मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

चिट्ठाकारी (हिन्दी?) में निहित ख़तरे…

इलाहाबाद में मैंने अपनी प्रस्तुति में चिट्ठाकारी में निहित खतरों के बारे में भी बताया था. अभिषेक ओझा ने कई पोस्टों में ब्लॉगिंग के खतरे के बारे में विस्तृत विवरण दिए हैं. इनमें से एक है – अनर्गल, व्यक्तिगत आक्षेप. यह टिप्पणी सुरेश चिपलूणकर के चिट्ठे से ली गई है. मुलाहिजा फरमाएँ :)





Vishal Pandey said...



सुरेश जी आपने सही मुद्दा उठाया है। जैसे नामवर जी मठाधीश है वैसे ही हमारे हिन्दी ब्लाग जगत के भी कुछ मठाधीश है। इनमे से दो को हम सब बखूबी जानते है। एक गंजी होती खोपडी वाला मरियल सा शख्स और दूसरा बाहर निकले दाँतो वाला हँसोड। आप यदि इन दोनो के चमचे नही तो हिन्दी ब्लाग जगत की मलाई कभी नही खा सकते।
आज हिन्दी बलाग जगत का विकास क्यो नही हुआ। ऐसे लोगो के कारण जो भाई-भतीजावाद को बढावा देते रहे और गूगल से हिन्दी प्रोमोशन के नाम पर पैसे उगाहते रहे। पैसे तो पा गये पर कुनबा बढाओ की नीति छूटी नही। आप ही बताये क्यो चिठठा-चर्चा मे खास ब्लागो की ही चर्चा होती है। यदि ये हिन्दी के सेवक है और उस नाम से पैसे कमा रहे है तो सभी चिठ्ठो की चर्चा करे।
मरियल से दूसरे मठाधीश को हिन्दी ब्लागिंग के नाम पर छत्तीसगढ से पैसा मिलता है। यहाँ हुये ब्लागिंग सम्मेलन मे भी उसने अपने चमचो को बुलाया था रेल की टिकट दिलवा कर। यह पूरा रैकेट है। इन्हे "हिन्दी ब्लाग माफिया" कह सकते है।
हिन्दी ब्लाग जगत आज की स्थिति मे दुर्गन्ध भरे तालाब की तरह है जिन्हे ऐसे मठाधीश सडा रहे है और सडाते रहेंगे।
वे लोग अच्छे है जो हिन्दी ब्लागिंग का मोह त्याग चुके है। हम भी उनमे शामिल है। बस आपको पढने चले आते है।
26 October, 2009 12:46 AM


यह रही स्क्रीनशॉट – ताकि सनद रहे:
mahajaal par suresh chiplunkar par raviratlami and anoop shukla
तो, यदि आप ब्लॉगिंग में हैं, तो इन खतरों से बच नहीं सकते. इन खतरों को मोल लेना ही होगा. कोई भी आपके किसी भी हिस्से की धज्जियाँ कभी भी कहीं भी बड़े बेखौफ़ तरीके से उड़ा सकता है.
जाहिरा तौर पर, आपकी जानकारी के लिए, टिप्पणीकार विशाल पाण्डेय का ब्लॉगर प्रोफ़ाइल बन्द है याने बेनामी?. अब जनता को कैसे पता चले कि ये मरियल... और हँसोड़ के बीच या इधर उधर ऊपर नीचे कहाँ ठहरते हैं?

अब शायद अगली बारी आपकी है. ठंडे पानी का गिलास, ब्लॉगिंग करते समय सदा साथ में रखें. :)

व्यंज़ल  तो बनता है न भाई? मुलाहिजा फरमाएँ -

चलने के खतरे हैं फिरने के खतरे हैं
यहाँ तो बोलने बताने में खतरे हैं

जंगलों का तो अजब हाल है साहब
अब हाथियों को चींटियों से खतरे हैं

बात भी करो तो किससे और कैसी
इस जमाने में बात-बेबात के खतरे हैं

जमाना बहुत बदल गया है यारों
अब औरों से नहीं अपनों से खतरे हैं

अज्ञानी मूढ़ रवि ये नहीं जानता
जियादा तो खुद को खुद से खतरे हैं

20 blogger-facebook:

  1. सहमत! ठीक इसी बात पर मैने अपने ब्लाग पर सुरेश चिपलूनकर की इसी पोस्ट के बारे में कहा है कि वे जाने/अनजाने में ट्रालिंग को बढावा दे रहे हैं - आशा है वे समझेंगे! उन्हे चाहिए कि ऐसे आधारहीन आक्षेपों पर मॉडरेशन का प्रयोग कर चुकें!
    http://hindini.com/eswami/archives/286

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  2. रवि जी, बिल्कुल सही ईंगित किया है और इस तरह की अनर्गल टिप्पणी से कहीं न कहीं हमारे ब्लॉगार मन को ठेस पहुँचती ही है।

    हमेशा की तरह व्यंजल से बात पूर्ण होती है।

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  3. This kind of personal attacks are obnoxious and certainly against the ethics of blogging . I condemn the tendency .

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  4. ब्लागिरी है यह। यहाँ अदृश्य पत्थर आता है और कीचड़ उछालता निकल जाता है। खुद उस पर न गिरे इसलिए वह पहले ही अदृश्य रहता है।
    भाई, ब्लागिंग में रहना है तो इतना तो झेलना पड़ेगा।
    वैसे इस के लाभ भी है, कम से कम लोग मठाधीश तो कहते हैं। एक सुंदर व्यंजल पैदा होती है।
    हमारे यहाँ कहावत है -
    जब हाथी निकलता है तो कुत्ते भूँकते ही हैं।

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  5. भई मैं तो मलाई खाना चाहता हूँ, अतः उपरोक्त दोनो व्यक्तियों के नाम पते भेजे :)

    साहब हम तो गंदी गालियों के साथ जान से मार देने की धमकी तक खा चुके है. मूँह उपर की ओर कर थुकने वालों को कौन रोक सका है?

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  6. कई ब्लॉगों पर विशुद्ध "पारिवारिक सम्बधों" युक्त भाषा में गालियां युक्त टिप्पणियां होती हैं। अपने बारे में भी मैने देखी है। उसकी तुलना में ये विशाल जी तो विशाल हृदय लगते हैं। :-)

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  7. @ हिन्दी ब्लागिंग के नाम पर छत्तीसगढ से पैसा मिलता है

    क्‍या सचमुच "विशाल" है आपका सूचना तंत्र ?
    पर मुझे क्‍यूं नहीं मिला अब तक ?
    व्‍यक्तिगत आक्षेप सर्वथा अनुचित है पर आजकल हिन्‍दी ब्‍लागजगत में यह आम है और यह आम रास्‍ता लोगों का खास नजर आता है, क्‍या करें.

    उत्तर देंहटाएं
  8. व्यक्तिगत आक्षेप करना बहुत गलत बात है। यह विकृत मानसिकता का परिचायक है।

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  9. malaai kaun na khana chahega ;)

    avadhiya ji se sehmat hoon

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  10. मैं तो कई बार बेनामियों की टिप्‍पणियों से आहत हुई हूं .. इस तरह अनाप शनाप लिखनेवालों की टिप्‍पणियां प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए !!

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  11. इस गोष्ठी से सम्बन्धित जितनी भी पोस्टें और टिप्पणियाँ आयी हैं उसे शान्तिपूर्वक पढ़ता रहा हूँ। कोई प्रतिक्रिया करने में रुचि नहीं रही। लेकिन इस विशाल पाण्डेय नाम के मुँहचोर ने जिस घटिया तरीके से अपनी टिप्पणी डाली है और सुरेश चिपलून्कर ने जिस प्रकार उसे ज्यों का त्यों बनाये रखा है वह जुगुप्सा पैदा करने वाला है।

    सुरेश जी तो बहुत शोध करके नियमों कानूनों का हवाला देकर अपनी पोस्ट लिखने का दावा करते हैं। फिर हैरत है कि ऐसी आपत्ति जनक सामग्री अपने ब्लॉग पर बनाये रखकर वे क्या बताना चाहते हैं? वे उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने से बच नहीं सकते।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेनामी10:26 pm

    Rachanaji ne shallen tarike se eik sawal uthaya jisme unhone naam nahi diya, halanki sabhi jante hai ki ve kiseke baare mai kah rahi hai. Par hamare eai varishthtam blogger ko unka es tarah ungli uthana nahi suhaya. Un varishthtam blogger ki tippanni kya mryada seema mai aati hai.

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  13. एक छोटी सी कविता ---

    मन को जो अच्छा लगे
    सो अच्छा
    मन को जो बुरा लगे
    सो बुरा
    दुनिया में हुए कई बुरे काम
    अच्छे के नाम पर

    --कॉपीराइट-शरद कोकास

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  14. 'इस जमाने में बात-बेबात के खतरे हैं' एकदम सच है जी !

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  15. अच्छा, ये बात? "मरियल" जनाब के चमचों को रेल भत्ता देकर बुलाया गया था? पर पूरा भाड़ा भत्ता देकर बुलाया तो अपने को भी गया था, नहीं जा पाए किसी आवश्यक कार्य से वह अलग बात है। अपने को तो नहीं पता कि अपन कब किसी के चमचे बने!! रवि जी, जब बिना चमचे बने अपनी इतनी पूछ है तो जल्दी ही इन दोनों महानुभावों के नाम और ईमेल पते वगैरह बता दीजिए, अपन चमचे, कढ़चे, डोंगे सब बन लेंगे क्योंकि तब तो यकीनन गारंटीड अपनी औकात बढ़ जाएँगी। अब ऐसा ही इन विशाल साहब ने विशाल रूप से फरमाया है कोई गलत थोड़े ही फरमाया होगा, इनकी टोन से ही पता चल रहा है कि इनके पास इनसाइड इन्फोर्मेन्शन थी!! ;)

    उत्तर देंहटाएं
  16. मैंने अपने ब्लाग पर मोडरेशन नहीं लगाया हुआ है अतः कई बार अनर्गल टिप्पणी प्रकाशित हो जाती है… इस टिप्पणी से मैं भी घोर असहमत हूं, लेकिन उसे हटाने का विचार करने से पहले ही रवि जी की यह पोस्ट आ चुकी थी, जिसमें उन्होंने खुद ही स्क्रीन शॉट देकर सबको पढ़वा दिया, फ़िर काफ़ी लोग पहले से ही इस घटिया टिप्प्णी को मेरे ब्लाग के जरिये पढ़ चुके थे… इसलिये अब इतनी देर से इसे हटाने का कोई औचित्य नहीं बनता। जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत राय का प्रश्न है मैं रवि जी का सम्मान पहले भी करता था, आगे भी करता रहूंगा, उनके योगदान को नकारने का सवाल ही नहीं है, बल्कि कई बार रवि जी ने मेरी तकनीकी मदद भी की है। यहाँ तक कि नामवर सम्बन्धी मुद्दा उठाने वाली पोस्ट में भी मैंने रवि जी, मसिजीवी और वडनेरकर जी के बारे में बाकायदा "सज्जन" शब्द का ही उपयोग किया है… फ़िर भी यदि कुछ लोग मुझसे नाराज़ हैं तो इसका कोई इलाज नहीं मेरे पास…

    उत्तर देंहटाएं
  17. सुरेश जी,
    आपके स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद. मैं भी कुछ स्पष्ट करना चाहूंगा.
    इलाहाबाद संगोष्ठी में ही अफ़लातून जी ने टिप्पणी मॉडरेशन के बारे में बताया कि मोह्ल्ला भी टिप्पणी मॉडरेशन के विरुद्ध था (है). मोहल्ला में अफ़लातून भी लिखते हैं. उनके एक लेख पर 20 पेज की पोर्न साइटों के लिंक किसी ने कमेन्ट में चिपका दिए. मोहल्ला के प्रबंधक आनलाइन नहीं थे. कोई सदा सर्वदा आनलाइन नहीं हो सकता. वो पोर्न टिप्पणी घंटों दिखती रही. किसी ने ध्यान में लाया तो उसे मिटाया गया.
    यहाँ पर अफ़लातून जी ने सवाल उठाया कि जब आप टिप्पणी मॉडरेशन के विरोध में हैं तो फिर उस पोर्न टिप्पणी को भी क्यों हटाया? और, आपके इस विचार के चलते वो घटिया टिप्पणी कई लोगों की नजर में आती रही. यह कानूनन जुर्म भी है कि आप अपने ब्लॉग पर पोर्न की कड़ी परोस रहे हैं (जो कि आप जानबूझ कर भले न कर रहे हों, मगर जाने अनजाने आपके ब्लॉग पर तो हो ही रहा है).

    तो, किसी दिन ऐसी ऊटपटांग टिप्पणी यहाँ दर्ज हो गई और कोई मामला कोर्ट ऑफ लॉ में ले जाएगा तो यकीन मानो, आपको लेने के देने पड़ सकते हैं. इसीलिए सुझाव ये है कि मॉडरेशन जितनी जल्दी लगा सकें लगा लें. यह स्वस्थ ब्लॉगिंग के लिए भी जरूरी है. इस प्रकरण में किसी की छवि को धूमिल करने का प्रयास कितना सफल रहा ये तो नहीं पता, मगर उंगली आप पर भी तो उठी कि नहीं?

    इसीलिए, मैंने स्क्रीनशॉट यहाँ लगाया कि सनद रहे...

    उत्तर देंहटाएं

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