व्यंग्यविविध | तकनीकीहिन्दीछींटें और बौछारें

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Thursday, March 29, 2007

अभिकलन एवं प्रक्रमण के दौरान मुंबइया चिट्ठाकार संगोष्ठी


पिछले दिनों वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने सीडॅक मुंबई के तत्वावधान में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैंने भी भाग लिया था. विषय था - भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के भाषाई संसाधनों का निर्माण (क्रिएशन ऑफ़ लेक्सिकल रिसोर्सेज़ फ़ॉर इंडियन लेंगुएज कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग). वैसे, शुद्ध साहित्यिक भाषा में इसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं किया गया था -

भारतीय भाषी अभिकलन एवं प्रक्रमण के लिए शाब्दिक संसाधनों का सृजन

कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग की जगह अभिकलन एवं प्रक्रमण का इस्तेमाल किया गया था, जो कि न तो प्रचलित ही है और न ही सुग्राह्य. परंतु यह क्यों किया गया था या जा रहा है - इसकी कथा बाद में.

शब्दावली आयोग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. बिजय कुमार ने जब अपना प्रजेंटेशन देना प्रारंभ किया तो पावर-पाइंट में बनाए गए प्रजेंटेशन ने हिन्दी दिखाने से मना कर दिया. जाहिर है, यह प्रजेंटेशन प्रो. बिजय कुमार के कार्यालय-सहायकों ने तैयार किया था, और यूनिकोड में नहीं वरन् किसी अन्य फ़ॉन्ट में था, जो कि एलसीडी प्रोजेक्टर से जुड़े कम्प्यूटर में उस फ़ॉन्ट के संस्थापित नहीं होने से चला ही नहीं. प्रो. बिजय कुमार के साथ-साथ सभी ने कम्प्यूटरी हिन्दी की इस दुर्गति का रोना रोया और बहुत-कुछ असहनीय-सी हँसी मजाक के दौर भी चले. दरअसल, तकनॉलाजी से अभिज्ञ-अनभिज्ञ सहायकों द्वारा तैयार किए गए पॉवर-पाइंट के प्रजेन्टेशन के चलने-नहीं-चलने में कम्प्यूटरी हिन्दी का कोई दोष आज से दो-चार साल पहले भले रहा हो, अब तो नहीं ही है. खैर.

अब आइए, बातें करते हैं अभिकलन एवं प्रक्रमण जैसे क्लिष्ट संस्कृत-रुप शब्दों के इस्तेमाल के बारे में. यह तो हम सभी को पता है कि वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के अंतर्गत भाषाई विद्वानों द्वारा हिन्दी में दो खंडों की वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली तैयार की गई है. इसकी भाषागत लोकप्रियता और स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न उठते रहे हैं और एक तरह से इस शब्दावली के शब्दों को आमतौर पर इस्तेमाल में नहीं लिया जाता रहा था - यहाँ तक कि सरकारी एनसीईआरटी के प्रकाशनों में भी. इसी बीच किसी भाषाई संस्था ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर दी कि वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा जारी तकनीकी शब्दों को एनसीईआरटी के प्रकाशनों में अनिवार्य इस्तेमाल में लिए जाने हेतु निर्देश दिए जाएं. न्यायालय ने कई पक्षों की बात सुनकर यह निर्णय दिया कि चूंकि भारत सरकार द्वारा गठित आयोग के अंतर्गत ये शब्द तय किए गए हैं अतः इनका इस्तेमाल जरूरी है अन्यथा इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा. अब आप हिन्दी में इस तरह के कठिन, अप्रचलित, संस्कृतनिष्ठ शब्दों के इस्तेमाल की आदत बना लें नहीं तो, कल को हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश विस्तारित होकर चिट्ठों पर भी लागू हो जाए, और आप न्यायालय की अवमानना के आरोपी होकर जेल भेज दिए जाएं!

बहरहाल, संगोष्ठी के दौरान कुछ पल हमने भी चुराए और गुलमोहर रोड क्रास नं 9 की तिवारी जी की मिठाई की दुकान में, फिर नुक्कड़ पर चाय की चुस्कियों के साथ और फिर बाद में सीडॅक के आगंतुक कक्ष में कोई दो घंटे से ऊपर, जम-कर मुम्बईया चिट्ठाकार संगोष्ठी कर डाली.

चार चिट्ठाकारों की इस संगोष्ठी में मेरे अलावा शशि सिंह, कमल शर्मा, चन्द्रकांत जोशी सम्मिलित रहे. हिन्दी चिट्ठाकारी की दशा व दिशा पर तमाम तरह की बातें हुईं. लोकमंच को मिल रहे नित्य के आठ-हजार क्लिक्स के बारे में जानकर सुखद आश्चर्य हुआ. शशि जी जितने हँसमुख दिखाई देते हैं, साक्षात मिलन में उससे कहीं ज्यादा हैं. चन्द्रकांत जी का ज्ञानसागर बड़ा विस्तृत है - और वे हिन्दी चिट्ठाजगत के हर चिट्ठों पर अपनी पैनी निगाह रखते हैं. हिन्दी चिट्ठाजगत और फैले-फूले इस क्षेत्र में उनके प्रयास अपने स्तर पर जारी हैं. कमल जी ने तो एक तरह से यह तय कर रखा है कि हिन्दी चिट्ठाकारों को ऐन-कैन-प्रकारेण सोना जैसी चीजें खरीदवा-बिकवा कर धनवान बनवाएंगे ही.

(कमल, मैं, चंद्रकांत व शशि)

तिवारी मिठाईवाले के स्वादिष्ट समोसों और रबड़ी से चिट्ठाकार संगोष्ठी में और अधिक स्वाद आ गया. चिट्ठाकारी के बहुत से पहलुओं पर बात हुई जिनमें वर्तमान में विंडोज़ 98 में फंसे हुए गैर यूनिकोड हिन्दी के पाठकों को यूनिकोड पाठकों में कैसे तबदील किया जाए इस पर तो विशेष चर्चा हुई. निकट भविष्य में मुम्बई में एक विशाल हिन्दी-चिट्ठाकार सम्मेलन-सह-संगोष्ठी के आयोजन के संकल्प के साथ यह संगोष्ठी संपन्न हुई.

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9 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

अतुल शर्मा said...

अभिकलन और प्रक्रमण हैं तो क्लिष्ट शब्द, ये कितने प्रचलित होंगे पता नहीं। परंतु बैं‍क में प्रचलित कुछ शब्दों से मैं परिचित हूँ जो अन्य लोग भी शायद जानते हों
डिपॉज़िट - निक्षेप
क्लिरिंग - समाशोधन
‍विद्ड्रॉअल - आहरण
शायद इसी प्रकार हिन्दी शब्द प्रचलित होते हों।

चिट्ठाकार संगोष्ठी की जानकारी अच्छी रही। इन चिट्ठाकारों के बारे में और जानने के मिला।

शशि सिंह said...

रवि भैया, आपने तो बाजी मार ली। अभी हम आपके दिये तीखे रतलामी सेव के स्वाद मे‍ ही उलझे थे कि आपने तिवारीजी की मिठाई की दुकान का जिक्र कर दिया। लगे हाथो‍ एक और खुशखबरी... शायद आपके मुम्बई आगमन का पुण्य प्रताप था कि उस खास दिन लोकमंच का पर हिट्स की संख्या पहली बार २० ह्जार के आंकडे‍ को पार कर गई। इस बात के मद्देनजर मेरा तो प्रस्ताव है कि आप यहां मुम्बई मे‍ डेरा डाल दो। आपसे हुई भेंट हमारे लिए न सिर्फ़ सुखद रही बल्कि प्रेरणादायी भी।
आपका
शशि

संजय बेंगाणी said...

क्लिष्ट हिन्दी के शब्द अगर बार बार प्रयोग होंगे तो वे भी सामान्य लगेंगे. बात है प्रचलित करने की.

गोष्टी का विवरण सुन मजा आया, खास कर मिठाई और समोसे वाली बात. :)

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा गोष्ठी के विषय में जानकर.

Srijan Shilpi said...

वाह, मुम्बई चिट्ठाकार सम्मेलन की रिपोर्ट सुना कर आपने खुश कर दिया। शशि भाई, इसपर आप भी कुछ लिखो न, चिट्ठाकार सम्मेलन वाले हमारे सामूहिक चिट्ठे पर।

रवि जी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े शब्दों के मामले में आयोग द्वारा बनाई गई शब्दावली पर विशेष ध्यान मैंने अभी तक नहीं दिया है, लेकिन विधिक शब्दावली (legal glossary) का इस्तेमाल मुझे रोजाना ही करना होता है और क़ानूनी शब्दों के लिए जैसे हिन्दी शब्द उस शब्दावली में दिए गए हैं, उनका कोई विकल्प नहीं है। क़ानूनों के हिन्दी रूपांतर उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हुए किए जाते हैं और वे ही प्रचलित भी हैं।

आप दिल्ली कब आ रहे हैं?

अनामदास said...

प्रिय रवि जी
संगोष्ठी का समाचार पढ़कर अच्छा लगा,मैं सचमुच दिल से आप सभी साथियों का आभारी हूँ जो हिंदी में चिट्ठाकारिता का सरल और सुलभ बनाने के इस अभियान में इतनी लगन से जुटे हैं. मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ स्वीकार करें. नारद रात-दिन प्रगति करे, उसके साथ-साथ उससे जुड़े सभी साथी भी. आपकी मेहनत ज़रूर रंग लाएगी.
अनामदास

अनूप शुक्ला said...

गोष्ठी का विवरण जानकर अच्छा लगा! समोसे ,मिठाई का जिक्र मजेदार। शशिसिंह इसे लिखें तो कुछ और मजा आये! लोकमंच की बढ़ती हिट्स की बात जानकर अच्छा लगा!बधाई! ऐसे में तो रवि रतलामी को नजर बंद कर लेना चाहिये भाई तुमको! :)

अनुनाद सिंह said...

लगता है जो लोग अपने को हिन्दी विकास का दीपक समझते हैं, वे खुद ही लिगेसी-फाण्ट रूपी अन्धकार के चपेटे में हैं।

हिन्दी तकनीकी शब्दों का जब प्रयोग होगा तो वे आसान लगने लगेंगे। (Everything is difficult before it is easy.) अंगरेजी और अन्य भाषायें क्लिष्ट तकनीकी शब्दों से भरी पड़ी हैं। हां, जब किसी अपरिचित शब्द का प्रयोग शुरू किया जाय तो उसका परिचय किसी दूसरे आसान और परिचित शब्द के द्वारा कराना ठीक रहेगा। 'कम्पटीशन' के स्थान पर 'स्पर्धा' या 'होड़' कम प्रचलित हैं, लेकिन इसका कारण यह नहीं है कि 'स्पर्धा' , 'कम्पटीशन' से कठिन शब्द है।

Hariraam said...

हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग या अभिकलन की समस्याओं रोना तो सभी रोते हैं, समाधान कोई क्यों नहीं देता। समाधान एक ही है -- सरकारी स्तर पर कुछ कठोर आदेश जारी हों कि भारत में बिकने या प्रयोग में आनेवाले हर कम्प्यूर आपरेटिंग सीस्टम् के बेसिक इन्स्टॉल प्रोग्राम में भारतीय भाषाओं के मानकीकृत सीस्टम् फोंट इनपुट मेथोड तथा इन्हें संचालित करनेवाले प्रोग्राम अनिवार्य रूप से स्वतः इन्स्टॉल हो जाएँ। इसका उल्लंघन करने पर आपरेटिंग सीस्टम् निर्माता पर 90 करोड़ रुपये का हर्जाना लागू किया जाए।

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