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व्यंग्य जुगलबंदी - किताब और मेला

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(विश्व पुस्तक मेला - चित्र अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक पृष्ठ से साभार) इस बार जब जुगलबंदी लिखने बैठा, तो पहले तो विषय ही समझ में नहीं आया. थोड...

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(विश्व पुस्तक मेला - चित्र अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक पृष्ठ से साभार)

इस बार जब जुगलबंदी लिखने बैठा, तो पहले तो विषय ही समझ में नहीं आया. थोड़ा-बहुत ध्यान किया, दिमाग लगाया, और जब सफल नहीं हुआ तो अंततः शब्दकोश-डॉट-कॉम की शरण में गया. पता चला, ओह! सब्जैक्ट तो रिलेटिवली ईज़ी है, और बुकफ़ेयर्स ऐंड बुक्स पर है. नहीं नहीं, शायद बुकफ़ेयर एंड बुक पर है. हद है! इतनी सड़ी सी बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी. मगर क्या कीजिए, मानव मन है. धीर गंभीर बातें तो वो जल्द आत्मसात कर लेता है, मगर सड़ी सी बात जेहन में ही नहीं आती, गले से नीचे ही नहीं उतरती. वैसे भी, एलियन भाषा समझने में टाइम तो लगता है. बात नई वाली हिंदी में कही जाती तो बात कुछ और थी. पुरानी हिंदी तो कब की निकल ली है. इलेक्ट्रॉनिकी, कॉन्वेंटी युग में यदि हिंदी में नवोन्मेष न आए तो फिर किसमें आए!

तो, लीजिए, पेश है बुकफ़ेयर एंड बुक पर मेरा मारक व्यंग्य. भई, ‘मारक’ मेरे ‘अपने स्टैंडर्ड’ के मुताबिक है, और हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र वासी हैं, हमें अपने स्टैंडर्ड और स्टैंड दोनों ही तय करने के अधिकार हैं.

वैसे भी, बुक एंड बुकफ़ेयर में जो ग्लैमर है, जो एक्सेप्टेबिलिटी है, जो दम है, जो मास अपील है, वो किताब और मेला में नहीं है. मेला से यूं लगता है जैसे कि किसी गांव देहात के मेले में जा रहे हों और पांच रुपए की चकरघिन्नी में एक चक्कर लगा कर और दो रुपए का बरफ गोला खाकर चले आ रहे हों. मेला से न स्टेटस उठता है और न ही स्टेटमेंट. सॉलिड स्टेटमेंट सहित सॉलिड स्टेटस के लिए बुकफ़ेयर ही ठीक है. मेला यहाँ ऑडमैनआउट है. और, बुकफ़ेयर भी वर्ल्ड किस्म का हो, राजधानी का हो, लोकल न ही हो तो क्या बात है.

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यूँ, होने हवाने को तो हमारे इधर भी साल में एकाध बार पुस्तक मेला लग जाता है. पर, चूंकि एक तो वो लोकल होता है, वर्ल्ड वाला नहीं, और दूसरा पुस्तक मेला किस्म का होता है बुकफ़ेयर किस्म का नहीं तो वो आमतौर पर हम वर्ल्ड-क्लास की बातें करते रहने वाले लेखकों के लिए कोई काम-धाम का नहीं होता. न तो वहाँ कोई धीर-गंभीर साहित्यिक विमर्श-उमर्श होता है, न कोई सॉलिड किस्म का लोकार्पण. होता भी होगा तो हम वर्ल्ड-क्लासी लोग उन्हें सिरे से खारिज कर देते हैं. कुल मिलाकर वो पक्का, चुस्त-दुरुस्त पुस्तक मेला ही होता है. नॉन ग्लैमरस. इसलिए इसका न कोई हो हल्ला होता है और न ही फ़ेसबुक-ट्विटरादि में चर्चा और स्टेटस अपडेट. और, इस कलियुग के जमाने में यदि किसी चीज – वह भी मेले जैसी चीज – की चर्चा और स्टेटस अपडेट सोशल-मीडिया में नहीं होती है तो उसे किसी भी किस्म की घटना मानने से इंकार कर देना ही उचित होता है.

लोग लोकल पुस्तक-मेले में जाते हैं तो यह ध्यान रखते हैं कि कहीं कोई देख न ले, और गलती से भी उनकी सेल्फी या फोटो सोशल मीडिया में अपलोड न होने पाए. आखिर, इज्जत का सवाल जो होता है. कोई क्या कहेगा! इस लेखक का स्तर इस बात से जाना जा सकता है कि यह लोकल पुस्तक मेले में पाया जाता है! इसके उलट यदि लोग गलती से भी वर्ल्ड बुकफ़ेयर में पहुंच जाते हैं तो यह सुनिश्चित करते हैं कि खोज-बीन कर, आविष्कार कर, उद्घोषणाएँ-घोषणाएं कर लोगों से मिला-जुला जाए, सबको देखा-दिखाया जाए, बहु-कोणों, बहु-स्टालों, बहु-लेखकों, बहु-प्रकाशकों के साथ उनकी सेल्फियाँ, ग्रुप-फ़ोटोज़ बहु-सोशल-मीडिया में बहु-बहु-बार आए.

पुस्तक या किताब तो बेचारा सादगी से किसी अल्पज्ञात समारोह में या किसी स्थानीय मेले में विमोचित-लोकार्पित हो लेता है, मगर ‘बुक’ वर्ल्ड बुकफ़ेयर में ही विमोचित-लोकार्पित होता है और ऐसे चर्चित होता है. हिंदी बुक्स में बेस्टसेलर की अवधारणा भले ही हो न हो, ‘वर्ल्ड बुकफ़ेयर में विमोचित, लोकार्पित’ की अवधारणा बहुत लंबे समय से लोकप्रिय है. इसलिए बहुत सी किताबें “बुक” बनने की ख्वाहिश में कभी-भी, कहीं-भी विमोचित-लोकार्पित होने से मना कर देती हैं और वर्ल्ड बुकफ़ेयर के शुभ-मुहूर्त का इंतजार करती हैं. वर्ल्ड बुकफ़ेयर के शुभ मुहूर्त का आतंक कई की लेखनी में भी समाया होता है, और इस कदर समाया होता है कि उनकी लेखनी में सृजन का चक्र कुछ इस तरह समन्वयित होता है कि वे जब जब भी रचते हैं, वर्ल्ड बुकफ़ेयर में ही विमोचित-लोकार्पित होते हैं अन्यत्र कहीं नहीं.

यूँ तो मैंने ऊपर जो विवरण दर्ज किए हैं, बहुत कुछ आत्मकथात्मक किस्म के हैं. मगर, यदि, आप ये समझते हैं कि ये आप जैसे सर्वहारा हिंदी लेखक की बायोग्राफ़ी से मिलते जुलते हैं, तो इसे केवल संयोग ही समझें!

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