व्यंग्य जुगलबंदी - कैशलेस इकॉनॉमी

  “भारत में कैशलेस इकॉनॉमी”. पर एक मेघावी विद्यार्थी (वो, जाहिर है, सीए इन्टर्न था) का लिखा निबंध आपके अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है – कै...

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“भारत में कैशलेस इकॉनॉमी”. पर एक मेघावी विद्यार्थी (वो, जाहिर है, सीए इन्टर्न था) का लिखा निबंध आपके अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है –

कैशलेस इकॉनॉमी की सोच बहुत ही फासीवादी, निरक्षर किस्म की, तुगलकी, फूहड़ और निकृष्ट विचार वाली है. यह ऐसा विचार है, जिसको अपना कर भारत प्रागैतिहासिक काल वाली स्थिति में पहुंच जाएगा. बहुत पीछे चला जाएगा. उसकी प्रगति खत्म हो जाएगी. भारत में क्या, कहीं भी कैशलेस इकॉनॉमी की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. कैशलेस इकॉनॉमी भी कोई इकॉनॉमी होती है भला? जहाँ कैश नहीं वहाँ इकॉनॉमी कैसी?

कैशलेस इकॉनॉमी से बहुतों का धंधा चौपट हो जाएगा. सबसे पहले चार्टर्ड एकाउन्टेंटों का धंधा चौपट होगा. जब हर ट्रांजैक्शन, हर लेन-देन खाता बही में दर्ज होगा, सारा कुछ ब्लैक एंड व्हाइट में दर्ज होगा, तो फिर भला हम चार्टर्ड एकाउन्टेंटों को कौन पूछेगा?

कैशलेस इकॉनॉमी से भयंकर मंदी आएगी. ऐसी मंदी जिससे देश कभी उबर नहीं सकेगा. कैशलेस सिस्टम से दो नंबर का धंधा बंद हो जाएगा, जिससे बहुत सारी इंडस्ट्री बंद हो जाएगी. स्टील और सीमेंट आदि सैक्टर में तो तालाबंदी हो जाएगी. जिस देश की इंडस्ट्री में सत्तर प्रतिशत बिजनेस दो नंबर में, बिना बिल के, या एक ही बिल में दर्जनों बार माल आर पार कर खेल होता है वह समाप्त हो जाएगा, जिससे बिजनेस मर जाएगा. इंडस्ट्री ये टैक्स, वो टैक्स दे देकर घाटे में आकर मर जाएगी. अरे! एप्पल जैसी विश्व की सबसे बड़ी, अमरीकी कंपनी भी आज अगर नंबर एक पर है तो इसलिए कि वो अमरीका में टैक्स नहीं देती, अपना पैसा और बिजनेस आयरलैंड में बताती और पार्क करती है. और आप बात करते हैं! जो आदमी अब तक दिन में सौ रुपए लगाकर पाँच हजार रुपए की चाय बेचकर नित्य चार हजार नौ सौ रुपए कमाता था और कोई टैक्स नहीं देता था, वो तो चाय के हर कप पर टैक्स देने के विचार के सदमे से मर ही जाएगा. भारती की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं सदमों से सफाचट हो जाएगी. ओह! अतिरेक हो गया? मगर, फिर, धंधा किये और टैक्स दिए – यह भी कोई जीना, आईमीन, धंधा है लल्लू?

कैशलेस इकॉनॉमी से देश के मतदाताओं को पंचसालाना चुनावी उत्सव से महरूम होना पड़ेगा. अहा! वे भी क्या दिन थे. जब देश में चुनाव एक महोत्सव हुआ करता था. बुरा हो शेषन का जिसने चुनावी महोत्सवों के गुब्बारे में इतने छेद कर दिए कि गुब्बारा फूट गया और चुनाव बस उत्सव बन कर रह गए और मामला भूकंप के बाद बचे अवशेषों को सजाने-सम्भालने जैसा हो गया. कैशलेस इकॉनॉमी से परेशान नेतागण आपस में सिर जोड़ कर यह जुगाड़ भिड़ाने में बैठे हैं कि पार्टी लाइन की ओर से मतदाताओं को दिए जाने वाले मंगलसूत्र, टीवी, साइकिल आदि तो खैर ठीक है, व्यक्तिगत जीत सुनिश्चित करने के लिए कंबल ओढ़ कर दिए जाने वाले कैश का विकल्प कैशलेस में आखिर कैसे संभव होगा? वैसे ये जमात भारत की सबसे जुगाड़ू जमात है. चुनाव आते न आते कैशलेस का कैशबैक किस्म का कोई न कोई जुगाड़ निकल ही आएगा.

कैशलेस इकॉनॉमी से आम जनता को अपना रोजमर्रा का कार्य करने-करवाने में बहुत समस्या आएगी. अभी तो किसी किस्म का ड्राइविंग लाइसेंस लेने, किसी बिल्डिंग का परमीशन लेने या राशन कार्ड बनवाने के लिए कैश बहुत काम आता है. दलालों और अफ़सरों को उनके सुविधा शुल्क के तयशुदा रेट कैश में दो और काम घर बैठे हो जाता है. कैशलेस इकॉनॉमी में यह सब कैसे होगा यह सोच-सोच कर जनता परेशान हो रही है हलाकान हो रही है और इस समस्या का कहीं कोई हल नजर नहीं आता.

कैशलेस इकॉनॉमी से आने वाले समय में कभी भी किसी का कहीं कोई काम नहीं होने वाला. कोई लाइसेंस नहीं बनेगा, न कहीं कोई परमीशन मिलेगी. किसी का राशनकार्ड भी नहीं बनेगा. चहुँओर अव्यवस्था हो जाएगी. दंगे भड़क उठेंगे. मारकाट मच जाएगी.  हाँ, कौन जाने आगे शायद नेताओं की तरह, भारतीय जुगाड़ू जनता इसका कोई हल निकाल ले. वैसे भी, आजकल की अधिकांश  भारतीय जनता किसी न किसी किस्म की नेतागिरी में व्यस्त है और यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि ये नेता है या आदमी या आदमी है या नेता. शायद पेटम जैसा कोई ऐप्प निकल आए जो बिटक्वाइन जैसे ब्लॉकचैन आभासी मुद्रा के जरिए पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी चलाए और जो केवल ऐसे काम-धाम के लिए खास, गुपचुप तौर पर बनाया जाए. वैसे इस विचार का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता है. सचिवालयों में जहाँ टेंडर आदि होते हैं, बिटक्वाइन के बारे में आजकल तहकीकातें वैसे भी जरा ज्यादा होने लगी हैं. जो दसवीं फेल नेता कभी इंटरनेट और कंप्यूटर को टेढ़ी निगाह से देखते थे और पूछते थे कि ये क्या बला है, वे भी बड़े कुतूहूल से बिटक्वाइन के बारे में पूछते फिर रहे हैं. जब दो-नंबरी, इंटरनेशनल पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी इस रफ़्तार से आ रही है तो कुल मिलाकर, एक नंबर की देशीय कैशलेस इकॉनॉमी को फेल होना ही है.

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व्यंज़ल

 

आया था कैशलेस जाएगा कैशलेस

फिर डर क्यों, हो जाएगा कैशलेस

 

गुमान क्योंकर हो, जब ये तय है

एक दिन, सब हो जाएगा कैशलेस

 

सभी देख रहे हैं चेहरे दूसरों के

कि कौन पहले हो जाएगा कैशलेस

 

याद रख, जन्नत में तुझे हूरें मिलेंगी

यदि, बंदे, तू हो जाएगा कैशलेस

 

क़तार में सबसे पहले खड़ा है रवि

जानता है, वो हो जाएगा कैशलेस

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छींटे और बौछारें: व्यंग्य जुगलबंदी - कैशलेस इकॉनॉमी
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