चिट्ठाकारी (हिन्दी?) में निहित ख़तरे…

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इलाहाबाद में मैंने अपनी प्रस्तुति में चिट्ठाकारी में निहित खतरों के बारे में भी बताया था. अभिषेक ओझा ने कई पोस्टों में ब्लॉगिंग के खतरे के ब...

इलाहाबाद में मैंने अपनी प्रस्तुति में चिट्ठाकारी में निहित खतरों के बारे में भी बताया था. अभिषेक ओझा ने कई पोस्टों में ब्लॉगिंग के खतरे के बारे में विस्तृत विवरण दिए हैं. इनमें से एक है – अनर्गल, व्यक्तिगत आक्षेप. यह टिप्पणी सुरेश चिपलूणकर के चिट्ठे से ली गई है. मुलाहिजा फरमाएँ :)





Vishal Pandey said...



सुरेश जी आपने सही मुद्दा उठाया है। जैसे नामवर जी मठाधीश है वैसे ही हमारे हिन्दी ब्लाग जगत के भी कुछ मठाधीश है। इनमे से दो को हम सब बखूबी जानते है। एक गंजी होती खोपडी वाला मरियल सा शख्स और दूसरा बाहर निकले दाँतो वाला हँसोड। आप यदि इन दोनो के चमचे नही तो हिन्दी ब्लाग जगत की मलाई कभी नही खा सकते।
आज हिन्दी बलाग जगत का विकास क्यो नही हुआ। ऐसे लोगो के कारण जो भाई-भतीजावाद को बढावा देते रहे और गूगल से हिन्दी प्रोमोशन के नाम पर पैसे उगाहते रहे। पैसे तो पा गये पर कुनबा बढाओ की नीति छूटी नही। आप ही बताये क्यो चिठठा-चर्चा मे खास ब्लागो की ही चर्चा होती है। यदि ये हिन्दी के सेवक है और उस नाम से पैसे कमा रहे है तो सभी चिठ्ठो की चर्चा करे।
मरियल से दूसरे मठाधीश को हिन्दी ब्लागिंग के नाम पर छत्तीसगढ से पैसा मिलता है। यहाँ हुये ब्लागिंग सम्मेलन मे भी उसने अपने चमचो को बुलाया था रेल की टिकट दिलवा कर। यह पूरा रैकेट है। इन्हे "हिन्दी ब्लाग माफिया" कह सकते है।
हिन्दी ब्लाग जगत आज की स्थिति मे दुर्गन्ध भरे तालाब की तरह है जिन्हे ऐसे मठाधीश सडा रहे है और सडाते रहेंगे।
वे लोग अच्छे है जो हिन्दी ब्लागिंग का मोह त्याग चुके है। हम भी उनमे शामिल है। बस आपको पढने चले आते है।
26 October, 2009 12:46 AM


यह रही स्क्रीनशॉट – ताकि सनद रहे:
mahajaal par suresh chiplunkar par raviratlami and anoop shukla
तो, यदि आप ब्लॉगिंग में हैं, तो इन खतरों से बच नहीं सकते. इन खतरों को मोल लेना ही होगा. कोई भी आपके किसी भी हिस्से की धज्जियाँ कभी भी कहीं भी बड़े बेखौफ़ तरीके से उड़ा सकता है.
जाहिरा तौर पर, आपकी जानकारी के लिए, टिप्पणीकार विशाल पाण्डेय का ब्लॉगर प्रोफ़ाइल बन्द है याने बेनामी?. अब जनता को कैसे पता चले कि ये मरियल... और हँसोड़ के बीच या इधर उधर ऊपर नीचे कहाँ ठहरते हैं?

अब शायद अगली बारी आपकी है. ठंडे पानी का गिलास, ब्लॉगिंग करते समय सदा साथ में रखें. :)

व्यंज़ल  तो बनता है न भाई? मुलाहिजा फरमाएँ -

चलने के खतरे हैं फिरने के खतरे हैं
यहाँ तो बोलने बताने में खतरे हैं

जंगलों का तो अजब हाल है साहब
अब हाथियों को चींटियों से खतरे हैं

बात भी करो तो किससे और कैसी
इस जमाने में बात-बेबात के खतरे हैं

जमाना बहुत बदल गया है यारों
अब औरों से नहीं अपनों से खतरे हैं

अज्ञानी मूढ़ रवि ये नहीं जानता
जियादा तो खुद को खुद से खतरे हैं

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छींटे और बौछारें: चिट्ठाकारी (हिन्दी?) में निहित ख़तरे…
चिट्ठाकारी (हिन्दी?) में निहित ख़तरे…
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