टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

द अदर साइड ऑफ अ ब्लॉगर

क्या आप जानते हैं कि अजित वडनेरकर कभी अहमद हुसैन – मोहम्मद हुसैन के शिष्य हुआ करते थे और वे एक उम्दा गायक भी हैं? देखिए उनके लाइव परफ़ॉर्मेंस का वीडियो – जब से हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए.

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(वीडियो – साभार अनूप शुक्ल के कैमरे से)

विषय:

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उनको देख कर लगता तो था...आज मालूम पड़ गया आपके मार्फत..वाह!! क्या गाया है!

अजित भाई ये फन हम से छुपाए बैठे थे। ये फन के साथ नाइंसाफी है। और उन्हें रियाज किए भी बहुत दिन हो गए।

अजित भाई का खुद का शेर बहुत लाजवाब है, ख्वाब बेपनाह हो गए, बहुत सुंदर प्रस्तुति है।

अजित जी के जीवन की इस तस्वीर से हम तो निरे अपरिचित ही थे , आप ने परिचय करा दिया बहुत - बहुत आभार !
वैसे बगैर संगीत के इतना बेहतरीन गायन !! क्या बात है ! वाकई बेमिसाल |

बढ़िया!
अजीत जी का एक रूप यह भी भा गया

बी एस पाबला

वाह! तो यहाँ सुरगंगा भी बह रही थी। मुझे आपलोगों ने शामिल नहीं किया इसका मलाल हो रहा है।

खैर... मजा आ गया। शुक्रिया।

सुरों पर क्या खूबसूरत पकड़ है अजीत जी की, गला भी सुमधुर ...और शेर ......वा भई वा....उम्दा....

क्या बात है..
शेर भी कमाल का है.. और शेर का गान भी कमाल का है!

क्‍या खूब गाया उन्‍होने !!

जब से हम तबाह हो गये............क्या गाया है..बधाई अजित जी.

सुनने से रह गए

I am unable to post a comment on your Blog.. :( I don't know why?

that post address is : http://raviratlami.blogspot.com/2009/10/blog-post_26.html
My comment is : ऑफिस में यह गीत नहीं सुन सकता हूं, सो घर जाकर सुनूंगा.. वैसे यह गीत शायद जगजीत सिंह द्वारा गाया गया है ना? अजित जी का यह फन हमें भी पता ना था.. :)

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Regards,
Prashant Priyadarshi,
Cybernet-SlashSupport.

http://prashant7aug.blogspot.com
http://pdtechtalk.blogspot.com

अजीत भाई के इस पक्ष के गवाह नहीं बन सके । अफसोस रहेगा । इलाहाबाद में रहते हुए भी एक ही दिन आपसे मुलाकात हो सकी । पारिवारिक कारणों से अगले दिन नहीं आ सके । उम्‍मीद है शीघ्र भोपाल में भेंट होगी

वाह, वाह, यह तो हम भी कह सकते हैं अपने लिये!

कह सकते हैं अर्थात: जब से हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए!

Waah! bahut accha laga.....

Ajit bhaiya ko badhai...

अभी अभी आपको गाते हुए सुना है वाह वाह ..क्या खूब गाई है ये ग़ज़ल और आपका शेर भी माशाल्लाह
बेहतरीन है ..जीते रहीये ...
" सा रे गा माँ " में कब जा रहे हैं ?
एकाध आला सीडी बनवा लीजिये अजित भाई
बहुत स्नेह व आशीष के साथ,
- लावण्या

वाह!...अजित भईया इतना अच्छा गाते हैं! अनूप जी का मोबाइल उपलब्ध करवाने और आपका यहाँ पोस्ट करने के लिए धन्यवाद.

waah bhai behtareen man khush kar diya ajit jee ne

बहुत खूब, आनन्द आ गया। काश ओर्केस्ट्रा के साथ होता तो और भी मजा आता।
वैसे अजितजी के संग्रह में पुरानी रिकार्डिंग्स भी तो होगी! कभी उन्हें भि तो सुनवाईये।

हांय अब तक हम शब्दों के सफ़र में थे...ये तो गज़लों का सफ़र भी निकला....वाह अजित भाई तो सच में कमाल ही निकले

जय हो। हम तो आमने-सामने सुने। मजे आ गये।

वाह वाह क्या बात है !

मैं तो वहीं रह कर चूक गया। वडनेरकर जी इतना अच्छा गाते हैं और वह भी माचिस की धुन पर। क्या बात है? ऒर्केस्ट्रा वालों को एक नया साज मिल जायेगा इससे।
बधाई!
सादर

रवि भैया,हुसैन बंधु रायपुर प्रेस क्लब को बहुत लकी मानते हैं और जब रायपुर आते है तो क्लब ज़रूर आते है।अजीत भाऊ को गाते देख अपने भी दिन याद आने लगे हैं,कई साल संगीत महाविद्यालय मे सिर्फ़ प्रवेश ही ले पाये सीखा कुछ नही।हा हा हा हा।ये आईडिया बहुत बढिया है द अदर साइड आफ़ ए ब्लागर।वंडरफ़ुल्।

हम तो उनके घर होकर आ गये और हमे पता ही नहीं था ...क्या बात है अजित भाई.. हो जाये जुगलबन्दी ।

बहुत खूब

आवाज का कायल हूँ और इसे अपने दिल के बेहद करीब पा रहा हूँ। मौका छूट गया, मलाल रहा।

ऐसा ही बवाल जी को सुन कर लगा था।

kal ki tippani aadhi rah gayi THI MERI ...BAHUT SUREELA GAYAN ..AJEET JI KA...HUM SAB TAK PAHUCHANEY KA SHUKRIYA

रविभाई को कहना भूल गया था कि हुसैन बंधुओं वाली बात का उल्लेख न करें। मुझ जैसा नालायक शागिर्द कोई न हुआ होगा जिसने गंडा बंधवाने के बाद लम्हा भी उस्तादों की सोहबत में न गुजारा हो। नौकरी की उठापटक, तबादले, रोजीरोटी की झंझटों ने वो तूफान मचाए रखा जिसके चलते ग़ालिब साब को भी कहना पड़ा था कि फिक्रेदुनिया में सर खपाता हूं, मैं कहां और ये बवाल कहां !!
सुरताल की बहुत ज्यादा समझ नहीं, फिर भी कुछ अच्छा गा लेने का भरम था कभी। ये बातें दो दशक पहले की हैं। जयपुर प्रवास के दौरान हुसैन बंधुओं ने उदारतापूर्वक मुझे सिखाने के लिए रजामंदी दी थी। आज भी वह सब याद कर गहरे अफ़सोस से भर जाता हूं। रविभाई का आभार और आप सबका शुक्रिया। ये ग़ज़ल जगजीत साहब ने ही गाई है। दिनेशराय द्विवेदी सही कहते हैं, रियाज़ तो कभी किया ही नहीं, अलबत्ता गला ज़रूर किसी ज़माने में गर्म था। अब तो साल में एकाध बार ही खुद को गुनगुनाते देखता हूं.....

क्या बात है जी…अच्छा, एकदम जगजीत सिंह की तरह ही…अन्दाज वही…

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