्लर और कितनी ही बड़ी राशि चाहे वह लाखों में हो – अपने जेब में साथ लेकर – एक प्लास्टिक कार्ड – डेबिट या क्रेडिट कार्ड - में या अपने मोबाइल वालेट के रूप में साथ लेकर चल सकते हैं, और उसका उपयोग चौबीसों घंटे कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं. वह भी पूरी तरह सुरक्षित.

आइए, अब जानते हैं कि कैशलेस भुगतान प्रणाली के पीछे का विज्ञान क्या है क्या क्या विकल्प हैं और यह काम कैसे करता है. परंतु पहले इसका इतिहास जानें –

कैशलेस भुगतान प्रणाली का इतिहास मानवीय सभ्यता जितना पुराना है जिसमें बार्टर यानी वस्तु-विनिमय का उपयोग किया जाता था. उधारी प्रथा भी एक तरह का कैशलेस तंत्र है जिसमें महीने के अंत में या एक नियमित अंतराल पर वास्तविक रकम का लेन-देन किया जाता है, बाकी समय लेन-देन को एक रजिस्टर या बही में दर्ज कर लिया जाता है. परंतु आधुनिक कैशलेस भुगतान प्रणाली जिसमें क्रेडिट डैबिट कार्डों अथवा ईवालेट जैसी टेक्नोलॉज़ी का उपयोग होता है, वह जटिल कंप्यूटिंग और इंटरनेट प्रणाली का सुरक्षित प्रयोग कर बनाया गया है.

लेन-देन के लिए रुपए-पैसे के बदले क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने की संकल्पना और इस शब्द का उपयोग उपन्यासकार एडवर्ड बेलामी ने अपने उपन्यास लुकिंग बैकवर्ड में सन 1887 में किया. तब इसे कोरी कल्पना ही कहा जा सकता था. मगर जल्द ही, विभिन्न व्यापारिक संस्थानों जिनमें होटल, डिपार्टमेंटल स्टोर और पेट्रोल पम्प आदि शामिल थे, अपने परिचित व बारंबार आने वाले ग्राहकों की सुविधा के लिए कुछ उपाय गढ़ने प्रारंभ किए. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में चार्ज-क्वाइन का प्रयोग प्रारंभ हुआ. ये चार्ज-क्वाइन आमतौर पर धातुओं के बने होते थे और केवल परिचित और नियमित ग्राहकों को दिए जाते थे जिनका खाता व्यापारिक संस्थानों में होता था. इस तरह इन चार्ज क्वाइन को दिखाकर लेन-देन को खाते में दर्ज कर लिया जाता था. सन् 1920 के आते आते चार्ज क्वाइन का रुपरंग बदल गया और चार्ज-प्लेट और चार्ज कार्ड का उपयोग होने लगा. वेस्टर्न यूनियन ने अपने नियमित ग्राहकों के लिए चार्ज कार्ड पेश किया और दस साल के भीतर ही ये कार्ड इतने लोकप्रिय हुए कि अन्य व्यापारिक संस्थानों ने एक दूसरे के कार्ड भी स्वीकार करना प्रारंभ कर दिए. चूंकि उस जमाने में इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिकी जैसी कोई सुविधा नहीं थी, अतः उन कार्डों में एम्बोज कर या कार्ड के पीछे चिपकी कागज की शीट पर मशीन से छपाई कर लेनदेन का विवरण दर्ज किया जाता था और महीने के अंत में कार्ड पर देय रकम का भुगतान किया जाता था.

तब की उपलब्ध ये सारी सुविधाएँ, तब की उपलब्ध वैज्ञानिकी, प्रौद्योगिकी पर निर्भर थीं, और इसी वजह से बेहद सीमित मात्रा में ही प्रचलित थीं. आमतौर पर क्षेत्र विशेष में ही. और इनके इस्तेमाल में तमाम झंझटें भी थी. फिर, सितंबर 1958 में बैंक ऑफ अमरीका ने एक बड़ा दांव खेला. बैंक ऑफ अमेरिका ने फ्रेस्नो शहर के सभी 60 हजार योग्य निवासियों को बैंकअमरीकार्ड नामक क्रेडिट कार्ड मुफ़्त में भेज दिया और इसका उपयोग शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों में करने का अनुरोध किया. शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों से भी इस कार्ड को स्वीकार करने का अनुरोध किया. यह परीक्षण चल निकला और इस कार्ड की मांग तो बढ़ी ही, नए प्रकल्पों के गठन का रास्ता भी खुला. 1966 में मास्टरकार्ड का जन्म हुआ और 1976 में बैंकअमरीकीकार्ड का नाम बदल कर वीजा कार्ड हो गया. दुनियाभर के देशों में यही दो कार्ड अधिक लोकप्रिय हैं. परंतु तब इन कार्डों का प्रयोग, कैशलेस की सुविधा देते होते हुए भी उपयोगकर्ताओं के लिए झंझट भरा होता था, बावजूद इसे ये कार्ड लोकप्रिय होते रहे.

आप पूछेंगे कि कैसे? तब जब आप अपना क्रेडिट कार्ड कहीं प्रयोग में लेते थे तो व्यापारिक संस्थान पहले आपके कार्ड के बैंक में फ़ोन लगाते थे और फिर आपके कार्ड के सही होने की व खाते में पर्याप्त बैलेंस या लिमिट की पुष्टि करते थे. पुष्टि हो जाने के उपरांत ही वे आपके कार्ड के लेनदेन को स्वीकृत करते थे. कार्ड लेनदेन की स्वचालित सुविधा ग्राहकों को तब मिलने लगी जब 1973 के पश्चात बैंकों में बड़े स्तर पर कंप्यूटरीकरण का दौर प्रारंभ हुआ. और नेटवर्क के जरिए कंप्यूटर पूरे समय एक दूसरे से जुड़े रहने लगे.

और जब दुनिया को इंटरनेट की सुविधा मिली, तब कैशलेस भुगतान सुविधा को तो जैसे पंख लग गए. बैंकों के चौबीसों घंटे आपस में जुड़े रहने और उपलब्ध रहने की सुविधा ने न केवल नए-नए विकल्प प्रदान किए, ये क्रेडिट कार्ड इंटरनेट बैंकिंग सेवा से पूर्ण रूपेण जुड़ गए और इनके विविध रूप जैसे कि डेबिट कार्ड, प्रीपेड कार्ड, पेट्रो कार्ड आदि भी आ गए. इंटरनेट के माध्यम से ही लेनदेन का प्रकल्प पेपाल भी आ गया जिसके जरिए घर बैठे ही समुद्रपार लेनदेन किया जा सकता था. अब तो एनएफ़सी और आरएफआईडी टैग जैसे सिस्टम आ चुके हैं जिनके जरिए बिना किसी कार्ड स्वाइप के, मात्र अपनी उपस्थिति से भुगतान कर सकते हैं. यही नहीं, इंटरनेट की अपनी, आभासी मुद्रा बिटक्वाइन भी आ गई जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया.

इसतरह, कैशलेस लेनदेन को देखें तो यह इंटरनेट के साथ ही पला-बढ़ा. हालांकि विभिन्न देशों में इस विधि की स्वीकार्यता विभिन्न कारणों से, इंटरनेट की स्वीकार्यता से बिलकुल भिन्न किस्म की रही है. फिर भी, जिन देशों में इंटरनेट को समग्र रूप से उपयोग में लिया जाता रहा है, वहां कैशलेस भुगतान प्रणाली परिपूर्ण विकसित और स्वीकार्य हो चुकी है. कुछ उन्नत देशों में तो यह 90-95 प्रतिशत तक स्वीकार्य हो चुकी है और केवल 5-10 प्रतिशत लोग ही लेन-देन के लिए यदा कदा रुपए पैसे का उपयोग करते हैं. यूँ तो अब, कैशलेस लेनदेन पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर है. परंतु बहुत सी जगह मोबाइल फ़ोनों से एसएमएस के जरिए भी कैशलेस बैंकिंग की सुविधा हासिल हो रही है, मगर इनके बैकएंड में तगड़ा इंटरनेट सपोर्ट समाहित होता है.

अभी जब आप कोई कैशलेस लेनदेन करते हैं – उदाहरण के लिए, आपने किसी दुकान पर अपने डेबिट कार्ड से स्वाइप मशीन से भुगतान किया. आपने कार्ड स्वाइप किया, मशीन में अपना पिन डाला और भुगतान हो गया. इस पूरी प्रक्रिया में पीछे बेहद जटिल कार्य निष्पादित हुए हैं – जिन्हें सिलसिलेवार इस तरह समझा जा सकता है – जैसे ही आपने कार्ड स्वाइप किया, इसके मैग्नेटिक स्ट्रिप् में मौजूद डेटा को पढ़कर वह स्वाइप मशीन आपके कार्ड को, आपके खाते को पहचान गया, और एक सेंट्रल सर्वर पर डेटा को भेज दिया कि कार्ड के जरिए इतनी राशि का भुगतान करना है. सर्वर पर आपके खाते में मौजूद रकम या लिमिट की सत्यता को चेक किया जाता है और आपके पिन को वेलिडेट किया जाता है. यह सही होने पर पलक झपकते ही भुगतान हो जाता है. यह सारा संचार अति सुरक्षित एनक्रिप्टेड होता है. हालांकि हाल ही में कुछ रपट यह भी आई थी कि किसी खास कंपनी के पीओएस मशीनों में वायरस इंस्टाल कर उनके डेटा चुराए गए थे और कंपनियों और बैंकों को बड़ा चूना लगाया गया था.

आमतौर पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि इंटरनेट बैंकिंग जो कि वर्तमान के किसी भी किस्म के कैशलेस लेन-देन का बैकबोन है, असुरक्षित रहता है और हैकर्स इसमें सेंध मारते रहते हैं. तो मामला भले ही तू डाल-डाल-और मैं पात-पात जैसा रहता हो, आमतौर पर यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाए, तो आधुनिक कैशलेस लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित रहता है. मैं स्वयं पिछले बीस साल से इंटरनेट बैंकिंग व डेबिट/क्रेडिट कार्डों का उपयोग कर रहा हूँ, यहाँ तक कि पुराने मोबाइल फ़ीचर फ़ोन में स्टेटबैंक ऑफ इंडिया के मोबाइल बैंकिंग का प्रयोग भी एसएमएस के जरिए करता रहा हूँ, जिसमें इंटरनेट की जरूरत नहीं होती है, आज तक मुझे किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं हुई और न ही मेरा एक पैसा किसी गलत या फर्जी ट्रांजैक्शन में फंसा. एकाध बार एटीएम में कैश नहीं निकला और खाते में क्रेडिट हो गया, मगर वह पैसा भी सप्ताह भर के भीतर वापस खाते में जमा हो गया. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कैशलेस लेनदेन पूरी तरह सुरक्षित रहता है और केवल एक-दो प्रतिशत मामले में ही समस्या होती है.

वर्तमान में भारत में कैशलेस लेनदेन के लिए अति सुरक्षित पेमेंट ग्रेड एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का उपयोग किया जाता है जिससे कि उपयोगकर्ता व बैंक का डेटा सुरक्षित रहे. इसे खासतौर पर सरकार के नेशनल पेमेंट कार्पोरेशन ऑफ इंडिया के लिए बनाया गया है. मास्टरकार्ड और वीज़ा के कार्ड में भी उन्नत किस्म की एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का प्रयोग किया जाता है जिससे प्रयोग के दौरान हैकिंग आदि के जरिए उपयोगकर्ताओं या व्यापारिक संस्थानों को चूना लगाने वाली संभावना नहीं होती. आमतौर पर इन कार्डों के प्रयोग में सुरक्षा की समस्या कार्ड धारक के कार्ड गुमने, गलत हाथों में जाने अथवा कार्ड का प्रयोग जहाँ हुआ है वहां के सिस्टम में सेंध मारकर डेटा चुराने आदि से होती है. फिर भी, ऐसे गलत लेनदेन की रपट यदि तीन कार्यदिवस के भीतर दे दी जाए तो उपयोगकर्ता का पैसा आमतौर पर सुरक्षित होता है चूंकि कानूनन, ऐसे लेनदेन के लिए फिर सेवा-प्रदाता कंपनियाँ जिम्मेदार होती हैं.

आज के दौर में कैशलेस लेनदेन के लिए बहुत सारे विकल्प हैं. क्रेडिट/डेबिट/प्रीपेड कार्ड में पहले मैग्नेटिक स्ट्रिप का प्रयोग होता था. जिसे पीओएस मशीन से स्वाइप कर लेनदेन सुनिश्चित किया जाता था. सुरक्षा बढ़ाने के लिहाज से उनमें चिप लग कर आने लगे. फिर उनमें सुविधा के लिहाज से एनएफसी टैग आने लगा जिससे भुगतान में और आसानी होने लगी – यानी बिना स्वाइप किए, कार्ड को मशीन में बिना लगाए, केवल टैप कर लेनदेन पूरा किया जाने लगा. इंटरनेट बैंकिंग व मोबाइल ऐप्प से बैंकिंग भले ही थोड़ा झंझट भरा हो सकता है, मगर यह एक अति सुरक्षित माध्यम कहा जा सकता है क्योंकि इसमें द्विस्तरीय और त्रिस्तरीय सुरक्षा जोड़ी जा सकती है. आपके रजिस्टर्ड मोबाइल पर प्रत्येक ट्रांजैक्शन के लिए पासवर्ड या पिन भेजा जाता है जिसे भर कर आपको अपना भुगतान वेलिडेट करना होता है. हाल ही में आरबीआई ने नया गाइडलाइन जारी किया है जिससे पंजीकरण के उपरांत उपयोगकर्ता और व्यापारिक संस्थान दो हजार रुपये से कम के लेनदेन पर हर बार पासवर्ड या पिन दर्ज करने के झंझट से मुक्ति पा सकेंगे और उनका केशलेस व्यवहार और आसान होगा. आजकल हर व्यक्ति के हाथ में एक अदद मोबाइल वह भी स्मार्टफ़ोन किस्म का दिख ही जाता है. फ्रीचार्ज और पेटीएम जैसे ऐप्प से आपका स्मार्टफ़ोन अब आपके बटुए का रूप धारण करने में पूरी तरह सक्षम हैं, और वह भी पूरी तरह सुरक्षित. आपका बटुआ यदि कोई चुरा ले तो उसमें रखा पूरा रुपया उस पॉकेटमार का हो जाता है, मगर यदि आपका मोबाइल बटुआ यानी मोबाइल फ़ोन यदि कोई चुरा ले या गुम जाए, तो भी उसमें से आमतौर पर कोई कुछ चुरा नहीं सकता क्योंकि पासवर्ड और पिन तो आपको आपके मन में याद रहता है. ऊपर से, आज की उन्नत तकनीक में इंटरनेट के जरिए या किसी अन्य मोबाइल के जरिए तत्काल ही अपने मोबाइल फ़ोन को लॉक कर सकते हैं व उसमें मौजूद डेटा को हटा सकते हैं.

यूँ भी आने वाला समय कैशलेस का होगा. कहीं भी जाइए, किसी भी देश में जाइए, किसी भी मुद्रा में लेनदेन करिए, कितनी ही छोटी बड़ी राशि का लेनदेन करिए, किसी भी समय लेनदेन करिए – कहीं कोई समस्या नहीं. कैशलेस तंत्र की यही खूबी है. तो आइए, इसे अभी से क्यों न अपनाएँ? आइए, कैशलेस हो जाएँ!

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दुनिया में आईओटी यानी इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स

 

की विचारधारा अभी आई ही थी, कि अब एक नई विचारधारा ने पूरी दुनिया को लपेट में ले लिया है. डीओटी यानी देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स. इतना कि इसके सामने इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा लगने लगी है.

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अब पूरी दुनिया देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है. न्यूयॉर्क से लेकर बस्तर तक और दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक लोग अपना अपना राष्ट्रगान हर यथासंभव स्थान और समय पर गा रहे हैं और राष्ट्रवाद का ट्रम्पेट बजा रहे हैं.

आइए, आपको ले चलते हैं कुछ लाइव शो में जहाँ आप देखेंगे कि देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स के पीछे भारतीय मन मानस किस तरह डूब-उतरा रहा है –

दृश्य एक –

सीपीडबल्यूडी हैडक्वार्टर पर एक नामचीन ठेकेदार, महा-मुख्य-अभियंता से जो अपना पिछला तीन टर्म एक्सटेंशन करवाने में ऑलरेडी महा-सफल हो चुके हैं : “सर, एक जबरदस्त राष्ट्रवाद स्कीम का आइडिया लाया हूँ. सीधे पचास परसेंट का खेल हो सकता है. पूरे देश में मकानों-दुकानों-सरकारी-गैर-सरकारी बिल्डिंगों के बाहरी रंग को अनिवार्य रूप से तिरंगे रंग में करने का प्लान लाया जाए. टेंडर और वर्क-ऑर्डर तो सदा की तरह अपन मैनेज कर ही लेंगे. इस राष्ट्रवादी प्लान को हर ओर से समर्थन मिलेगा, विभाग को जबरदस्त फंड मिलेगा. विरोधियों की तो हवा गोल हो जाएगी क्योंकि कोई बोलेगा ही नहीं, क्योंकि जो बोला समझो वो राष्ट्रद्रोही मरा. सर, आपके एक और टर्म एक्सटेंशन के पूरे चांस हो जाएंगे.”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – तीन-टर्म-एक्सटेंसित-महा-मुख्य-अभियंता ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

दृश्य दो –

सूचना-प्रसारण हैडक्वार्टर पर एक कार्यकर्ता, महा-मुख्य-सचिव से जो हाल ही में महा-जुगाड़ कर इस महा-मलाईदार पद पर आसीन हुए हैं : “सर, सिनेमाघर की तर्ज पर हर टीवी शो के पहले, हर रेडियोकार्यक्रम के पहले, हर वाट्सएप्प पोस्ट के पहले, हर फ़ेसबुक स्टेटस के पहले, हर इसके पहले, हर उसके पहले राष्ट्रगीत अनिवार्य किया जाना चाहिए और इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए एक नौ-नॉनसैंन-फुलप्रूफ़, राष्ट्रवाद-रक्षक विभाग गठित किया जाना चाहिए. इस विभाग को जाहिर है 24X7 मॉनीटरिंग और इंसपैक्टिंग करनी होगी तो हर लेवल पर तगड़ा स्टाफ़ भी चाहिए होगा. तो देखिए कि कितनी संभावनाएँ बनती हैं. अपन अधिकांशतः तो अपनी ही विचारधारा के लोगों को भर्ती करेंगे और बाकी तो फिर आप समझ ही रहे होंगे...”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – महा-जुगाड़ित-महा-मलाईदार-पदासीन-महा-मुख्य-सचिव ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

कुछ समय बाद -

कण कण में भगवान वाले देश में कण कण में देशभक्ति और राष्ट्रवाद आ गया. देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की क्रांतिकारी अवधारणा ने देश में क्रांति ला दी, और बाढ़-सूखा-गरीबी-भुखमरी-अशिक्षा-गंदगी-भ्रष्टाचार-कालाधन आदि आदि समस्याएँ गौण होकर नेपथ्य में चली गई. पूरा देश फुल राष्ट्रवाद की आगोश आ गया. कहीं सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा है, दुकानों मकानों की दीवारें, छत तो तिरंगे हो ही चुके हैं, घर के भीतर किचन और टॉयलेट की दीवारें भी तिरंगी हो गई हैं. लोगों ने अपने परिधान, अपने केश तक तिरंगे कर लिए हैं – वस्तुतः अन्य रंगों का उपयोग देश में दंडनीय-अपराध हो गया है. देशवासियों को दिन में पाँच वक्त राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य हो गया है. किसी भी फ़िल्मी-ग़ैर-फ़िल्मी-भजन-ग़ज़ल-कव्वाली-पॉप-रॉक-रैप गीत का मुखड़ा राष्ट्रगीत होना अनिवार्य है. अतः अब हर कहीं या तो कोई राष्ट्रगीत गा रहा है, या कोई बजा रहा है, या कहीं बज रहा है, या कहीं कोई सुन-सुना रहा है. और सम्मान में हर कोई हर कहीं सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है. इस तरह पूरा देश सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है.

ल्लो! कहीं किसी ने राष्ट्रगीत बजा दिया – शायद किसी सरकारी-न्यायालयीन आदेश के तहत! सावधान!

सिनेमा ही क्यों, हर टीवी चैनल पर हर सीरियल के पहले राष्ट्रगान सुनाया जाना चैये!

अनिवार्य रूप से!

लोगों की राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ गायब हुई जा रही है, उसे इसी जरिए से वापस लाया जा सकेगा.

घर घर में, हर घर में.

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चलो, अब मूवी थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तब भी चलेगा. बल्कि थोड़ा लेट जाने से ही ठीक रहेगा :)



इधर मैंने वह खबर टीवी पर देखी,  उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ था. मुझे रात में हजारों सूरज दिखाई देने लगे थे. सुबह ही मैंने एटीएम से पूरे पाँच हजार रुपए निकलवाए थे – पाँच पाँच सौ के पूरे दस नोट. वे अब मुझे चिढ़ाते से प्रतीत हो रहे थे. रात बारह बजे के बाद से वो महज कागज के टुकड़े भर रह जाने वाले थे.

रॉबर्ट के हाथ में भी टीवी का रिमोट था. उसके टीवी में भी, तमाम चैनलों में वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही खबर देख सुन रहा था. खबर सुन कर उसकी भी आंखें फटी रह गई थी. वह भी घबरा गया था. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा था. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की थी – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में पुराने नोट बंद कर दिए हैं और बदले में नए नोट चलाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. ऊपर से बहुत सारा माल मार्केट में आने को तैयार है उस स्टाक का क्या होगा? हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा था. वह भी टीवी के सामने जमा हुआ था. वह भी वही समाचार देख रहा था. परंतु  उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला था – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. दरअसल बिजनेस का चार्म इधर खत्म होता जा रहा था. लाइफ़ में कोई चैलेंज साला बचा ही नहीं था. अब आएगा मजा. असली चैलेंज का असली मजा. जल्द से जल्द इन नए नोटों के असली से भी असल लगने वाले नकली नोटों को छापना और चलाना. अभी तक तो हर ऐरा-गैरा, पाकी-ए-टू-जैड गैंग इन पुराने नोटों का नकल छाप लेता था और मार्केट में चला डालता था. नए नोट चैलेंजिंग है, सुना है कि इसमें चिप लगा है, ट्रैकिंग डिवाइस है, कैमरा है, न जाने क्या क्या है. अब कोई बनाए इनकी नकल! हमारे सिवा किसी के पास इस तरह की तकनीक मिलना मुश्किल है. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है. अब तो हम इसकी तकनीक आउटसोर्स कर और ज्यादा बिजनेस करेंगे”

इस तरह लॉयन ने रॉबर्ट का कन्फ्यूजन दूर कर दिया था. इधर नए रुपए के संबंध में मेरा भी सारा कन्फ्यूजन दूसरे दिन ही दूर हो गया था. पुराने नोटों के चलन से बाहर होने के कारण बाजार में नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. नए नोटों के बंडल ऑन में बिकने लगे. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन रुपयों की काला बाजारी होने लगी. भ्रष्टाचार और कालाधन मिटाने के चक्कर में सरकार ने देश की मासूम जनता के हाथ में भ्रष्टाचार करने का एक और सरल किस्म का, आसान सा औजार थमा दिया था. जिधर, जिस बैंक में निगाह डालो, उधर लोग लाइन में लगे थे और कमीशन लेकर एक दूसरे के नोट अदला-बदली कर रहे थे और अपने सुप्त-गुप्त खातों को किराए पर प्रस्तुत कर रहे थे. तीस प्रतिशत में तो आप चाहे जितना पुराना रुपया नए रुपए से बदल सकते थे. टार्गेट पूरा करने के चक्कर में बेचारे जिन बैंकरों ने अपनी जेब से दस रुपल्ली खर्च कर, ऐसे लोगों को पकड़-पकड़ कर, जिनके पास शाम की दारू के पैसे के लाले हमेशा बने रहते थे, जन-धन खाते खुलवाए थे उनमें अचानक, नामालूम कहाँ से पैसों की बरसात होने लगी थी. बैंकों में पिछले दरवाजे का उपयोग बढ़ गया था, और विशिष्ट कस्टमर सेवा का प्रचलन बढ़ गया था. जिन लोगों ने पूरी जिंदगी अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड का नाम तक नहीं सुना था, वहां के लिए चार्टर्ड प्लेन बुक कर फेरियां लगाने लगे थे.

अचानक बहुतों का जमीर भी जाग गया था. बड़े अकड़ वाले अफसर और नेता अचानक रिश्तेदारी निभाने लग गए थे. चार्टर्ड अकाउंटैंट और बैंकर्स को जिन्हें लोग साल में एकाध बार भी दुआ-सलाम नहीं करते थे. अचानक सबके दुलारे बन बैठे. हर कोई उनसे रिश्तेदारी निभाने, निकालने और जमाने में लग गया था.

इधर हफ़्ते भर की मशक्कत के बाद, एटीएम से निकाले अपने इकलौते दोहजारी नए नोट के साथ सब्जी खरीदने गया तो ठेले वाले ने मुझ पर हिकारत भरी नजर डाली और कहा – या तो खुल्ले लाओ या फिर फैटीएम से पेमेंट करो. संदेश साफ था – या तो जुगाड़ कर चिल्लर ले आओ या फिर अपग्रेड हो जाओ.

लगता है नए रूपए ने भारत को सचमुच बदल दिया है. एक नए भारत का निर्माण हो रहा है. नई इकॉनामी, नए प्रयोग, नए-नए रास्ते और नई-नई रिश्तेदारियाँ.

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