मंगलवार, 23 नवंबर 2004

भारत में भगदड़...

या भगदड़ में भारत?



नई दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर पिछले दिनों जन साधारण एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ने उतरने के

दौरान मची भगदड़ में आधा दर्जन व्यक्तियों की मौत हो गई तथा कई गंभीर रूप से घायल हो

गए. जाहिर है, ऐसे भगदड़ में मरने तथा घायल होने वालों में अधिकतर महिलाएँ एवं बच्चे

ही थे.
भारत में भगदड़ कोई नई बात नहीं है. हर जगह भगदड़ मची रहती है. चाहे वह रेल्वे स्टेशन

हो, हवाई अड्डा हो या फिर मरीन ड्राइव. जहाँ भीड़ है, और सुविधाओं का अभाव हो वहाँ

भगदड़ तो मचेगी ही.
फिर नई दिल्ली, जो भारत देश की राजधानी है, वहाँ के रेल्वे स्टेशन पर भगदड़ मचना इस

बात की गवाही देता है कि यहाँ की जनता किस हाल में गुज़र बसर करने को अभिशप्त है. नई

दिल्ली रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर आपको कहीं भी सूचना पट्ट देखने को नहीं मिलेंगी जो

बताएँगी कि कौन सी ट्रेन किस समय पर और कब उस पर आएगी और जाएगी. सुविधाओं का

घोर अभाव है. भीड़ नियंत्रित करने का कोई प्लान ही नहीं है. ऐसे में भगदड़ तो मचना ही

है.
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ग़ज़ल
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क्या मिलना है भगदड़ में
जीना मरना है भगदड़ में

मित्रों ने हैं कुचले हमको
अच्छा बहाना है भगदड़ में

लूटो या खुद लुट जाओ
यही होना है भगदड़ में

जीवन का नया वर्णन है
फँसते जाना है भगदड़ में

तंग हो के रवि भी सोचे
शामिल होना है भगदड़ में
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