शनिवार, 5 अगस्त 2006

अप्रैल 2006 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ...

<> **-** बात इंटरनेट के मुफ़्त सॉफ़्टवेयरों की नहीं हो रही है. वह फ़िलॉसफ़ी तो ख़ैर अलग ही है. बात हो रही है राजनीतिक पार्टियों द्वारा हर चुनावों में जनता को, वोटरों को लुभाने के लिए मुफ़्त में सौग़ातें बांटने की घोषणाओं की. डीएमके ने अपने ताज़े चुनावी घोषणा पत्र में अन्य लोक लुभावन नारों के साथ ही यह भी ऐलान किया है कि तमिलनाडु में अबकी अगर वह सत्ता में आई तो उन सब परिवारों को मुफ़्त रंगीन टीवी सेट प्रदान करेगी जिनके घरों में रंगीन टीवी सेट पहले से नहीं हैं. अमीर हो या गरीब – चमार हो या पंडित – हिंदू हो या मुसलमान – सबको रंगीन टीवी सेट मिलेगा. शर्त यही है कि पहले से ही रंगीन टीवी सेट घर में नहीं होना चाहिए. लगता है रंगीन टीवी सेट आज की मूलभूत आवश्यकता हो गई है. कम से कम डीएमके का तो यही सोचना है. आपके पास खाने को दाना नहीं है, काम को रोजगार नहीं है, कोई बात नहीं. रंगीन टीवी सेट ले लीजिए मुफ़्त में, और सैकड़ों चैनलों में चल रहे मजेदार कार्यक्रमों को देखकर अपनी तक़लीफ़ें भूल जाइए. सास-बहू का कोई सीरियल देख कर अपने घर के झंझटों को भूल जाइए तथा खाना-खजाना टाइप कोई कार्यक्रम देखकर अपने पेट की आग बुझा लीजिए. रंगीन टीवी तो आ गया. आपको वह मुफ़्त में मिल गया. पर वह चलेगा कैसे? आपके पास बिजली है क्या? अभी तो जितनी बिजली है वो ही पूरी नहीं पड़ रही है – कल्पना कीजिए कि जब प्रत्येक परिवार के पास रंगीन टीवी हो जाएगा तो बिजली की कितनी डिमांड पैदा हो जाएगी. पॉवर कट दो-तीन गुना हो जाएगा. पर इससे क्या? रंगीन टीवी तो है घर पर – आज की बड़ी और मूल-भूत आवश्यकता. कभी रहा होगा किसी घर का स्टेटस सिंबल, परंतु आज तो झोंपड़े में अगर रंगीन टीवी न हो तो वो झोंपड़ा ही क्या. दिहाड़ी मजदूर रग्घू के घर रंगीन टीवी. वाह क्या बात है. और, भई, इस साल रंगीन टीवी मुफ़्त मिला है, अगले चुनाव में भी जितवा दें तो बिजली भी मुफ़्त मिल जावेगी. जल्दी क्या है? मुफ़्त की टीवी के लिए बिजली तो मुफ़्त होना ही चाहिए. जनता काम धाम छोड़े, मुफ़्त की बिजली से मुफ़्त टीवी में मुफ़्त के कार्यक्रम देखते रहे, और चुनावों के समय वोट देते रहे. बस राजनीतिक पार्टियों को और क्या चाहिए? पर, जिनके घरों में पहले से ही रंगीन टीवी है – क्या वे बेवकूफ़ हैं? क्या वे दोहरे दर्जे के नागरिक हैं? तो फिर उन्हें रंगीन टीवी क्यों नहीं मिलना चाहिए? उन्हें इसका कंपनशेसन मिलना चाहिए. पर, दूसरी नजर में तो ऐसा लगता है कि चुनावी घोषणा पत्र लिखने वाले को भारतीय मेंटालिटी का पूरा ज्ञान है. उसे पता है कि आज तक किसी ने कोई चुनावी वादा निभाया है क्या जो इस वादे को निभाया जाएगा. और, माना कि अगर इस वादे को निभाया भी गया, तब जब सरकार मुफ़्त रंगीन टीवी उन परिवारों को देने लगेगी जिनके यहाँ रंगीन टीवी नहीं हैं, तो प्रत्येक परिवार के घरों के रंगीन टीवी तो पहले ही गायब हो चुके होंगे जिनके यहाँ पहले से ही रंगीन टीवी हैं, और ऐन केन प्रकारेण ऐसे परिवार वालों का पहला हक रंगीन टीवी प्राप्त करने का होगा. इनमें से कुछेक परिवारों को रंगीन टीवी प्राथमिकता में मिलेगा और फिर बाद में कुछ नियम कायदे कानून लागू कर दिए जाएंगे जिससे कि बाकी सारे परिवारों की पात्रता अपने आप ही खत्म हो जायेगी. कुछ इसी तरह से छत्तीसगढ़ में पिछले चुनावों में भाजपा द्वारा प्रत्येक गरीब परिवार को एक गाय मुफ़्त में बांटने की पेशकश की गई थी. जब वह सत्ता में आई तो जाहिर है उसे अपना चुनावी वादा निभाना था. हजारों परिवारों को गाय बांटने के लिए तलाशा गया तो उतनी संख्या में गाय नहीं मिले. भ्रष्टाचार के चलते मरियल बूढ़ी गायों को गरीबों में बांटने की कोशिशें की गई. जिन गरीबों के पास अपने खुद के खाने पीने की व्यवस्था नहीं थी, रहने की व्यवस्था नहीं थी वे गाय लेकर क्या करते?. गाय को क्या खिलाते पिलाते? वो भी बूढ़ी मरियल गाएँ. गाय को कहाँ रखते? जाहिर है, गाय बँटे, खूब बंटे गरीबों में और जेब भारी हुए अफ़सर नेताओं के. जाहिर है, कुछ अपवादों को छोड़कर योजना नाकाम ही रही. कुछ ऐसे ही हाल रंगीन टीवी के होंगे. लाखों की संख्या में गरीब परिवारों के पास ढंग से छत नहीं है. बरसात का पानी टपकता है. बिजली के पोल तो कई किलोमीटर दूर है – बिजली की तो बात ही क्या. पर रंगीन टीवी प्राप्त करने की पात्रता तो है. रंगीन टीवी मिलेगा. सरकार की तरफ से मुफ़्त मिलेगा. वह चलेगा या नहीं या उसे चलाया जाएगा भी या नहीं यह तो जुदा बात है. हो सकता है ऐसे लोगों को ऐसी रंगीन टीवी दिया जाए जिसका बाहरी बक्सा रंगीन हो और अंदर खोखा खाली हो – गरीबों को कम से कम आलमारी की तरह कुछ सामान रखने के काम तो आएगा वह. वैसे, ऐसी घोषणाओं कर राजनीतिक पार्टियाँ यह संदेश भी देती दिखाई देती हैं कि जनता को मेहनत मजदूरी करने, रोजगार से धन कमाने की, धनी बनने की कोई आवश्यकता नहीं है. गरीब बने रहिए वोट देते रहिए. बस आप उन्हें वोट देते रहिए, वे आपको मुफ़्तखोर बनाए रखेंगी. **-** व्यंज़ल **-** मिलता नहीं कुछ मुफ़्त में फिर ये लंच कैसा मुफ़्त में वोट दे देकर सदियों से मारा गया गरीब मुफ़्त में मुसकुराहट की बात करते हो गालियाँ मिलती नहीं मुफ़्त में लड़ाई भले हो हक के लिए पर हम क्यूँ लड़ें मुफ़्त में लेने को कोई तैयार नहीं बांटे है राय, रवि मुफ़्त में **-** 888888888 धर्म पर बहस चल रही है. इस लेख को पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखा था, पर इसका चयन नहीं हुआ. बाद में इसे अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया था. इस बीच नए लोग आए, और हो सकता है कुछ ने नहीं पढ़ा हो. पढ़ा भी हो तो भूल गए हों. और अब चूंकि धर्म पर बहस जारी है, इसीलिए अनुगूंज के तहत धर्म विषय पर यह प्रविष्टि अब भी सटीक बैठती है. धर्म - क्या कोई विकल्प है हमारे पास? मनुष्य मात्र के लिए ‘धर्म’ एक गढ़ी गई, अनावश्यक रूप से लादी गई, विकृत परंपरा है. दरअसल, मनुष्य को अन्य जीव-जन्तुओं के विपरीत, सभ्य आचरण करने के लिए, ईश्वर के प्रति जवाबदेह बनाने के नाम पर कुछ परंपराओं का सहारा आदिम काल से लिया जाता रहा है – जिसे धर्म का नाम दिया गया है. मनुष्य, जन्म से बे-धर्मी होता है - उसका कोई धर्म नहीं होता. पीढ़ियों से चले आ रहे परंपराओं के अनुसार वह पालक के धर्म का, या बाद में किसी विचार से प्रभावित हो, किसी अन्य धर्म का अनुयायी बन जाता है. विश्व के तमाम धर्मों में ईश्वर की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए उसकी प्राप्ति के अलग अलग जरिए अपनाए जाते हैं – कोई प्रार्थना करता है, कोई इबादत पढ़ता है और कोई आरती गाता है. समस्या यहीं उत्पन्न होती है. किसी को किसी की प्रार्थना में थोथापन नज़र आता है तो किसी को किसी की इबादत में फूहड़ता दिखाई देती है तो किसी को किसी की आरती में ढकोसला दिखाई देता है. और हर कोई समझता है कि उसका धर्म, उसके ईश प्राप्ति का तरीका ही सर्वश्रेष्ठ है. नतीजतन, वह निरपेक्ष नहीं रह पाता. अकसर, सियासतें इन विचारों में आग में घी डालने का काम करती हैं. और, पंडित-मौलवी-पादरी-ग्रंथी अपने क्षणिक, व्यक्तिगत लाभों के लिए समाज में इस अ-निरपेक्षता के अलाव को जलाए रखते हैं. धर्म क्या है ? अगर ईश्वर नहीं भी है, तो ‘मनुष्य’ को मनुष्य बनाए रखने के लिए हमें ईश्वर को सृजित करना ही होगा. ईश्वर का भय ही मनुष्य को मनुष्यत्व के करीब लाता है. आज से तीन हजार साल पहले धर्म नाम की चीज इस पृथ्वी पर नहीं थी. मनुष्यों में सर्वत्र अराजकता फैली रहती थी. उसका पशुवत् व्यवहार पृथ्वी के अन्य जीव जंतुओं से उसे अलग नहीं करता था. क्रमश: मनुष्य सभ्य होता गया. कुछ विचारकों ने प्रकृति की अदृश्य, कल्पित महाशक्ति को ईश्वर का नाम दिया. प्राचीन मनुष्य को वायु के थपेड़ों में, वर्षा के झोंकों में, जंगल के दावानल में, और तो और, शारीरिक बीमारियों में - ईश्वरीय शक्ति नजर आती थी, चूंकि उनके पास इन्हें पारिभाषित करने का कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं था. धार्मिक परंपराओं की नींव उसी दौरान पड़ी. परंतु यह विडंबना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य प्रकृति को जानने समझने लगा, अवैज्ञानिक धार्मिक परंपराएँ उससे भी ज्यादा तेज़ी से अपनी जड़ें समाज में जमाने लगीं. दरअसल, मनुष्य के ज्ञान का बड़ा हिस्सा समाज के विशाल हिस्से में पहुंच ही नहीं पाता है – जिससे वह आदिम काल के मनुष्य की तरह अंध विश्वासों से युक्त धर्मांध बना रहता है. और, धर्मांध मनुष्य कभी भी, अन्य धर्म के प्रति निरपेक्ष नहीं रह सकता. धर्मनिरपेक्षता क्या है ? धर्मनिरपेक्षता (सेक्यूलरिज़्म) शब्द का पहले पहल प्रयोग बर्मिंघम के जॉर्ज जेकब हॉलीयाक ने सन् 1846 के दौरान, अनुभवों द्वारा मनुष्य जीवन को बेहतर बनाने के तौर तरीक़ों को दर्शाने के लिए किया था. उनके अनुसार, “आस्तिकता-नास्तिकता और धर्म ग्रंथों में उलझे बगैर मनुष्य मात्र के शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक, बौद्धिक स्वभाव को उच्चतम संभावित बिंदु तक विकसित करने के लिए प्रतिपादित ज्ञान और सेवा ही धर्मनिरपेक्षता है” दूसरे शब्दों में, धर्मनिरपेक्षता मनुष्य जीवन के लिए वह कर्तव्य संहिता है जो पूरी तरह मानवीय आधार लिए हुए तो है ही, जो धर्म के अनिश्चित, अपर्याप्त और प्रायः अविश्वसनीय तत्वों को नकारता है. जॉर्ज जेकब हॉलीयाक द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता के तीन मूल तत्व हैं :-

1. भौतिक संसाधनों द्वारा मनुष्य के जीवन मूल्यों में समुचित, सम्पूर्ण विकास, 2. आधुनिक युग में मनुष्य के लिए “विज्ञान” का स्वरूप विधाता की तरह है, 3. भलाई में ही अच्छाई है.
जॉर्ज जेकब हॉलीयाक ने ये सिद्धांत तब बताए जबकि इंग्लैंड में चर्च का अपरोक्ष शासन चलता था, और दूसरे धर्मों का कोई वज़ूद वहाँ नहीं था. अकसर उनके विचारों को नास्तिकता का जामा पहनाया जाकर सिरे से नकारने की कोशिश की जाती थी. जबकि जॉर्ज का कहना था कि धर्मनिरपेक्षता ईसाईयत के ख़िलाफ़ कतई नहीं है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा थोड़ी वृहद हो चुकी है. अब धर्मनिरपेक्षता को कुछ इस तरह भी पारिभाषित किया जाता है-
1. व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने-अपनाने की पूरी स्वतंत्रता हो 2. धर्म और राजनीति पूरी तरह अलग रहें 3. सार्वजनिक स्रोतों के जरिए धर्म को प्रश्रय न दिया जाए तथा, 4. सार्वजनिक जीवन में धर्म का स्थान महत्वपूर्ण न हो.
धर्मनिरपेक्ष देशों में, जिनमें भारत भी सम्मिलित है, धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए तमाम तरह के संविधानिक क़ायदे कानून हैं. परंतु प्रायः राष्ट्रों के ये क़ायदे क़ानून समय-समय पर अपना स्वरूप बहुसंख्य जनता के धार्मिक विश्वासों से प्रेरित हो बदलते रहते हैं, या उचित स्तर पर इन कानूनों का पालन नहीं होता, या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष स्तर पर इनमें ढील दी जाती रहती हैं. यह छद्म धर्मनिरपेक्षता है. छद्म धर्मनिरपेक्षता के कई उदाहरण हैं - अयोध्या मंदिर में पूजा अर्चना का सवाल हो या शाहबानो प्रकरण – धर्मनिरपेक्ष सरकार द्वारा धार्मिक समुदायों के आगे अकसर हथियार डाला जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता के सत्व:
मनु स्मृति में मनु कहते हैं- धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥
अर्थात्, धर्म के दस लक्षण हैं- धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , स्वच्छता, इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना. हर धर्म में मूलत: इन्हीं बातों को घुमाफिरा कर कहा गया है. महर्षि वेद व्यास धर्म की व्याख्या कुछ इस तरह करते हैं- श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रूत्वा चैव अनुवर्त्यताम् । आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषाम् न समाचरेत् ॥
अर्थात्, धर्म के सर्वस्व को सुन-समझ कर उस पर चलो. जो आचरण अपने को प्रतिकूल प्रतीत होते हैं, वैसा कदापि दूसरों के साथ न करो.
तुलसी दास कहते हैं- परहित सरिस धरम नहिं भाई।
अन्य किसी भी धर्म में चाहे, ईसाई हो, इस्लाम हो या जैन-बुद्ध – सभी में इन्हीं बातों पर, धर्म के इन्हीं सत्वों को अपनाए रखने पर जोर दिया गया है. जो मनुष्य धर्म के इन प्रतीकों का गंभीरता से पालन करता है, वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, वह वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होता है. आधुनिक युग के तमाम धर्मगुरु चाहे जिस धर्म के हों, अपने प्रवचनों में अपने भक्तों को प्राय: इसी तरह के संदेश देते हैं. परंतु बात जब किसी दूसरे धर्म की होने लगती है, तो उनकी भृकुटियाँ तन जाती हैं – नतीजतन भक्त जन भी दूसरे धर्मों को, दूसरे धर्मावलम्बियों को उन्हीं निगाहों से देखने लगते हैं. धर्मनिरपेक्षता का मूल सत्व यह है कि व्यक्ति अपने धार्मिक ज्ञान और क्रिया कलापों में वैज्ञानिकता, आधुनिकता, तार्किकता तो शामिल करे ही, वह विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता भी रखे. धर्मनिरपेक्षता और व्यक्ति कोई भी धार्मिक व्यक्ति निरपेक्ष हो ही नहीं सकता. निरपेक्ष होने के लिए उसे धर्म को त्यागना होगा. यहाँ बात आस्तिकता और नास्तिकता की नहीं हो रही है. व्यक्ति धर्म को अपनाए बिना भी पूर्ण ईश्वर वादी और आस्तिक हो सकता है. बस, उसे धर्म के सियाह और संगीन पन्नों से अपने को दूर करना होगा. धार्मिकता में वैज्ञानिकता, सांसारिकता और व्यवहारिकता लानी होगी तभी सच्ची व्यक्तिगत धर्मनिरपेक्षता हासिल की जा सकेगी. आधुनिक युग के व्यक्ति को, हजारों साल पुरानी, बारबेरिक युग में कही गई, आज के युग के लिए अप्रासंगिक हो चुकी बातों को ईश्वर, ईशु या अल्लाह द्वारा कही गई बातें न मानकर, मात्र ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखे, उसका आदर करे तो वह सम्पूर्ण धर्मनिरपेक्षता को प्राप्त कर लेगा. धर्मनिरपेक्षता और राज्य इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में राज्य कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे. यूरोप में पोप की सत्ता अदृश्य सत्ता केंद्र होती थी. स्वतंत्रता से पहले दक्षिण और उत्तरी कैरोलिना राज्यों में धर्म और राजनीति के लिए विपरीत क़ानून थे. भारत में मुसलमान शासकों ने तमाम तरह से दमन कर मुसलिम धर्म को फैलाया. सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में लगे रहे. अंग्रेजों के आगमन से भारत में ईसाईयत का फैलाव हुआ. इन धर्मों के धर्मावलम्बी दूसरे धर्मों के प्रति अनुदार तो थे ही, इनके अपने ही धर्मों के विभिन्न पंथों में संघर्ष होते रहे – जो किसी न किसी रूप में आज भी जारी है. ईसाईयों में कैथोलिक-प्रोटेस्टेन्ट, मुसलमानों में शिया-सुन्नी, हिन्दुओं में ब्राह्मण-शूद्रों के बीच के अहम् का टकराव कमोबेश अब भी जारी हैं. धीरे से राज्य प्रजातांत्रिक होते गए. जनता और उनके प्रतिनिधियों के हाथों में राज्य आने के फलस्वरूप धार्मिक सोचों में परिवर्तन होने लगा. वैश्विक परिदृश्य में राजनीति व धर्म का सम्बन्ध खत्म होने लगा. इस अवधारणा को स्वीकारा गया कि धर्म मनुष्य की निजी सम्पत्ति है और उसमें राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. व्यक्ति अपने लिए धर्म को चुनने के लिए स्वतंत्र था – प्राचीन राज शाही परंपराओं की तरह अब उसके धर्म के परिपालन पर कोई पाबंदी नहीं थी. इस अवधारणा को धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया गया. बहुत से आधुनिक सोच के राज्य पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हो गए – अब जनता बिना किसी भय-बाधा के विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच अपने-अपने धर्म को मानते हुए, और दूसरों के धर्म का आदर करते हुए शांति से जीवनयापन कर सकती थी. भारत ने भी स्वतंत्रता के पश्चात् धर्मनिरपेक्षता की इस अवधारणा को आत्मसात किया. धर्मनिरपेक्षता और भारत कोई दो हजार साल के लगातार राजनीतिक उथल-पुथल और प्राचीन काल के राज्य और धर्म के सम्मिश्रण के कारण भारत में विश्व के सभी बड़े धर्मों के अनुयायी बड़ी संख्या में बसते हैं. प्रजातांत्रिक राष्ट्र होने के नाते स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने धर्मनिरपेक्ष राज्य का चोला पहना. कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, परंतु फिर इसमें विकृतियाँ आने लगीं. धर्मनिरपेक्षता के विकृत मायने निकाल कर धार्मिक अन्ध भक्तों को प्रश्रय दिया जाने लगा है. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में खास तबके के लोगों के लिए आरक्षण का मसला – राज्य के धर्मनिरपेक्षता से पूरी तरह से भटकने का सबूत है.– शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक पार्टियाँ खुलेआम हिन्दुत्व का प्रचार कर वोट मांगती हैं. समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल हर तरीके से मुसलिमों का वोट प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध रहती हैं. छुद्र राजनीतिक स्वार्थों के चलते भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षता पनपने लगी है. गोधरा कांड और उसके प्रतिक्रिया स्वरूप एक सम्पूर्ण राजतंत्र का बेलौस, बेलगाम दुष्कर्म किस तरह की धर्मनिरपेक्षता है ? धर्म के आधार पर राज्यों में आरक्षण की अंधी दौड़ जारी हो चुकी है और संवैधानिक रूप से भारत कहलाता है एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र. धर्मनिरपेक्षता की यह नई, भारतीय परिभाषा है. उपसंहार
एक कहावत है – मनुष्य पोथी पढ़कर जानकार तो बन सकता है, ज्ञानी नहीं. धर्मनिरपेक्षता को सही रूप में अपनाने के लिए व्यक्ति, समाज और राज्य को ज्ञानी बनना होगा. समय के पहिए के साथ-साथ कदमताल मिलाकर ही समग्र मनुष्य मात्र का भला हो सकता है, यह उसे समझना होगा और इसके लिए उसे अपने धार्मिक आडंबरों को फेंक देना होगा. अपनी सोच में व्यापकता लानी होगी उसे, अन्यथा सामाजिक-धार्मिक संघर्षों के फल स्वरूप सारे संसार का नुकसान होगा.
टैगः , 88888888888 मंडल - पार्ट 2 ने सर्व प्रभुसत्ता संपन्न, प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश को विभाजित कर दिया है. देश पहले ही हिन्दू - मुसलिम में विभाजित हो चुका है, अब वह अगड़े-पिछड़ों में विभाजित होने जा रहा है. आने वाले समय में वर्ग संघर्ष अपरिहार्य हो गया है. शुरूआत हो चुकी है. प्रचार-प्रसार माध्यमों से एक दूसरे के विचारों में संघर्ष तो प्रारंभ हो ही गया है - भौतिक संघर्ष में अब कोई देर नहीं. बजाए इसके कि जातिवाद पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने या अध्यादेश लाने के, हमारे तथाकथित राजनेता तो जातिवाद को, कौम वाद को और भी बढ़ाने के उपाय किए जा रहे हैं. उच्च शिक्षा में आरक्षण की नैतिकता पर वैचारिक संघर्षों के कुछ नमूने पढ़ें - हिन्दी ब्लॉग दिल्ली ब्लॉग दस्तक अभिनव सृजन शिल्पी सृजन शिल्पी -2 ई-लेखा खालीपीलीआशीष मेरा पन्ना रामलाल छींटें और बौछारें नव भारत टाइम्स - विश्वनाथ सचदेव एक और विचार बिंदास बाबू नारायण मूर्ति सीमा चिश्ती डीएनए स्पीकअप प्रताप भानु मेहता तवलीन सिंह रतन टाटा शिक्षाशास्त्री बीजेपी श्रेया रॉय एक अन्य विचार छात्रों के विचार सुपरस्पेशियलिटी कोर्स में भी आरक्षण? मंडल 2 - ब्लॉग और चिट्ठों के जरिए समर्थन-विरोध में युद्ध? मायावती - बदले सुर ग्लोबल इंडिया वी, रघुनाथन - प्रतिभा पर पानी डालना? विविध विचार प्रियंका तिवारी - आरक्षण रद्द ! यह सीट आरक्षित है! टीप: यह पोस्ट अनारक्षित है. आप अपने विचार बिंदास, बिना किसी भय या पूर्वाग्रह के रख सकते हैं. विचारों में संधर्ष तो स्वस्थ परंपरा की निशानी है - अनुरोध है कि उसे भौतिक संघर्ष तक न पहुँचाएँ, और मर्यादा का आँचल न छोड़ें. 88888888888888 नबआ में अब आया है एक नया, ग्लैमरस रंग… नर्मदा बचाओ आंदोलन (नबआ) में मेधा पाटकर और बाबा आमटे के आरंभिक आंदोलनों के बाद गॉड ऑफ़ स्माल थिंग – अरूंधती राय के शामिल हो जाने से इस आंदोलन में बड़ा ग्लैमर आ गया था. अब रंग दे बसंती – आमिर खान भी अपने पूरे बसंती टीम के साथ उस आंदोलन के समर्थन में कूद पड़े हैं तो जाहिर है उसमें एक नया, बड़ा, बसंती, ग्लैमरस रंग आना ही है. दरअसल, उपवास, अनशन और आंदोलनों के जरिए बापू ने जो अपना नाम इतिहास में अमर किया, उसी तर्ज पर चल कर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराने की ललक लिए लोग ऐसे आंदोलनों से जुड़ते रहे हैं. पचास वर्षों में दुनिया बहुत बदल चुकी है. अगर आप एक घंटे भी कहीं बंद रखते हैं, आंदोलनों के जरिए देश के विकास कार्यों को रोकते हैं तो देश को आने वाले कई सालों तक इसका मूल्य चुकाना होता है. तब तक तो दुनिया आगे निकल चुकी होती है और आप वहीं पीछे रह जाते हैं. मेधा पाटकर का पर्याय तो धरना-आंदोलन-और बंद हो गया है. क्या सरकार को चेताने के लिए, या अपनी बात रखने के लिए इससे अच्छा दूसरा उपाय कोई नहीं है? कल्पना कीजिए कि पंजाब के भाखरा-नांगल बाँध के वक्त इसी तरह के विरोध दर्ज होते और यह बाँध नहीं बनता तो क्या होता? आज इस बात से किसी को इंकार नहीं है कि पंजाब की आज की प्रगति और खुशहाली में वहां के बाँध और नहरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. नबआ से जुड़े लोगों की सोच निःसंदेह अप्रगितशील है और इसे तमाम बुद्धिजीवियों ने समय-समय पर स्वीकारा है. इस बात से किसी को इंकार नहीं है कि विस्थापितों के पुनर्वास कार्यक्रमों को पारदर्शिता और मानवता से अंजाम दिया जाना चाहिए, परंतु अपनी मिट्टी और अपनी जमीन से नहीं हटेंगे जैसी बातें आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब हम अपनी सेवाएँ भारत के किसी गांव में बैठकर अमरीकी और स्विस मेट्रो शहरों के नागरिकों को दे रहे हैं तो इस बात में कहीं कोई तुक नहीं दीखता. पर, ऐसे लोगों को कुछ विवादास्पद अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और उसके जरिए बड़ा नाम मिल चुका है तो जाहिर है यह बात इस तरह के आंदोलनों में बड़ा ग्लैमर लाता है – और शायद यही वजह है कि बॉलीवुड के हीरो अब अपना नाम और फैलाने के लिए नबआ से जुड़ रहे हैं. उन्हें तमाम प्रयासों और कैनवासिंग के पश्चात् भी लगान के लिए हॉलीवुड का अकादमी पुरस्कार नहीं मिला तो वे किसी अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार की चाहत में नबआ से जुड़ गए हैं, ऐसा प्रतीत होता है. और मेरी छठी इंद्रिय यह इंगित करती दीखती है कि इस बार उन्हें ऐसा कोई पुरस्कार मिलना ही है – भले ही वह पटना के गौतम गोस्वामी को मिले एशियन हीरो जैसा पुरस्कार हो! बाँध का कार्य अस्थाई रूप से रुक गया है, वह भी उच्चतम न्यायालय के पूर्व के निर्णय के बावजूद. उच्चतम न्यायालय ने बाँध की ऊँचाई तय कर दी थी कि वहां तक काम किया जा सकता है. परंतु अब पुनर्वास को लेकर फिर से याचिका दायर की गई है. देश का विकास याचिकाओं में उलझकर रह गया है. मंत्रियों सांसदों की एक नई कमेटी भी बनाई गई जो बेनतीजा रही और खबरों के मुताबिक उन्होंने प्रधानमंत्री की ओर निर्णय के लिए रूख किया तो उन्होंने भी अपनी राय नहीं दी. जब तक फिर से कोई निर्णय नहीं होता, तब तक मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात की करोड़ों जनता जिनके बिजली पानी का इंतजाम इस बाँध से होना है, अभावों में रहकर, मूक दर्शक बनकर यह ड्रामा देखने को अभिशप्त है, और सर झुकाकर सूखी-तपती जमीन को देख रही है कि कब उसे सर उठाकर पीने को पानी मिलेगा.... **-** व्यंज़ल **-** बहती नर्मदा है हाथ धोइए आप भी जरा नाम कमाइए सोचा है कि कुछ करना है कोई बंद धरना करवाइए मुल्क की बात करते हो अपना आंगन तो धुलवाइए सभी बहरे गूंगे हैं तो क्या आप भी वैसे सिर हिलाइए ज़हीन कोई मिलेगा रवि को अरे भाई कोई तो बताइए **-** अद्यतन - 1: नबआ से सम्बन्धित खोजपूर्ण आंकड़ों तथा विस्तृत विवेचना के लिए देखें - आखिर क्या गलत है नर्मदा बचाओ आंदोलन में 8888888888888 **-** यूँ तो हिन्दी एमएस ऑफ़िस पिछले दो साल से उपलब्ध है, परंतु पहली दफ़ा इसका विज्ञापन मैंने आउटलुक हिन्दी 24 अप्रैल 2006 के अंक में देखा, और, बड़े राहत की बात यह है कि यह विज्ञापन हिन्दी में ही है. बड़े आकार में विज्ञापन यहाँ देखें विज्ञापन में एक अच्छी बात और भी बताई गई है- अब आप एम-एस ऑफ़िस 2003 हिन्दी का डेमो / इवेल्यूएशन सीडी मुफ़्त में डाउनलोड कर सकते हैं ताकि इसे खरीदने से पहले इसे चलाकर इसकी उपयोगिता की जाँच परख कर सकें. इसके लिए आपको माइक्रोसॉफ़्ट की वेबसाइट http:/ /www.microsoft.com/india/officehindi पर पंजीकृत होना होगा. आश्चर्य है कि मेरे जैसे ऑनलाइन रहने वालों को भी यह बात पता नहीं थी...:) 88888888888888 परफ़ॉर्मेंसिंग - चिट्ठा पोस्ट करने का स्वचालित औजार! *** यूँ तो परफ़ॉर्मेंसिंग के बारे में कुछ-कुछ कहीं-कहीं अच्छी समीक्षाएँ पढ़ने में आ रही थीं, परंतु इसका प्रयोग करने का समय नहीं निकाल पाया था. परफ़ॉर्मेंसिंग - एक फ़ॉयरफ़ॉक्स एक्सटेंशन है, जिसे ब्लॉग लेखन और प्रकाशन में सुविधा के लिए बनाया गया है. यह सभी प्रमुख ब्लॉग सेवा - मसलन ब्लॉगर तथा वर्ड प्रेस को समर्थित करता है. यह पोस्ट परफ़ॉर्मेंसिंग परीक्षण पोस्ट है. अगर आप इसे मेरी बिना किसी विपरीत टिप्पणी के पढ़ पा रहे हैं, तब तो यह अच्छा और काम का है. अन्यथा नहीं. और, अगर कोई विपरीत टिप्पणी दिखाई नहीं दे रही, तो फिर देर किस बात की ? दौड़ लगाइए अपने फ़ॉयरफ़ॉक्स में परफ़ॉर्मेंसिंग संस्थापित करने के लिए... 8888888888888 अनिद्रा , अतिनिद्रा या चार्ज्ड निद्रा .... **-** अनिद्रा पीड़ितों से ज्यादा समस्याएँ मेरे जैसे अतिनिद्रा पीड़ितों की होती हैं. तभी तो तमाम तरह की अलॉर्म घड़ियाँ तमाम विश्व में बनती बिकती हैं. हाल ही में एक ऐसे अलॉर्म घड़ी को नायाब डिज़ाइन का पुरस्कार दिया गया था जो बहुत कर्कश आवाज तो निकालता ही है, वह स्वयं घर के कोने काने में कहीं जाकर छिप जाता है ताकि सोने वाले को मजबूरन बिस्तर छोड़कर, अपना आलस्य त्यागकर उसे ढूंढकर उसका बटन बंद करना जरूरी हो जाता है... सुबह सुबह बिस्तर से उठना मानों ऐसा लगता है कि सिर्फ और सिर्फ पाँच मिनट की नींद और मिल जाए. परंतु इस पाँच मिनट के चक्कर में अकसर ऐसा होता है कि कब दो-तीन घंटे खर्राटों के बीच गुज़र गए पता ही नहीं चलता. पर, लगता है अब हमें ऐसी समस्या से दो-चार नहीं होना पड़ेगा. न्यूज़वीक के ताज़ा संस्करण में दिए गए विज्ञापन को असली मानें, तब तो यह स्वीकारना ही होगा. सुबह नींद खुलेगी तो हम अपने आपको बिस्तर से उछलकर दौड़ते हुए पाएँगे... इस विज्ञापन को देखकर मैं हँसता रहा देर तक. विज्ञापन से कंपनी के बिस्तर बिके-न-बिके, यह विज्ञापन जरूर बिक (सफल हो) चुका है  सोचता हूँ, ऐसा एक बिस्तर खरीद ही डालूं. आपकी क्या राय है? 888888888888888 *** इस चित्र को ध्यान से देखें. अगर नारद जी का कहा मानें, तो, पिछले छः महीनों में उसे हिन्दी चिट्ठाकारों की अठ्ठाइस सौ बयासी प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं. प्रतीत होता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी अब इंटरनेट पर अपनी स्वाभाविक रफ़्तार पाने की ओर अग्रसर है. अगले छः महीने के लिए कितनी प्रविष्टियों की भविष्यवाणी कर सकते हैं आप? पाँच हजार? दस हजार? पंद्रह हजार? या बीस हजार? 888888888888888 आपके असली सामान्य ज्ञान की असली परीक्षा **-** रांची विश्वविद्यालय के बीए तृतीय वर्ष के सामान्य ज्ञान के पर्चे में जब परीक्षार्थियों के उनके असली सामान्य ज्ञान की असली परीक्षा लेने की कोशिश की गई तो लोगों को बुरा लगा. परीक्षार्थियों को तो, हो सकता है, ऐसे परचे देने में शायद मजा भी आया हो, मगर तथाकथित संस्कृति के पहरेदारों या किसी भी परिवर्तन को नकारने वाले पुरातनपंथियों को परीक्षा का यह अंदाज खासा नागवार गुजरा. वैसे भी, आप इस तरह की अव्यावहारिक बातें जानकर क्या उखाड़ लेंगे कि पृथ्वी चंद्रमा से कितनी दूर है या पृथ्वी के कितने उपग्रह हैं या चीन की राजधानी क्या है. ऐसे ज्ञान से आपका क्या भला होगा, जरा बताइए. क्या आपको चंद्रमा की सैर करनी है? पृथ्वी के उपग्रह क्या संख्या में घटते बढ़ते हैं? और अगर उनकी संख्या जान भी लिए तो उससे आपका क्या फ़ायदा होगा? चीन की राजधानी या सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी के बारे में सामान्य ज्ञान रखने से पहले यह सामान्य ज्ञान होना जरूरी है कि पड़ोस का रामलाल अपने पड़ोस की सीताबाई के साथ क्या गुल खिला रहा है. और कुछ ऐसा ही तो पूछा गया था उस पर्चे में. जब तक आप अपने आसपास के लोगों के चरित्र, आचार, व्यवहार, विचार, चाल-चलन, नेक-नीयत इत्यादि के बारे में अपना सामान्य ज्ञान ठीक-ठाक नहीं रखते हैं, आपका जीवन व्यर्थ है. वैसे भी, आज के युग में जब जीवन अति-संघर्षमय हो गया है, अपने आप को अपराधों-अपराधियों और सामाजिक अंतर्विरोधों के बीच में से लेकर-बचकर चलना सीखना है तो ऐसा ज्ञान तो और भी जरूरी है. लोग तो नाहक, बिला वजह विरोध करते हैं. और अच्छे कार्यों का तो सदा ही विरोध होता रहा है. ऐसे विरोधों का जमकर विरोध करना चाहिए. उस बेचारे परीक्षक ने छात्रों की रसहीन पढ़ाई में थोड़ा सा आकर्षण, थोड़ा सा आनंद और थोड़ा सा चाव जगाने की कोशिश की थी. व्यवहारिक, लोकोपयोगी सामान्य ज्ञान के प्रश्न पूछकर उसने परीक्षार्थियों को आज के कठिन दौर के समाज में रहने लायक बनाने की एक क्षुद्र सी कोशिश की थी. मगर अब उसके खिलाफ कार्यवाही की जाने की सूचना है. बेचारा परीक्षक! बहरहाल, समाचार की कतरन में दिखाई दे रहे प्रश्नों के उत्तर क्या आप बता सकते हैं? हो गए न फेल! **--** व्यंज़ल --*--
कोई आसान है होना फेल इसमें भी निकलता है तेल हर घड़ी यहाँ परीक्षाएँ हैं कहाँ पास हों किसमें फेल जद्दोजहद कम नहीं होगी नतीजा पास हो कि फेल जिंदगी वैसी नहीं निकली पास होकर भी हुए फेल अकेला हँसता मिला रवि जो हो गया था वो फेल
**-** 888888888888888 **-** रांची विवि के सामान्य ज्ञान के पर्चे पर, कि पूछे गए प्रश्न व्यवहारिक भी हैं या नहीं, खासा बावेला मचा. अब अगर यही पर्चा इस खबर के बाद बनाया जाता तो क्या आप सोचते हैं कि वह कुछ ऐसा नहीं बनाया जाता- ? दयानिधि और दाऊद के बीच दिए गए दस सही या गलत अंतर को पहचानिए? 1 दयानिधि उद्योगपतियों को धमकाते हैं दाऊद बिल्डरों, अभिनेताओं को धमकाते हैं 2 दयानिधि मंत्री है दाऊद भगोड़ा है 3 दयानिधि नेता है दाऊद आतंकवादी है 4 दयानिधि बेजा हिस्सा मांगते हैं दाऊद बेजा फिरौती मांगते हैं 5 दयानिधि सरकारी पावर दिखाते हैं दाऊद मसल पावर दिखाते हैं 6 दयानिधि पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती क्योंकि वह सरकारी मंत्री है दाऊद पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती क्योंकि वह पाकिस्तान में सरकारी संरक्षण में छुपा है 7 दयानिधि के हाथ पैर जोड़ आप छूट नहीं सकते दाऊद का पैर पकड़कर आप पिंड छुड़ा सकते हैं 8 दयानिधि मारता नहीं तो मरने भी नहीं देता दाऊद जीने नहीं देता सीधे मार देता है 9 दयानिधि भारतीय राजनीति आतंकवाद और दाऊद अलकायदा आतंकवाद के पर्याय हैं 10 दयानिधि जैसे भारतीय राजनीति में कई हैं दाऊद अपने आप में अकेला है **--** व्यंज़ल **-** राजा ने रंक को धमकाया क्या कोई नया रंग बतलाया यूं तो सहती है प्रजा पर कई राजाओं को है धूल चटवाया ये भक्ति गान नहीं हो सकता जो बिना अर्थ गया रटवाया क्या क्या याद रखें आखिर कितनों को धोया चमकाया राजनीति के नाले में रवि एक दूजे का कच्छा उतराया ***---***

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  1. हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म

    हिन्‍दुत्‍व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है।आज हम जिस संस्‍कृति को हिन्‍दू संस्‍कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्‍वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्‍त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।

    अधिक के लिये देखियेः http://vishwahindusamaj.com/hindutva.htm

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