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व्यंग्य जुगलबंदी 50 : नोटबंदी, जीडीपी और आर्थिक विकास

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अस्वीकरण – यह टोटल व्यंग्य (परिपूर्ण व्यंग्य भी लिख मार सकता था, पर, फिर कितने लोगों को समझ में आता?) है. अतः तद्नुसार ग्रहण करें. नोटबंदी प...

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अस्वीकरण – यह टोटल व्यंग्य (परिपूर्ण व्यंग्य भी लिख मार सकता था, पर, फिर कितने लोगों को समझ में आता?) है. अतः तद्नुसार ग्रहण करें.

नोटबंदी पर, एक बार फिर से एक गुट की ओर से नेगेटिव सियापा हो रहा है कि देश का बड़ा नुकसान हो गया, तो दूसरे गुट की ओर से पॉज़ीटिव सियापा हो रहा है - यानी फ़ायदों के आंकड़े-दर-आंकड़े पेश किए जा रहे हैं.

मैं भी कूदता हूँ इसमें. पीछे क्यों रहूँ? बीते दो दशकों तक एक-एक मेगाबाइट डेटा को तरसता हुआ, महंगे डेटा के उपयोग में पूरी तरह कंजूसी बरतता हुआ दिन बिता रहा था, और अब तो जियो का धन्यवाद, कि जहाँ चहुँओर से धूल की तरह सस्ते डेटा की बरसात हो रही हो तो सोशल मीडिया के कलह में हर किसी को अपना योगदान देने का फ़र्ज़ तो बनता ही है, वरना भाई लोग तटस्थता के संज्ञेय अपराध की ओर ध्यान दिलाने लगते हैं.

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हालांकि नोटबंदी, जीडीपी और आर्थिक विकास पर - किसी भी पॉज़िटिव और निगेटिव एंगल से - बड़े ठाठ से पंडिताई झाड़ने के लिए किसी को भी आर्थिक विशेषज्ञ होने या बनने की आवश्यकता किसी सूरत नहीं है, मगर यहाँ मैं अपनी खुद की बात थोड़ी विनम्रता से तो कह ही सकता हूँ.

नोटबंदी ने देश के जीडीपी और आर्थिक विकास का कबाड़ा किया हो या आगे बढ़ाया हो, इससे मुझे क्या? मैं तो बस अपनी बात कहता हूँ. इसने मुझे बहुत सारा फायदा पहुँचाया. बहुत-बहुत सारा फायदा. सचमुच का. उनमें से कुछ खास ये हैं –

· नोटबंदी ने मुझे कैशलेस जीना सिखाया – जब अचानक नोटबंदी हुई, तो जेब में रखा नोट महज काग़ज़ का टुकड़ा रह गया. मेरा अपना खुद का कमाया पैसा था, अतः बैंकों की लंबी लाइन में लगने की हिम्मत नहीं हुई. सो, कोई महीने भर तक मैं कैशलेस रहा और इस तरह कैशलेस जीना सीख गया.

· नोटबंदी ने मुझे न्यूनतम आवश्यकताओं के बीच, संतोष पूर्ण जीना सिखाया – कोई महीने भर मेरे बटुए में महज काग़ज़ के टुकड़े रहे. गुल्लक में कुछ सिक्के थे जिनके दम पर मैंने पूरा महीना निकाला. न कोई विलासिता की – प्याज - टमाटर जैसी - चीजों की खरीदारी की, न किसी तरह की इच्छा अपेक्षा रखी. इच्छा हुई तो भी मन में संतोष कर लिया, सांत्वना दे दी. बड़ा ही शांति-पूर्ण, संतोष पूर्ण जीवन बना रहा. आगे किसी भी कठिन समय को झेल लेने की बड़ी ताकत मिली. नोटबंदी से सादा जीवन उच्च विचार का फंडा पूरी तरह से प्रतिपादित हो गया.

· नोटबंदी ने मुझे  पेटीएम सिखाया – अंततः मरता क्या न करता की तर्ज पर. जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा तो मैंने भी जुगाड़ कर, पूछ-पाछ कर, लोगों-गुरुओं-एक्सपर्टों की लल्लो-चप्पो कर और घंटों यू-ट्यूब ट्यूटोरियल वीडियो देख-सुन कर पेटीएम इंस्टाल करना, इंस्टाल करने के बाद खाता बनाना और खाता बनाने के बाद सफलतापूर्वक भुगतान करना सीख गया. धन्यवाद नोटबंदी. तूने मुझे तकनीकी जानकार बना दिया.

· नोटबंदी ने मेरा स्वास्थ्य ठीक किया – नोटबंदी के बाद बार बार बैंक के चक्कर लगाने, एटीएम दर एटीएम भटकने से आउटिंग हुई, कसरत हुई और इस वजह से मेरा शुगर लेवल डाउन हुआ, हार्ट रेट ठीक हुआ, शरीर में चुस्ती फुर्ती आई, पेट की चरबी कम हुई और इस तरह कुल मिलाकर मेरा स्वास्थ्य पहले की अपेक्षा बहुत अच्छा हो गया.

· नोटबंदी ने मुझे मुखर बनाया, मेरी शर्म-हया दूर की – लोगों की शिकायत रहती थी कि मैं अंतर्मुखी, शर्मीला किस्म का इंसान हूँ. नोटबंदी ने मेरी यह कमी दूर कर दी. राह चलते लोगों से बेझिझक चालू एटीएम के बारे में पूछताछ करने लगा. पड़ोसियों से नमक और चीनी मांगने में शर्म नहीं किया. एटीएम की लाइनों में अपने आगे पीछे लगे लोगों की कहानियाँ सुनीं कम, और अपनी सुनाईँ ज्यादा. बड़ा अच्छा अनुभव रहा. सीखें मिलीं अलग से, जैसे कि, कुछ परिचितों के नोट बदलवाने के स्पष्ट और अस्पष्ट आग्रह को यथायोग्य विनम्रतापूर्वक और कठोरतापूर्वक ठुकराने की कला भी सीखी.

मैं तो शिद्दत से नोटबंदी सीजन 2 का इंतजार कर रहा हूँ. जीडीपी और आर्थिक विकास आप अपने पास रखो, मुझे पहले से भी अधिक फायदा होगा ऐसी पूरी उम्मीद है.

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व्यंग्य जुगलबंदी 50 : नोटबंदी, जीडीपी और आर्थिक विकास
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