टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

अगस्त 05 में छींटें और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

अगस्त 05 में छींटें और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ
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स्नेहासिक्त शरारतें...


शरारत देखूँ...

अगर आप शादी शुदा हों, एक अदद बीबी घर में आपका खयाल रखने को हर पल चिंतित हो और आप उसका खयाल रखे बगैर दिन में 15-17 घंटे काम पर बिताते हों (मैं

नाम नहीं गिनाना चाहूँगा, परंतु कई चिट्ठाकार बंधु अपने ब्लॉग में और वेब समूह में इस बात को स्वीकार कर चुके हैं, मुझे मिलाकर) तो यदा कदा आपकी अर्द्धांगिनी की तनी भृकुटी आपके लिए समस्या पैदा कर देती है. पिछले दिनों मुझे भी ऐसी ही समस्या से दो-चार होना पड़ा. मैंने मनाने-रिझाने की कोशिश कुछ यूँ की – (मैं सफल रहा या नहीं, अब यह दूसरा किस्सा है.. :)

ग़ज़ल
/-/-/
कनखियों में उनकी शरारत देखूँ
चढ़ती उतराती मुसकराहट देखूँ

वादा भले ही न किया हो उनने
हर आवाज़ पे उनकी आहट देखूँ

पल पल बदले है मिज़ाज उनका
कभी गुस्सा तो कभी चाहत देखूँ

मैं जाहिल गंवार उनके गुस्से में
दिव्य प्रणय की सरसराहट देखूँ

उनके इनकार में मैं बावरा रवि
युग्म की तीव्र छटपटाहट देखूँ

*-*-*

रेस में शामिल होने का हार्दिक निमंत्रण...


व्यंग्यः
*-*-*
आइए, रेस में शामिल हो जाएं…
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अफसर अब तक या तो भ्रष्ट होते थे या ईमानदार होते थे. आगे-पीछे, इधर-उधर या बीच की कोई सीमा नहीं होती थी. परंतु अब भ्रष्टता की भी सीमाएं बांधीं जा रही हैं. उसे भी केटेगराइज़ किया जा रहा है. लेवल बनाया जा रहा है – कम भ्रष्ट, साधारण भ्रष्ट, अधिक भ्रष्ट और सबसे ज्यादा भ्रष्ट. लगता है अब हर क्षेत्र में सीमाएं टूटने और हदें पार करने का समय आ गया है. और किसी बात की कोई गारंटी नहीं कि मामला कहाँ तक जा सकता है. ताज़ा उदाहरण है – यू.पी. में अफसरों का अपने बीच में से तीन सबसे ज्यादा भ्रष्ट अफसरों का चुनाव किया जाना.

आपके खयाल से सबसे ज्यादा भ्रष्ट अफसर का चुनाव करने के लिए क्या अर्हताएं अंकित की गई होंगी? क्या वह सबसे ज्यादा भ्रष्ट माना जाएगा जिसने सबसे ज्यादा रोकड़ा भ्रष्ट तरीके से कमाया या वह जिसने भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा, सबसे नायाब तरीके अपनाए? या यह ताज उसे पहनाया जाएगा जिसने सबसे कम उम्र या अपनी सेवा के निम्नतम समय में रेकॉर्ड, सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किए हों? या फिर सबसे ज्यादा भ्रष्ट अफसर का दावेदार उसे माना जाएगा जिसने हर संभव-असंभव तरीकों से भ्रष्टाचार किए हों?

वैसे, यहाँ संभावनाएँ अनंत हैं. जैसे, इस मामले में कुछ अच्छे पाइन्ट उन्हें भी देना क्या उचित नहीं होगा जिन्होंने भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके ईजाद किए होंगे? इन्हें भी महाभ्रष्टों की केटेगरी में लेना उचित नहीं होगा क्या जिन्होंने अपने बाप और बेटों को भी नहीं बक्शा ? इस मामले में संभवतः उनकी गिनती फिसड्डियों में होगी जो मॉडरेट होते हैं और किसी काम को बड़े रीजनेबल लेन-देन में निपटाते हैं तथा अपनी प्राइज़ कभी फ़िक्स नहीं करते. मिला तो ठीक, नहीं मिला तो ठीक की राह पर चलते हैं.

दूसरी ओर जो हरगिज समझौतावादी नहीं होते, हर मामले में अपार संभावनाएँ ढूंढते हैं तथा अपनी प्राइज कभी डाउन नहीं करते ऐसे अफसरों की गिनती टॉप में ही होगी और हो सकता है कि थोड़े, मामूली, दाल में नमक के बराबर भ्रष्टाचार करने वालों को इस रेस में शामिल ही नहीं माना जाए? दूसरे शब्दों में इस तरह उन्हें ईमानदारी का लेबल मिल जाए?

अब तक गरीब गुरबे अपनी समस्याओं-शिकायतों का समाधान ढूंढने के लिए ईमानदार अफसरों की ओर ताकते थे. अब शायद यह उम्मीद सबसे कम भ्रष्ट अफसरों में से खोजनी होगी. अपनी समस्याओं को लेकर ऐसे अफसरों की तलाश करनी होगी जो अफसरों के कुनबे में सबसे कम भ्रष्ट हों. जाहिर है अपनी समस्या का कम खर्चीला हल कम भ्रष्ट अफसर के पास ही तो होगा. ज्यादा भ्रष्ट अफसर के पास जाने से परसेंटेज भी ज्यादा देना होगा और काम होने की गारंटी भी कम ही होगी. हो सकता है महाभ्रष्ट वह होता हो जो पैसा भी खा ले और काम भी न करे.

अब तक अफ़सरों की ईमानदारी के चर्चे चलते थे. सामाजिक उदाहरणों में नाम गिनाया जाता था. और अब भ्रष्ट अफसरों के चर्चे चलेंगे- जैसे, इस साल का सबसे भ्रष्ट अफसर ऐसा है और उस साल का सबसे भ्रष्ट अफसर वैसा है. इनके किस्से कहानी लोग चटखारे लेकर सुनेंगे-सुनाएंगे, उद्धरणों में दिए जाएंगे कि कैसे उन्होंने किसी मद का सारा पैसा हजम किया और साफ बच निकले या कैसे उन्होंने अपने-अपनों को ढेरों फ़ायदा पहुँचाया और कैसे वे गुदड़ी के लाल से करोड़पति-अरबपति रातों रात बन गए.

जहाँ तक भ्रष्ट होने का सवाल है, हर अफसर दूसरे किसी भी अफसर को अपने से ज्यादा भ्रष्ट समझता है. इस मामले में उसे अपनी थाली के पेड़े-पकवानों में वह मजा दिखाई नहीं देता और सामने वाले की थाली की दाल भी उसे काजू-करी जैसा आभास देती है. और जहाँ तक ईमानदारी का सवाल है, स्थिति ठीक इसके विपरीत है. अफसर चाहे जितना भ्रष्ट हो, अपने आप को हरिश्चंद्र का अवतार मानता है और यह बात, बात-बात में साबित करने की पुरजोर कोशिश करता रहता है.

चूँकि, हर चीज़ की सीमाएँ टूट रही हैं, किसी दिन, संभव है, सबसे ज्यादा भ्रष्ट होना भी स्टेटस सिंबल बन जाए.

तो फिर बात सिर्फ चुनिंदा अफसरों तक ही क्यों सीमित रहे? चाहे जिस क्षेत्र में हम हैं, आइए, अपन भी रेस लगाएँ?
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नीचताई की हद...


भ्रष्टाचार के लिए लोग किस हद तक जा सकते हैं ?



इंदौर (अन्य दर्जनों जगहों पर भी ऐसी संभावनाएँ बताई जा रही हैं) म्युनिसिपल कार्पोरेशन के कुछ अफ़सरों कर्मचारियों और स्थानीय नेताओं ने तो, हद ही कर दी.

निराश्रित, विकलांग, बूढ़े, अशक्त लोगों के लिए स्वीकृत सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि इन लोगों ने हजम कर ली! हर माह आधा करोड़ रुपया ये गबन करते रहे. और बेचारे निराश्रित, विकलांग, बूढ़े, अशक्त – जिनके लिए यह सरकारी पैसा था, तड़पते रहे. भ्रष्टाचारियों के लिए नीचताई की पराकाष्ठा है यह!

ऊपर से, लचर भारतीय कानून-तंत्र के चलते, इन भ्रष्टाचारियों का कोई बाल बांका नहीं होने वाला – जैसे कि, खेल मंत्रालय के कुछ खेल मंत्रियों (साध्वी उमा का नाम भी शामिल है!) के लिए एक दिन का टैक्सी का बिल 98हजार रुपये (जी, हाँ, 98 हजार रुपए प्रतिदिन, जबकि शायद ही कोई मंत्री टैक्सी पर सफर करता होगा) भ्रष्ट तरीके से भुगतान किया गया और जब यह भ्रष्टाचार पकड़ में आया तो इसे सरकारी जांच तंत्रों ने नाम दिया गया – माइनर फाइनेंशियल इर्रेगुलरिटीज़!

भारत - निराश्रित, विकलांग, बूढ़ा और अशक्त ही रहेगा – ऐसे भ्रष्टाचारियों के चलते तो बिलकुल. लोग भारत को विश्व महाशक्ति के रूप में देखने की बात करते हैं. क्या बेकार की बातें करते हैं.

-*-*-
व्यंज़ल
**--**

जिंदा रहने की बात करते हो
किस शहर की बात करते हो

एक कौर रोटी नहीं मयस्सर
तुम भोज की बात करते हो

गली के हुड़दंगिये संभले नहीं
विश्व शांति की बात करते हो

न घर न वस्त्र न है निवाला
हद में रहने की बात करते हो

इन हालातों में जिंदा है रवि
तुम किस की बात करते हो

*-*-*

बिन पानी सब सून...


रहिमन पानी राखिए...
*-*-*
निरंतर का जल पर आधारित विशेषांक अवतरित हो चुका है. नियमित स्तंभों के अलावा जल से संबंधित, जल-समस्याओं की ओर इंगित करते कई सारगर्भित लेख आप यहां पढ़ सकेंगे. जिनमें शामिल हैं – मेधा पाटकर की देबाशीष चक्रबर्ती से खास बातचीत तथा दिलीप डिसूज़ा का आलेख.

पर, रुकिए, जल के बारे में आप कितना क्या कुछ जानते हैं ?

अपने ज्ञान की परीक्षा लें. उत्तर कल इन्हीं पृष्ठों में ढूंढें.
**-**

पानी के बारे में कितना जानते हैं आप?

पानी का सही अर्थ आपको पता है? पिछली दफ़ा किसी ने आपको पानी पिलाने की बात कह आपको (शर्म से) पानी-पानी तो नहीं कर दिया था ? और आप उसका पानी उतारने के पीछे तो नहीं लग गए थे? पानी का आपके जीवन में नहाने-धोने और पीने से भी ज्यादा महत्व है. आइए, पानी के बारे में अपनी जानकारी की परीक्षा लें. नीचे दिए गए पानी से सम्बन्धित मुहावरों/कहावतों के अर्थ किसी काग़ज़ पर नोट करें. अपने उत्तरों की जाँच के लिए, कि आप कितने सही और कितने गलत हैं, कल इसी स्थल पर पढ़िए.

1. पानी उतरना
2. पानी उतारना
3. पानी कर देना
4. पानी का बुलबुला
5. पानी काटना
6. पानी की तरह ख़ून बहना
7. पानी की तरह पैसा बहाना
8. पानी की तरह साफ़
9. पानी के मोल
10. पानी को भी न पूछना
11. पानी खोजना
12. पानी नाक तक पहुँचना
13. पानी चढ़ना
14. पानी छोड़ना
15. पानी डालना
16. पानी थमना
17. पानी दिखाना
18. पानी देना
19. पानी देनेवाला
20. पानी न पचना
21. पानी न मांगना
22. पानी पानी होना/करना
23. पानी पी पीकर
24. पानी फिरना
25. पानी फेरना
26. पानी भरना
27. पानी मरना
28. पानी मुँह में भरना
29. पानी में आग लगाना
30. पानी में घुलना
31. पानी में पड़ना
32. पानी में फेंकना
33. पानी में बहाना
34. पानी में बुझाना
35. पानी लगना
36. पानी दार

और, जल के बारे में ?
1. जलक
2. जल अलि
3. जल कंटक
4. जलकंद
5. जलकरंक
6. जलकर
7. जलकल्क
8. जलकिराट
9. जलकुंभी
10. जलकुंतल
11. जलकुक्कुट
12. जलकूपी
13. जलकेतु
14. जलकेलि
15. जलक्रीड़ा
16. जलखग
17. जलखरी
18. जलगुल्म
19. जलघड़ी
20. जलचर
21. जलज
22. जलडमरू मध्य
23. जलडिंब
24. जलतरंग
25. जलतापी
26. जलताल
27. जलत्रास
28. जलद
29. जलदेव
30. जलधर
31. जलधारा
32. जलधारी
33. जलधि
34. जलन
35. जलनिधि
36. जलरुत
37. जलपादप
38. जलपीपल
39. जलप्रपात
40. जलप्लावन
41. जलबिल्व
42. जलमार्जार
43. जलयान
44. जलवीर्य
45. जलसर्पिणी
46. जलसा
47. जलसुत
48. जलोदर
वाटर के बारे में भी तो कुछ बताइए ?

1. वाटर गैस
2. वाटर ग्लास
3. वाटर पोलो
4. वाटर पम्प
5. वाटर टेबल
6. वाटर ट्रीटमेंट
7. वाटर व्हील
8. वाटर बरी
9. वाटर गेट
10. वाटर वर्क्स
11. वाटर वर्ल्ड
12. वाटर थेरेपी
बस ... बस ... मुम्बई की तरह चहुँओर पानी ही पानी हो गया. अब बस भी करो और उत्तर बताओ...
********.

पानी उतरा कि नहीं ?


पानी के अर्थ:
***-***


1. पानी उतरना = अमर्यादित हो जाना / मर्यादाहीन
2. पानी उतारना = अपमानित करना, इज़्ज़त उतारना
3. पानी कर देना = शांत करना, सरल करना
4. पानी का बुलबुला = क्षण भंगुर, क्षणिक
5. पानी काटना = खेत के पानी का मार्ग बदलना
6. पानी की तरह ख़ून बहना = बहुत अधिक मारकाट
7. पानी की तरह पैसा बहाना = फ़िज़ूल ख़र्च
8. पानी की तरह साफ़ = मिलावट रहित, निष्कपट
9. पानी के मोल = सस्ता
10. पानी को भी न पूछना = दुत्कार, असत्कार


11. पानी खोना = इज़्ज़त खोना
12. पानी नाक तक पहुँचना = असहनीय (व्यवहार)
13. पानी चढ़ना = धातु की पॉलिश (चाँदी पर सोने का पानी चढ़ाना)
14. पानी छोड़ना = वनस्पति आदि का आंतरिक पानी निकलना (नमक डालने या गर्म करने से), नहरों से पानी छोड़ना
15. पानी डालना = सदा के लिए भुलाना
16. पानी थमना = वर्षा का गिरना रुक जाना
17. पानी दिखाना = पशुओं को पीने के लिए पानी देना, वास्तविकता बताना
18. पानी देना = पौधों को सींचना, पितरों को तर्पण
19. पानी देनेवाला = वंशज (पितरों को जल देने वाला)


20. पानी न पचना = राज़ उगलना
21. पानी न मांगना = निःशक्त होना
22. पानी पानी होना/करना = लज्जित होना/करना
23. पानी पी पीकर = बारंबार शक्ति संचय कर
24. पानी फिरना = योजना / विचार नष्ट हो जाना
25. पानी फेरना = नष्ट करना
26. पानी भरना = तुच्छ प्रतीत होना
27. पानी मरना = शर्म खत्म होना
28. पानी मुँह में भरना = लालायित होना
29. पानी में आग लगाना = असंभव को संभव करना
30. पानी में घुलना = एकाकार होना, अस्तित्व हीन होना



31. पानी में पड़ना = कठिनाई में पड़ना, नुकसान होना
32. पानी में फेंकना = बर्बाद करना
33. पानी में बहाना = व्यर्थ व्यय / गंवाना
34. पानी में बुझाना = लोहे (के औज़ार) को कठोर बनाना
35. पानी लगना = प्रभावित होना
36. पानी दार = इज़्ज़त दार

और जल के अर्थ:


1. जलक = शंख
2. जल अलि = पानी का भ्रमर कीट
3. जल कंटक = सिंघाड़ा
4. जलकंद = सिंघाड़ा
5. जलकरंक = कमल
6. जलकर = जल प्रदाय के लिए कर
7. जलकल्क = कीचड़
8. जलकिराट = घड़ियाल
9. जलकुंभी = जल में उगने वाली एक वनस्पति
10. जलकुंतल = शैवाल
11. जलकुक्कुट = जल पक्षी
12. जलकूपी = कुआँ
13. जलकेतु = एक पुच्छल तारा
14. जलकेलि = जलक्रीड़ा
15. जलक्रीड़ा = जल में तैरने या नौका वहन का खेल
16. जलखग = जल के किनारे रहने वाला पक्षी
17. जलखरी = फल/सब्जी रखने की जालीदार थैली
18. जलगुल्म = कछुआ
19. जलघड़ी = जल की मदद से समय बताने वाला उपकरण
20. जलचर = जल में रहने वाला जन्तु
21. जलज = जल से उत्पन्न हुआ
22. जलडमरू मध्य = समुद्रों को जोड़ने वाला संकरा जल भाग
23. जलडिंब = घोंघा
24. जलतरंग = जल से भरी कटोरियों से बना वाद्य
25. जलतापी = हिलसा मछली
26. जलताल = सलई का वृक्ष
27. जलत्रास = रेबीज़ से होने वाला रोग
28. जलद = बादल
29. जलदेव = इंद्र देवता
30. जलधर = बादल
31. जलधारा = जलप्रवाह
32. जलधारी = बादल
33. जलधि = नदी
34. जलन = ईर्ष्या
35. जलनिधि = समुद्र
36. जलपूर = जल से भरी नदी
37. जलपादप = हंस
38. जलपीपल = मत्स्यगंधा औषधि
39. जलप्रपात = नदी के जल का ऊँचे स्थान से गिरना
40. जलप्लावन = बाढ़
41. जलबिल्व = केकड़ा
42. जलमार्जार = ऊदबिलाव
43. जलयान = जहाज, नाव
44. जलवीर्य = भरत के एक पुत्र का नाम
45. जलसर्पिणी = जोंक
46. जलसा = समारोह
47. जलसुत = कमल
48. जलोदर = एक क़िस्म का रोग

वाटर के अर्थ:

1. वाटर गैस = लाल गर्म कोक पर तप्त भाप छोड़ने पर प्राप्त ज्वलनशील गैस
2. वाटर ग्लास = रंगहीन, कांच जैसा पदार्थ सोडियम/पोटेशियम सिलिकेट
3. वाटर पोलो = स्विमिंग पूल में गेंद से खेला जाने वाला खेल
4. वाटर पम्प = पानी खींचने / चढ़ाने का पम्प
5. वाटर टेबल = भूगर्भीय जल स्थिति दर्शक तालिका
6. वाटर ट्रीटमेंट = जल शुद्धि प्रक्रिया
7. वाटर व्हील = जल चक्की
8. वाटर बरी = न्यू हैवन काउन्टी, यूएसए का एक शहर
9. वाटर गेट = यूएसए में सन् 1972 में घटित राजनीतिक षडयंत्र
10. वाटर वर्क्स = पेय जल शोधन संयंत्र
11. वाटर वर्ल्ड = केविन कॉस्नर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म
12. वाटर थेरेपी = हाइड्रोथेरेपी, जल का इस्तेमाल कर की जाने वाली चिकित्सा

ओह, सब तरफ पानी ही पानी हो गया, चलो अब कहीं सूखे पर चलें
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मुम्बई की बरसती सरकार...


हृदय-हीन सरकारी व्यवस्था...

*-*-*




मुम्बई की बरसात में मृतकों के एवज में सरकार ने मुआवजा प्रदान करने की घोषणा की थी. उद्देश्य था – गरीब तबकों को कुछ सहारा मिले. मुआवजा देने में लकीर के फकीर सरकारी बाबू मुम्बई की बरसात से भी ज्यादा जुल्म गरीबों पर कर रहे हैं. ताजा उदाहरण है – मोहम्मद शेख का - जिसे कहा गया है कि मुआवजा पाना है तो अपनी दो माह की बच्ची को कब्र से खोद कर निकालो, उसका पोस्टमार्टम करवाओ, उसकी पोस्टमार्टम रपट जमा करो तभी मुआवजा मिलेगा.




गरीब मोहम्मद शेख को शायद यह गुमान नहीं था कि सरकारी मुआवजा पाने के लिए मुम्बई की बरसात में भेंट चढ़ चुकी अपनी प्यारी बिटिया को दफनाने से पहले थाने में रपट डालनी थी, किसी सरकारी डॉक्टर को पकड़ कर उसका पोस्टमार्टम करवा कर उसकी रपट हासिल करनी थी... वगैरह... वगैरह...

हाय रे सरकार! और सरकारी व्यवस्था! !

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व्यंग्यः जुलाई का महीना


(निरंतर में पूर्व प्रकाशित)

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जुलाई का महीना सदैव डराता आया है और लगता है हमेशा डराता आएगा। मैं जब बच्चा था, और स्कूल में पढ़ता था, तब इस जुलाई के महीने से भारी डरता था। मई और जून की पूरी दो महीनों की घनघोर छुट्टियाँ जब खत्म होने को आती थीं, तब जुलाई का महीना भयंकर रूप से डराता चला आता था। याद आने लगती थीं किताबें, कापियाँ और होम वर्क। याद आने लगते थे गुरूजनों की छड़ियाँ, उनके डांट फटकार और उनके द्वारा दिए जाने वाले दण्ड। ये सारी चीजें भयंकर रूप से डराती थीं, और मैं भगवान से प्रार्थना करता था – मनौतियाँ मानता था कि हे! ईश्वर, जुलाई के महीने को लेकर मत आ। या फिर कुछ दो-चार दिनों की मोहलत और दे दे। परंतु डराता-धमकाता और अपने असर से सराबोर करता चला जाता अपने पीछे भुगतने को अगस्त, सितंबर इत्यादि को छोड़ता हुआ।

आज मैं बुजुर्ग और बड़ा हो गया हूँ, तो भी जुलाई के महीने से डरता हूँ। और, आश्चर्य की बात यह है कि मैं अभी भी स्कूल और कॉलेजों से ही डरता हूँ। तब भी, अब जब मैं पढ़ता नहीं हूँ। जब मैं बच्चा था, तब मैं सोचा करता था कि मैं और मेरे जैसे मेरे सहपाठी ही हैं जो जुलाई के महीने से डरते हैं। पर उस वक्त की मेरी सोच कितनी संकीर्ण थी, इसका अंदाजा आज मुझे हो रहा है। उस वक्त हमें कल्पना ही नहीं हो पाती थी कि हमारे पालक भी जुलाई के महीने से डरते घबराते होंगे।

मेरे जैसा हर पालक जुलाई के महीने से डरता घबराता होगा। मई-जून की शानदार छुट्टियाँ बीतने के बाद जब जुलाई का महीना आता है तो पालकों का दिल धक-धक करने लगता है। छोटे का फलां स्कूल में एडमीशन कराना है- उसके लिए एप्रोच जुगाड़नी है। बड़े को मेडिकल में भेजना है उसके लिए तगड़ा डोनेशन देना है। फिर स्कूल ड्रेस, किताबें, कॉपियाँ, स्कूल बस्ते, ट्यूशन, बच्चों के स्कूल आने जाने की व्यवस्था इत्यादि... इत्यादि... चीजें सारा समय डराने का काम करती रहती हैं।

जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे-वैसे ‘जुलाई के महीने के डराने वाले फ़ैक्टर’ के स्टैंडर्ड भी बढ़ते जा रहे हैं। पहले स्कूलों कॉलेजों में एडमीशन सामान्य सी चीज़ हुआ करती थी, और कहीं कोई मारा मारी नहीं थी। अब स्कूलों-कॉलेजों में एडमीशन हेतु प्री-टेस्ट होते हैं। मेरिट लिस्ट बनती है। लोग तीन-तीन, चार-चार स्कूलों कॉलेजों में एडमीशन फ़ॉर्म भरते हैं। डरते रहते हैं कि कहीं किसी भी जगह एडमीशन न मिला तो वे क्या करेंगे। कहीं किसी घटिया कॉलेज में भी एडमीशन मिल गया तो अपना अहोभाग्य समझते हैं।

डराने वाले ‘परसेंटेज’ भी दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। अपने जमाने में, मेरे पिताश्री – जैसा कि वे बताते रहे – परीक्षा में द्वितीय श्रेणी आ पाएगी या नहीं इस भय से वे वर्ष भर ग्रस्त रहते थे, और जाहिर है, यह भय जुलाई में चढ़ता था और अप्रैल-मई में नतीजों के आने तक बरकरार रहता था। मैं परीक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के लिए अपने विद्यार्थी जीवन के समय में भय ग्रस्त रहता था। अब मेरा भय जुलाई के महीने से इसलिए चालू हो जाता है कि मेरा फलॉ पुत्र जो फलॉ कक्षा में पढ़ता है – परीक्षा में नब्बे प्रतिशत ला पाएगा या नहीं। नहीं तो उसके अंधकार मय भविष्य की कल्पना करना ही भयावह है।

कक्षा, परीक्षा और किताब-कापियाँ, स्कूल ड्रेस के अलावा भी कई ‘फ़ैक्टर’ हैं जुलाई महीने में डरने के। सरकारी तंत्र में काम करने वालों के लिए यह महीना अकसर ट्रांसफर रूपी तलवार लेकर आता है। कईयों के लिए जमा-जमाया खेल बिगाड़ता है जुलाई का महीना। इस ट्रांसफर रूपी तलवार का वार खत्म करने के लिए, इसकी धार कमजोर करने के लिए या इसका रूख बदलने के लिए लोग जी तोड़ मेहनत करते हैं। बड़े से बड़ा, बैकिंग वाला अफ़सर भी जुलाई के महीने में डरता घबराता रहता है कि कहीं इस दफा उसका ट्रांसफर हो जाए तो नई जगह पर नई सेटिंग बनाने में बहुत खर्चा हो जाएगा – और पुराना तो अभी वसूल ही नहीं हो पाया है।

भारतीय किसान तो ख़ैर सदियों से जुलाई के महीने से डरता घबराता आया है। भगवान भला करे उन तथाकथित पर्यावरण वादियों, प्रगतिवादियों और अपने-अपने स्तर पर भ्रष्ट अफ़सरों-राजनीतिज्ञों का जिसके कारण आज भी भारतीय किसान ऊपर वाले के रहमोकरम पर, ऊपर वाले की जुलाई महीने की बरसात पर निर्भर है। इसीलिए वह साल-दर-साल जुलाई के महीने से डरता आया है। कहीं अवर्षा, कहीं अति वर्षा, कहीं सूखा, कहीं बाढ़ यानी डरने के तमाम कारण।

वैसे, अगर किसानों को अपवाद मान लें, तो बाकी सब लोगों के भय का रेडीमेड इलाज अब मार्केट में मिलने लगा है। बस रोकड़ा खर्चना होगा। मसलन – एडमीशन के लिए डोनेशन, अच्छे नंबरों के लिए ट्यूशन या पर्चा आउट, ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए राजधानी की यात्रा वगैरह-वगैरह। मगर, तब ख़ाली जेब का भय भी तो सताएगा। दुआ करता हूँ कि मेरे साथ साथ आप सभी के लिए अबकी यह जुलाई महीने का समय जरा जल्दी कट जाए।

***********.

शायद मैं ही जरा सा कतराया होऊँगा


ग़ज़ल

मैं भला कैसे इस तरह शरमाया होऊँगा
किसी और के गम पे मुसकाया होऊँगा

छिन गए बचपन, जवानी, बुढ़ापा सभी
मैं शायद कभी गर्भ में इतराया होऊँगा

मत पूछो मेरे चेहरे की खुशी का सबब
किसी सपने में शायद पगलाया होऊँगा

यूँ तो कट गई थी मजे में रात अपनी
खाली पेट को ठीक से सहलाया होऊँगा

गिला करने को तो कुछ भी नहीं रवि
शायद मैं ही जरा सा कतराया होऊँगा

*-*-*

फ्रॉड कौन?


यह तो सीधे ममी रिटर्न वाली बात हो गई!
*-*-*



योजनाएँ बनीं नहीं, और उसका फ़ायदा उठाने के लिए लोग पहले से ही तैयार हो गए. सरकार की महात्वाकांक्षी योजना – ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, जिसे क़ानूनी रूप पहनाया जाने वाला है, उसका क्या हश्र होने वाला है- इसका नमूना तो दिख ही गया है. महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में 9.1 करोड़ रुपयों का घपला इस योजना के अंतर्गत कुछ ही समय के भीतर हो गया और जब कलेक्टर द्वारा इसकी जाँच करने की कोशिश की गई तो रातों रात उसका तबादला भी हो गया! (हालाकि बाद में मामले ने तूल पकड़ा तो यह तबादला रूक गया). मृत लोगों के नाम पर भी मस्टर रोल बनाकर भुगतान दिखाया गया!

क्या इस देश का हर आदमी फ़्रॉड हो गया है?
*-*-*

व्यंज़ल
*-*-*

ये दुनिया इक फ्रॉड है
हर वासी यहाँ फ्रॉड है

ये काम सब करते हैं
तुम कहते हो फ्रॉड है

मैं सही हूँ खुदा कसम
क्यों कहते हो फ़्रॉड है

नमाज पूजा व प्रार्थना
प्रभु जाने क्या फ्रॉड है

इज़्ज़त से बताता रवि
उसका ईमान फ्रॉड है
*-*-*

व्यंग्य : सबसे सफेद !


व्यंग्य
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सबसे सफेद !

कुछ दिनों से मैं भ्रमित सा हो गया हूँ. मुझे समझ में नहीं आता कि मेरी क़मीज़ और मेरी बीबी की साड़ी सबसे सफेद धुली है या अभी उसमें कुछ धुलना बाकी है ? मेरी क़मीज़ और मेरी बीवी की साड़ी की सफेदी, क्रमशः मेरे पड़ोसी की क़मीज़ और पड़ोसिन की साड़ी से ज्यादा सफेद है या कम ? जितना ज्यादा मैं इस बारे में सोचता हूँ, उतना ज्यादा गड़बड़ होता जाता है.

एक जमाना था जब साधारण, शेर छाप लोकल मेड साबुन के बट्टे से या फिर कपड़े धोने के सोडे से अपने कपड़े धो कर हम उसकी सफेदी से संतुष्ट हो लेते थे. यदा कदा नील और टिनोपाल का इस्तेमाल भी कर लेते थे. तब हमें अपनी क़मीज़ की सफेदी और अपने पड़ोसी की क़मीज़ की सफेदी में अंतर दिखाई नहीं देता था. परंतु अब हालात यह हैं कि मुझे अपनी धुली हुई क़मीज़ की सफेदी की तुलना करने के लिए किसी पड़ोसी की क़मीज़ की ओर ताकना नहीं पड़ता. बाजार में ऐसा डिटर्जेंट मौजूद है जो धुले कपड़ों में से भी मैल निकाल देता है. अब मैं अपनी धुली क़मीज़ को बार-बार धोकर, धुली क़मीज़ से बार-बार मैल निकाल कर मतिभ्रम का शिकार होते रहता हूँ.

अब, जब भी मैं बाजार में नया, ताजा तरीन पेश किया गया ‘डर्टईटर’ क़िस्म का पॉवरफ़ुल डिटर्जेंट पाउडर या डिटर्जेंट केक लाकर उससे अपनी क़मीज़ धोकर पहनता हूँ, और उसकी सफेदी पर गर्व करता हूँ, दूसरे दिन टीवी और अख़बारों के द्वारा पता चलता है कि बाजार में उस डर्टईटर किस्म के पॉवरफ़ुल डिटर्जेंट से भी ज्यादा पावरफ़ुल डर्टबस्टर क़िस्म का डिटर्जेंट आ गया है जो अब तक की सबसे सफेद धुलाई करता है. जाहिर है, जिस धुली क़मीज़ की सफेदी पर मैं गर्व कर रहा होता हूँ, उसकी सफेदी धूसर, मटमैली प्रतीत होने लगती है और उस सफेदी पर मुझे शर्म आने लगती है. अपनी इस शर्म को धोने के लिए मैं पुनः बाजार की ओर दौड़ पड़ता हूँ उस नए सुपर डर्टबस्टर क़िस्म के पॉवरफ़ुल डिटर्जेंट को खरीदने और खरीद कर अपनी क़मीज़ को धोने के लिए.

इस ताजातरीन सुपर पॉवरफ़ुल डिटर्जेंट की सफेदी की चमकार कुछेक दिन ही टिक पाती है कि बाजार में किसी और कम्पनी का नया डिटर्जेंट फिर चला आता है – पुराने सभी डिटर्जेंटों के दावों की धज्जियाँ उड़ाता हुआ. लिहाजा मेरी क़मीज़ आज तक अपनी संपूर्ण सफेदी यानी एब्सल्यूट व्हाइटनेस को प्राप्त नहीं कर पाई है.

बात सिर्फ सफेदी की रहती तो हम भी संतुष्ट हो लेते अपने एक दूरस्थ पड़ोसी की तरह जो अपने थोड़े बहुत मैले कुचैले कपड़ों को क्रीमी-धूसर या ऑफ व्हाइट कह कर संतुष्ट हो लेता है. परंतु यहाँ तो और भी बातें हैं भ्रमित करने को. कभी किसी डिटर्जेंट का हरा, पीला, नीला या सफेद रंग आकर्षित करता है, तो कभी उसकी नींबू, संतरे या गुलाब की खुशबू. इन रंगों और खुशबुओं का भले ही क़मीज़ की सफ़ेदी और डिटर्जेंट पाउडर के पॉवर से संबंध न हो, तो भी किसी दिन, किसी की क़मीज़ से आ रही गुलाब की या केवड़े की खुशबू मुझे उस ब्रांड का डिटर्जेंट खरीदने को बाध्य कर देती है.

मुझे भ्रमित करने के लिए मेरा पीछा मेरी क़मीज़ धोने वाले भी नहीं छोड़ते. जब मेरी बीबी कपड़े धोती थी, तो उसे मेरी क़मीज़ की सफेदी के बजाए अपने कोमल हाथों की कोमलता की चिंता ज्यादा सताती थी. नतीजतन मेरी क़मीज़ अकसर मैली ही रह जाती थी. ऊपर से वह डिटर्जेंटों को जी भर कोसती थी कि उसके प्रयोग से उसका कोमल कर कठोर होने लगा है. उसकी हमेशा ऐसी डिमांड रहती थी कि तुम ऐसा डिटर्जेंट लाओ जो भले ही सफेदी न दे, मेरा हाथ तो खराब न करे. इस समस्या से पीछा छुड़ाने कपड़े धोने के लिए एक बाई की व्यवस्था की गई. उसके लिए समय महत्वपूर्ण था. उसे तमाम और घरों के कपड़े धोने जो होते थे. लिहाजा, दो मिनट में कपड़े धुल जाएँ, ऐसे सुपर-डुपर पॉवरफुल डिटर्जेंट की मांग वह करती रहती थी और अकसर, उसके धुले कपड़ों में मैल तो क्या, डिटर्जेंट ही ठीक से धुल नहीं पाता था.

इसका भी हल ढूंढने की कोशिश की गई. घर में कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन स्थापित किया गया. उसके इंस्ट्रक्शन मैनुअल में ही लिखा था कि अमुक ब्रांड के अमुक प्रकार के डिटर्जेंट ही वाशिंग मशीन में बढ़िया परिणाम देंगे. और, अगर किसी दूसरे तरह का डिटर्जेंट इस्तेमाल किया गया तो मशीन खराब हो सकता है और ऐसे में कंपनी की कोई गारंटी नहीं होगी. इस हादसे से उबर ही रहे थे कि बाजार में एक और नया डिटर्जेंट आ गया जो हाथ से कपड़े धोने की सलाह देता है और यह भी सलाह देता है कि अगर आपके पास वाशिंग मशीन है तो उसे फेंक दो.

भला बताइए, अब आदमी अपने कपड़े धोए तो धोए किस तरह ?

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क्या आपको चाहिए ऐसी स्वतंत्रता?


स्वतंत्रता की 59 वीं वर्षगांठ...
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पर, क्या हम सचमुच स्वतंत्र हुए हैं?

शायद नहीं. पत्रकार तवलीन सिंह का कहना है कि भारत को सच्ची स्वतंत्रता तब मिलेगी जब उसे नेताओं से छुटकारा मिल जाएगा – और, आज भारत को - उसकी सड़ती जा रही राजनीतिक व्यवस्था से स्वतंत्रता पाने का उपयुक्त समय आ चुका है. हमें शीघ्र ही कुछ करना होगा वरना तो बहुत देर हो चुकी होगी...

भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ब्रिटेन जाकर, वहाँ अपने भाषण में स्वतंत्रतापूर्व भारत में ब्रिटिश राज की सराहना करते हैं, जिसके फलस्वरूप भारत में शिक्षा-औद्योगीकरण-इंफ्रास्ट्रक्चर के दौर चले. अर्थ साफ है- स्वतंत्र भारत से अच्छा-भला तो ब्रिटिश राज था.

क्या यह स्वतंत्रता है कि सन् 1984 के जिस प्रायोजित दंगे में भारत भर में 5000 व्यक्तियों को मार डाला गया, उसके लिए 9 तरह की जांच कमेटियाँ बिठाई गईं, और जब 21 साल बाद आखिरी जांच कमेटी की रपट आई (और यह कमेटी भी विपक्षी बीजेपी ने बिठाई थी, अन्यथा कुछ होना नहीं था) तो भी उससे एकाध राजनेता के इस्तीफे के अलावा भुक्तभोगियों को कुछ इंसाफ हासिल नहीं हुआ?

इस जांच आयोग के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी टी नानावटी कहते हैं- इस देश में कहीं पर भी, कभी भी, कुछ भी हो सकता है. क्योंकि इस देश में राज कर रहे राजनीतिज्ञों में मूल्यों को आदर करने की भावना ही नहीं है, भारतीय पुलिस के पास आचरण और व्यवहार जैसी कोई सीमा ही नहीं है.

शायद यही स्वतंत्रता है - भारत की असली स्वतंत्रता.

अगर यही स्वतंत्रता है, तो, मुझे नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता.

मुझे ही क्यों – आजादी के दीवाने – स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही – इन्हें भी नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता. और, इन्हें अपने स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही होने पर पछतावा भी है!


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सुभाषित - अनुगूंज के सुविचार...


अनमोल वचन
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1. जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया, उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया – विनोबा
2. अकर्मण्यता का दूसरा नाम मृत्यु है – मुसोलिनी
3. पालने से लेकर कब्र तक ज्ञान प्राप्त करते रहो – पवित्र कुरान
4. इच्छा ही सब दुःखों का मूल है – बुद्ध
5. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अज्ञान है – चाणक्य
6. आपका आज का पुरुषार्थ आपका कल का भाग्य है – पालशिरू
7. क्रोध एक किस्म का क्षणिक पागलपन है – महात्मा गांधी
8. ठोकर लगती है और दर्द होता है तभी मनुष्य सीख पाता है – महात्मा गांधी
9. अप्रिय शब्द पशुओं को भी नहीं सुहाते हैं – बुद्ध
10. नरम शब्दों से सख्त दिलों को जीता जा सकता है – सुकरात
11. गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व गंभीर होता है – शेक्सपीयर
12. समय और समुद्र की लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं – अज्ञात्
13. जिस तरह जौहरी ही असली हीरे की पहचान कर सकता है, उसी तरह गुणी ही गुणवान् की पहचान कर सकता है – कबीर
14. जो आपको कल कर देना चाहिए था, वही संसार का सबसे कठिन कार्य है – कन्फ्यूशियस
15. ज्ञानी पुरुषों का क्रोध भीतर ही, शांति से निवास करता है, बाहर नहीं – खलील जिब्रान
16. कुबेर भी यदि आय से अधिक व्यय करे तो निर्धन हो जाता है – चाणक्य
17. दूब की तरह छोटे बनकर रहो. जब घास-पात जल जाते हैं तब भी दूब जस की तस बनी रहती है – गुरु नानक देव
18. ईश्वर के हाथ देने के लिए खुले हैं. लेने के लिए तुम्हें प्रयत्न करना होगा – गुरु नानक देव
19. जो दूसरों से घृणा करता है वह स्वयं पतित होता है – विवेकानन्द
20. जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है.
21. भरे बादल और फले वृक्ष नीचे झुकरे है, सज्जन ज्ञान और धन पाकर विनम्र बनते हैं.
22. सोचना, कहना व करना सदा समान हो.
23. न कल की न काल की फ़िकर करो, सदा हर्षित मुख रहो.
24. स्व परिवर्तन से दूसरों का परिवर्तन करो.
25. ते ते पाँव पसारियो जेती चादर होय.
26. महान पुरुष की पहली पहचान उसकी विनम्रता है.
27. बिना अनुभव कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है.
28. क्रोध सदैव मूर्खता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त.
29. नारी की उन्नति पर ही राष्ट्र की उन्नति निर्धारित है.
30. धरती पर है स्वर्ग कहां – छोटा है परिवार जहाँ.
31. दूसरों का जो आचरण तुम्हें पसंद नहीं, वैसा आचरण दूसरों के प्रति न करो.
32. नम्रता सारे गुणों का दृढ़ स्तम्भ है.
33. बुद्धिमान किसी का उपहास नहीं करते हैं.
34. हर अच्छा काम पहले असंभव नजर आता है.
35. पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी होता है.
36. सबसे उत्तम बदला क्षमा करना है.
37. आराम हराम है.
38. दो बच्चों से खिलता उपवन, हँसते-हँसते कटता जीवन.
39. अगर चाहते सुख समृद्धि, रोको जनसंख्या वृद्धि.
40. कार्य मनोरथ से नहीं, उद्यम से सिद्ध होते हैं. जैसे सोते हुए सिंह के मुँह में मृग अपने आप नहीं चले जाते – विष्णु शर्मा
41. जो जैसा शुभ व अशुभ कार्य करता है, वो वैसा ही फल भोगता है – वेदव्यास
42. मनुष्य की इच्छाओं का पेट आज तक कोई नहीं भर सका है – वेदव्यास
43. नम्रता और मीठे वचन ही मनुष्य के सच्चे आभूषण होते हैं – तिरूवल्लुवर
44. खुदा एक दरवाजा बन्द करने से पहले दूसरा खोल देता है, उसे प्रयत्न कर देखो – शेख सादी
45. बुरे आदमी के साथ भी भलाई करनी चाहिए – कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा डालकर उसका मुंह बन्द करना ही अच्छा है – शेख सादी
46. अपमानपूर्वक अमृत पीने से तो अच्छा है सम्मानपूर्वक विषपान – रहीम
47. थोड़े से धन से दुष्ट जन उन्मत्त हो जाते हैं – जैसे छोटी, बरसाती नदी में थोड़ी सी वर्षा से बाढ़ आ जाती है – गोस्वामी तुलसीदास
48. ईश प्राप्ति (शांति) के लिए अंतःकरण शुद्ध होना चाहिए – रविदास
49. जब मैं स्वयं पर हँसता हूँ तो मेरे मन का बोझ हल्का हो जाता है – टैगोर
50. जन्म के बाद मृत्यु, उत्थान के बाद पतन, संयोग के बाद वियोग, संचय के बाद क्षय निश्चित है. ज्ञानी इन बातों का ज्ञान कर हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होते – महाभारत
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हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरण: आधी अधूरी सरकारी प्रस्तुति...


संचार और सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय (http://www.ildc.in) द्वारा आम जनता के मुफ़्त इस्तेमाल के लिए हाल ही में जारी किए गए हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरण पर पहले पहल उत्साहित नजर डाली थी विनय जैन ने. उनके अनुभव कुछ अप्रिय से रहे जिन्हें आप यहाँ पढ़ सकते हैं. दरअसल, खूब हो-हल्ला करके, ओछी राजनीतिक लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा मिलाकर इन सॉफ़्टवेयर उपकरणों को आम जनता के मुफ़्त इस्तेमाल हेतु जारी किया गया है. इन उपकरणों में कुछ तो बिलकुल बेकार से हैं और कुछ को कुछ-कुछ मायनों में काम में लिया जा सकता है. वैसे, कुल मिलाकर ये उपकरण हिन्दी उपयोगकर्ताओं का कुछ भला कर पाएँगे, इसमें संदेह है. उदाहरण के लिए जो हिन्दी फ़ॉन्ट इस वितरण में जारी गए हैं, उनका मानक यूनिकोड के हिसाब से नहीं है, और उनको चलाने के लिए अलग से ड्राइवर की आवश्यकता होती है. ऐसे में आपके कम्प्यूटर की मेमोरी अनावश्यक खर्च होती है लिहाजा अनुप्रयोग धीमें चलते हैं.

मगर, फिर भी – कुछ शुरुआत तो हुई ही है, और उम्मीद करते हैं कि ऐसे प्रयास लगातार जारी रहेंगे.

मैंने इनमें से प्राय: सभी उपकरणों को विंडोज़ एक्सपी के वातावरण में चलाकर जाँचने की कोशिश की. यूँ तो अनुभव लगभग वैसे ही रहे जैसे कि विनय ने पाए. परंतु फिर भी कुछ अनुप्रयोग हिन्दी कम्प्यूटर प्रयोक्ताओं के काम तो आ ही सकते हैं. ऐसे काम लायक कुछ अनुप्रयोगों के बारे में संक्षिप्त विवरण निम्न हैं. इन अनुप्रयोगों को आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.

1 आसान हिन्दी टाइपिंग ट्यूटर: अगर आप विंडोज़ / लिनक्स का डिफ़ॉल्ट हिन्दी कुंजी पट इनस्क्रिप्ट सीखना चाहते हैं तो यह आपके बड़े काम का है. जैसा कि इसका नाम है, यह टाइपिंग शिक्षक इस्तेमाल में बड़ा आसान है. इसका इंटरफेस मज़ेदार किस्म का है. शिक्षण पाठ और परीक्षाओं को अलग – अलग श्रेणियों में सुंदर तरीके से बांट कर रखा गया है. शिक्षण पाठ में हिन्दी के अंतर्निर्मित पाठ भी हैं जिन्हें बाएँ विंडो में प्रदर्शित किया जाता है और आपको दाएँ विंडो में टंकित करना होता है. आपकी टाइपिंग गलतियों को लाल अक्षरों से तथा आवाज से बताया जाता है. टाइप सीखना मजेदार और आसान बनाने के लिए कुछ खेल भी हैं. हिन्दी के अतिरिक्त यह आपको अँग्रेज़ी भी सिखा सकता है.

2 जनरल डिक्शनरी – सीडॅक द्वारा प्रस्तुत अँग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश यूनिकोड हिन्दी में है. दरअसल, वर्तमान में यूनिकोड हिन्दी का संभवत यह एक मात्र शब्दकोश है. परंतु यह शब्दकोश अभी अपनी शैशवावस्था में ही है लगता है और लगता है कि इसे हड़बड़ी में जारी किया गया है. इसमें शब्दों को ढूंढने की सुविधा गतिमय नहीं है. आपको अंग्रेजी के पूरे शब्द लिखकर उसे ड्रापडाउन सूची में से क्लिक करना पड़ता है तब कहीं उसका हिन्दी का अर्थ प्रकट होता है. इसका शब्द भंडार अत्यंत सीमित है. उदाहरण के लिए, अंग्रेजी अक्षर वाई तथा जेड के लिए क्रमश: मात्र 40 और 15 प्रविष्टियाँ ही है. फिर भी, अगर आपके कंप्यूटर में पहले से ही कोई शब्दकोश संस्थापित नहीं है, तो मुफ़्त का यह आधारभूत शब्दकोश आपके कुछ तो काम आएगा ही. हाँ, इस बात का खास ध्यान रखें कि यह प्रारंभ होने में काफी समय लेता है.

3 शब्दिका – तकनीकी शब्दावली संग्रह – यह संग्रह दो खंडों में पुस्तक रूप में प्रकाशित वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का इलेक्ट्रानिक संस्करण है. इसका इंटरफेस बेकार किस्म का है जो इसके उपयोग में बार-बार खटकता है. यह बगी भी है. इसके प्रशासन तथा बैंकिंग शब्दकोश के फ़ॉन्ट कृतिदेव है तो आईटी शब्दावली के शुषा फ़ॉन्ट हैं. अत: जब तक दोनों ही प्रकार के फ़ॉन्ट स्थापित न हो जाएँ, यह हिन्दी अर्थों को प्रदर्शित नहीं कर पाता. वैसे, इसका शब्दभंडार अत्यंत विशाल है और यह खासा उपयोगी भी है.

4 पाठ से वार्ता – आईआईआईटी हैदराबाद का डेमो संस्करण कुछ आशा जगाता है. अगर इसके बिलकुल रद्दी और एकदम आधारभूत इंटरफेस को माफ़ कर सकते हों, तो हिन्दी पाठ से वार्ता का यह शानदार और जानदार अनुप्रयोग है. जानदार इसलिए कि इसमें जो आवाज सुनाई देती है वह रोबॉटिक और मशीनी न होकर मानवी लगती है, जो सुनने में कर्णप्रिय-आनंददायी है. अभी यह सिर्फ यूनिकोड पाठ फ़ाइलों में से हिन्दी पाठ को ही पढ़ पाता है. उम्मीद है इसके पूर्ण संस्करण में हमें बहुत कुछ नया और मिले.

5 चित्रांकन – हिन्दी के लिए ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन सॉफ़्टवेयर की बहुत जरूरत है- परंतु खेद का विषय है कि काम लायक ऐसा सॉफ़्टवेयर नजर नहीं आता. चित्रांकन नाम का यह उपकरण खास हिन्दी के लिए जारी किया गया है. वैसे तो यह उपकरण उपयोग में उन्नत प्रतीत होता है और प्राय: सभी तरह की फंक्शनलिटीज़ को इसमें खूबसूरती से पिरोया गया है, परंतु इसको कई तरह से चलाकर, तथा इसे कई तरह से ट्रेन करने के उपरांत चलाकर देखने के बावजूद इसका परिणाम संतोषप्रद नहीं रहा. अगर इसे और डेवलप किया जाता है तो भारत के अथाह साहित्य भंडार को कम्प्यूटरीकृत करने में बहुत सुविधा होगी.
6 परिवर्तन – हिन्दी भाषा के दर्जनों फ़ॉन्ट को एक दूसरे में परिवर्तन करने के लिए यह उपकरण खासा काम का है. अगर इसे माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड के साथ उपयोग किया जाए तो यह बहुत शुद्ध परिणाम देता है. मगर इसका इंटरफेस बहुत ही बेकार किस्म का है और आपको हर फ़ाइल के लिए बार-बार वही चरण दोहराने होते हैं, जो काफ़ी ऊबाऊ होता है. कहीं कहीं यह अत्यंत धीमा भी हो जाता है और बड़ी फ़ाइलों को परिवर्तित करते समय क्रैश भी हो जाता है. वैसे, इक्का दुक्का फ़ाइलों को परिवर्तित करने के लिए यह अच्छा है. वैसे भी, रिच टैक्स्ट फ़ाइल या एमएस वर्ड डाकुमेंट जैसे प्रोप्राइटरी फ़ाइल फ़ॉर्मेट के फ़ॉन्ट को एक दूसरे में परिवर्तित करने में यह एकमात्र मुफ़्त सॉफ़्टवेयर है. अन्य सॉफ़्टवेयर प्रमुखत: पाठ फ़ाइलों में ही काम कर पाते हैं. इस आलेख को यूनिकोड फ़ॉन्ट पर लिखा गया था और इसे कृतिदेव आधारित फ़ॉन्ट, जिसमें आप अभी पढ़ रहे हैं, इसी अनुप्रयोग के जरिए परिवर्तित किया गया है. हाँ, फ़ाइलों को परिवर्तित करते समय इंटरनेट के लिंक को यह हटा देता है, जिसे आपको फिर से डालना पड़ता है.

ऑफ़िस सूट के नाम पर हिन्दी इंटरफेस युक्त ओपन-ऑफ़िस.ऑर्ग सम्मिलित है जिसकी विस्तृत चर्चा पहले ही इस जालस्थल पर की जा चुकी है. इसमें नया कुछ नहीं है. वही पुराना – गलतियों भरा अनुवाद युक्त हिन्दी इंटरफेस. आश्चर्यजनक रूप से, सीडॅक का लीप ऑफ़िस सूट और प्रकाशन उपकरण जारी नहीं किया गया है, जिसे मुफ़्त इस्तेमाल हेतु जारी किया जा सकता था. शायद वे यूनिकोड सम्पन्न नहीं होने की वजह से शामिल नहीं किए गए हैं, परंतु अगर ऐसा होता तो अन्य उपकरण जो यूनिकोड के नहीं हैं जैसे कि शब्दिका उन्हें भी तो जारी किया गया है. और, लीप ऑफ़िस में हिन्दी में दस्तावेज़ तैयार कर यूनिकोड में तो परिवर्तित किया ही जा सकता है. इससे कहा जा सकता है कि हिन्दी के लिए यह प्रस्तुति आधी अधूरी ही रही.
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आरक्षित - असुरक्षित राजनीति...


आप आरक्षित हैं या असुरक्षित?




सर्वोच्च न्यायालय ने निजी और सरकारी-अनुदान से रहित शिक्षा संस्थानों पर आरक्षण को समाप्त करने का निर्णय दिया है. आरक्षण के दैत्य-नुमा कैंसर से मुक्ति पाने का भारत के पास यही सबसे उपयुक्त अवसर था. परंतु गंदी भारतीय राजनीति ने इसे गंवा दिया है. राजनीतिक पार्टियाँ अपने छुद्र राजनीतिक लाभों के लिए देश की ओर, देश की प्रगति की ओर देखना बन्द कर अपने वोट बैंक को पुख्ता करने के उपायों की ओर ही देखते रहे हैं और देखते रहेंगे. सारी राजनीतिक पार्टियाँ सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को किसी तरह उलटने और लागू न होने देने के लिए लाम-बंद हो गई हैं. इस हेतु राजनीतिज्ञों द्वारा अध्यादेश लागू किए जाने की बात की जा रही है. तमिलनाडु की जयललिता की सरकार ने तो यहाँ तक कहा है कि वह सभी निजी और गैर अनुदान प्राप्त शिक्षा संस्थानों का सरकारी करण कर देगी ताकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को मानने की आवश्यकता ही न रहे.

देश गया भाड़ में अपने वोट बैंक तो बने रहें – अपनी सत्ता पर कोई आंच न आए. यह है आज की राजनीति का सिद्धांत. धर्मनिरपेक्ष राज्य भारत में धार्मिक आधार पर विभाजन तो बना हुआ है ही, अब आने वाले समय में अगड़े-पिछड़े का विभाजन साफ नज़र आता है. कमजोर तबके के लोगों को सम्पूर्ण विकास देने के लिए परिपूर्ण योजनाओं पर बल देने के बजाए अक्षमता को शह देना, अक्षमता को पालना-पोसना और बनाए रखना जैसे नियमों को लागू किया जाता रहा है और यदि न्यायालय को इसमें गलतियाँ नज़र आती है तो उसे कानून बनाकर बदलने के उपाय किए जाते हैं – किसी देश को गर्त में ले जाने के लिए ये काफी नहीं हैं?

राजनीतिकरण के चलते भारत की जनता आरक्षित भले ही हो गई हो, वह असुरक्षित भी उतनी ही हो गई है!

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व्यंज़ल
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समा गई है रसातल में राजनीति।
होने लगी है मुहब्बतों में राजनीति।

रहा करता था भाई चारा कभी
फैल गई गली कूचों में राजनीति।

क्यों देखता हूँ हर तरफ बुराइयाँ
समा गई मेरी नज़र में राजनीति।

जीवन तो है पल भर का इनका
देखो इनकी हर चीज़ में राजनीति।

रवि सोचता है क्या हो जाता जो
न होती अपने जीवन में राजनीति।

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अमरीकी भगदड़...


भगदड़ – पर भारत में नहीं...

जमाने में और भी भगदड़ मचाने वाले देश हैं भारत के सिवा!

एक और भगदड़ मची. पर शुक्र है, इस दफ़ा भारत में नहीं मची, और किन्हीं साड़ियों के मुफ़्त वितरण या ट्रेन पकड़ने के लिए या किसी मेले-ठेले में नहीं मची. बल्कि, आई-बुक को सस्ते दामों में खरीदने के लिए मची. और, क्या आप कसम खा कर बता सकते हैं कि इतने सस्ते दामों में कोई आई-बुक बेच रहा हो तो क्या आप भी उस भगदड़ में शामिल नहीं होंगे? खासकर तब जब आपको पता हो कि माल बहुत कम है और ख़रीदार बहुत ज्यादा?
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सामान्य सावधानी या ...?


जनरल अलर्ट!
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भारत में सरकारी कर्मचारी क्या होता है? वह खुदा होता है, भगवान होता है, अपनी कुर्सी पर बैठकर वह लॉर्ड होता है. और जो जितने बड़े पोस्ट पर होता है वह उतना ही बड़ा गॉड होता है. और तो और, बड़े अफसर का अर्दली, चपरासी और ड्राइवर भी खुदा समान होता है.

ऊपर से यहाँ बात भारतीय फौज के ‘जनरल’ की हो रही है. फिर तो बात ही क्या? (यह खबर पुरानी है, कहीं कतरनों में छुप गई थी. कूमी कपूर हर हफ़्ते इंडियन एक्सप्रेस में कुछ इसी तेवर की ख़बरें लेकर आती हैं.)

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व्यंज़ल
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हैं नेता और अफसर इस जमाने के खुदा।
मेरे खुदा तो बस किस्से कहानी के खुदा।

तमाम झगड़े हैं सिर्फ उसी एक के लिए
किसी के प्रभु परमेश्वर तो किसी के खुदा।

चोरों के ही राज चल रहे हैं इस दौर में
बड़े ही शक्तिशाली हैं सिर्फ उन के खुदा।

शहर के बाशिंदे भूखे हैं किसी जमाने से
फिर किस का ईश्वर और किस के खुदा।

एक जहान, एक ही वेष हम सभी के रवि
फिर क्यों विविध रंगों के हैं सब के खुदा।

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एमएस वर्ड से सीधे ब्लॉगर पर पोस्ट...


ब्लॉगर और एमएस वर्ड युगल बंधन में बंधे...


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ब्लॉगर ने एक एमएस वर्ड प्लगइन जारी किया है (यहाँ से डाउनलोड करें- http://desktop.google.com/download/blogger/BloggerForWordSetup.exe ) जो कि विंडोज तथा वर्ड 2000 से ऊपर के संस्करणों में काम करता है. यह प्लगइन आपके एमएस वर्ड मेन्यू में ब्लॉगर मेन्यू जोड़ता है जिसके जरिए सीधे एमएस वर्ड से ही ब्लॉग पर न सिर्फ पोस्ट किया जा सकता है, बल्कि पोस्ट का संपादन भी किया जा सकता है. यह औज़ार उन ब्लॉग लेखकों के लिए शानदार है जो एम एस वर्ड के जरिए अपना ब्लॉग लिखते हैं.

वैसे अभी यह सिर्फ ‘पाठ’ सामग्री को ही ब्लॉग पर पोस्ट कर पाता है. परंतु मुझे लगता है कि अब सिर्फ कुछ समय की ही देरी है, जब उपयोक्ता एमएस वर्ड के पूरी तरह फ़ॉर्मेट किए, रंगबिरंगे दस्तावेज़ों को चित्रों समेत, जैसा दिखता है वैसा का वैसा न सिर्फ ब्लॉगर पर, बल्कि अन्य कहीं भी पोस्ट कर सकेंगे.

जिंदगी सचमुच आसान हो रही है – दिन –प्रतिदिन 
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आपकी सोच कड़क या मुलायम?


पूरे भारत के लिए कोई ऐसा ही कुछ क्यों नहीं सोचता है?


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उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सेफ़ई (कुल जनसंख्या महज़ 4000) के लिए क्या किया जा रहा है, जरा देखिएः
• 170 करोड़ रूपयों का पीजीआई सुपर हास्पिटल बनाया जा रहा है
• 69 करोड़ रुपयों का चौधरी चरण सिंह डिग्री कॉलेज बनाया जा रहा है
• 50 करोड़ रुपयों का स्पोर्ट स्टेडियम की स्थापना की जा रही है जिसमें स्वीमिंग पूल इत्यादि हैं.
• 10 करोड़ रुपए विविध मदों में स्वीकृत किए गए हैं- जैसे कि एक करोड़ रुपए 1000 सीट का एयर-कंडीशंड आडिटोरियम, 5.6 करोड़ रुपए सफारी पार्क के लिए इत्यादि...
• 45 करोड़ रुपयों का इंटरनेशल क्वालिटी का एयरपोर्ट जहाँ बोइंग 737 लैंड कर सके.

उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली जैसे स्थान पूरे देश में ऐसे ही, अतिरिक्त, अनुपयुक्त, अनुचित, अनावश्यक संसाधनों को, जो हम-आपके द्वारा सरकार के खजाने में जमा किए गए टैक्स का बहुमूल्य पैसा है, झोंके जाने को लेकर समय-समय पर चर्चा में बने रहते हैं. लालू यादव के चुनाव क्षेत्र में कई सौ करोड़ रुपयों की लागत का रेल चक्के का कारखाना खोला गया, जबकि पहले के, अन्यत्र के कारखाने पूरी तरह अपनी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. जब मध्य प्रदेश में भयंकर बिजली की कमी थी और पूरा प्रदेश बिजली कमी से जूझ रहा था, यहाँ के एक बिजली मंत्री के चुनाव क्षेत्र में कोई कटौती नहीं होती थी, और उस क्षेत्र के लिए मनमाने, अनावश्यक विद्युत उपकेंद्रों की स्थापना की गई.

सवाल यह है कि कोई समग्र देश के लिए क्यों नहीं सोचता है? दरअसल, कोई भी नेता अपने चुनावक्षेत्र, अपनी कांस्टीट्यूएंसी, अपने वोटरों से ऊपर नहीं जा पाता. ऐसे में देश का क्या खाक भला होगा. संसाधन ऐसे ही बरबाद होते रहेंगे.

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व्यंज़ल
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किसी ने ये क्यों नहीं सोचा सोचता रहा
तमाम उम्र बैठे बैठे बस मैं सोचता रहा
तेरा खयाल मुझ से जुदा नहीं होता पर
क्यों तेरे खयाल में मैं नहीं सोचता रहा

हरकतें तो कर डालीं उनने तमाम मगर
टूटा नहीं मेरा ये दिल क्यों सोचता रहा

जनसंख्या बेकारी धार्मिकता के मध्य से
किधर जा रहा है मेरा मुल्क सोचता रहा

उठाते कोई कंकर तभी कोई हक था रवि
मजमे में आसीन मैं भी यही सोचता रहा

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व्यंग्यः एनीटाइम मनी


व्यंग्यः एनीटाइम मनी
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मनुष्य सुविधा भोगी होता जा रहा है. अपनी सुविधाओं के लिए वह निरंतर ईजाद पर ईजाद किए जा रहा है. मेरे बैंक से मुझे प्लास्टिक का एक कार्ड मिला है जिसमें यह सुविधा दी गई है कि एटीएम मशीन से मैं किसी भी समय किसी भी शहर से पैसा निकाल सकता हूँ. यही नहीं बड़े बड़े शहरों के मल्टीप्लैक्सेस और शॉपिंग माल में एटीएम कार्ड के जरिए में बगैर पैसे के भी तमाम खरीदारी कर सकता हूँ. ये बातें जानकर तो मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ. ये बात दीगर है कि मेरी प्रसन्नता उस समय हवा हो गई जब मुझे बताया गया कि पैसा आप अपने ही खाते से निकाल सकते हैं और उतना ही निकाल सकते हैं जितना आपके खाते में जमा है.

अब तो हालात यह हैं कि जगह-जगह चौराहे-चौराहे पर एटीएम मशीनें लग गई हैं. उनके दरवाज़े पर और काँच के पैनल के भीतर स्क्रीन पर जगमगाते रंगबिरंगे एलईडी आपको हर क्षण लुभाते रहते है कि आओ भाई आओ अपने खाते से पैसा निकालो. मैं पैसा उगलने के लिए तैयार बैठा हूँ. मेरा उपयोग करो. दिन हो या रात. सुबह-सुबह आप सैर के लिए, जरा सी, मुट्ठी भर ताज़ी हवा खाने के लिए निकले हैं. रास्ते में एटीएम मशीन की सदा चालू रहने वाली जगमगाती जलती बुझती लाइटें आपका स्वागत करती हैं- सुबह-सुबह पैसे ले लो भाई. ज़रूरत नहीं है तो ज़रूरत पैदा कर लो भाई. और खाते में अगर पैसा नहीं है तो उधार ले लो, ऋण ले लो भाई. उधार-ऋण लेने में शरम आती है तो कमाओ भाई. मशीन की तरह चौबीस घंटे काम करो, काम कर कमाओ, कमा कर एटीएम मशीन से पैसा निकालो और खर्च करो.

धर्मपत्नियों की आदतें होती हैं- वैसे पत्नियों की आदतें प्रायः एक सी ही होती हैं - भले ही वे धर्म की हो या अधर्म की - आपात काल के लिए, अटके-फटके के लिए कुछ रुपये - कुछ हज़ार रुपये और कुछ मामलों में कुछ लाख रुपये - घर के किन्हीं कोने काने में, ट्रंक के किसी दरार में और आलमारी के किसी छुपे खंड में बचा-छिपा-जमा-कर रखती हैं - कब जाने किसी रात दो बजे ज़रूरत पड़ जाए. मुए एटीएम ने उनका फंडा खराब कर के रख दिया है. अब अगर रात दो बजे भी आपको पैसा चाहिए तो आपके मुहल्ले का एटीएम आपकी सेवा में हाजिर है. किसी खराब समय के लिए पैसे छुपाकर अपने घर में रखने की कतई जरूरत नहीं. कहाँ चोर-डाकुओं की चिंता पाले बैठे रहते थे घर में पैसे छिपाकर. अब आपके पैसे की चिंता करें बैंक वाले. और, अब तो आप किसी भी दूसरे बैंक के एटीएम से भी पैसा निकाल सकते हैं. है न कमाल की बात. लेकिन मेरी मोटी बुद्धि में यह समझ नहीं आता कि जब मैं अपना पास बुक लेकर दूसरी बैंक में जाता हूँ तो वहाँ का बाबू पैसा देने से मना कर देता है. परंतु दूसरे बैंक का एटीएम धड़ाधड़ तड़ातड़ पैसे क्यों फेंक देता है- बस उसमें एटीएम कार्ड फँसाने की देरी होती है.

बैंकें तो धड़ाधड़ सबको एटीएम कार्ड जारी किये जा रही हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि बैंको को भी लगने लगा है कि उनके पास पैसा जमा रहेगा तो उनके यहाँ भी कोई चोरी डकैती हो जाएगी लिहाज़ा वे भी सबको एटीएम के जरिए सारा पैसा निकाल लेने के लिए सबको कार्ड जारी कर रहे हैं और हर गली मुहल्ले में एटीएम मशीनें बिठाए जा रहे हैं. मेरा एक मित्र जरा कंजरवेटिव किस्म का है. उसके पास भी एटीएम कार्ड है. उस मित्र ने कभी अपने एटीएम कार्ड का इस्तेमाल नहीं किया. पूछने पर बताता है कि ऐसा कोई आइन्दा इरादा भी नहीं है. कुरेदने पर बोलता है कि भई, एक तो, उसे समझ में नहीं आता कि बटन को दबाकर या स्क्रीन को छूकर किस तरह से मशीन अपने खाते का पैसा अपने आप देती होगी. दूसरा, जब उसका इनसानों पर ही भरोसा नहीं है तो उसके द्वारा ईजाद की गई मशीन पर कैसे हो. दरअसल उसने कहीं सुन रखा था कि किसी बन्दे ने जब एटीएम कार्ड से पैसा निकालने की कोशिश की तो उसी समय लाइट गुल हो गई. उसका पैसा मशीन के अंदर ही रह गया और उस बेचारे को अपना पैसा वापस पाने के लिए महीनों बैंक के चक्कर लगाने पड़े और दर्जनों अफसरों को अपना दुखड़ा सुनाना पड़ा तब कहीं जाकर उसका काम बना. ऊपर से जब लाइट चली गई थी, तो एटीएम का दरवाजे का इलेक्ट्रानिक ताला जाम हो गया और वह अंदर फंसा चिल्लाता रहा घंटों. पर कोई कुछ नहीं कर सका जब तक कि लाइट फिर से घंटों बाद नहीं आई. और, हमारे इधर तो जब चाहे तब लाइट चली जाती है - लाइट का कोई ठिकाना है क्या?

मेरा एक अन्य मित्र जो कि जरा ज्यादा ही आधुनिक किस्म का है, अपने एटीएम का धड़ाधड़ इस्तेमाल करता था. उसने अपने जवान होते पुत्र को अपना एटीएम कार्ड दे रखा था और उसका पुत्र ही घर खर्च के लिए पैसे निकालता था. वह बड़े गर्व से सबको बताता कि उसका बेटा इतना एडवांस्ड है कि एटीएम से पैसे निकाल लेता है. एक दिन उसका एडवांस्ड बेटा एटीएम कार्ड लेकर, साथ में अपनी दोस्त को लेकर फरार हो गया. उसे मालूम जो था कि बाप के खाते में बहुत माल है. परंतु उस एडवांस्ड बेटे को यह पता नहीं था कि एटीएम उससे भी एडवांस्ड है. जिस शहर में वह भाग कर पँहुचा था, उसने पहली ही दफा एटीएम से पैसा निकाला, ओर इधर पता चल गया कि वह किस शहर में किस स्थान से पैसे निकाल रहा है. आधे घंटे में पुलिस ने उसे पकड़ लिया और सीधे घर वापसी के लिए गाड़ी में बिठा दिया. लिहाजा, अगर आपके घर में जवान होते बच्चे हों, तो एटीएम आपके लिए - इस दूसरे तरीके से भी बड़ा फायदेमंद है.

एक वाकया और मेरी जानकारी में आया है. और जब से मुझे यह पता चला है, मैं बगैर एटीएम कार्ड अपनी जेब में रखे कहीं बाहर नहीं जाता. एक व्यक्ति का दिमाग अचानक खराब हो गया और वह अपना होशो हवास खो बैठा. वह अपना नाम पता भूल गया. तलाशी ली गई तो उसकी जेब में एटीएम कार्ड निकला. उसके यूनीक आइडेंटिफ़िकेशन नंबर के जरिए उसका अता पता तत्काल चल गया और उसे उसके घर वालों के सुपुर्द कर दिया गया. धन्य है एटीएम. एनी टाइम मनी से भी कहीं ज्यादा है इसकी उपयोगिता. अब तो मैं जिधर से निकलता हूँ, उधर एटीएम मशीन देखकर हाथ जोड़कर नमन करता हूँ जैसे लोग धर्मस्थलों को देख नमन करते हैं. और, यह तो आधुनिक युग का वास्तविक धर्म स्थल तो है ही – हर समय आपको पैसा रूपी आशीर्वाद देने को हाजिर!

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लिनक्स – भारतीय भाषाओं में काम ऐसे करें


ओपनसोर्स होने के कारण लिनक्स की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसके हर आयाम को अपने मनपसंद रूप में ढाला, संवारा जा सकता है। इसके मूल रूप को इस प्रकार से डिज़ाइन किया गया है कि लिनक्स को विश्व के किसी भी भाषा के वातावरण में आसानी से लाया जा सकता है – यही कारण है कि व्यवसायिक उत्पाद विंडोज की तुलना में दुगने से भी अधिक भाषाओं में लिनक्स के संस्करण जारी हो चुके हैं और यह यात्रा अनवरत जारी है।
लिनक्स के नए संस्करणों (फेदोरा कोर 4, रेडहेट इंटरप्राइज संस्करण 4 तथा मेनड्रेक लिनक्स संस्करण 10.x इत्यादि) में 9 भारतीय भाषाओं – बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, हिन्दी, मराठी, उड़िया और मलयालम में काम करने की अंतर्निर्मत सुविधा है तथा इनमें से पाँच भाषाओं में डेस्कटाप वातावरण (इंटरफेस) उपलब्ध हैं। भारत की 6 प्रतिशत से भी कम जनता अंग्रेजी बोलती समझती है। ऐसी स्थिति में उनकी अपनी भाषा में कम्प्यूटर पर कार्य करने का माहौल प्रदान करने से संचार-सूचना में क्रांति की उम्मीद तो जगती ही है।
हालाकि लिनक्स में 9 भारतीय भाषाओं का अंतर्निर्मित समर्थन है, परंतु इन भाषाओं में काम करने के लिए आपको कुछ स्थापना तथा सेटिंग इत्यादि के कुछ चरणों को पूरा करने होते हैं। आइए, देखते हैं कि रेडहेट के लोकप्रिय ओपनसोर्स संस्करण फेदोरा कोर 3/4 (लगभग यही चरण रेडहेट एंटरप्राइज़ेस 3/4 में भी होंगे, तथा अन्य वितरणों में भी मिलते जुलते चरण होंगे) में हिन्दी (या किसी अन्य समर्थित भारतीय भाषा) में काम करने के लिए हमें क्या करना होगा।
आरंभिक स्थापना और सेटअप:
फेदोरा की आरंभिक स्थापना के दौरान ही अधिकाधिक भाषाई वातावरण, जिनका उपयोग हमें करना है, उन्हें चुन लेने की सलाह दी जाती है। इससे उस भाषा की समस्त सिस्टम फ़ाइलें खुद-ब-खुद स्थापित हो जाती हैं। वैसे, यह काम बाद में भी सुविधानुसार किया जा सकता है। इसके लिए अपने मौजूदा फेदोरा स्थापना को स्थापना सीडी के जरिए अद्यतन करना होगा और वांछित भाषा के अतिरिक्त विकल्प स्थापना के लिए चुनने होंगे।
जब आप फेदोरा सेटअप के चयन विंडो “Language Support” में पहुँचते हैं तो आपको अतिरिक्त भाषाओं को स्थापित करने का विकल्प मिलता है। यहाँ पर आप समर्थित भाषाओं की सूची पाते हैं। जिन अतिरिक्त भाषाओं की स्थापना की जानी है, उन्हें यहाँ दिए चेक बक्से के जरिए चुनें। अब सेटअप सामान्य रूप से पूरा करें। कृपया टीप लें कि यह चरण ज़रूरी है। इसके बगैर भाषाई वातावरण की फ़ाइलें, कुंजीपट, फ़ॉन्ट इत्यादि उचित प्रकार से स्थापित नहीं हो सकेंगी और समस्याएँ उत्पन्न होंगी। अगर आप एडवांस्ड उपयोक्ता हैं, तब तो उपयुक्त डिरेक्ट्रीज़ में उपयुक्त भाषाई फ़ाइलों को स्थापित कर सकते हैं, परंतु फिर भी ऐसी सैकड़ों फ़ाइलें होती हैं जिन्हें एक एक कर स्थापित करना कठिन होता है। इसीलिए, इस स्वचालित सेटअप युक्त चरण के लिए अनुशंसा की जाती है।
उपलब्ध भाषाई वातावरण:
हालाकि लिनक्स फेदोरा 3/4 नौ भारतीय भाषाओं को समर्थित करता है तथा इसका भाषाई वातावरण छ: भारतीय भाषाओं में है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें के सारे अनुप्रयोग और सारा का सारा वातावरण इन भाषाओं में उपलब्ध होगा। दरअसल, अनुप्रयोगों के अनुवाद की सतत प्रक्रिया चलती रहती है और प्राय: कुछ प्रतिशत अनुवाद हो जाने पर यह मान लिया जाता है कि अनुप्रयोग उस भाषा में इस्तेमाल लायक हो गया है। तब उसे उस भाषा के लिए जारी कर दिया जाता है। अनुवादों का यह सारा कार्य विभिन्न अ-शासकीय, सामाजिक संस्थाओं-व्यक्तियों जैसे कि इंडलिनक्स, अंकुर-बांग्ला, उत्कर्ष, पंलिनक्स इत्यादि द्वारा किया जाता है। ये सारे अनुवाद कार्य मुक्त स्रोत के अंतर्गत जारी किए जाते हैं और इसी लिए, इन अनुवादों को आप लिनक्स के रेडहेट में भी पाते हैं, मेनड्रेक में भी और सूसे में भी। हालाकि, रेडहेट ने आगे जाकर अपने उन्नत तंत्र सेटअप संवादों तथा स्थापना संदेशों, मदद फ़ाइलों को भी इनमें से कुछ भाषाओं में अनुवादित करवा लिया है जिससे भारतीय भाषाओं के लिहाज से अन्य लिनक्स संस्करणों से बीस बैठता है।
लिनक्स के लिए तीन प्रमुख डेस्कटॉप वातावरण मौज़ूद हैं जो अपने समृद्ध अनुप्रयोगों के साथ आते हैं – वे हैं गनोम, केडीई तथा एक्सएफसीई। गनोम हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली तथा तमिल भाषा में उपलब्ध है। केडीई हिन्दी, तमिल पंजाबी तथा कुछ मात्रा में बंगाली में उपलब्ध है। एक्सएफसीई बंगाली, गुजराती, हिन्दी, तथा तमिल में उपलब्ध है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इन भाषाओं के सभी कार्य माहौल तथा सभी अनुप्रयोग इन्हीं भाषाओं में मिलेंगे। दरअसल यह निर्भर करता है कि उस भाषा में कितना प्रतिशत कार्य अनुवादित किया जा चुका है। उदाहरण के लिए आप पाएँगे कि गनोम में हिन्दी, गुजराती और पंजाबी में लगभग सारा कार्य माहौल इन्हीं भाषा में मिलेगा चूँकि इन भाषाओं में अनुवाद का लगभग सारा कार्य हो चुका है। जबकि मराठी में आपको आंशिक माहौल ही मिलेगा। गनोम तथा केडीई के अनुप्रयोगों के अलावा लिनक्स के अन्य ढेरों अनुप्रयोग हैं जिन्हें भारतीय भाषाओं में नहीं लाया जा सका है, अत: आप इस बात के लिए तैयार रहें कि भारतीय भाषाओं के वातावरण में भी आपको अंग्रेजी तो यदा कदा दिखाई देगी ही। वास्तव में तो जो अनुप्रयोग और उसके हिस्से अनुवाद से छूटे हुए हैं, वे आपको अंग्रेजी में ही दिखाई देंगे।
अपनी डिफ़ॉल्ट भाषा सेट करें:
अगर आपने आरंभिक सेटअप के दौरान लिनक्स के डिफ़ॉल्ट भाषा के रूप में किसी भारतीय भाषा को नहीं चुना है, तो यह डिफ़ॉल्ट, अंग्रेजी भाषा में बूट होगा। अगर डिफ़ॉल्ट भाषा हिन्दी चुना गया है तो यह हिन्दी के वातावरण में बूट होगा। लिनक्स के भाषाई वातावरण को चित्रमय लॉगिन के दौरान भी चुन सकते हैं। तंत्र के डिफ़ॉल्ट भाषा को परिवर्तित करने के लिए क्लिक करें - Start Menu Button-->System Settings-->Language। यदि आप रूट उपयोक्ता नहीं हैं, तो यह आपको रूट पासवर्ड के लिए पूछेगा। वह पासवर्ड दें। अब आपके लिए एक नया चयन विंडो खुलेगा।
अब इनमें से वांछित भाषा चुनें : बंगाली, गुजराती, हिन्दी, मराठी, पंजाबी, तमिल या तेलुगु। अब यह दर्शाएगा - “Changes will take effect the next time you log in”। यहाँ परिवर्तनों को स्वीकारने हेतु क्लिक करें OK पर। अब लॉगआउट हों तथा फिर से लॉगइन हों और देखें कि आपके द्वारा चुनी गई भाषा कार्य कर रही है। यदि आप ग्राफिकल लॉगइन होते हैं उस वक्त भी आपके पास तंत्र की डिफ़ॉल्ट भाषा तथा डिफ़ॉल्ट डेस्कटॉप को चुनने / बदलने के विकल्प होते हैं। जैसे कि अगर आप केडीई वातावरण चुन रहे हैं तो ध्यान दें कि गुजराती के लिए केडीई उपलब्ध नहीं है और आपको गुजराती के बदले अंग्रेजी ही दिखाई देगा। तो अगर आपको गुजराती का वातावरण चाहिए तो आपको डेस्कटॉप गनोम चुनना होगा। ग्राफिकल लॉगइन प्रक्रिया में इन भाषाओं तथा डेस्कटॉप वातावरण को चुनने के विकल्प मौजूद रहते हैं। हिन्दी के लिए आप गनोम / केडीई या एक्सएफसीई कोई भी चुन सकते हैं। परंतु ध्यान रहे कि हजारों लिनक्स अनुप्रयोगों को हार्डडिस्क में स्थापित करते समय आपने इन्हें भी स्थापित कर लिया है।
भाषा विशेष कुंजीपट जोड़ना:
माना कि आपने अपने लिनक्स मशीन के डिफ़ॉल्ट, अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा को आपने ऊपर दिए निर्देशों के अनुसार स्थापित कर लिया है और आप का डेस्कटॉप हिन्दी वातावरण दर्शा रहा है। परंतु हिन्दी का कुंजीपट किधर है ? हिन्दी कुंजीपट लाने के लिए आपको कुछ चरण और अपनाने होंगे जो कि गनोम में अलग होगा, केडीई में अलग और एक्सएफसीई में अलग। जब आप भाषाई वातावरण हिन्दी का बना लेते हैं तो आपका कुंजी पट इनस्क्रिप्ट हिन्दी में टाइप करने में सक्षम हो जाता है। परंतु टर्मिनल में कमांड अंग्रेजी में ही दिए जा सकते हैं तो वापस कुंजीपट को अंग्रेजी में लाने तथा इनके बीच टॉगल करने के लिए छोटा सा कुंजीपट परिवर्तक औज़ार (कीबोर्ड स्विचर) होता है उसे तंत्र तश्तरी में चालू कर रखना होता है जिससे कार्य में आसानी रहे।
गनोम में कुंजीपट जोड़ना:-
गनोम वातावरण में आपको तल पर तथा शीर्ष दोनों ही जगह पर फलक मिलेंगे जहाँ से अनुप्रयोगों को रख कर चलाया जा सकता है। आप इनमें से किसी एक में या दोनों पर ही कुंजीपट परिवर्तक जोड़ सकते हैं जिसे बाद में क्लिक कर वांछित भाषा का चुनाव किया जा सकता है। इसके लिए किसी भी फलक पर रिक्त स्थान पर दायाँ क्लिक करें तथा चुनें “Add to Panel”, फिर चयन विंडो पर चुनें “Keyboard Indicator” और अंत में “Add” बटन पर क्लिक करें। आप देखेंगे कि एक बटन जिस पर “USA” लिखा है (या अन्य डिफ़ॉल्ट भाषा का नाम यदि वह सेट है, जैसे कि हिन्दी के लिए “dev” ) प्रकट हो गया है। इसमें अतिरिक्त भाषा जोड़ने के लिए इसके ऊपर दायाँ क्लिक करें और चुनें “Keyboard Preferences”। उसके बाद “Layouts” टैब को चुनें और फिर वहाँ उपलब्ध कई भाषाओं में से उपयुक्त भाषा को चुनें। उदाहरण के लिए, हिन्दी चुनें तथा विंडो को बन्द कर दें। यहीं पर आपको अन्य 9 भारतीय भाषाएँ भी मिलेंगी जिनका वर्णन ऊपर दिया गया है।
अब भिन्न कुंजीपट में जाने के लिए- जैसे कि हिन्दी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिन्दी, इस कुंजीपट परिवर्तक के प्रतीक के ऊपर क्लिक करें। यह टॉगल स्विच की तरह काम करता है। आप चाहें तो कई भाषा जोड़ सकते हैं और उनके आपसी समूह भी बना सकते हैं। इस काम के लिए कुंजीपट शॉर्टकट भी बना सकते हैं जो कि प्राय आल्ट+कंट्रोल तथा किसी अन्य कुंजी पट का संयोजन होता है। कुंजीपट शॉर्टकट बनाने के लिए फलक के कुंजीपट परिवर्तक प्रतीक पर दायाँ क्लिक करें तथा चुनें “Keyboard Preferences” फिर क्लिक करें “Layout Option” टैब पर। अब “Group Shift Lock Behavior” को विस्तारित करें जो कि “Available Options” में है, तथा वहाँ से चुनें वह कुंजीपट संयोजन जो आपको लगता है कि आपके लिए उपयुक्त है। उदाहरण के लिए, भाषाई समूह के बीच टॉगल करने के लिए: बायाँ आल्ट+शिफ़्ट चुनें। अब “Add” बटन पर क्लिक करें। यहाँ से आप पहले से निर्धारित शॉर्टकट को बदल सकते हैं तथा एक ही काम के लिए कई तरह के शॉर्टकट भी दे सकते हैं।

टीप: कुंजीपट वरीयताओं के अंदर आप चाहें तो उपलब्ध कुंजी पट की स्थिति को ऊपर/नीचे बटन की सहायता से ऊपर नीचे कर सकते हैं। उदाहरण के लिए हाल ही में शामिल किए गए हिन्दी को आप सबसे ऊपर रख सकते हैं। इससे होगा यह कि जब भी कोई अनुप्रयोग चालू होगा तो उसका डिफ़ॉल्ट कुंजीपट हिन्दी होगा। हालाकि बहुत से मायनों में इससे आपको असुविधा भी हो सकती है जैसे कि इंटरनेट इस्तेमाल करते समय जब भी कोई नया विंडो खुलेगा, कुंजीपट हिन्दी सेट होगा और उसमें अंग्रेजी में भरने के लिए आपको उसे वापस अंग्रेजी में सेट करना होगा। ऐसे में सलाह दी जाती है कि अंग्रेजी भाषा को ही शीर्ष पर रहने दें। वैसे भी टर्मिनल में कमांड अंग्रेजी में ही स्वीकारे जाते हैं चूँकि इनमें यूनिकोड हिन्दी समर्थन आने में तनिक देरी है (फ़ॉन्ट रेंडरिंग की समस्या है)।
केडीई में कुंजीपट जोड़ना:-

केडीई में अतिरिक्त कुंजीपट खाका जोड़ने के लिए स्टार्ट मेन्यू बटन पर क्लिक करें तथा “Control Center” पर क्लिक करें। कंट्रोल सेंटर के “Index” टैब में आपको बहुत सी प्राथमिकताएँ एवं सेटिंग्स मिलेंगी जिन्हें आप तय कर सकते हैं। यहाँ आप “Regional & Accessibility” के + चिह्न को क्लिक कर इसकी प्रविष्टि को फैलाएँ तथा “Keyboard Layout” पर क्लिक करें जो दाएँ फलक में दिखेगा। यहाँ “Enable Keyboard Layouts” को चुनें। आपको सभी उपलब्ध कुंजीपट खाका दिखाई देंगे। जिन अतिरिक्त भाषा कुंजीपट को चालू करना है, उन्हें चुनें, जैसे कि हिन्दी, गुजराती इत्यादि। फिर “Add >>” बटन पर क्लिक करें। अब कुंजीपट खाका को स्विच करने के लिए शॉर्टकट कुंजियों के लिए “Xkb Options” टैब पर क्लिक करें। अब चेक बक्सा “Enable Xkb Option” को चेक करें तथा “Group Shift / Lock behavior” विकल्प में से उपयुक्त का चयन करें, जैसे कि बायाँ आल्ट+शिफ़्ट कुंजी। अब Apply बटन पर क्लिक करें ताकि आपके द्वारा चुने गए विन्यास लागू हो सकें।
अब आपका लिनक्स तंत्र भारतीय भाषाओं में बेरोकटोक कार्य करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। :) हैप्पी कम्प्यूटिंग !

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अनुगूंज - सुभाषित, सुविचार ...


सुभाषितों की गूंज – 2
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1. अध्ययन हमें आनन्द तो प्रदान करता ही है, अलंकृत भी करता है और योग्य भी बनाता है.
2. बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं तो भलाई के साल में एकाध बार.
3. अरूणोदय के पूर्व सदैव घनघोर अंधकार होता है.
4. एक शेर को भी मक्खियों से अपनी रक्षा करनी पड़ती है.
5. ईश्वर ने तुम्हें सिर्फ एक चेहरा दिया है और तुम उस पर कई चेहरे चढ़ा लेते हो.
6. यदि आप इस बात की चिंता न करें कि आपके काम का श्रेय किसे मिलने वाला है तो आप आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं – हैरी एस. ट्रूमेन
7. अपनी आंखों को सितारों पर टिकाने से पहले अपने पैर जमीन में गड़ा लो – थियोडॉर रूज़वेल्ट
8. श्रेष्ठ आचरण का जनक परिपूर्ण उदासीनता ही हो सकती है – काउन्ट रदरफ़र्ड
9. क्लोज़-अप में जीवन एक त्रासदी (ट्रेजेडी) है, तो लंबे शॉट में प्रहसन (कॉमेडी) – चार्ली चेपलिन
10. आपके जीवन की खुशी आपके विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है – मार्क ऑरेलियस अन्तोनियस
11. मैं अपने ट्रेनिंग सत्र के प्रत्येक मिनट से घृणा करता था, परंतु मैं कहता था – “भागो मत, अभी तो भुगत लो, और फिर पूरी जिंदगी चैम्पियन की तरह जिओ” – मुहम्मद अली
12. हमेशा बत्तख की तरह व्यवहार रखो. सतह पर एकदम शांत. परंतु सतह के नीचे दीवानों की तरह पैडल मारते हुए – जेकब एम ब्रॉदे
13. सही किताब वह नहीं है जिसे हम पढ़ते हैं – सही किताब वह है जो हमें पढ़ता है. - डबल्यू एच ऑदेन
14. आमतौर पर आदमी उन चीजों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहता है जिनका उससे कोई लेना देना नहीं होता – जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
15. जैसे जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, सुंदरता भीतर घुसती जाती है – रॉल्फ वाल्डो इमर्सन
16. अव्यवस्था से जीवन का प्रादुर्भाव होता है तो अनुक्रम और व्यवस्थाओं से आदत – हेनरी एडम्स
17. टेलिविज़न पर जिधर देखो कॉमेडी की धूम मची है. क्या वह गली मुहल्लों में भी कॉमेडी भर देगी? – डिक कैवेट
18. कभी आंसू भी सम्पूर्ण वक्तव्य होते हैं – ओविड
19. किसी दूसरे को अपना स्वप्न बताने के लिए लोहे का ज़िगर चाहिए होता है – एरमा बॉम्बेक
20. ईश्वर से प्रार्थना करो, पर अपनी पतवार चलाते रहो.
21. हथौड़ा कांच को तो तोड़ देता है, परंतु लोहे को रूप देता है.
22. ईश्वर एक ही समय में सर्वत्र उपस्थित नहीं हो सकता था, अतः उसने ‘मां’ बनाया.
23. काली मुरग़ी भी सफ़ेद अंडा देती है.
24. यदि आपको रास्ते का पता नहीं है, तो जरा धीरे चलें.
25. वहाँ मत देखो जहाँ आप गिरे. वहाँ देखो जहाँ से आप फिसले.
26. हाथी कभी भी अपने दाँत को ढोते हुए नहीं थकता.
27. तालाब शांत है इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें मगरमच्छ नहीं हैं – माले
28. सूर्य की तरफ मुँह करो और तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे होगी – माओरी
29. जो व्यक्ति सोने का बहाना कर रहा है उसे आप उठा नहीं सकते – नवाजो
30. खेल के अंत में राजा और पिद्दा एक ही बक्से में रखे जाते हैं – इतालवी सूक्ति
31. सही या गलत कुछ भी नहीं है – यह तो सिर्फ सोच का खेल है.
32. पुस्तक एक बग़ीचा है जिसे जेब में रखा जा सकता है.
33. तलवारों तथा बंदूकों की आँखें नहीं होती हैं.
34. हँसते हुए जो समय आप व्यतीत करते हैं, वह ईश्वर के साथ व्यतीत किया समय है.
35. ग़लतियाँ मत ढूंढो. उपाय ढूंढो – हेनरी फ़ोर्ड
36. त्रुटियों के बीच में से ही सम्पूर्ण सत्य को ढूंढा जा सकता है. – सिगमंड फ्रायड
37. मेरे घर में मेरा ही हुक्म चलता है. बस, निर्णय मेरी पत्नी लेती है. – वूडी एलन
38. मुट्ठियां बाँध कर आप किसी से हाथ नहीं मिला सकते – इंदिरा गांधी
39. जब तक आप ढूंढते रहेंगे, समाधान मिलते रहेंगे. – जॉन बेज
40. इंटरनेट के उपयोक्ता वांछित डाटा को शीघ्रता से और तेज़ी से प्राप्त करना चाहते हैं. उन्हें आकर्षक डिज़ाइनों तथा सुंदर साइटों से बहुधा कोई मतलब नहीं होता है. – टिम बर्नर्स ली (इंटरनेट के सृजक)
41. कम्प्यूटर कभी भी कमेटियों का विकल्प नहीं बन सकते. चूंकि कमेटियाँ ही कम्प्यूटर खरीदने का प्रस्ताव स्वीकृत करती हैं. – एडवर्ड शेफर्ड मीडस
42. सम्पूर्णता (परफ़ेक्शन) के नाम पर घबराइए नहीं. आप उसे कभी भी नहीं पा सकते – सल्वाडोर डाली
43. राजनीति में किसी भी बात का तब तक विश्वास मत कीजिए जब तक कि उसका खंडन आधिकारिक रूप से न कर दिया गया हो. – ओटो वान बिस्मार्क
44. आदमी सिर्फ दो लीवर के द्वारा चलता रहता है : डर तथा स्वार्थ – नेपोलियन
45. किताबों को नहीं पढ़ना किताबों को जलाने से बढ़कर अपराध है – रे ब्रेडबरी
46. कठिन परिश्रम से भविष्य सुधरता है. आलस्य से वर्तमान – स्टीवन राइट
47. प्यार में सब कुछ भुलाया जा सकता है, सिर्फ दो चीज़ को छोड़कर – ग़रीबी और दाँत का दर्द – मे वेस्ट
48. यदि आपको गर्मी नहीं सुहाती, तो रसोई में नहीं जाएँ – हैरी एस ट्रुमेन
49. चूंकि एक राजनीतिज्ञ कभी भी अपने कहे पर विश्वास नहीं करता, उसे आश्चर्य होता है जब दूसरे उस पर विश्वास करते हैं – चार्ल्स द गाल
50. जालिम का नामोनिशां मिट जाता है, पर जुल्म रह जाता है.
51. डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है – एमर्सन
52. कांटों को मुरझाने का डर नहीं सताता.
53. कभी कोयल की कूक भी नहीं भाती और कभी (वर्षा ऋतु में) मेंढक की टर्र टर्र भी भली प्रतीत होती है – गोस्वामी तुलसीदास
54. जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने वश में कर लेता है, वह दूसरों के क्रोध से (फलस्वरूप) स्वयमेव बच जाता है – सुकरात
55. जब क्रोध में हों तो दस बार सोच कर बोलिए, ज्यादा क्रोध में हों तो हजार बार सोचकर. – जेफरसन
56. रुपए ने कहा, मेरी फिक्र न कर – पैसे की चिन्ता कर. – चेस्टर फ़ील्ड
57. जब मैं किसी नारी के सामने खड़ा होता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर के सामने खड़ा हूँ.- एलेक्जेंडर स्मिथ
58. पुरुष से नारी अधिक बुद्धिमती होती है, क्योंकि वह जानती कम है पर समझती अधिक है.
59. दृढ़ निश्चय ही विजय है
60. यदि राजा किसी अवगुण को पसंद करने लगे तो वह गुण हो जाता है – शेख़ सादी
61. बहुत अधिक आराम स्वयं दर्द बन जाता है – होमर
62. जब तुम्हारे खुद के दरवाजे की सीढ़ियाँ गंदी हैं तो पड़ोसी की छत पर पड़ी गंदगी का उलाहना मत दीजिए – कनफ़्यूशियस
63. जब कभी भी किसी सफल व्यापार को देखेंगे तो आप पाएँगे कि किसी ने कभी साहसी निर्णय लिया था.
64. इस संसार में दो तरह के लोग हैं – अच्छे और बुरे. अच्छे लोग अच्छी नींद लेते हैं और जो बुरे हैं वे जागते रह कर मज़े करते रहते हैं – वूडी एलन
65. मेरी चापलूसी करो, और मैं आप पर भरोसा नहीं करुंगा. मेरी आलोचना करो, और मैं आपको पसंद नहीं करुंगा. मेरी उपेक्षा करो, और मैं आपको माफ़ नहीं करुंगा. मुझे प्रोत्साहित करो, और मैं कभी आपको नहीं भूलूंगा – विलियम ऑर्थर वार्ड
66. अच्छा ही होगा यदि आप हमेशा सत्य बोलें, सिवाय इसके कि तब जब आप उच्च कोटि के झूठे हों – जेरोम के जेरोम
67. प्रत्येक मनुष्य में तीन चरित्र होता है. एक जो वह दिखाता है, दूसरा जो उसके पास होता है, तीसरी जो वह सोचता है कि उसके पास है – अलफ़ॉसो कार
68. हमारे साथ प्रायः समस्या यही होती है कि हम झूठी प्रशंसा के द्वारा बरबाद हो जाना तो पसंद करते हैं, परंतु वास्तविक आलोचना के द्वारा संभल जाना नहीं – नॉर्मन विंसेंट पील
69. किसी व्यक्ति को एक मछली दे दो तो उसका पेट दिन भर के लिए भर जाएगा. उसे इंटरनेट चलाना सिखा दो तो वह हफ़्तों आपको परेशान नहीं करेगा. – एनन
70. मैं छः ईमानदार सेवक अपने पास रखता हूँ. इन्होंने मुझे वह हर चीज़ सिखाया है जो मैं जानता हूँ. इनके नाम हैं – क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन. – रुडयार्ड किपलिंग
71. ईश्वर को धन्यवाद कि आदमी उड़ नहीं सकता. अन्यथा वह आकाश में भी कचरा फैला देता. – हेनरी डेविड थोरे
72. मैं सिर्फ उतने ही दिमाग का इस्तेमाल नहीं करता जितना मेरे पास है, बल्कि वह सब भी जो मैं उधार ले सकता हूँ. – वुडरो विलसन
73. यदि आप जानना चाहते हैं कि ईश्वर रुपए-पैसे के बारे में क्या सोचता होगा, तो बस आप ऐसे लोगों को देखें, जिन्हें ईश्वर ने खूब दिया है. – डोरोथी पार्कर
74. कभी भी सफाई नहीं दें. आपके दोस्तों को इसकी आवश्यकता नहीं है और आपके दुश्मनों को विश्वास ही नहीं होगा – अलबर्ट हब्बार्ड
75. जब आपके पास कोई पैसा नहीं होता है तो आपके लिए समस्या होती है भोजन का जुगाड़. जब आपके पास पैसा आ जाता है तो समस्या सेक्स की हो जाती है. जब आपके पास दोनों चीज़ें हो जाती हैं तो स्वास्थ्य समस्या हो जाती है. और जब सारी चीज़ें आपके पास होती हैं, तो आपको मृत्यु भय सताने लगता है. – जे पी डोनलेवी
76. यदि आप को 100 रूपए बैंक का ऋण चुकाना है तो यह आपका सिरदर्द है. और यदि आप को 10 करोड़ रुपए चुकाना है तो यह बैंक का सिरदर्द है. – पाल गेटी
77. विकल्पों की अनुपस्थिति मस्तिष्क को बड़ा राहत देती है – हेनरी किसिंजर
78. दुनिया में सिर्फ दो सम्पूर्ण व्यक्ति हैं – एक मर चुका है, दूसरा अभी पैदा नहीं हुआ है.
79. अगर आपके पास जेब में सिर्फ दो पैसे हों तो एक पैसे से रोटी खरीदें तथा दूसरे से गुलाब की एक कली.
80. भीख मांग कर पीने से प्यास नहीं बुझती.
81. मुझे मनुष्यों पर पूरा भरोसा है – जहां तक उनकी बुद्धिमत्ता का प्रश्न है – कोका कोला बहुत बिकता है बनिस्वत् शैम्पेन के.- एडले स्टीवेंसन
82. यदि वोटों से परिवर्तन होता, तो वे उसे कब का अवैध करार दे चुके होते.
83. यदि आप थोड़ी देर के लिए खुश होना चाहते हैं तो दारू पी लें. लंबे समय के लिए खुश होना चाहते हैं तो प्यार में पड़ जाएँ. और अगर हमेशा के लिए खुश रहना चाहते हैं तो बागवानी में लग जाएँ. – आर्थर स्मिथ
84. प्रसिद्धि व धन उस समुद्री जल के समान है, जितना ज्यादा हम पीते हैं, उतने ही प्यासे होते जाते हैं.
85. शिकायत करने की अपनी गहरी आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए ही मनुष्य ने भाषा ईजाद की है. – लिली टॉमलिन
86. कविता में कोई पैसा नहीं है. परंतु पैसा में भी तो कविता नहीं है. – रॉबर्ट ग्रेव्स
87. समयनिष्ठ होने पर समस्या यह हो जाती है कि इसका आनंद अकसर आपको अकेले लेना पड़ता है. – एनॉन
88. गरीबों के बहुत से बच्चे होते हैं, अमीरों के सम्बन्धी. – एनॉन
89. सफलता का कोई गुप्त रहस्य नहीं होता. क्या आप किसी सफल आदमी को जानते हैं जिसने अपनी सफलता का बखान नहीं किया हो. – किन हबार्ड
90. मैं सफलता के लिए इंतजार नहीं कर सकता था, अतएव उसके बगैर ही मैं आगे बढ़ चला. – जोनाथन विंटर्स
91. कोई शाम वर्ल्ड वाइड वेब पर बिताना ऐसा ही है जैसा कि आप दो घंटे से कुरकुरे खा रहे हों और आपकी उँगली मसाले से पीली पड़ गई हो, आपकी भूख खत्म हो गई हो, परंतु आपको पोषण तो मिला ही नहीं. - क्लिफ़ोर्ड स्टॉल
92. अत्यंत बुद्धिमती औरत ही अच्छा पति (बना) पाती है. – बालज़ाक
93. बुद्धिमान पिता वह है जो अपने बच्चों को जाने.
94. हम जानते हैं कि हम क्या हैं, पर ये नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं. - शेक्सपीयर
95. बिल्ली का व्यवहार तब तक ही सम्मानित रह पाता है जब तक कि कुत्ते का प्रवेश नहीं हो जाता.
96. हर व्यक्ति में प्रतिभा होती है. दरअसल उस प्रतिभा को निखारने के लिए गहरे अंधेरे रास्ते में जाने का साहस कम लोगों में ही होता है.
97. ऐसा क्यों होता है कि कोई औरत शादी करके दस सालों तक अपने पति को सुधारने का प्रयास करती है और अंत में शिकायत करती है कि यह वह आदमी नहीं है जिससे उसने शादी की थी. – बारबरा स्ट्रीसेंड
98. जो भी प्रतिभा आपके पास है उसका इस्तेमाल करें. जंगल में नीरवता होती यदि सबसे अच्छा गीत सुनाने वाली चिड़िया को ही चहचहाने की अनुमति होती. – हेनरी वान डायक
99. बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होता है कि ध्यानपूर्वक यह सुना जाए कि कहा क्या जा रहा है.
100. सफल क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ होता है, असफल अपराधी. – एरिक फ्रॉम

*-*-*

इस परियोजना को प्रारंभ होने में लगे 145 साल...


तो इसे पूरे होने में कितने साल लगेंगे…?


कन्याकुमारी – श्रीलंका के मध्य स्वेज-पनामा जैसी नहर परियोजना – ‘सेतुसमुद्रम’ का शुभारंभ केंद्र सरकार ने पिछले माह किया. इस परियोजना के पूर्ण होने पर जहाजों को बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच जाने-आने के लिए 785 किलोमीटर के अनावश्यक सफर की बचत होगी. प्रत्येक सफर में हर जहाज के बहुमूल्य 30 घंटे समय तो बचेंगे ही, प्रत्येक जहाज के ईंघन खर्च में बचत की वजह से भारत को प्रतिवर्ष 215 करोड़ रुपयों की बचत होगी.

सचमुच बढ़िया परियोजना है. शानदार. सरकार बधाई की पात्र है. पर, रुकिए, परदे के पीछे की कहानी भारतीयता की मिसाल है. इस परियोजना की फैक्ट फ़ाइल में से कुछ फैक्ट:


• इस परियोजना की परिकल्पना पहले पहल 1860 में हुई.
• इसे स्वीकृति 1863 में मिली, परियोजना आगे नहीं बढ़ी.
• 1902 में फिर एक बार स्वीकृति मिली. लागत 60 लाख रुपए, वार्षिक आय 7.59 लाख रुपए अनुमानित. दस वर्षों में लागत वसूल होने का अनुमान. धनाभाव के कारण परियोजना अटकी.
• आजादी के बाद अनेक समितियों की सिफारिशों के बावजूद परियोजना को स्वीकृति नहीं मिली.
• अंततः 145 साल बाद, जुलाई 05 में इस परियोजना का शिलान्यास हुआ. – लागत अनुमानित – 2400 करोड़ रुपए. प्रतिवर्ष 215 करोड़ रुपयों की बचत के फलस्वरूप 12 वर्ष में लागत वसूल होने का अनुमान.
• देखना है कि यह परियोजना पूर्ण कब होती है – द्रमुक के केंद्र का सहयोगी होने के कारण अन्नाद्रमुक को, जाहिर है, इस परियोजना में पर्यावरणीय ख़तरा दिखाई दे रहा है और वह इसे सिरे से खारिज कर रहा है. उसने परियोजना का बहिष्कार तो किया ही, विरोध भी कर रहा है.

कुछ ऐसी ही अन्य महात्वाकांक्षी योजनाएँ हैं जो भारत की तकदीर पलट सकती हैं, जैसे – गंगा-कावेरी योजना – जो दशकों से सोई पड़ी हैं, न जाने कब जागेंगीं, न जाने कब उनकी तकदीर चमकेंगीं. और जब जागेंगीं, तो कौन विरोध करेगा, तो कौन समर्थन.

*-*-*

    व्यंज़ल
    **/**
    जाने किस जहाँ में खोया रहा
    सब चलते रहे मैं सोया रहा


    जिसने प्राण हरे दोस्तों के
    वो ज़हर मैं ही तो बोया रहा

    जाना है एक दिन ये सोच
    अपना ताबूत खुद ढोया रहा

    दो हाथ थे मेरे भी फिर क्यों
    बैठ के तकदीर पे रोया रहा

    जिहाद तो कर आया रवि
    ता उम्र वो लहू मैं धोया रहा


    *-*-*



**************.

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