टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

यस प्राइम मिनिस्टर, यू आर राइट. वाजिब ग़लती और ग़लत काम में बाल बराबर ही तो फ़र्क़ होता है!

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हमारे प्राइम मिनिस्टर सही कहते हैं. वाजिब कहते हैं. वैसे भी नेताओं-मंत्रियों के लिए ग़लती और ग़लत काम में बाल बराबर ही तो फ़र्क़ होता है. और, दरअसल जो बाल बराबर फ़र्क़ होता है वो जरा कुछ इस तरह का होता होगा –

कांग्रेसी मंत्री करे तो ग़लत काम, कोएलिशन पार्टनर का मंत्री करे तो, वाजिब ग़लती.

मंत्री करे तो वाजिब ग़लती, अफ़सर करे तो ग़लत काम.

बड़ा अफ़सर करे तो वाजिब ग़लती, अदना अफ़सर करे तो ग़लत काम.

वैसे, ये फ़ॉर्मूला भारत में सर्वव्यापी है. सिर्फ सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार को जोड़कर इस यूनिवर्सल नियम को नहीं देखा जाना चाहिए. प्रधानमंत्री कोई नई बात नहीं कह रहे. अपने दैनिक सामाजिक जीवन में जरा झांकें –

पति करे तो वाजिब ग़लती, पत्नी करे तो ग़लत काम.

पुत्र करे तो वाजिब ग़लती, पुत्री करे तो ग़लत काम.

पिता करे तो ग़लत काम, पुत्र करे तो वाजिब ग़लती (या कई मामलों में इसके उलट).

सास करे तो वाजिब ग़लती (वो भी बड़ी मामूली), बहू करे तो ग़लत काम (वो भी बहुत भारी!).

सूची यूँ लंबी खिंचेगी, मगर उसे खींचने जैसा ग़लत काम करने का क्या फ़ायदा?

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गलती भी होने से पहले आदमी को देखा लेती है |

भ्रष्टाचार को तनिक भी न सहने का भरोसा दिखाना होगा।

प्रधानमंत्री नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की 150 वर्षगांठ के मौके पर विज्ञान भवन में संबोधित कर रहे थे. संबोधित नहीं कर रहे थे, बल्कि अफसरों को हरका रहे थे(सुधर जाओ, वर्ना सुधार दिए जाओगे). बता रहे थे कि इस संस्था के अधिकारियों को निष्पक्ष... आदि आदि रिपोर्ट पेश करना चाहिए, टीका टिप्पणी से बचना चाहिए. इन्हें वास्तविक गलती और गलत काम में अंतर को समझना चाहिए. उस वक्त काफी दिमाग लगाया लेकिन बातों को ठीक-ठीक समझ नहीं पाया. अब थोड़ा बहुत समझ में आ रहा है. वैसे हमारे प्रधानमंत्री इतने ज्ञानी है कि उनकी बातें लोगों को बामुश्किल ही समझ में आती है.
सीएजी को क्या करना चाहिए ये बात उन्हें समझ में आती है. लेकिन उन्हें क्या करना चाहिए वो खुद उन्हें समझ में नहीं आती है. वो अफसरों को सुधरने के लिए उपदेश दे सकते हैं मगर अपने मंत्रियों को सुधरने की नसीहत नहीं दे सकते है. उनसे कोई जवाब मांगता है, तो वो जवाब नहीं दे सकते हैं.. क्या करें बड़े लोगों के साथ यही प्राब्लम होती है.

हममें से कोई भी कुछ भी खोना नहीं चाहता और चाहता है कि उसे सब हासिल हो जाए। हममें से हर एक चाहता है कि देश में कानून का राज हो किन्‍तु उसे छोड कर हो। हममें से प्रत्‍येक चाहता है कि अतिक्रमण तत्‍काल हटाया जाना चाहिए किन्‍तु उसके किए अतिक्रमण को छोड कर।

जैसे हम हैं, वैसे हमारे नेता हैं। जैसा कच्‍चा माल, वैसा ही फिनिश्‍ड प्राडक्‍ट।

श्रीविजय वाते का शेर एक बार फिर अर्ज है -

चाहते हैं सब के बदले ये अंधेरों का निजाम,
पर हमारे घर किसी बागी की पैदाइश न हो।

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