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(चित्र – साभार – डॉ. अरविंद मिश्र का फ़ेसबुक पृष्ठ)

परकाया प्रवेश विधा का उपयोग कर मैं एक वरिष्ठ आईएएस अफ़सर के शरीर में घुस गया था. बड़े दिनों से तमन्ना थी कि लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद लूं. परंतु ये क्या! इधर मैंने परकाया प्रवेश किया और उधर नोटबंदी की तरह लाल-बत्ती बंदी हो गई.

मैंने सोचा, चलो, एक वरिष्ठ आईएएस के शरीर में प्रवेश किया है जो अब तक लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद उठाता फिरता था, उसके नए, गैर-लाल-बत्ती वाले अनुभव को एक दिन जी कर देख लिया जाए –

“आज सुबह जब मैं उठा तो मुंह सूजा और आँखें फूली हुई थीं. मैंने मन में ही सोचा क्या शक्ल हो गई है एक वरिष्ठ अफसर की. पूरी रात करवटें बदलते गुजरी जो थीं. पूरी रात सपने में लाल-बत्ती वाली गाड़ियां अजीब अजीब शक्लों में, रूपाकारों में आती रहीं और डराती रही थीं तो नींद बार बार टूट जो जाती थी. जैसे लाल-बत्ती ने मुंह का पूरा नूर नोच लिया है लगता था. वैसे भी आज आफिस जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. जैसे तैसे आलस्य को त्यागकर तैयार होकर बाहर निकला, तो बिना लाल-बत्ती के अपनी सरकारी गाड़ी को देख कर दिल धक्क से हो गया और बुझ गया. लगा, जैसे गाड़ी विधवा हो गई है, उसके सिर का सिंगार, सुहाग चिह्न जबरदस्ती उतार लिया गया हो. गाड़ी पूरी तरह बेनूर हो गई थी. इधर ड्राइवर का हाल भी बुरा था. ड्राइवर का भी सबकुछ बुझा हुआ सा लग रहा था. मुझे लगा कि वो जल्दी ही इस बोरिंग, बिना लाल-बत्ती वाली गाड़ी की उतनी ही बोरिंग गाड़ी से पीछा छुड़ाने वाला है. आखिर, सड़कों पर मुझसे ज्यादा सैल्यूट और सम्मान मेरा ड्राइवर पाता था जो उसे केवल और केवल लाल-बत्ती वाली गाड़ी की वजह से हासिल था. जब मैं गाड़ी में बैठा, तो लगा कि ड्राइवर बस रो ही देगा. मैं स्वयं उसे तसल्ली देने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि भीतर से रो तो मैं भी रहा था.

गाड़ी का इंजन आज अजीब आवाज कर रहा था. बिलकुल मरियल. आज तो गाड़ी की चाल में भी दम नहीं दिख रहा था. यकीनन उसे भी अपनी लाल-बत्ती गंवाने का दुःख हो रहा था. आगे बढ़े तो सरकारी कॉलोनी के मुहाने पर बने चेकपोस्ट के चौकीदार ने कोई तवज्जो नहीं दी, और उसका ध्यान खींचने के लिए ड्राइवर को हॉर्न बजाना पड़ गया. इससे पहले ऐसा हादसा कभी नहीं हुआ था. गाड़ी के ऊपर डुलबुग जलती लाल-बत्ती को देखते ही चौकीदार दौड़कर बैरियर हटाता था. आज जब चौकीदार बैरियर हटा रहा था तो उसमें वह फुर्ती तो ख़ैर दिखी ही नहीं, उल्टे उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान अलग तैर रही थी जो बड़ी दूर से महसूस की जा सकती थी. लगा कि वो जानबूझ कर देर से और बड़े आराम से बैरियर हटा रहा है ताकि उसके चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान को ठीक से पढ़ा समझा जा सके.

आगे बढ़े तो जैसी आशंका थी, वही हुआ. चौराहे पर ट्रैफ़िक सिपाही ने उलटे तरफ का ट्रैफ़िक क्लीयर करने के चक्कर में अपनी गाड़ी रोक दी. सैल्यूट मारना तो दूर की बात थी. लाल-बत्ती रहती तो ट्रैफ़िक की ऐसी-तैसी बोल वो पहले तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी को एक शानदार सैल्यूट ठोंकता, इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि गाड़ी के भीतर कोई बैठा भी है या नहीं, या बैठा है तो कोई अफ़सर है नेता है या कोई अपराधी जो नक़ली लाल-बत्ती लगाए घूम रहा है, और फिर वो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए पहले रास्ता क्लीयर करता. पूरे रास्ते यही हाल रहा और दस मिनट में नित्य ऑफ़िस पहुंचने वाले रास्ते में आज पूरे पैंतालीस मिनट लग गए. लगा कि भारत में जनता और गाड़ियों की भरमार हो गई है और इस पर नियंत्रण के लिए हम जैसे अफसरों को ही कुछ करना होगा. इन नेताओं के भरोसे बैठे रहे तो बस लाल-बत्ती लाल-बत्ती खेलते रह जाएंगे.

आफिस में विशिष्ट वीआईपी पार्किंग के हाल बुरे थे. कोई रौनक नहीं थी, कोई एटीट्यूड नहीं था, कोई गर्व नहीं था, कोई रौब नहीं था. कहीं लाल-पीली-नीली बत्ती का नामोनिशान नहीं था तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक सारी गाड़ियाँ मारूती 800 की तरह बेजान, एक-सी नजर आ रही थीं. प्रधान सचिव की पर्सनल मर्सिडीज़ बैंज, जिस पर वे शान से लाल-बत्ती लगाया करते थे, रोती हुई-सी प्रीमियम पार्किंग में खड़ी थी. और कुछ इस तरह खड़ी थी जैसे वह पार्किंग उसे धकिया रहा हो – कलमुंही परे हट, यह स्थल तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए आरक्षित है. तू बिना बत्ती के यहाँ कैसे खड़ी है?

ऑफ़िस के अपने चैम्बर में घुसा तो अर्दली को हमेशा की तरह दरवाजे पर स्वागत में नहीं पाया. वो दरअसल खिड़की से नीचे झांक रहा था. जहाँ से प्रीमियम पार्किंग का दिलकश नजारा दिखाई देता था. आज उसकी निगाह में अलग चमक थी, जो स्पष्ट प्रतीत हो रही थी, और मुख पर थी संतुष्टि और प्रसन्नता के साथ व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट. उसे मेरी स्थिति का आभास नहीं था. मैंने टेबल पर निगाह मारी. धूल की परत जमी हुई थी. प्रकटतः उसने आज टेबल साफ नहीं किया था.

मैंने अपनी गर्दन मोड़ी और दीवार की और मुख किया. मेरी निगाह कैलेंडर को खोज रही थी. मैं अपने रिटायरमेंट के बचे-खुचे दिन गिनने लगा.”

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ऊपर जो स्क्रीनशॉट है वह याहू मेल में आया है। सभी लिंक यह बयान कर रहे हैं कि बड़ा फर्जीवाड़ा हो रहा है मगर याहू सो रहा है। इस ईमेल की भाषा ऐसी है कि कोई भी धोखा खा जाए।

नीचे का स्क्रीनशॉट भी कम नहीं है -


शायद इसीलिए याहू के बुरे दिन चल रहे हैं। 😕

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ईवीएम से छेड़छाड़ के आपको कितने तरीके पता हैं?
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यदि आप एक आईआईटी इंजीनियर हैं तो शर्तिया आपको ये दस तरीके तो पता होंगे ही–

1. एक हथौड़ी लें, ईवीएम पर दन्न से दे मारें. बल्कि हथौड़ा ठीक रहेगा. वो भी लुहार वाला.

2. एक प्लायर लें, ईवीएम के बटनों को, फिर सर्किट को और अंत में प्रोसेसर व रोम को प्लायर की सहायता से क्रम से उखाड़ें. बेतरतीब से उखाड़ने में न तो ईवीएम को मजा आएगा न देखने वालों को.

3. ईवीएम के बैटरी कंपार्टमेंट को खोलें और उसमें सीधे 440 वोल्ट का करेंट दें. करेंट कैसे दें यदि नहीं पता तो आईआईटी में फिर से एडमीशन लें. इस बार सब्जैक्ट मेटलर्जी लें. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में करेंट कैसे देना यह नहीं सिखाया जाता. वैसे, सीखकर भी क्या हासिल होगा? थ्योरी और प्रैक्टिक में जमीन आसमान का अंतर होता है. आजकल करेंट वैसे भी फेज़ में नहीं आती, आती भी है तो बार बार जाती है जबकि न्यूट्रल और अर्थ में आती है तो फिर जाती नहीं. 

4. गैस बर्नर को चालू करें. सब्सिडी छोड़ी गई वाली गैस से छेड़छाड़ अच्छी होगी. हाँ, तो गैस जलाएँ, उस पर चाय की पतीली जिस तरह रखी जाती है उस तरह ईवीएम को रखें. मस्त छेड़छाड़ होगी. सुगंध सूंघकर धुंआ देखकर एनजीटी वाले आ धमकेंगे ऐसा अगर सोच रहे हैं तो निश्चिंत रहें, ऐसा कुछ नहीं होगा. उनके अपने एजेंडे हैं, उनकी अपनी अलग समस्याएँ हैं.

5. एक हेलिकॉफ्टर किराए पर लें. चार्टर्ड हो तो उत्तम. मालिकाना हो तो सर्वोत्तम. फिर पंद्रह हजार फुट की ऊँचाई से ईवीएम को नीचे गिराएं. यदि तीस हजार फुट ऊंचे से गिराएंगे तो छेड़छाड़ सर्वोत्तम तो होगी ही, छेड़छाड़ का सबूत भी नहीं मिलेगा.

6. सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद बाजार में बेधड़क बिक रहे एसिड का पूरा एक ड्रम खरीदें. उस ड्रम में ईवीएम को डाल दें. बड़ी रासायनिक किस्म की छेड़छाड़ होगी, पूरी तरह विकृत करती हुई. बाजार में यदि एसिड न मिले तो मुहल्ले के मजनूं के पास शर्तिया बढ़िया स्टॉक होगा, और असली भी और सस्ती भी.

7. ईवीएम को पेचकस की सहायता से ठीक से खोलें. सर्किट बोर्ड अलग करें. डीसॉल्डरिंग मशीन से सारे कंपोनेंट अलग करें. डीसॉल्डरिंग मशीन चलाना नहीं आता तो आईटीआई में वेल्डिंग कोर्स में एडमीशन लें. आईआईटी व आईटीआई में केवल अक्षरों के क्रम का अंतर है.

8. ईवीएम को लेकर किसी जलाशय के किनारे जाएँ. अच्छा होगा उस जलाशय के किनारे जाएँ दुर्गा गणेश आदि विसर्जित होते हैं. ईवीएम को भी उसी तरह विसर्जित करें. यह नारा भी लगाएं – ईवीएम तोरया, अगले चुनाव तू मत आ! (यह भी ठीक रहेगा - ईवीएम मोरया, अगला चुनाव मुझे जितवा)

9. मटन काटने वाला छुरा लें. आजकल यह बहुतायत में कबाड़ियों के पास मिल रहा है. ईवीएम को इससे काटें. समस्या हो तो गौरक्षक सेना की सहायता लें.

10. शराब दुकान जाएँ. ताज़ा ताज़ा राष्ट्रीय राजमार्ग से डीनोटीफ़ाई होकर अर्बन सिटी सड़क के किनारे की शराब दुकान हो तो ज्यादा अच्छा. ईवीएम को सामने रखें और अपनी पसंद की वह्सिकी या रम के तीन चार तग़ड़े शॉट मारें. दारू नहीं पीते हों तो भोलेनाथ की पसंदीदा प्रसाद स्वरूप भाँग / गांजे की दुकान में ठंडाई या सुट्टे का शॉट मारें. आप पूछेंगे कि ईवीएम में छेड़छाड़ कहाँ हो रही है? हो रही है भाई, बखूबी हो रही है. थोड़ा नशा चढ़ने दो. फिर दिखेगा कि एक नहीं, दस ^ दस तरीकों से हो रही है!

भूल से, यदि आप आईआईटीएन नहीं हैं, तो फिर आपके अपने तरीके होंगे ईवीएम में छेड़छाड़ के. जरा हमें भी तो बता दें?













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