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दर्द दिल का - रवि रतलामी की आत्मकथा

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दर्द दिल का आत्मकथात्मक उपन्यास रवि रतलामी जीवन से अद्भुत प्रेम की असल कहानी समर्पण · स्टीफ़न हाकिंस को, जिन्होंने अपनी आसन्न ...



दर्द दिल का

आत्मकथात्मक उपन्यास

रवि रतलामी

जीवन से अद्भुत प्रेम की असल कहानी



समर्पण
· स्टीफ़न हाकिंस को, जिन्होंने अपनी आसन्न मृत्यु को सदैव खारिज किया, और मुझे भी यह प्रेरणा दी!
· पद्मश्री डॉ. के. एम चेरियन, डॉ. प्रमोद जायसवाल व डॉ. के. के. हरिदास तथा आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान को जिन्होंने मुझे नई जिंदगी दी.
· रेखा को जिसने मुझे यमराज के द्वार से वापस आने में महती भूमिका निभाई.

अनुक्रमणिका


1. मेरे पुनर्जन्म की कहानी
2. दिल तो बच्चा है जी
3. दिल के 16 वें साल में
4. मच्छर दिल
5. इंडिया इन अ वीक
6. अजूबा दिल
7. दिल के छुपे राज
8. बेदिल दिल्ली में
9. लौट के बुद्धू
10. चमत्कारिक पत्र
11. चलो मद्रास
12. दिल तो बड़ा गड़बड़ है जी
13. दैवीय चिकित्सा
14. मौत के मुंह में
15. इट्ज ए लांग लांग टाइम
 


मेरा पुनर्जन्म


आखिरकार, कोई साल भर के बेहद लंबे इंतजार के बाद, 8 जून 1995 को सुबह 10.30 बजे जब मुझे मद्रास मेडिकल मिशन के बेड नंबर 16 से ऑपरेशन थिएटर के लिए ले जाया गया तो सेंट्रल एयरकंडीशन्ड वातावरण होने के बावजूद जून की लू की तपिश का अहसास मन में हो रहा था. मेरी जटिल हृदय शल्य चिकित्सा होनी थी. ऐसी जटिल शल्यक्रिया जिसके बारे में जानकर अपोलो अस्पताल चेन्नई तथा एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे, और मुझे दवाइयों, भगवान और भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया था, और अपोलो अस्पताल मद्रास के हृदय रोग विशेषज्ञ ने तो अपने प्रिस्क्रिप्शन में स्पष्ट लिख दिया था –
“चूंकि इस शल्य चिकित्सा में शल्य क्रिया के दौरान या बाद में मरीज की मृत्यु की संभावना अधिक है, अतः शल्य क्रिया के बजाए उन्हें दवाइयों के जरिए इलाज पर जारी रखे जाने की सलाह दी जाती है.”
इस सलाह के विरुद्ध मैंने चलने का फैसला किया था और सर्जरी के लिए हामी भरी थी. पांचवे माले के गलियारे से वार्डब्वॉय ने जब मेरा स्ट्रेचर धकेला तो वहाँ से नीचे सड़क का पूरा नजारा दिखाई दे रहा था. दूर जाती भीड़ भरी सड़क पर गाजे बाजे के साथ किसी बारात का जुलूस भी निकल रहा था, जिसकी बहुत धीमी आवाज ऊपर तक भी पहुँच रही थी. मेरा मन प्रसन्नता से भर उठा था. शायद यह एक ईश्वरीय संकेत-सा ही था कि बाजे गाजे के साथ सर्जरी के लिए जा रहे हैं तो सब अच्छा ही होगा - गंभीर और जटिल हृदय शल्य चिकित्सा संबंधी जो शंकाएं या भय मन में थी काफूर हो गईं थीं और मैं निश्चिंत-सा हो गया था और मन प्रफुल्लित हो गया था.
सर्जरी के बारे में कहा जाता है कि अगर 1 प्रतिशत भी रिस्क है तो उस 1 प्रतिशत रिस्क में सबकुछ शामिल रहता है. और मेरे केस में मामला तो बहुत ही अधिक था. अपोलो चेन्नई और ऐम्स दिल्ली ने मेरा केस यूँ ही खाली हाथ नहीं लौटाया था.

मगर, मुझे हुआ क्या था? 35 साल की उम्र में गंभीर, जटिल हृदय शल्य चिकित्सा की ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी थी?

ईश्वर - या प्रकृति - से भूल?

स्टीफ़न हाकिंस ने अपनी अंतिम किताब में कहा है कि ईश्वर नहीं है. शायद ईश्वर नहीं ही है, और शायद इसीलिये हमारी दुनिया बड़ी बेतरतीब है. मगर, ईश्वर, अगर कहीं सचमुच है, तो वो बहुत ही अनाड़ी है. उसने अपने बंदों को बनाने में घोर अनाड़ी पन दिखाया है. कम से कम मेरे मामले में तो. जब ईश्वर ने मुझे बनाया तो उसने बाकी सबकुछ तो सही बनाया, बस मेरे दिल को बनाने में उससे भूल हो गई. मेरे दिल को बनाते समय उसे झपकी लग गई शायद और उसने कुछ का कुछ कर दिया. कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा लगा दिया. मेरे दिल को सामान्य तौर पर छाती में बाईं ओर लगाने की जगह दाईँ ओर लगा दिया और इस गड़बड़ी में नसें भी इधर की उधर लगा दीं. डॉक्टर लोग कहते हैं कि लाखों व्यक्तियों में से एक में ऐसा हो जाता है. तो मैं भी अपने आप को, विशिष्ट, लाखों में एक मान लूं?
बात यहीं तक होती तो भी ठीक था, ईश्वर ने और भी गलतियाँ कर दीं. मेरे दिल के बनने में दो बड़े से छेद भी रह गए. दिल के पास थायमस ग्रंथि भी नहीं बनाया! वो महत्वपूर्ण ग्रंथि जो मनुष्य के शरीर में इम्यून सिस्टम को बनाए रखने में अच्छा खासा दखल रखती है. और, इसीलिए मुझे सर्दी-खांसी भी बारंबार होती रही है और वो भी गंभीर किस्म की – क्योंकि थायमस ग्रंथि के अभाव में मेरा इम्यून तंत्र पूरी तरह काम नहीं कर पाता है. पूरा इन्वेस्टीगेशन रिपोर्ट आगे है जिसे पढ़कर आप भी चकरा जाएंगे और कह उठेंगे – यह क्या मिरेकल है! ठीक यही बात कार्डियोलाजिस्ट डॉ. कार्थिगेशन ने कही थी जब हाल ही में मेरा केस उनके सामने आया था – यू आर अ मिरेकल मैन उनके मुंह से बेसाख्ता निकल गया था. इतनी सारी गड़बड़ियों के बाद भी आप अभी भी सामने खड़े हैं – यह तो मिरेकल है!

दिल तो बच्चा है जी


बचपन में मैं बहुत ही दुबला-पतला था, और साथी मुझे ‘सिंगल-हड्डी’ कह कर बुलाते थे – और मैं बुरा नहीं मानता था. शायद इसीलिए, बहुत बाद में, हिंदी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम दिनों में, किसी ने तर्क-कुतर्क और टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी के दौरान मुझे “मरियल” की उपाधि दी, तब भी मैंने बुरा नहीं माना – मैं हूँ ही जन्मजात मरियल किस्म का. खेलकूद और दौड़भाग मैं अधिक नहीं कर पाता था क्योंकि मैं जल्द ही थक जाता था. प्रायमरी में खेल और व्यायाम का एक पीरियड हर रोज होता था और उसमें शामिल होना अनिवार्य होता था. हमारा खेल शिक्षक पूरा पहलवान था और सभी बच्चों को डम्बल लेजिम और पीटी तो करवाता ही, साप्ताहिक रूप से एक-दो किलोमीटर की दौड़ भी लगवाता जिसमें लाइन लगाकर दौड़ना होता था और उस लाइन को तोड़ने वाले को सूंटी से मारता था. मैं दूसरे व्यायाम तो जैसे तैसे कर लेता, मगर दौड़ नहीं पाता था, और मार से बचने के लिए दौड़ में शार्टकट अपनाता और शुरू में थोड़ा दौड़ कर फिर बाद में लाइन में शामिल हो जाता.

कुछ बच्चे इसमें मेरी सहायता करते तो कुछ शिकायत. तो कभी बच भी जाता और अकसर मार खाता. पर, तब न मुझे और न ही मेरे शिक्षक को यह पता था कि मैं तो पैदाइश से ही गंभीर हृदय विकार से ग्रसित हूँ, और इस तरह की शारीरिक वर्जिशें मेरे बस की तो खैर है ही नहीं, उल्टे इनसे मुझे और समस्या हो सकती है.
एक बार की घटना मुझे याद है. सन् 1970 की फरवरी महीने का कोई दिन था. व्यायाम का कालखंड सुबह ही होता था और फिर उसके बाद कक्षाएँ लगती थीं. तिवारी गुरूजी हमारे कक्षा शिक्षक थे और हाजिरी लेने के बाद श्यामपट्ट पर गणित का कोई सवाल समझा रहे थे. उस दिन व्यायाम मुझे कुछ ज्यादा ही भारी लगा था, और कक्षा में बैठे बैठे भी मुझे पसीने छूट रहे थे. यूँ भी मुझे पसीना खूब आता था, और सिर से तो एक तरह से टपकने ही लगता था. वह तो बाद में, बहुत बाद में पता चला था कि हृदय विकारों से ग्रस्त लोगों को पसीने अधिक आते हैं, और हृदयाघात के लक्षणों में से एक यह भी है.

अचानक ही मेरे सीने में दर्द उठा. तेज बहुत तेज. अकल्पनीय असहनीय. मैं जोर से चिल्लाया मेरी छाती में दर्द हो रहा है और बेजार रोने लगा. पूरी कक्षा सन्न. गुरुजी हमारे पड़ोसी भी थे, और सहृदय भी. उन्होंने मेरी हालत देखी, पानी पिलाया, दो साथी सहपाठियों को किताब से हवा करने को कहा, और फिर अपनी साइकिल में बिठाकर मुझे घर छोड़ आए. दर्द जिस तेजी और तीव्रता से आया था, उसी तेजी और तीव्रता से ग़ायब भी हो गया था, मगर फिर भी मेरी हालत ठीक नहीं थी.

दूसरे दिन मुझे जिला चिकित्सालय ले जाया गया. उन दिनों जन्मजात हृदय विकारों की पड़ताल और निदान की सुविधाएँ और तकनीकें तो माशा अल्लाह ही थीं. मुझे याद है कि ईसीजी की बहुत बड़ी मशीन होती थी और डाक्टरों को मेरे हृदय में कुछ अलग सा लगा होगा तो वे बारंबार और कई-कई बार ईसीजी निकालते. सीने के दाएँ बाजू का भी और बाएँ बाजू का भी.

लंबे समय तक और बारंबार लगे रहने वाले इलैक्ट्रोड के सक्शन कपों के वैक्यूम से शरीर में लाल चकत्ते पड़ जाते जो कई दिनों तक बने रहते. तब एंजियोग्राफ़ी और इकोकार्डियोग्राफ़ी जैसी तकनीक नहीं थी, तो हृदय के अंदरूनी हिस्से की बनावट के बारे में जानने समझने के लिए एक्सरे और फ्लोरोसेंट एक्सरे बारंबार लिए जाते. कोई सप्ताह भर जिला अस्पताल का चक्कर चला. मगर मुझे अच्छी तरह याद है कि इलाज के नाम पर मुझे किसी तरह की कोई गोली दवाई आदि नहीं दी गई. बस ये बताया गया (या मैंने व घर वालों ने तब समझा,) कि बंदे का दिल डबल है – यानी कि वो कुछ खास है.

और फिर कोई पच्चीसेक साल गुजर गए. दिल का वैसा दर्द दोबारा फिर कभी नहीं हुआ. सर्दी-जुकाम और मलेरिया के अलावा और कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या कभी नहीं हुई. शायद इसमें बढ़ती उम्र और नित्य शारीरिक व्यायाम का हाथ हो. तब सार्वजनिक या निजी वाहनों का अकाल होता था और आमतौर पर जनता हर कहीं पैदल ही निकल लेती थी. मैं भी घर से स्कूल, कॉलेज और बाजार-दुकान आदि जाने-आने के नाम पर औसतन 10 से 12 किलोमीटर प्रतिदिन, वह भी तेज सरपट चाल से चलता था. थकान थोड़ी होती थी, सांस भी भरती थी, परंतु वह जल्द ही ठीक हो जाती थी.

दिल के 16 वें साल में...


जावेद अख्तर ने तो बहुत बाद में एक शानदार गीत लिखा – एक लड़की को देखा तो... दरअसल गीत में लिखे प्रत्येक हर्फ का असल अनुभव तो मुझे बहुत पहले हो गया था - भाव भी वही आये थे, और मन में उसी भाव के गीत भी गुनगुनाए थे, जब मैंने पहली बार रेखा (पत्नी) को देखा था. हम साथ में स्कूल में पढ़ते थे, और कॉलेज पहुंचते पहुंचते यह अहसास हो गया था कि जीवन साथ ही गुजारना है. पर हमने पहले अपना कैरियर बनाने का तय किया और मैं इंजीनियरिंग लाइन में चला गया और रेखा फाइन आर्ट्स में. बहुत बाद में, जब हमने लगभग तय कर लिया था कि अब वैवाहिक बंधन में बंधने का समय आ गया है, तो मैंने अपने बचपन में क्षणिक रूप से उभर आई हृदय संबंधी बीमारी से रेखा को अवगत कराने का विचार किया. मैं उसे अंधेरे में नहीं रखना चाहता था, और चाहता था कि भविष्य में यदि कोई किसी तरह की परेशानी हो तो वो या उनके परिवार में कोई यह न कहे कि हमें अंधेरे में क्यों रखा.

यूँ तब मुझे किसी तरह की, स्वास्थ्य की कोई परेशानी नहीं थी. सन् 84-88 के बीच कुसमी और रामानुजगंज - बलरामपुर (जिला अंबिकापुर, छत्तीसगढ़) नामक स्थानों पर जब मैं राज्य विद्युत मंडल में जूनियर इंजीनियर के रूप में कार्यरत था तो साइकल से बीस-पच्चीस किलोमीटर तक विद्युत लाइनों की पेट्रोलिंग आदि के लिए आसानी से आता जाता. वहाँ के एक विशाल जनरेटर रूम को जो कि विद्युत लाइनों के आ जाने से खाली हो गया था, हमने बैडमिंटन कोर्ट बना लिया था और हम नित्य बैडमिंटन भी खेलते और प्रतियोगिताएँ भी आयोजित करते. और इस दौरान कभी कोई शारीरिक परेशानी नहीं हुई. मैं अपने बचपन की परेशानी को एक तरह से भूल चुका था.

तो, एक दिन मैंने रेखा को पत्र लिखा. प्रत्यक्ष कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी. तो उसे पत्र के द्वारा अपने बचपन में हुई हृदय संबंधी परेशानी के बारे में बताया, और भविष्य के लिए संकेत भी किया – आने वाले जीवन में परेशानी हो सकती है. उसने अपनी मां यानी मेरी सासू माँ – कमला प्रकाशम को यह बात बताई. मैंने अपने जीवन में जितनी भी स्त्रियों को करीब से जाना, उनमें मेरी सासू माँ जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति वाली और ऑर्गेनाइज़्ड, सुघड़ स्त्री और नहीं देखा. रेखा यदा कदा अपनी मां की तुलना हिटलर से भी करती रही हैं, मगर उनके भी मन में अपनी माँ के प्रति सम्मान में कोई कमी कभी नहीं आने दी. तो रेखा की मां ने रेखा से स्पष्ट और दृढ़ता से कहा – अगर तुम्हें लगता है कि मैंने तुम्हें इतना मजबूत तो बनाया है कि जीवन में आई किसी भी तरह की परेशानी से आसानी से जूझ सको तो तुम आगे बढ़ सकती हो. मेरी तरफ से कोई विरोध नहीं. बल्कि तुम्हें तो उसका साथ देना चाहिए. रेखा को और मुझको इससे अच्छा आशीर्वाद भला और क्या मिल सकता था. लगता है कि उनका वह लालन-पालन और आशीर्वाद ही है जो आज मैं इस आत्म कथ्य को लिख कर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.

वैवाहिक जीवन में छोटी-मोटी बातों की वजह से तनातनी तो जीवन का अनिवार्य अंग है. एक बार ऐसी ही तनातनी के बीच एक व्यंग्य ग़ज़ल मैंने रेखा को समर्पित की थी. नतीजा था, और अधिक गुस्सा J

प्रिये, है ये प्रेम, नहीं है झगड़ा
आओ यूँ सुलझाएँ अपना रगड़ा

जिंदगानी के चंद चार क्षणों में
ऊपर नीचे होते रहना है पलड़ा

करम धरम तो दिखेंगे सबको
चाहे जित्ता डालो उस पे कपड़ा

जब खत्म होगी सुखद होगी
यूँ पीड़ा को रखा हुआ है पकड़ा

जिया है जिंदगी को बहुत रवि
मौत कैसी, है ये असली पचड़ा


एक मच्छर आदमी को दिल का मरीज बना देता है


ईश्वर ने दुनिया में लाखों करोड़ों जीव बनाए. फिर उसने अपना एक खास, प्यारा जीव – मनुष्य बनाया. तमाम जीवों में से केवल एकमात्र यही ईश्वर जैसी संकल्पना को मानता और पूजता है. मगर, फिर इसने अपने प्यारे मानव को तंग करने के लिए एक अदद मच्छर भी बना दिया. इन्हीं मनहूस मच्छरों की वजह से फरवरी 1994 को मुझे फिर से मलेरिया हो गया. भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाला हर शख्स एकाधिक बार मलेरिया से ग्रस्त होता ही है चाहे वो कितनी ही मच्छरदानी लगा के सो ले या कितने ही आलआउट लगा ले, कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती जला ले या ओडोमॉस में गले तक डूबा रहे. आजकल तो मच्छर जनित कुछ और गंभीर बीमारियाँ आ गई हैं जिनमें डेंगू या डेंगी और जीका आदि हैं. तो, मुझे भी मलेरिया हुआ – अबकी शायद आठवीं या दसवीं बार – गिनती याद नहीं, मगर इस बार बहुत गंभीर.
मच्छरों की मार से परेशान होकर मैंने एक तुकबंदी भी लिख मारी थी. मुलाहिजा फ़रमाएँ –

मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह
आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।

घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ
इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।

डीडीटी, मलहम, अगरबत्ती, और आलआउट
अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।

एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है
इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।

सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का
मच्छरों से बचने दिन रात छोटा चाहिए ।

इस बार मलेरिया बुखार के दौरान चक्कर आने लगे. लगा कि दवाइयों और तेज बुखार से हो रहा होगा, ठीक हो जाएगा. मगर जब दवाइयों का पूरा डोज़ खत्म हो जाने और मलेरिया बुखार चले जाने के बाद भी मुझे चक्कर आना बंद नहीं हुए, और मैं उठने बैठने को भी लाचार-सा हो गया, खासा कमजोर सा हो गया तो शहर के वरिष्ठ, नामी चिकित्सक डॉ. पाठक की शरण ली. तमाम किस्म की जांच पड़ताल के बाद उन्होंने कहा कि वैसे तो कोई इमरजेंसी नहीं है, मगर फिर भी इंदौर में जाकर हृदय रोग विशेषज्ञ को दिखा दो तो बेहतर. कुछ दिनों के बाद मैं जाँच के लिए इंदौर चला ही गया.

इंदौर में चोईथराम अस्पताल में हृदय रोग विभाग में डॉ. विद्युत जैन का तब बड़ा नाम था. उन्होंने मेरा इकोकार्डियोग्राम निकाला और बताया कि आपके हृदय में तो बहुत सी असमान्यताएँ हैं और उसमें एक बड़ा सा छेद भी है. उन्होंने बताया कि ऐसे केसेज में सर्जिकल करेक्शन – यानी हृदय शल्य चिकित्सा ही एकमात्र इलाज होता है वह भी बचपन में. बड़ी उम्र में ऐसी सर्जरी आमतौर पर नहीं होती क्योंकि मामला रिस्की हो जाता है. आगे और अधिक स्पष्ट जांच-पड़ताल के लिए उन्होंने सर्जरी से पहले एंजियोग्राफ़ी करवाने का सुझाव दिया. मेरे बचपन में हुए हृदय में दर्द के बाद हुए जांच-पड़ताल के कोई पच्चीस साल बाद तो चिकित्सकीय तकनीक में बड़ा बदलाव हो गया था और नित्य नई तकनीकें ईजाद हो रही थीं. इकोकार्डियोग्राफ़ी, एंजियोग्राफ़ी आदि भी उनमें से थीं. कहा जाता है कि भारतीय चित्रपट की सर्वकालिक खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक मधुबाला को भी यही बीमारी थी और तब उस वक्त इसका सर्जरी आदि से इलाज का ईजाद नहीं हुआ था और इसी वजह से अल्पायु में उनकी दर्दनाक मृत्यु हुई थी.

इकोकार्डियोग्राफ़ी में कंप्यूटरीकृत ध्वनितरंगों के जरिए प्राप्त इको से परीक्षण किया जाता है तो एंजियोग्राफ़ी में गले के पास के या पैर की नसों के जरिए बारीक पोली तार हृदय तक भेजी जाती है फिर हृदय के अलग अलग चैम्बर में विशेष किस्म का रंग इन पोली तारों के जरिए इंजैक्ट किया जाता है और एक्सरे से उसका बहाव देखा परखा जाता है और इस तरह हृदय के आंतरिक विकारों का पता लगाया जाता है. हृदय शरीर का एक मजबूत पंपिंग उपकरण होता है जिसका काम मूलतः शरीर में खून के बहाव को नियंत्रित करने का होता है. यह बहाव सभी ओर सही तरीके से, सही क्षमता और दबाव से हो रहा है या नहीं इसी का परीक्षण इकोकार्डियोग्राम व एंजियोग्राम में किया जाता है.

उस वक्त हृदय शल्य चिकित्सा भारत के केवल बड़े महानगरों यथा दिल्ली, मुंबई, मद्रास आदि में ही होती थी और सर्जरी का खर्च, एंजियोग्राफ़ी सहित अमूमन एक-डेढ़ लाख रुपए आता था. अलग-अलग अस्पतालों के, जनरल या प्राइवेट वार्ड के अनुसार, अलग-अलग रेट थे. बाईपास सर्जरी के लिए कुछ कम. मेरी ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी जिसमें रिस्क और खर्च दोनों ही अधिक था. मैं सरकारी नौकरी में था, तब नियमों के मुताबिक, हृदय शल्य चिकित्सा के लिए अधिकतम 80 हजार रुपए का सहयोग मिलता था, वह भी, शल्य चिकित्सा हो जाने के उपरांत, बिल जमा करने पर.

मेडिकल इंश्योरेंस जैसी चीज रही होगी, मगर आज जैसी जागरूकता तब नहीं ही थी. इसलिए हमें पता ही नहीं था और मेरा इंश्योरेंस भी नहीं था. तो अब हमें अच्छी खासी राशि एकत्र करनी थी. जेब में एक घेला नहीं था और डेढ़ लाख की हृदय शल्य चिकित्सा करवानी थी. मगर हमने हिम्मत नहीं हारी और अपने सभी सगे संबंधियों और मित्रों के सामने हाथ फैलाए. सभी ने भरसक सहयोग किया. बहुतों ने तो इस आग्रह के साथ सहयोग किया कि वापस करने की जरूरत नहीं है. मध्यप्रदेश विद्युत मंडल रतलाम जहाँ मैं कार्यरत था, वहाँ के अभियंता संघ के सचिव जगदीश शरण का सहयोग विशेष रहा. उन्होंने अभियंता संघ के सदस्यों से मेरे लिए कोई पचास हजार रुपए की सहयोग राशि एकत्र की थी. रेखा के कॉलेज - शासकीय गर्ल्स कॉलेज – के समस्त स्टाफ ने भी अच्छा खासा सहयोग किया, जिनमें सुहृदय किंतु प्रशासनिक रूप से कठोर प्रिंसिपल वी. एन. तिवारी ने प्रशासनिक कार्यों में बहुत सहयोग किया.

उस वक्त बहुत से मित्रों व संबंधियों ने हमें सर्जरी के विरुद्ध भी सलाह दी. उन्होंने सीधे-सीधे मुझसे तो भले ही नहीं कहा, मगर वे रेखा को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जरूर बोलते बताते रहते. हार्ट सर्जरी में इतना रिस्क होता है क्यों करवा रहे हो? कल को कुछ हो जाएगा तो? अभी तो फिर भी रवि तुम्हारे पास है. चार-छः साल तो यूँ ही खान-पान परहेज आदि में निकल जाएंगे. बहुत सी दवाईयाँ आ रही हैं उनसे भी ठीक हो सकता है. सर्जरी का रिस्क क्यों ले रहे हो. तुम्हारे बच्चे छोटे हैं उनका क्या होगा? फिर ये दुनिया जहां अकेली औरत का जीना मुश्किल होता है वहाँ तुम दो बच्चों के साथ क्या करोगी? आदि आदि. कई बार तो लगता कि इनकी बातों में दम है, और हम हार मान कर हथियार डाल कर बैठ जाते. मगर कुछ समय गुजारने के बाद फिर लगता कि ऐसे तिल-तिल मरने और मौत का इंतजार करने के बजाए तो आर या पार ठीक है. हम अपने आप को यह दोष तो नहीं देंगे कि हमने पूरी कोशिश नहीं की. एकांत में मुझे मेरे माता पिता भाई बहन पत्नी बच्चे मित्र-मंण्डली सब प्रत्यक्ष दिखते और तब लगता कि मुझे इनके लिए हर हाल में जीना होगा. हार किसी सूरत नहीं माननी है.

पैसों की समस्या हल हो गई तो दूसरी तकनीकी समस्याएँ सामने आ गईं थीं. चोईथराम अस्पताल इंदौर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विद्युत जैन की हृदय शल्य चिकित्सा की रिकमंडेशन रिपोर्ट मेरे सरकारी विभाग ने खारिज कर दी और कहा कि सरकारी रेफरल अस्पताल – महाराजा यशवंत राव यानी एमवाई अस्पताल इंदौर का संस्तुति पत्र लाओ.

मरता क्या न करता. मैं शासकीय एमवाई अस्पताल व मेडिकल कॉलेज के हृदय रोग विभाग में गया तो वहाँ के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. भराणी ने पूरी बेरूखी से यह कह कर मामला लटका दिया कि मैं केवल पोस्ट-मैन का काम नहीं करता कि आप प्राइवेट अस्पताल की जांच रिपोर्ट ले आएँ और मैं आपको उसके आधार पर आगे के इलाज के लिए रेफर कर दूं. मैं स्वयं परीक्षण करूंगा, पूरी तरह संतुष्ट होऊंगा, तत्पश्चात ही रेफर करूंगा. बाद में मेरी जांच करने के बाद उन्होंने बड़े ही तल्ख शब्दों में कहा कि रतलाम के डॉक्टर क्या घसियारे हैं जो तुम्हें अभी रेफर कर रहे हैं? तुम तो पूरे नीले पड़ गए हो और स्थिति बिगड़ गई है यह प्रत्यक्ष दिख रहा है. इस तरह की बीमारी का इलाज जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा और उम्र बढ़ जाने के बाद इलाज भी नहीं होता. यह सुनकर मेरा सिर घूम गया और मेरा डूबता हृदय थोड़ा और डूब गया. एक चिकित्सक को किसी मरीज के सामने क्या यह कहना चाहिए कि वो कितना बीमार है – उसकी स्थिति कितनी बिगड़ गई है. उस दिन यह बात सुनने के बाद मैं अपने आपको तो मरणासन्न ही महसूस करने लगा था! जैसे कि किसी को यह कह दिया जाए कि भाई, अब गिनती के इतने ही दिन हैं तुम्हारे पास. उस दिन मैं रतलाम से ट्रेन से मैं स्वयं आया था, अच्छा खासा हिस्सा पैदल चलते हुए, मगर जब मैं वहाँ से वापस हो रहा था तो लग रहा था कि सचमुच मेरा शरीर नीला पड़ गया है, मेरे नाखून नीले पड़ गए हैं, और मेरे शरीर में अब चलने फिरने का भी दम नहीं है! जब मैं इन पंक्तियों को अभी लिख रहा हूँ तो अब लग रहा है कि मनुष्य को तो मनोवैज्ञानिक तरीके से भी, इस तरह मारा जा सकता है!
फिर भी, एक अच्छी बात यह रही कि सरकारी अस्पताल में हृदय-रोगियों की भयंकर भीड़ के बावजूद उन्होंने सप्ताह भर बाद का जो समय दिया उस समय सीमा में उन्होंने मेरे हृदय की इको कार्डियोग्राफ़ी की और संतुष्ट होने के उपरांत, क्योंकि वे स्वयं एम्स, दिल्ली से प्रशिक्षित थे, सरकारी सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल - एम्स दिल्ली के लिए रेफर कर दिया. परंतु उन्हीं दिनों मेरे एक सहकर्मी प्राइवेट अपोलो अस्पताल मद्रास से अपने हृदय की बाईपास सर्जरी करवा कर लौटे थे और उस अस्पताल और खासकर वहाँ के हृदय शल्य चिकित्सक डॉ. गिरिनाथ की तारीफ करते अघाते नहीं थे, लिहाजा हमने डॉ. भराणी से मिन्नतें कर अपोलो अस्पताल मद्रास (अब चेन्नई) के लिए संस्तुति पत्र चाहा जो उन्होंने बड़े बेमन से जारी किया. पर, उस समय हमें यह कहाँ पता था कि भाग्य का खेल और समय का पहिया आगे हमें एम्स दिल्ली का चक्कर कटवाकर ही मानेगा!


अराउंड द इंडिया इन ए वीक



हम जेब में कोई दो लाख रुपए नकद – जो मित्रों, रिश्तेदारों और सहकर्मियों की दरियादिली और सहयोग से एकत्र हुए थे – जिन्हें उन्हें वापस लौटाने आदि का कोई आभास उन्हें उस वक्त नहीं था, परंतु बाद में हमने एक-एक पाई जोड़कर यथासंभव वापस लौटा दिए थे - लेकर 18 मई 1994 को रतलाम से भोपाल रवाना हुए जहाँ से हम मद्रास के लिए तमिलनाडु एक्स्प्रेस पकड़ने वाले थे. तब संचार के साधन नहीं थे और दूरस्थ स्थानों से यात्रा टिकट आरक्षण के लिए रेलवे के टेलीग्राम सेवा पर निर्भरता होती थी, और हमारा टिकट महीने भर पहले आवेदन देने के बाद भी आरक्षित नहीं हुआ था. संयोग से स्लीपर बर्थ में रनिंग आरक्षण भले ही मिल गया था मगर यात्रा सुखद कतई नहीं थी. गरमी के दिन थे, लू चलती थी और तब स्लीपर कोचों में अनारक्षित यात्री भी स्वीकार्य थे और पूरा डब्बा पैक था. कहीं पैर धरने की जगह भी नहीं थी. दरअसल गरमी की स्कूली छुट्टियाँ चालू हुई थीं, और हर परिवार कहीं न कहीं जाने के लिए निकल पड़ा है प्रतीत हो रहा था. खैर, दक्षिण भारत की मेरी यह पहली यात्रा थी, समुद्र देखने का पहला मौका था तो इस बात का थोड़ा सा रोमांच भी था.

नागपुर में ट्रेन में ही हमने अपने बच्चों – बेटा - अन्वेष 3 वर्ष और बेटी – अनुश्री 10 माह को उनके ननिहाल छोड़ने के लिए बच्चों की बड़ी अम्मा यानी रेखा की बड़ी बहन, उमा के सुपुर्द किया जो उन्हें लेने राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ से आई थीं. बच्चों से हमें बिछुड़ना अजीब लग रहा था, और बच्चों को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि उनके माता पिता क्यों उन्हें दूसरों के हवाले कर दे रहे हैं. बहरहाल रोते-बिलखते, मासूम, छोटे बच्चों से बिछुड़ना बहुत ही दर्द भरा रहा और रास्ते भर उनके दर्द भरे चेहरे जेहन में रह रह कर कौंधते रहे.

अपोलो अस्पताल मद्रास में रोगियों और स्वास्थ्य कर्मियों का मेला-सा लगा था. जिजीविषा, जीवन की जद्दोजहद का असली रूप देखना हो तो किसी अस्पताल में चले जाएँ. स्ट्रेचर पर अंतिम सांसें लेते, वेंटीलेटर पर मृत्युशैय्या में लेटे रोगी भी यमराज को ठेंगा दिखा वापस, निरोगी हो, अपनी सामान्य जिंदगी में लौट आते हैं. मेरी इको कार्डियोग्राफी की रिपोर्ट मैंने पढ़ी थी, और उसमें कुछ असामान्य बातें लिखी थीं, जिन्हें मैं ज्यादा तो समझ नहीं पाया था, परंतु फिर भी लग रहा था कि मुख्यतः समस्या हृदय में छेद है, जिसे बंद कर दिया जाएगा, जो कि आसान सी ओपन हार्ट सर्जरी होती है, तो समस्या खत्म हो जाएगी और मैं भी वापस अपनी सामान्य जिंदगी जी सकूंगा.

उस जमाने में संचार के त्वरित साधन जैसे कि ईमेल आदि उपलब्ध नहीं थे. अतः साधारण डाक से पत्र (स्नेल मेल) के माध्यम से अपोलो अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ – कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर सुब्रमण्यम से पहले ही समय तय कर लिया था.
19 मई को हम चेन्नई के प्रसिद्ध मरीनो बीच गए. समुद्र देखने की लालसा पूरी हो रही थी. क्या पता कल को क्या हो? एंजियोग्राम और सर्जरी के जो गाइड बुक हमें भेजे गए थे उसमें तमाम रिस्क फैक्टरों को भी दर्शाया गया था और लगता था कि बहुत कुछ अनहोनी भी हो सकती है. और, भाग्यवश, एक अनहोनी तो मरीनो बीच में होते-होते ही रह गई थी.

मरीनो बीच में कुछ नावों में समुद्र की सैर करवाई जा रही थी. बीस-बीस रुपए लेकर दस मिनट की सैर करवाई जा रही थी. वहाँ हालांकि बहुत बड़ी-बड़ी लहरें आ रही थीं, फिर भी उन लहरों के बीच नावों को नाविक मजे से सर्फ बोर्ड की तरह चला रहे थे और सैलानियों को समुद्र की सैर का मजा दिलवा रहे थे. मैंने रेखा से कहा कि चलो हम भी सैर करते हैं. रेखा ने मना कर दिया. तो मैं चला गया. हिचकोले लेती नाव में समुद्र की लहरों की की सैर कर मुझे बड़ा आनंद आया. समुद्र की उठती बैठती लहरों के बीच नाव का सफर बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था. खतरनाक लहरों में सर्फिंग करने वालों को सचमुच कितना रोमांचक अनुभव होता होग इसकी कल्पना की जा सकती है.

समुद्र में नाव की सैर इतनी रोमांचकारी थी कि नाव की अगली ट्रिप में भी मैं गया और रेखा को भी जैसे तैसे मना कर साथ ले गया. परंतु नाव अभी अपनी सैर की आधी दूरी तक पहुँचा ही था कि समंदर में एक बहुत ही बड़ी दैत्याकार लहर आती दिखाई दी. माहिर नाविकों ने तमिल में कुछ चिल्लाना शुरू किया. आधी जनता समझ गई और नाव की तली से चिपक गई. और हम कुछ समझ पाते इससे पहले ही नाव लहर पर सवार हुई और लहर ने नाव को कोई बीस फुट ऊपर से नीचे समुद्र की तली पर जोर से पटक दिया. हम सब पानी से तरबतर हो गए और ऐसा भयंकर झटका लगा पूरे शरीर में कि पूछिए मत. बस जान ही बची समझिए. जबरदस्त झटके की वजह से हम लोगों के सिर में भयंकर दर्द उठ गया था जो लंबे समय तक बना रहा. उसी समय एक दूसरी नाव जो सामने जा रही थी, वह तो पूरी तरह पलट ही गई. और लोग डूबने लगे थे जिन्हें जैसे तैसे बचाया गया. वह तो हमें बहुत बाद में पता चला कि मरीनो बीच में चूंकि बड़ी और खतरनाक लहरें आती हैं, इसीलिए यहाँ किसी भी तरह की बोटिंग, समुद्री-नौवहन जैसी सैलानी क्रीड़ाएँ प्रतिबंधित हैं, और जो नाविक हमें समुद्र की सैर करवा रहे थे वे ग़लत कर रहे थे. बाद के वर्षों में मरीनो बीच कई बार जाना हुआ, परंतु वहां उस तरह की बोटिंग होते हुए फिर कभी नहीं देखी.

कल हो न हो की उहापोह के साथ मरीनो बीच की स्मृतियों को संजोए, दूसरे दिन, 20 मई 1994 को मैं अपोलो अस्पताल में भर्ती हो गया था. दूसरे दिन एंजियोग्राम होना था जिससे पक्के तौर पर पता किया जाता कि हृदय में जन्मजात क्या-क्या खराबी है, और फिर आगे शल्य चिकित्सा के आयामों के बारे में फैसला लिया जाता.

अजूबा दिल


अपोलो अस्पताल में जब मैं भर्ती हुआ तो मुझे देखने को रेजीडेंट डाक्टरों की लाइन लग गई. हल्ला हो गया था कि कोई टिपिकल जन्मजात हृदय रोगी भर्ती हुआ है- जिसके हार्ट में कई तरह की एबनॉर्मलिटीज़ हैं. कोई मेरे परिवार के लोगों में हृदय रोगों की हिस्ट्री पूछ रहा था, कोई रोग संबंधी लक्षण पूछ रहा था, कोई दवा क्या ले रहे हो यह पूछ रहा था. मुझसे पूछते – आर यू मैरीड? मैं कहता हाँ, तो फिर पूछते कितने बच्चे हैं तुम्हारे? मैं कहता दो. तो वो बोलते – ओह शिट, और फिर दुखी मुंह बनाते. रेखा को वहाँ के डॉक्टर पूछते – कितने बच्चे हैं तुम्हारे? वो बोलती दो. तो उम्र पूछते. वो बताती तीन साल और दस माह तो डॉक्टर दुखी स्वर में कहते – च च च च.
कहते हैं कि किसी के दुःख बांटने से दुःख कम होता है. पर, अब ध्यान आता है कि कभी-कभी किसी के दुख को बांटने के लिए अतिरिक्त रूप से शामिल होना भी आदमी को और ज्यादा दुखी कर देता है.

अपोलो अस्पताल में एक बार फिर से मेरी इको कार्डियोग्राफ़ी की गई. मेरी इको कार्डियोग्राफ़ी की अजीब रिपोर्टों से कार्डियोलॉजी विभाग के सारे के सारे डॉक्टर सन्न थे, और उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उतनी अजीब समस्याओं के बावजूद में अभी उनके सामने बोलते बताते बैठा कैसे हूँ! पैंतीस साल का हो रहा था अब मैं, और लोगों को जब मैंने बताया कि पिछले छः महीने पहले तक तो मैं लगभग सामान्य जीवन ही जी रहा था, बिना किसी परेशानी व बीमारी के लक्षणों के, तब भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ. और, तब मुझे लगा कि सचमुच मैं अजूबा हूँ, और मेरा दिल तो उससे भी बड़ा अजूबा है. अगले दिन होने वाले एंजियोग्राम से अभी मेरे रहस्यमय दिल की परतें और भी खुलने वाली थीं.

एडवेंचर मुझे पसंद है और रेखा को यात्राएँ करना.. मेरे पास कायनेटिक होंडा स्कूटर था जो उस समय नया नया लांच हुआ था. वो बिना गियर वाला पहला स्कूटर था. हमने उस स्कूटर से लंबी लंबी यात्राएँ की. बेटे अन्वेष को हम गोद में ही लेकर लंबी यात्राओं में निकल जाते थे. उसे नदियों की उछली स्वच्छ धारा में हाथ पैर पटक कर खेलना बहुत अच्छा लगता और एक बार धारा में बैठ जाने के बाद उसे निकलना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. वह भूख-प्यास भूलकर पानी से खेलने में व्यस्त रहता. हम रतलाम से उज्जैन, इंदौर, ओंकारेश्वर आदि की यात्राएं स्कूटर से ही कीं और यथासंभव हर सप्ताहांत यात्राएँ करते, स्कूटर से ही करते. मेरी बीमारी ने हमारे इस एडवेंचर पर पूर्णविराम सा लगा दिया था.

कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुब्रमण्यम सांवले रंगत के, छरहरे बदन के औसत ऊंचाई के नौजवान दक्षिण भारतीय थे जो मेरी एंजियोग्राफ़ी कर रहे थे – यह प्रोसीजर लोकल अनेस्थेसिया में किया जाता है – मरीज को बेहोश नहीं किया जाता.

एंजियोग्राम के दौरान जैसे ही उन्होंने मेरे हृदय में डाई (रंग) इंजैक्ट किया, मुझे उससे रीएक्शन हो गया और मारे ठंड के मैं कांपने लगा. दांत बजने लगे, सारा शरीर हिलने लगा ठिठुरने लगा. वैसे भी ऑपरेशन थियेटर वातानुकूलित रहता है और उसका तापमान कम ही रखा जाता है ताकि इन्फ़ैक्शन आदि न फैले. तुरंत ही मुझे कुछ एंटीडोट के इंजैक्शन लगाए गए ताकि दवा का रीएक्शन दूर किया जा सके. कई मोटे मोटे कंबलों से मुझे ढंका गया. मेरी हालत में थोड़ा सुधार तो हुआ, मगर पूरी एंजियोग्राफ़ी के दौरान मैं कांपता ठिठुरता ही रहा. एंजियोग्राफी की रिपोर्ट अगले दिन मिलने वाली थी, जिसे कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुब्रमण्यम तैयार करने वाले थे और उस रिपोर्ट के आधार पर फिर कार्डियोथोरेसिक सर्जन – हृदय शल्य चिकित्सक डॉ. गिरिनाथ मेरी हृदय शल्य चिकित्सा संबंधी प्लान करने वाले थे.

मैं बेसब्री से रिपोर्ट का इंतजार कर रहा था. लग रहा था कि कब ऑपरेशन हो, और कब मैं ठीक होकर यहाँ से निकल भागूं. परंतु नियति को तो अभी साल भर मुझे और भटकाना था!
मैं वहाँ जनरल वार्ड में था, जहाँ और भी भिन्न भिन्न जटिल किस्म के रोगों से ग्रस्त रोगी थे. एक धनबाद कोलफ़ील्ड से आए हुए सिन्हा जी थे जो पिछले तीन माह से वहाँ भर्ती थे, और अभी छः महीने और भर्ती रहने वाले थे. वे कोलफ़ील्ड में नौकरी करते थे और एक दुर्घटना में उनके टांग की हड्डी टूट गई थी, जिसे एलिजारोव तकनीक के जरिए ठीक किया जा रहा था. यह भी एक तिलस्मी किस्म की चिकित्सा तकनीक ही थी जिसमें हड्डी को जोड़ने व बढ़ाने का बेहद धीमा, मगर बहुत ही कारगर तरीका ईजाद किया गया है. एक हड्डी रोग विशेषज्ञ रोज सुबह आते और उनके पांवों में कीलों से लगाई गई स्टील की फ्रेमों में लगे स्क्रू को कहीं टाइट करते तो कहीं ढीला. और मरीज की प्रगति से संतुष्ट हो सिर हिला कर चले जाते.

ऐसे मरीजों को देखकर एकबारगी यह भरोसा हो गया था कि मैं भी सुरक्षित जगह पर हूँ, और बस मेरा इलाज होते ही मैं भी पूरी तरह ठीक-ठाक होकर, लौटकर फिर से सामान्य जिंदगी जी सकूंगा.

मेरे दिल के छुपे राज


अगले दिन बहुप्रतीक्षित एंजियोग्राफ़ी की रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट क्या थी, हैरी पॉटर तिलिस्मी सीरीज की किसी कहानी का हिस्सा सी थी. मूल अंग्रेज़ी भाषा की हिंदी में सरलीकृत रिपोर्ट कुछ यूँ है –

· मरीज को जन्मजात एसायनोटिक (जिसमें नाखून नीला नहीं होता) हृदय रोग है,
· मरीज का हृदय उलटी तरफ यानी दायीं तरफ है.
· हृदय की शिराएँ व धमनी उल्टी पुल्टी हैं.
· हृदय के दाएँ भाग (निलय- वेंट्रिकल) से दोहरा आउटलेट निकल रहा है.
· महाधमनी L आकार की उलटी स्थिति में है.
· फेफड़े के वाल्व (पल्मोनरी वाल्व) में कैल्शियम का जमाव हो चुका है, और प्रायः काम नहीं कर रहा है.
· फेफड़े के वाल्व (पल्मोनरी वाल्व) के नीचे, हृदय में बहुत बड़ा सा छेद है.
· दो के स्थान पर केवल एक हृदय-धमनी (कोरोनरी आर्टरी) है.

और उसके साथ लिखा था –

“मरीज को उसके हृदय में छेद को बंद करने तथा फ़ेफड़े के वाल्व को ठीक करने के लिए हृदय शल्य चिकित्सा की सलाह दी जाती है.”

मगर रुकिए.

हार्ट सर्जरी के बारे में जो यह सलाह टाइप कर लिखा गया था, उसे काट कर पेन से लिखा गया था –

“चूंकि इस शल्य चिकित्सा में शल्य क्रिया के दौरान या बाद में मरीज की मृत्यु की संभावना अधिक है, अतः शल्य क्रिया के बजाए उन्हें दवाइयों के जरिए इलाज पर जारी रखे जाने की सलाह दी जाती है.”

और उन्होंने दवाई के नाम पर लिखा – आल्प्रैक्स.

 एक बेहद एडिक्टिव, नशीली दवा (यह बात मुझे बाद में पता चली, मैं तो हृदय संबंधी जरूरी दवाई मान कर उसे नित्य लेने लगा था) जो मरीज को डिप्रेशन से तथाकथित रूप से बाहर निकालती है. तो, क्या मैं डिप्रैस्ड था? बाद में तो मैं इस दवाई का मैं एडिक्ट भी हो गया था, इसे न लेने पर मरने जैसा अनुभव होता था, और आत्महत्या के खयाल मन में आते थे. और बहुत बाद में, जय हो इंटरनेट और गूगल महाराज की - बड़ी खोजबीन करने के बाद इस दवाई को टैपर्ड डोज लेकर मैं अपने आप को इसके एडिक्शन से बाहर निकाल पाया था.

इस सुझाव को सुनकर तो मेरा दिल फिर से डूब गया. मुझे अब तक अच्छी तरह से महसूस हो चुका था कि मेरी बीमारी का सही इलाज केवल सर्जिकल करेक्शन यानी सर्जरी द्वारा संभव था, और अब उसकी भी संभावना खत्म हो गई थी. मैं एक बार फिर से अपने दिन गिनने लगा. दिन रात मेरे छोटे-छोटे मासूम बच्चे, बीवी, भाई बहन, माता पिता, मित्र मंडली सभी याद आते और लगता कि जैसे अब बिछुड़े तब बिछुड़े. रात को सोता तो लगता सुबह होगी कि नहीं और सुबह होती तो लगता कि दिन कैसे कटेगा. दिल की हर धड़कन मुझे यूँ महसूस होती जैसे कि वो बस, अब आखिरी हो!

कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुब्रमण्यम ने कार्डियक सर्जन डॉ. गिरिनाथ से मेरी सर्जरी के संबंध में चर्चा की थी, और प्रतिफल ये आया था कि चूंकि शल्य क्रिया में बहुत ज्यादा खतरा है, सर्जरी के बाद मरीज के हृदय की स्थिति के ठीक होने की संभावना अत्यल्प है, अतः इसे न किया जाए. वैसे भी हृदय शल्य क्रिया विशेषज्ञ डॉ. गिरिनाथ जिनका बहुत नाम था, बाइपास सर्जरी के विशेषज्ञ थे और उनका मानना था कि मेरा जटिल केस किसी जन्मजात/बाल्य हृदय रोग विशेषज्ञ शल्य चिकित्सक को देखना चाहिए. वैसे भी, बड़े नाम वाले कुछ निजी अस्पताल क्रिटिकल और कॉम्प्लीकेटेड केसेज में हाथ नहीं डालते हैं जिससे कि उनके संस्थान के इलाज के सक्सेस रेट का प्रतिशत अधिकाधिक बने रहें. वे अपने विज्ञापनों में गर्व से सफल सर्जरी के 99.5 प्रतिशत सक्सेस रेट की बात लिखते हैं. पर ये नहीं बताते कि वे रिस्की केसेज में हाथ ही नहीं डालते. यह जग जाहिर है कि भारत के अधिकांश निजी अस्पताल मरीज के हालत और उसकी आर्थिक की स्थिति का आकलन कर अपने यहाँ इलाज करते हैं अन्यथा वे सीधे सरकारी अस्पताल को रेफर कर देते हैं.

मेरा एक जीवंत अनुभव है, दिल-दिमाग पर छपा हुआ. इतना कि इन पंक्तियों को लिखते समय मैं उस मरीज का दर्द भरा चेहरा, उसके शरीर की तड़पन, सभी दिख रहा है – स्पष्ट. मैं रेखा को स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास कुछ चेकअप के लिए ले गया था. वह एक दंपत्ति का नर्सिंग होम था. दोनों ही डॉक्टर थे. डॉक्टर साहब मेडिसिन विशेषज्ञ थे. हम वहाँ नंबर लगा कर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. इतने में कुछ लोग एक युवा लड़की को लेकर आए. उसके मुंह से झाग निकल रहा था. उसका शरीर कांप रहा था और रह-रह कर ऐंठ और कांप रहा था. उस लड़की ने आत्महत्या के इरादे से बेहद जहरीली दवा सल्फ़ास खा लिया था. आननफानन में उस लड़की के परिजन उसे इस निकटस्थ नर्सिंग होम में लेकर आ गए थे. सुबह की बात थी. डॉक्टर दम्पत्ति अपना इलाज प्रारंभ करने से पहले सुबह पूजा करते थे. उन्होंने नर्सिंग होम में एक मंदिर भी बनवा रखा है. बहुत ही मार्मिक किस्म का मंजर था. जहर खाया हुआ गंभीर मरीज, जिसे तत्काल इलाज की जरूरत है, वो प्रांगण में तड़प रहा है, और डॉक्टर दम्पत्ति इधर भगवान के सामने घंटी बजा रहे हैं, आरती गा रहे हैं. जब वे पूजा से निपटे तो मरीज को देखा और निःस्पृह भाव से बोले – ये तो लीगल केस है, किसी सरकारी अस्पताल ले जाओ. उन डॉक्टर ने किसी भी तरह का कोई इलाज नहीं किया, उल्टे उस मरीज के क्रिटिकल आधे घंटे और खा गए. मुझे पता नहीं उस मरीज का बाद में क्या हुआ, मगर यदि उसकी मौत हो गई होगी तो यकीनन यह शर्तिया फर्स्ट डिग्री मर्डर चार्ज का केस है.

हमने अतिरिक्त कंसल्टेशन फीस जमा कर डॉ. गिरिनाथ से निजी तौर पर मुलाकात की. उन्होंने बताया कि जन्मजात हृदय रोगों की ओपन हार्ट सर्जरी के एक्सपर्ट को ही मेरा केस समझ में आ सकता है, और इस संबंध में सर्जरी संभव है या नहीं ये बात वो ही बता सकेंगे. और उन्होंने भारत के नंबर#1 सरकारी चिकित्सा संस्थान, एम्स दिल्ली (AIIMS Delhi) के कार्डियक सर्जन डॉ. के. एस. अय्यर – जो जन्मजात हृदय विकारों को ठीक करने वाले एक्सपर्ट सर्जन थे - को मेरा केस रेफर करते हुए पत्र लिखा और मेरे अजूबे केस की जांच-परख कर सर्जरी की संभावनाएँ तलाशने का निवेदन किया.

चलो बेदिल दिल्ली को


मद्रास ने हमें ठेंगा दिखा दिया था. हम बड़े ही बेमन से जब वहाँ से निकले तो लगा कि मद्रास ने हमारे जीवन के सपने को चूर चूर कर दिया है. बड़े ही गमगीन हो हम उस शहर को विदा कर रहे थे. परंतु विधि का विधान कुछ और ही होता है. हमें क्या पता था कि यही शहर कुछ दिनों के बाद हमें फिर बुलाएगा और जीवन के और कई कई वसंत हमें उपहार में देगा.

उस वक्त चूंकि हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था, अतः हम तत्काल ही मद्रास से नई दिल्ली के लिए ट्रेन से रवाना हुए. मई का महीना था. गरमी अपने चरम पर थी और स्लीपर कोच में गर्मी और लू से जूझते हुए हम 5 लोग 40 घंटे की अनवरत यात्रा के लिए रवाना हुए. चूंकि मैं मरीज था, दिल का मरीज था, हार्ट सर्जरी के लिए अपोलो अस्पताल गया हुआ था, अतः मेरे साथ मेरी पत्नी के अलावा मेरा छोटा भाई देवेन्द्र, मेरे साले साहब रवि ऋग्वेदी और बहनोई सुभाष शर्मा भी सहयोग के लिए साथ में थे.

दिल्ली में हम सभी पता पूछते पाछते डॉ. के. एस. अय्यर के घर पहुँच गए. हमें लगा था कि डॉ. गिरिनाथ के पत्र को वो तवज्जो देंगे, और उससे भी ज्यादा हमें, क्योंकि हमें तो अपोलो अस्पताल के बड़े नामी सर्जन ने रेफर किया था और हम तो चिकित्सा विज्ञान के लिए विशिष्ट केस थे. परंतु उन्होंने पत्र को सरसरी निगाह से देखते हुए कहा कि एम्स नई दिल्ली के हृदय रोग विभाग में आइए, आपको वहीं देखेंगे. और हाँ, मेरा ओपीडी कल नहीं है, आल्टरनेट डे में होता है अतः आपको परसों वहाँ देखेंगे.

हमने एम्स नई दिल्ली के पास किराए का एक कमरा ले लिया. एम्स के आसपास के क्षेत्र में बहुत से लोगों ने मरीजों के लिए ढेरों कमरे बना रखे हैं और अनगितन ढाबे भी हैं. तब अनगिनत एसटीडी टेलिफ़ोन बूथ भी हुआ करते थे. मोबाइलों के आधुनिक जमाने में उन बूथों का इन्तकाल कब हुआ पता ही नहीं चला. उस वक्त वहाँ एक कमरे का एक दिन का किराया औसतन 200 रुपए रोज के हिसाब से लगता था. मेरे मन में थोड़ी सी आशा तो जगी थी कि डॉ. के. एस. अय्यर का जन्मजात हृदय रोगों की सर्जरी में अच्छा खासा नाम है, एम्स दिल्ली का भी बड़ा नाम है और शायद यहाँ इलाज हो जाए.

हम 18 मई 1994 से रतलाम से इलाज के लिए निकले थे, पहले मद्रास पहुँचे, और फिर वहाँ से एम्स दिल्ली रेफर हुए और फिर दिल्ली के कार्डियोलॉजी ओपीडी विभाग में, दो सप्ताह बाद, 1 जून 1994 को मेरा पर्चा बना. डॉ. के. एस. अय्यर वैसे तो दक्षिण भारतीय थे, परंतु थे पूरे गोरे चिट्ठे, दुबले पतले और लंबे. वे अपने स्टेथेस्कोप में एक छोटे से, प्यारे से बच्चे का सॉफ़्ट टॉय लगा कर रखते थे जो उन्हें पूरे अस्पताल परिसर में विशिष्ट लुक देता था. उन्होंने अपोलो अस्पताल की रिपोर्ट व एंजियोग्राफ़ी की फ़िल्म देखी और मुझे कहा कि आपके हार्ट की कंडीशन तो बहुत खराब है. अभी तक क्या कर रहे थे? मैं क्या जवाब देता. सपाट उनकी ओर देखता रहा.

उन्होंने मेरी रिपोर्ट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. तलवार / डॉ. बहल को रेफर कर दी ताकि उनके भी विचार जान सकें. चूंकि वहाँ ओपीडी एक दिन छोड़कर होती थी तो डॉ. तलवार या डॉ बहल को रिपोर्ट दिखाने के लिए एक दिन बाद की डेट लेनी पड़ी. वहाँ आप सीधे डॉक्टर को रिपोर्ट दिखा नहीं सकते. वहाँ भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि किसी भी ऐसे प्रयास का प्रश्न ही नहीं है. फ़ाइल बनती है, और आपकी फ़ाइल के नंबर के हिसाब से – जिसके लिए पहले से ही नंबर लगाना होता है, और नंबर लगाने के बाद भी यदि आपकी फ़ाइल सही सलामत वहाँ पहुंच गई है, तभी आपकी सुनवाई हो सकती है और आपको देखा जा सकता है. – हाँ, अगर आप वीवीआईपी हों तो बात दीगर है, और यह बात हमें बाद में मालूम चली.

डॉक्टर के चैम्बर के सामने मजेदार मगर दारूण दृश्य होता था. तमाम दर्द के मारे, बीमारियों से जूझते मरीज वहाँ लाइन लगाए बैठे मिल जाते. हर डाक्टर अपने ओपीडी सेशन में बीस-तीस फ़ाइलें निपटाता और इन सबमें शाम के कोई चार पाँच तो बज ही जाते. इसके लिए मरीज को सुबह नौ बजते बजते ओपीडी में अपना कार्ड दिखा कर फ़ाइल नंबर और डाक्टर जिससे मिलना है उसका नाम बताना पड़ता. रजिस्टर में नंबर दर्ज होने के हिसाब से फ़ाइल ऊपर नीचे रहती. कुल मिला कर दिन भर का काम होता यह.

हम कितना भी सुबह पहुँच जाएं, जाने कैसे, हमारा नंबर पंद्रह के बाद ही आता और डॉक्टर के पास पहुँचते पहुँचते शाम के प्रायः तीन या चार बज जाते. डॉक्टर भी, कभी आते, कभी नहीं और मामला चूंकि हृदय रोग का होता था, वीआईपी लोग भी वहीं इलाज कराने आते थे तो अक्सर इमरजेंसी भी होती और डॉक्टर इमरजेंसी में बिजी हो जाते और उस दिन का ओपीडी कैंसल हो जाता. यानी दो दिन बाद फिर हाजिरी देनी होगी तब सुनवाई होगी. तारीख पे तारीख का फंडा केवल न्यायालय में नहीं होता, सरकारी अस्पतालों में भी जमकर होता है मी लॉर्ड और यहाँ की तारीख और भी बुरी होती है – मर्ज बढ़ता जाता है, दवा होती नहीं है.

खैर. 3 जून 94 को डॉ तलवार ने मेरी फ़ाइल देखी और एम्स में ही इको कार्डियोग्राफ़ी दोबारा करवाने की सलाह लिख दी. जिसके लिए तिथि मिली – 10 जून 94. जी हाँ, सप्ताह भर बाद की तिथि. रतलाम से निकले हमें महीना भर होने को था, और नतीजा ठनठन गोपाल था. जेब के पैसे धुँए की तरह उड़ रहे थे. ऊपर से 10 जून तक हमें बाहर कमरे में रह कर दिल्ली में समय काटना था. आए थे इलाज को, काटन लगे समय. उस समय, मेरे परिवार वाले लोगों के द्वारा, मेरी हर बात का, हर इच्छा का यूँ खयाल रखा जाता कि जैसे बस, अब आगे कहाँ मौका मिलने वाला है. धीरे धीरे मैं भी कंडीशन्ड हो गया. कहीं जाना होता तो मरियल चाल में. बात करता तो जैसे दम निकल रहा हो. कोई पूछता कि कैसे हैं तो कहता – हालात ठीक नहीं है. कृत्रिम तौर पर तो मैंने अपने आप को एक तरह से मार ही लिया था, और एक जिंदा लाश को, जैसे ढो रहा था.

न खाने में मन लगता था न पीने में. उदासी ने मन में घर बना लिया था. उसी दौरान स्टीवन स्पीलबर्ग की जुरासिक पार्क सीरीज की पहली फ़िल्म रिलीज हुई थी जिसका बड़ा तहलका मचा हुआ था और अखबारों में रोज उसके समाचार और रीव्यूज आते. मेरे मुंह से उस फिल्म को देखने की बात यूँ निकली और यूँ पूरी हुई. इस संशय में कि मैं कल को रहूं या न रहूं, मेरी हर इच्छा तुरंत पूरी होनी ही थी. तो, यूं हमने वह फिल्म देखी. तब तो केवल टॉकीज ही हुआ करते थे फिल्म देखने को. और, जनाब फिल्म में क्या तो आनंद आया – जीवंत डायनॉसौर को सिल्वर स्क्रीन से निकलते देखना अजूबा था. तब के अनुभव की तुलना करें तो अभी कुछ बरस पहले आई अवतार और अभी-अभी की बाहुबली भी फीकी रही समझिए! स्पीलबर्ग का धन्यवाद कि हम अगले दो-तीन दिन तक अस्पताल-बीमारी आदि की बातें भूल कर बस डायनॉसौरों में ही खोए रहे.

जैसे तैसे इकोकार्डियोग्राफ़ी हुई, और, बुरा हो एक-दिन-छोड़कर-ओपीडी सिस्टम का, रिपोर्ट दो दिन बाद मिली और उसके दो दिन बाद, यानी 15 जून 94 को इको कार्डियोग्राफ़ी की रिपोर्ट देखने के बाद डॉ. तलवार ने दोबारा एंजियोग्राफ़ी करवाने की सलाह दे दी. एंजियोग्राफ़ी के लिए कैथ लेब में मरीजों की महा लंबी लाइन लगी थी, तत्काल में कोई डेट उपलब्ध नहीं थी, बहुत से डॉक्टर व तकनीशियन गर्मी की छुट्टियों में जा रहे थे अतः अगली तिथि दो महीने बाद की, 3 अगस्त 94 की दी गई. हम दिल्ली से अपने गृह नगर राजनांदगांव वापस हो गए और बच्चों को उनके ननिहाल से लेकर वापस रतलाम आ गए. अगस्त का इंतजार करने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था.

मेरी हृदय संबंधी गंभीर बीमारी की खबर रिश्तेदारों और मित्र-मंडली में जंगल में आग की तरह फैली. रतलाम वापस आने पर प्रायः रोज ही शुभाकांक्षी मित्र या रिश्तेदार पधारते. हर किसी के पास अपने अनुभव और चिकित्सा संबंधी सलाह या टोने टोटके या देसी-विदेसी उपाय. कोई रेकी करने की सलाह देता तो कोई गेहूं की बालियाँ चबाने की. किसी ने साईं बाबा के यहाँ मानता मानी तो किसी ने मेरे ठीक होने पर भागवत कथा करवाने का संकल्प लिया. रेखा (पत्नी) कभी-कभी इन झमेलों में पड़ जाती, और कभी सचमुच के चाहने वाले जोर जबरदस्ती करते तो हम कुछ टोने-टोटके कर भी लेते या देसी इलाज कुछ दिन ले लेते मगर, जाहिर है, होता हवाता कुछ नहीं था. वैसे भी मुझे अच्छी तरह से पता था कि मेरा इलाज न टोने टोटके से होगा और न ही ईश्वर के आगे घंटी बजाने से. मेरी समस्या का समाधान केवल हृदय की शल्य चिकित्सा है, और अब तो वह भी संभव प्रतीत नहीं हो रहा है. ईश्वर यदि अगर कहीं है तो उसने मानव जाति पर, बीमारियाँ थोपकर बड़ा जुल्म किया है, और मैं तो उसे कभी माफ नहीं करने वाला क्योंकि उसने तो बिना वजह मुझे जन्मजात बीमार बना दिया.
एक बार एक पारिवारिक मित्र के बहुतेरे आग्रह करने पर कि नीमच के पास स्थित भादवा माता मंदिर में ब्रह्म-मुहूर्त में स्नान कर और गीले कपड़े में ही देवी दर्शन करने पर सब तरह की बीमारियाँ दूर हो जाती हैं, हमारा और मित्र का परिवार वहाँ स्नान करने चला गया. बीमारियाँ क्या तो दूर होतीं, सर्दी-बुखार और डायरिया के इन्फ़ैक्शन साथ लेकर लौटे. मानवीय आस्था जो न कराए कम है.

इसी तरह की एक बात और याद आ रही है. जब मैं ठीक हो गया था, तो ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए, जिसके लिए मैंने नहीं, मेरे अजीज लोगों ने मानता मानी थी और जिनका मान रखना मेरा धर्म था, शिरडी के मंदिर में दर्शनार्थ पहुँचे. वहाँ की अनियंत्रित भीड़ और कुव्यवस्था में मेरी बेटी जो अभी दो साल की भी नहीं थी, जिसे हम गोद में लिए हुए थे, उसकी पीठ में किसी पुजारन की थाली चुभ गई और गहरा जख्म कर गई. उस दिन से मैंने किसी मंदिर में जाने से तौबा भी कर लिया. खासकर ऐसे मंदिरों में जहाँ आस्था के नाम पर अनावश्यक भीड़ होती है. दरअसल, मंदिर तो अपने मन के भीतर होता है, उसमें के दीप को जलाए रखे जाने की जरूरत होती है – और यहीं हम भूल करते हैं और दूसरों को दिखाने के लिए बाहरी दीप – प्रायः चमक धमक और शोर शराबे वाला – जलाते हैं.

एक-एक दिन जैसे-तैसे काटते-काटते अंततः जब हम तय दिनांक 2 अगस्त 94 को दोबारा एंजियोग्राफ़ी करवाने वापस एम्स दिल्ली की और रतलाम से ट्रेन से शाम को चले तो झमाझम बारिश हो रही थी. मूसलाधार बारिश के बावजूद बहुत से मित्रगण स्टेशन पर छोड़ने आए. परंतु वहाँ 3 अगस्त की तिथि में कोई इमरजेंसी हो गई तो हमें 4 अगस्त की तारीख दी गई. मगर पूरे दिन इंतजार करने के बाद उस दिन भी एंजियोग्राफी नहीं हुई तो फ़ाइल में फिर से आगे की तिथि लिख दी गई. दिल्ली दिलवालों की नहीं है – खासकर ऐम्स का कार्डियोलॉजी विभाग. अंतहीन इंतजार में बस प्राण निकलना ही रह गया, बाकी सब भुगत लिया. अंततः तिथि आगे बढ़ते बढ़ते 9 अगस्त 94 को एंजियोग्राफ़ी की गई. मगर, तब क्या पता था कि अभी तो महीना भर और इंतजार करना होगा – रिपोर्ट पाने और डॉक्टरी सलाह मिलने में. उस समय एम्स दिल्ली में कार्डियोलॉजी विभाग में देश का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था और हम उत्साहित थे कि हमारा भी इलाज अब हुआ तब हुआ. पर मामला उलटा ही हुआ.

एंजियोग्राफ़ी तो हो गई परंतु उसकी रिपोर्ट जाने कहाँ गुम हो गई. रिपोर्ट बनाने वाले डाक्टर मिलते नहीं थे – किसी ने बताया कि उनका एक्सीडेंट हो गया है और वे छुट्टी पर हैं. हम ओपीडी में हर दूसरे दिन जाते और रिपोर्ट ढूंढते. वहाँ स्टाफ हमसे पूछता कि आपकी एंजियोग्राफ़ी किसने की? हमें तो पता ही नहीं था कि किसने की. कई कार्डियोलॉजिस्ट थे वहाँ और उस दिन किसकी ड्यूटी थी, किसने एंजियोग्राफ़ी की थी यह तो संस्था में ही रेकार्ड होगा ना. अंततः एंजियोग्राफ़ी की रिपोर्ट, एंजियोग्राम होने के ठीक 16 दिन बाद, 26 अगस्त को मिली. आप कल्पना कर सकते हैं – एक ऐसे मरीज की जो पल पल मौत के मुंह की ओर बढ़ रहा है, वो रोज अस्पताल का चक्कर महज एक रिपोर्ट के लिए कर रहा है ताकि उसके जीवन की फ़ाइल एक डॉक्टर आगे बढ़े! और वहाँ अस्पताल तो मरीज के साथ डॉक्टर-डॉक्टर का खेल खेल रहे हैं. तारीख पे तारीख दे रहे हैं.

पर, डॉक्टर भी क्या करे. सिस्टम भी क्या करे. असंख्य लोगों की बिलबिलाती भीड़ में कोई भी तंत्र कहीं भी काम नहीं करने वाला. नित्य सौ मरीजों को मरता देख डॉक्टरों की संवेदनाएं भी मर जाती हैं. उनके लिए हम मनुष्य नहीं, केवल मरीज होते हैं, जिसे एक ओपीडी नंबर मिला होता है. परंतु बाद में, बहुत बाद में मुझे यह भी महसूस हुआ कि नहीं, मैं गलत था. बहुत से मामलों में, डॉक्टर के लिए मरीज भी बहुमूल्य होता है, मरीज की संवेदनाएँ भी डांक्टर से अंतर्गुंथित होती हैं, और मरीज के कष्ट में डॉक्टर को भी कष्ट होता है. आगे कहानी में कई-कई बार यह बात स्पष्ट होगी.

इस देरी से घबरा कर रेखा ने जैसे तैसे कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. तलवार से मुलाकात का समय लिया और पूछा कि इलाज में इतनी देरी हो रही है और उधर मरीज नर्वस हो रहा है. डॉ. तलवार ने निस्पृह और व्यंग्यात्मक भाव से कहा कि मरीज नर्वस हो रहा है तो क्या हुआ यहाँ पांच मंजिला मनोरोग विभाग है. पहले वहाँ इलाज कर उसका नर्वसनेस दूर कर देंगे फिर यहाँ हृदयरोग विभाग में उसके हृदय का इलाज कर देंगे. क्या समस्या है? पर समस्या ये थी कि वहाँ रोज ओपीडी में लाइन लगने के बाद भी इलाज मिल नहीं रहा था.

आखिर में, 28 अगस्त को, जैसे तैसे डॉ. के. एस. अय्यर ने दोबारा की गई एंजियोग्राफ़ी देखी और इलाज में किसी तरह की सर्जरी से मना करते हुए दवाई लिखी –
- फ़ेसोविट कैपसूल – दिन में एक बार, तीन माह तक
- बीकोसूल कैपसूल – दिन में एक बार, एक माह तक

और उन्होंने मेडिकल फ़ॉलोअप व सेकंड ओपीनियन के लिए वहाँ के एक अन्य नामी हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कोठारी से सलाह लेने के लिए लिखा.

31 अगस्त 1994 को डॉ. कोठारी ने मेरी फ़ाइल देखी और सर्जरी में खतरा बताते हुए मुझे दवाई लिखी – फ़ेसोविट सिरप 1 चम्मच दिन में एक बार.

भारत के नामी और अग्रणी चिकित्सा संस्थान एम्स ने इस तरह मेरे जन्मजात हृदय रोग का मेरा क्या शानदार इलाज किया था. दो बार के दो महीने के ट्रिप और लाख रुपए खर्च होने के बाद इलाज के रूप में एक आयरन टॉनिक. अब मेरे जीवन के सामने एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा हो गया था – मेरी स्थिति बिगड़ रही थी, उठने बैठने में चक्कर आने लगे थे. 

मौत आसन्न थी, बस समय का इंतजार था.

 कितने दिन? सप्ताह, माह या बरस? कितने?

ऊपर से, वहाँ चिकित्सकों ने रेखा को बताया – देखो, इनके जीवन के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. ये दो माह भी जी सकते हैं, दो साल भी. अधिकाधिक आराम और शारीरिक श्रम से बचकर, दिल पर तनाव से यथासंभव बच कर जीवन लंबा किया जा सकता है बस. और फिर फिलासफी झाड़ते कि आदमी आया है तो जाने के लिए ही, और एक दिन तो हम सब को जाना ही है. पर मैं तो अभी आया ही था, रेखा की जिंदगी में तो कुछ लम्हे ही बीते थे, और मेरे जाने की बातें की हो रही थीं.

सरकारी अस्पतालों के साथ त्रासदी यह है कि लालफ़ीताशाही और भ्रष्टाचार और आपणो क्या (यानी सरकारी कर्मियों के - इसमें हमारा क्या) एटीट्यूड के चलते समय बहुत लगता है. जिसके कारण चीजें सस्ती होते हुए भी भयंकर महंगी पड़ती हैं. जहाँ प्राइवेट अपोलो अस्पताल मद्रास में मेरा इकोकार्डियोग्राम व एंजियोग्राम आदि जांच तीन दिन में हो गए, और कुल खर्च जांच व रहने ठहरने समेत कोई 20 हजार रुपए में हो गया, वहीं सरकारी आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ दिल्ली में दो बार में कुल पैंतालीस दिन लगे और खर्च हुए 1 लाख रुपए से अधिक.

पूरे महीने भर दिल्ली में रहने और रोज अस्पताल के चक्कर खाते रहने के दौरान एक अच्छी बात यह हुई कि मैं व्यंग्यकार बन गया. कविता तो ख़ैर हर मानुस करता है जिसके हृदय में प्रेम बसता है, और मैंने भी अपनी किशोरावस्था में बहुत सी, अपने-हिसाब-से-उम्दा कविताएँ लिख मारी थीं, जिन्हें छापने का दुस्साहस किसी संपादक ने तब तक नहीं किया था और इस तरह मैं एक अनजान, मगर उभरता हुआ कवि था. एम्स दिल्ली ने मेरे दिल के कवि को मार दिया और व्यंग्यकार बना दिया. ओपीडी के चक्कर में हमारे पास समय ही समय रहता, और समय पास करने के लिए हम रोज 2-3 समाचार पत्र खरीदते और एक-एक लाइन दो तीन बार पढ़ मारते. पंजाब केसरी में उन दिनों अंतिम पृष्ठ पर नित्य ही हास्य-व्यंग्य छपता था. मैंने कुछ मिलते-जुलते सामयिक व्यंग्य टाइप लिखने का प्रयास किया और उनमें से कुछ छप भी गए. जीवन में यदि दर्द का दरिया निरंतर बहता है तो यदा कदा खुशी के टापू भी आते हैं. व्यंग्य लेखन ने जीवन को पहचाने का, उसके उसी रूप में ग्रहण करने का एक नया नजरिया भी दिया. मेरी प्रेम कविताएँ व्यंग्यात्मक ग़ज़लों और व्यंज़लों में बदल गईं. दो खास पेश हैं-

जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषाएं
सोचो तुम किनको इंसान कहते हो

नैनों का जल अभी सूखा नहीं है
पहचानो उन्हें जिन्हें महान कहते हो

सूचियाँ सब सार्वजनिक तो करो
जानते हो किनको भगवान कहते हो

जमाने को मालूम है बदमाशियाँ
कैसे अपने को नादान कहते हो

कभी झांके हो अपने भीतर रवि
औरों को फिर क्यों शैतान कहते हो
--.

जीने की खबर है
मरने की खबर है

अपने दोस्तों के
जलने की खबर है

उनके नासूरों के
भरने की खबर है

डरावने लोगों के
डरने की खबर है

दो प्रेमियों के
लड़ने की खबर है

किसी कंगाल के
खाने की खबर है

दर्द को रवि के
सहने की खबर है
--

लौट के बुद्धू घर को


अब यह तो ऐसी बात हो गई कि अस्पताल कहे - भई, अब मरीज की हालत किसी सूरत संभल नहीं सकती, इसे घर ले जाओ, अब मरीज को दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है. मेरा बेटा चार साल का हो रहा था, मेरी बेटी अभी ठीक से चलना सीख ही रही थी और उनके अनाथ होने का खतरा मंडराने लगा था. एम्स, दिल्ली के डॉ. कोठारी का बताया इलाज – मल्टीविटामिन सिरप का एक घूंट प्रतिदिन या अपोलो मद्रास के डॉ. सुब्रमणियम का इलाज – एंटीडिप्रसेंट - आल्प्रैक्स 25 एमजी प्रतिदिन कोई इलाज नहीं था यह तो सबको पता था.

देश के दो प्रमुख चिकित्सा संस्थानों से मना हो जाने के बावजूद प्रेमीजनों के सुझाव व सलाह जारी रहे. कहीं से पता चला कि बैंगलोर के पास पुट्टपार्थी सत्य साईं अस्पताल में निःशुल्क हृदय शल्य चिकित्सा तो होती ही है, जाने माने विदेशी शल्य चिकित्सक भी आते हैं और जटिल, असंभव सी शल्यक्रियाएँ भी निःशुल्क करते हैं और मेरे जैसे टिपिकल मरीजों को ठीक करते हैं. अक्तूबर 84 मैं अपने एक साईं भक्त मित्र क्षीरसागर को साथ लेकर वहाँ गया. वहाँ का अनुभव तो और भी बुरा था. मीलों लंबी लाइन लगी थी, गंभीर से गंभीर हृदय रोगियों को, जिन्हें बाईपास सर्जरी की तत्काल जरूरत थी, एक साल बाद की तिथि दी जा रही थी. मेरी फ़ाइल देखते ही वहाँ के डॉक्टर ने जो स्क्रीनिंग कर लोगों को आगे कार्डियोलाजिस्ट के पास भेज रहा था, एम्स दिल्ली को रेफर कर दिया और कहा कि ऐसे टिपिकल केस तो यहाँ नहीं ही देखे जाते. मैं वापस दिल्ली क्या जाता! वहाँ से तो लौटकर आया ही था.

आसन्न मौत और व्यस्त जिंदगी


मैंने कहीं पर बताया है कि मैं सोचने लगा था कि दिन कटेगा या नहीं और रात में सोता था तो सोचता था कि सुबह होगी या नहीं. रेखा को भी कुछ कुछ ऐसा लगने लगा था और उसने मुझे बाद में बताया था कि वो भी रातों में कई बार उठ-उठ कर मेरी सांस व मेरी धड़कन चेक करती थी – कि मैं अभी भी जिंदा हूँ या नहीं. बहुत से हृदय रोगियों के बारे में खबर आती रहती थी कि एक पल पहले वे थे और दूसरे पल वे नहीं रहे. लोग बातें करते – जो भी हो, ईश्वर ने उन्हें अच्छी मृत्यु दी. एक दिन जाना सबको है. घिसट-घिसट कर और भुगत-भुगत कर मरने से अच्छा है फट से चले जाओ. लगता मेरा भी फट अब आया तब आया – आज आया, कल आया.

फिर मैंने अपने आपको व्यस्त रखने का सोचा ताकि नेगेटिव विचारों से अपने आप को अधिकाधिक दूर रख सकूं. पढ़ने लिखने में मेरी रूचि शुरू से ही थी. उस समय चारों ओर एमबीए का जोर बहुत था, अर्थव्यवस्था खुल रही थी. मैं इग्नू दिल्ली के एमबीए चयन परीक्षा में बैठा और पास हो गया. अगले छः महीनों में मैंने कोई चार पेपर भी निकाल लिए. इसके लिए मैं रतलाम से ट्रेन से सुबह सुबह इंदौर जाता, वहाँ टैम्पो से परीक्षा सेंटर जाता दो घंटे पेपर लिखकर फिर वापस ट्रेन से रतलाम आता. मैंने अपनी बीमारी को कुछ इस तरह भुलाने की कोशिश की. नौकरी तो मैं कर ही रहा था, जहाँ दिन व्यस्तता में निकल आते. साथी सहकर्मी यथासंभव मुझसे मेरी बीमारी आदि की बातें नहीं करते. पर कभी कभार कोई पूछ बैठता – तबीयत कैसी है? तब लगता – अरे! मैं तो क्रिटिकल कंडीशन वाला हृदय रोगी हूँ. और तब अवसाद की जड़ें फिर-फिर उग आतीं.

वैकल्पिक चिकित्सा के जाल में


अब चूंकि सर्जरी से मना कर दिया गया था, अतः वैकल्पिक चिकित्सा – जो जहाँ जैसे कहता वो करने लगा. तमाम तरह के आयुर्वेदिक, यूनानी दवाइयाँ, घरेलू नुस्खे – अर्जुनारिष्ट से लेकर अर्जुन की छाल और लौकी के जूस तक और विशिष्ट, स्वर्णभस्म युक्त च्यवनप्राश तक आजमाए, कोई फर्क महसूस नहीं हुआ. होमियोपैथी भी अपनाया और रेकवेग कंपनी का एक लिक्विड फार्मूलेशन बहुत दिनों तक लेता रहा उससे और कुछ नहीं तो मानसिक संबल मिलता था. वह फार्मूलेशन 40 प्रतिशत अल्कोहल में आता था और उसकी कोई दस-बारह बूंद दो चम्मच पानी में डालकर लेना होता था. मेरे सहकर्मी राजेन्द्र पाण्डेय जिन्होंने मेरी बीमारी के दौरान हर किस्म से मेरी सहायता की जिसके लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहूंगा, मजाक में मुझसे कहते थे कि आप बहाने से दिन में तीन बार टाइनी पैग लेते हैं.

राजेन्द्र पाण्डेय सहज योग के बड़े भक्त हैं और मां निर्मला देवी की तस्वीर के सामने ध्यान करते हैं. उनके मुताबिक मेरी समस्याओं का हल सहज योग से संभव था. दो एक बार वे मुझे सहज योग में भी ले गए जहाँ कुछ सहज योगियों ने मेरे शरीर के विभिन्न हिस्सों में अपने हाथ रख कर करेंट जैसा मिलने आदि की पुष्टि की. मगर मुझे तो कुछ खास महसूस नहीं हुआ, उल्टे, उनके मुताबिक, उनके ही हाथों में तीव्र करेंट का अहसास हुआ और उन्होंने मुझ पर प्रयोग करना छोड़ दिया.

मेरे एक अन्य सहृदय सहकर्मी चिमनलाल जैन ने भी वक्त बेवक्त सदैव साथ दिया. वे श्रीश्री रविशंकर के आर्ट आफ लिविंग के भक्त हैं और कई कोर्स किए हुए हैं और वे भी अदृश्य शक्तियों के द्वारा कुंडलिनी जागृत कर बीमारों को इलाज प्रदान करते थे. एक बार मैं उनके कहने पर इसके बेसिक कोर्स में भी शामिल हुआ और पूरे समय अपने आप को कोसता रहा. नतीजा सिफर होना ही था. और, ये बात भी दीगर है कि दूसरों का योग शक्ति से इलाज करने वाले चिमनलाल जैन की बाद में दो बार बाई पास सर्जरी हुई.

तब के मेरे बॉस अरुण कामरिया ने भी बहुत सहयोग दिया. वे स्वयं भुक्तभोगी थे. कुछ समय पहले उनके गले की सर्जरी हुई थी और वे भी एक समय क्रिटिकल कंडीशन में थे. वे बातों को समझते थे, और हमें भी समझाते थे. उनकी पत्नी भी सहृदय थीं और उन्होंने मुझे इमोशनली व फ़िजिकली सम्हालने के लिए रेखा को कई टिप्स भी दिए जिनका वो आज भी पालन करती हैं.

मद्रास मेडिकल मिशन का चमत्कारिक पत्र-


इस बीच, चूंकि वो जमाना गूगल का नहीं था, और न ही याहू या अल्टाविस्टा प्रसिद्ध हुए थे, लोगों की बातों, चर्चाओं, खबरों आदि के हवाले से प्राप्त ज्ञान के आधार पर, और किसी के कहने पर – जो मैं भूल गया - मैंने अपनी फ़ाइल की प्रति हृदय रोग विभाग, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर भेज दी थी. उस जमाने में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर की प्रसिद्धि चहुँ ओर थी, और जटिल बीमारियों के इलाज आदि के संबंध में उस संस्थान की बहुत सी किंवदंतियाँ भी चला करती थीं. वेल्लोर से मैं जवाब की प्रतीक्षा करता रहा, परंतु मेरे पास वेल्लोर से कभी कोई जवाब नहीं आया.

16 अक्तूबर 94 को डाक में इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो वस्कुलर डिसीज़, मद्रास मेडिकल मिशन, मद्रास के डायरेक्टर, हृदय रोग सर्जन, पद्म श्री डॉ. के. एम. चेरियन की एक चिट्ठी मुझे मिली. चिट्ठी पढ़कर जाने क्यों मुझे लगा कि मेरे जीवन में कहीं आशा का तारा टिमटिमाया है. कुछ चमत्कार सा होने वाला है.

पत्र में लिखा था –


प्रिय श्रीवास्तव जी,
आपका सीएमसी वेल्लोर को लिखा पत्र मुझे मेरे अभिमत के लिए अग्रेषित किया गया था, हमने आपकी फ़ाइल देखी है और हमारे लिये यह जरूरी है कि हम आपकी एंजियो फ़िल्म को देखें. आपके लिए निम्न तीन विकल्प इलाज के तौर पर उपलब्ध हैं –
1 – आपके दिल के छेद को बंद करना, पल्मोनरी वाल्व को निकाल बाहर कर उसमें जमे कैल्शियम को साफ करना तथा फिर से उसे लगाना.
2 – आपके दिल के छेद को बंद करना तथा वेंट्रिकल से पल्मोनरी आर्टरी के बीच एक पाइप लगाना.
3 – टोटल केवो पल्मोनरी कनेक्शन (TCPC)
अतः कृपया अपनी एंजियो फ़िल्म हमें भेजें ताकि उसे देख कर हम आपको उचित सलाह व उपचार दे सकें.
आपका,
डॉ. के. एम. चेरियन
एम एस, एफआरएसीएस

मैंने उक्त पत्र को सैकड़ों बार पढ़ा. हर बार एक नया रोमांच होता. मुझे लगता तो क्या मेरी बीमारी लाइलाज नहीं है? क्या मैं पूरी तरह से ठीक हो जाउंगा? बिना कोई दूसरा विचार किए, मैंने शीघ्र ही उनको अपनी दोनों – अपोलो मद्रास व एम्स दिल्ली की एंजियो फ़िल्म पंजीकृत डाक से भेज दी और बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगा. एक-एक दिन जैसे युगों-युगों जैसे लग रहे थे. मगर मुझे क्या पता था कि आगे अभी और भी ढेरों इंतजार के, उतार चढ़ाव के पल आने वाले हैं जिसमें मेरे जीवन की डोर कभी भी टूट सकती थी, और एक बार तो कम्प्लीट हार्ट ब्लॉक भी हो गया था, और मैं यमराज के द्वार से वापस लौटाया गया था!

4 नवंबर 1994 को डॉ. चेरियन का जवाबी पत्र आया –

प्रिय श्रीवास्तव जी,
अपनी एंजियो फ़िल्म भेजने के लिए धन्यवाद. हमने उसे रीव्यू किया और पाया कि आपका इलाज सर्जरी से संभव है, जिसमें आपके हृदय के छेद को बंद किया जाएगा और वेंट्रिकल से पल्मोनरी आर्टरी तक एक कंड्यूइट लगाया जाएगा. आपको पेसमेकर भी लगाना पड़ सकता है.
यदि आप यह इलाज करवाना चाहते हैं तो हमें पहले से सूचित करें ताकि संबंधित व्यवस्था की जा सके. मरीज के लिए जरूरी जानकारियों के पत्रक अलग से संलग्न हैं.
आपका,
डॉ. के. एम. चेरियन

मैंने वह पत्र रेखा को दिखाया. भारत के सबसे बड़े हृदय शल्य चिकित्सा संस्थानों - अपोलो मद्रास से लेकर एम्स दिल्ली तक ने हाई रिस्क केस के नाम पर मुझे – यहाँ तक कि लिखित में – चेतावनी सी दे दी थी कि मेरा सर्जरी से इलाज बेहद ही जटिल, खतरनाक और मृत्यु तुल्य हो सकता है. और अब हमारे सामने एक विकल्प आ गया था – सर्जरी का. एक ऐसे सर्जन की चिट्ठी आई थी, जिसके पास मेरा केस कहीं और से रेफर होकर गया था और जिसने अभी मुझे देखा भी नहीं था, जिसमें किसी रिस्क की बात नहीं थी और मेरी सर्जरी हो सकने की बात लिखी थी.

चार दिन तो हमने हां या ना में गुजारे. अंततः मैंने व रेखा ने यह तय किया कि इस मामले में किसी से कोई राय नहीं लेनी है और न ही किसी से पूछना है. बस, रोज-रोज, तिल-तिल कर मरने के बजाए एक बार का रिस्क लेना ही उचित होगा. और हमने तय किया कि अब जब इलाज होने की संभावना सामने आ गई है तो सर्जरी करवाना ही एकमात्र विकल्प है. हमने एक दूसरे के कंधे पर सिर रख कर दिल खोल कर आंसू बहाए, मन हल्का किया और फिर आंसू पोंछ कर युद्ध की तैयारी में जुट गए.

डॉ. चेरियन के पत्र में कहीं भी किसी तरह के खतरे आदि की बात नहीं की गई थी, और एक मरीज के लिए यह बहुत बड़ी बात थी. अब तक का मेरा अनुभव ये था की हर चिकित्सक ने मुझे गंभीर, खराब हालत और लाइलाज जैसी स्थिति में देखा और बताया था, और मैं हर दिन जी और मर रहा था. जीने की आशा उस दिन से पहली बार, चमत्कारिक रूप से बलवती होनी शुरू हुई. आदमी को उसकी शारीरिक कम बल्कि मानसिक बीमारियाँ ज्यादा मारती हैं.

एक बार फिर मद्रास की ओर


इस बार हमने कोई जल्दी नहीं की और शांति से पूरा प्लान बनाया. सर्जरी के लिए हमने 19 मई1995 को मद्रास मेडिकल मिशन अस्पताल में भर्ती होने का तय किया. मैं विद्युत मंडल में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत था और रेखा (पत्नी) शासकीय कन्या महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत थी. तब स्कूलों और कॉलेजों में गर्मी की डेढ़-दो माह की छुट्टियाँ होती थीं. कॉलेज 15 मई से डेढ़ माह के लिए बंद हो रहा था और छुट्टियाँ चालू हो रही थीं. इसी छुट्टी का उपयोग करने का सोचा गया क्योंकि पिछले साल भर से यहाँ वहाँ भटकते रहने की वजह से मेरी छुट्टियाँ तो खत्म हो ही गई थीं, रेखा को तो गर्मी की छुट्टियाँ मिलती थीं तो अन्य अर्जित छुट्टियाँ मिलती ही नहीं थी और उसे भी अवैतनिक अवकाश लेना पड़ता.

रतलाम में हमारा परिवार न्यूक्लियर यानी एकल था – संयुक्त नहीं था. मैं बीमार हो चला था, दोनों बच्चे छोटे थे, उन्हें रेखा सुबह से तैयार कर, खाना आदि बना कर झूला घर छोड़ते हुए कॉलेज जाती थी और कॉलेज से लेते हुए आती थी. तब तो समझ नहीं आता था, परंतु अब समझ में आता है कि कुछ झूलाघर में बच्चों को छोड़ते समय वे बहुत रोते थे. बच्चों के साथ आउट आफ साइट आउट आफ माइंड का फंडा चलता है. जब हम उन्हें सुबह झूलाघर छोड़ने जाते तो वे खुश होकर बाहर जाने को तैयार हो जाते. परंतु झूलाघर का दरवाजा देखते ही बिलखने लग जाते. जरूर ही उनके साथ झूलाघर में बुरा बर्ताव होता होगा. बेचारे बच्चे कुछ बता पाने में असमर्थ जो रहते थे. सचमुच बहुत ही कठिन दिन थे वे. ऐसे कठिन दिनों में रेखा की सहकर्मी व मित्र वर्षा करंदीकर का सहयोग बहुत मिला. जब भी उसके पास समय मिलता वो हमारे बच्चों को अपने घर ले जाती व एक मां से भी बढ़कर उनका ध्यान रखती.

इस दौरान मेरी बड़ी दीदी कमला भी हमारी मानसिक संबल बनी रहीं. उन्होंने रेखा को कई इमोशनल पत्र लिखे जिसमें न केवल रेखा की हौसला अफजाई की, बल्कि रास्ते भी दिखाए. उनके लिखे पत्र का एक संक्षिप्त हिस्सा कुछ यूँ है –

रेखा,
आशीष,
तुम चिन्ता नहीं करना. रवि को सहानुभूतिपूर्वक समझाते रहना. अपने स्वास्थ्य एवं बच्चों के तरफ भी खयाल रखना. एक पत्नी ही तो सबकुछ कर सकती है जो कोई नहीं कर सकता है. हम लोग दूर हैं एवं तुम ही मित्र, पत्नी, माँ, बहिन के रूप में रवि को ढांढस बंधाती रहो. उसे किसी प्रकार की चिन्ता न हो. हमारे परिवार ने तुममें सभी गुण पाया है. मेरी प्रेरणा है कि तुम रवि को हर तरह से खुश रखने की कोशिश करो ताकि उसे अपनी तबीयत की खराबी का अहसास कभी न हो.
तुम्हारी दीदी – कमला.

निर्धारित तिथि को एक बार फिर बच्चों को उनके ननिहाल छोड़ा गया और हम फिर पहुँच गए मद्रास. इस बार मद्रास मेडिकल मिशन, मद्रास सर्जरी के लिए. हम रतलाम से 17 मई को निकले. तय तिथि – 19 मई 1995 को मुझे विजया अस्पताल में भर्ती कर दिया गया. तब मद्रास मेडिकल मिशन का हिस्सा विजया हास्पिटल, वडापलानी, मद्रास में लगता था. बाद में मद्रास मेडिकल मिशन की अलग बिल्डिंग बन गई थी तो वह वहां शिफ़्ट हो गया था. इस बार हमारे साथ रेखा की बड़ी बहन उमा व उनके पति चंदर – जिन्होंने मेरे लिए वहां रक्तदान भी किया था, हमारा मनोबल बढ़ाने हमारे साथ थे. तत्काल ही सर्जरी के लिए आवश्यक तैयारियाँ शुरू हो गईं. सर्जरी की तिथि 23 मई की दी गई थी. सर्जरी के लिए आवश्यक जांच पड़ताल हेतु खून आदि के सैम्पल लिए गए. एक बार फिर से इको कार्डियोग्राफ़ी की गई. एंजियो फ़िल्मों का फिर से अध्ययन किया गया. 22 मई की रात को होल बॉडी शेव किया गया. मेरी मूंछें भी साफ कर दी गईं और मैंने आइने में एक बदसूरत अजनबी को सम्मुख पाया. जिजीविषा कुछ भी करने करवाने को माहिर है. रात 8 बजे के बाद कुछ भी खाने पीने से मना किया गया – अगले दिन सर्जरी थी. क़त्ल की रात थी. अगले दिन का सूरज मेरे लिए नई रौशनी लेकर आने वाला था.
मेरे लिए वह सुबह जल्दी ही हो गई थी. शायद रात में मुझे कोई निद्राकारक दवाई दी गई थी जिससे मैं सो तो गया था, परंतु फिर जल्दी ही उठ गया था. 4 बजे. और तब से इंतजार कर रहा था – 8 बजे मुझे ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाने वाला था.

इंतजार करते करते 8 भी बजा, 9 भी और फिर जब 10 भी बज गए तो पूछताछ की गई. अब क्या गड़बड़ी हो गई. मुझे सर्जरी के लिए क्यों नहीं ले जा रहे. किसी को कुछ पता नहीं था, या बताना नहीं चाहता था. आखिर में 11 बजे एक ड्यूटी डॉक्टर आया और बोलकर गया कि आपकी सर्जरी में कुछ जटिलताएँ हैं, जिसके बारे में कान्फ्रेंस में फिर से चर्चा होगी, तब फिर कोई निर्णय लिया जाएगा.

लगा कि मैं नाहक ही बड़ी बड़ी आशाएँ लेकर आया था. यहाँ भी वही, अपोलो और एम्स वाली बात दोहराई जाएगी, और हमें बैरंग वापस लौटा दिया जाएगा. हमने फिर से इंतजार की देवी का आंचल पकड़ा और उसमें अपनी पीड़ा छुपाने का प्रयास करने लगे.

ईश्वर में मेरी आस्था कब की खत्म हो चुकी थी, परंतु रेखा की आस्था विकट है. गणेश चतुर्थी पर हर साल वो अपने स्वयं के हाथों से मिट्टी से गणेश जी की मूर्ति पूजा के लिए बनाती है. उसने वहाँ वार्ड में मेरे पलंग के पास दवाइयों के रैक के बाजू में ईश्वर की एक मूर्ति स्थापित कर दी. जिसे देख कर शीश नवाते हुए एक बार एक सर्जन ने कहा भी था – हम भी सर्जरी के लिए छुरी उठाते समय ईश्वर को याद करते हैं, उसे धन्यवाद देते हैं, और सबकुछ अच्छा करने के लिए आशीर्वाद मांगते हैं.

शाम को वार्ड में भर्ती मरीजों की नियमित पड़ताल करने डॉक्टर चेरियन आए तो वे मेरे बेड पर भी आए. वे एक औसद कद काठी के घुंघराले बालों वाले, गेहुँए रंग के गोल, मांसल चेहरे वाले और भारी भरकम आवाज के व्यक्ति थे. उनके व्यक्तित्व में एक आभामंडल सा फैला रहता. जब वो वार्ड में राउंड लगाते, उनके साथ डॉक्टरों की पूरी टीम चलती.

उन्होंने बताया कि मेरे इलाज के लिए सर्जरी का निर्णय लिया गया है. परंतु चूंकि यह एक जटिल किस्म की सर्जरी होगी, और चूंकि इसमें विशिष्ट चीज़ों की, और तैयारियों की जरूरत होगी, अतः इन चीजों को तैयार करने व इनके उपलब्ध हो जाने तक आपको इंतजार करना होगा. इसमें कोई सप्ताह भर का समय लग सकता है. उन्होंने यह भी विकल्प दिया कि चाहें तो आप अभी डिस्चार्ज हो जाएँ और सप्ताह भर बाद फिर से एडमिट हो जाएँ या फिर यहाँ एडमिट रहें, और जैसे ही हमारी तैयारी पूरी होगी हम सर्जरी करेंगे.

हमने तय किया कि अस्पताल में ही भर्ती रह कर इंतजार किया जाए. परंतु उमा व चंदर एक सप्ताह की तैयारी पर ही आये थे और उनकी अपनी जिम्मेदारी व नौकरियाँ थीं, तो वे वापस लौट गए और वहाँ मैं और रेखा अकेले रह गए. एक अच्छी बात यह थी कि सर्जन डॉ. चेरियन ने कभी भी यह नहीं कहा और न ही अहसास दिलाया कि सर्जरी में कोई खतरा भी है. 3 जून को वार्ड की सिस्टर ने रेखा को बताया कि सर्जरी की तिथि शुक्रवार, 9 जून 95 को तय की गई है. और फिर, अचानक 6 जून की रात में सिस्टर ने बताया कि तैयारियाँ पहले ही पूरी हो गई हैं, अतः सर्जरी अब एक दिन पहले, 8 जून को सुबह होगी.

इस बीच रेखा ने बहुत हिम्मत करके डॉ. चेरियन से बात करने के लिए समय लिया. उसने डॉ. चेरियन से अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में पूछा कि अब तक तो सभी बड़े-बड़े डॉक्टरों ने इनकी सर्जरी के लिए मना किया है और कहा है बड़ा रिस्की है और कुछ भी हो सकता है. रेखा ने डॉ. चेरियन से यह भी कहा कि पहले ऑपरेशन का दिन 9 जून था तो उस लिहाज से मेरे परिवार के लोग यहाँ आ रहे हैं, और 8 तारीख को तो मैं निपट अकेली रहूंगी. डॉ. चेरियन तमिल भाषी थे, और हिंदी नहीं जानते थे. उन्होंने आसान अंग्रेजी में रेखा को समझाया कि मैं रिस्क आदि की बात नहीं करता, मैं बस केवल अपना काम करता हूँ. हाँ, उलटे मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, बल्कि मैं उन सभी से यह प्रश्न पूछता हूँ जो मुझसे ऐसा प्रश्न पूछते हैं – आदमी सड़क चलते भी हादसों में मर जाता है. उसमें भी रिस्क फ़ैक्टर होता है. तो क्या आदमी सड़क पर चलना छोड़ देता है? वैसे ही हमारे लिए ये सर्जरी है. हम रिस्क से डरकर मरीज का इलाज बंद नहीं करते. डॉ. चेरियन ने आगे रेखा को आश्वस्त करते हुए कहा कि सर्जरी के दिन तुम अकेली नहीं रहोगी, हम सब तुम्हारे साथ रहेंगे. डॉ. चेरियन की बात से रेखा पूरी तरह से भले ही नहीं, परंतु थोड़ी आश्वस्त सी तो हो गई थी.

और फिर, बहुप्रतीक्षित, मेरे हृदय की शल्य चिकित्सा 8 जून की सुबह 10.30 बजे प्रारंभ हुई और कोई पांच घंटे चली. सर्जिकल टीम में डॉ. चेरियन के अलावा डॉ. सुरेश जी राव, डॉ. पन्नू एचएस भी थे और एनेस्थेसिया विशेषज्ञ थे डॉ. अजू जेकब और डॉ. सुंदरावल्ली. परफ्यूजनिष्ट थे – डॉ. तनवीर अहमद. दोपहर 3.30 बजे ऑपरेशन सफल रहने की जानकारी रेखा को दी गई. शाम को 5.15 बजे मुझे आईसीसीयू में शिफ़्ट किया गया और रात्रि 9.20 बजे रेखा को दूर से मुझे दिखाया गया. रेखा ने बताया - मैं नंगधड़ंग बेड पर बेहोश पड़ा था. मैं केवल एक मरीज था, लोकलिहाज से अंजान, बेसुध. मेरे चारों ओर दर्जनों तरह के उपकरण, मॉनीटर और पाइप लगे हुए थे. सिस्टर ने जोरों से मेरे बेड पर हाथ मारा और मुझे आवाज दी – मिस्टर श्रीवास्तव, मिस्टर श्रीवास्तव आपकी पत्नी देखिए विंडो पर है. मैं क्षण भर क लिए होश में आया, रेखा की ओर देखा, और फिर तुरंत फिर से बेहोश हो गया. इसके कोई चौबीस घंटे बाद मुझे होश आया – तब तक मुझे सेडेशन में ही रखा गया था.

जब मुझे ऑपरेशन के लिए ले जाया गया था तो अस्पताल प्रबंधन द्वारा रेखा से पूछा गया कि तुम्हारे साथ कौन है. रेखा ने बताया कि कोई नहीं तो उसे एक प्रार्थना स्थल पर ले जाया गया जहाँ अस्पताल प्रबंधन के लोगों के अलावा और भी बहुत सारे लोग मौजूद थे. वे सब उस दिन – अन्य ऑपरेशन थिएटर में सर्जरी वाले मरीजों के परिजन थे. सभी वहाँ एक दूसरे को दिलासा देते हुए सर्व-धर्म समभाव में एक दूसरे के लिए प्रार्थनाएँ कर रहे थे. और रेखा ने बताया था कि उसने उस दिन सचमुच अपने आप को अकेला नहीं पाया. बाद में हमारे एक पारिवारिक मित्र के संबंधी, मद्रास निवासी थानसिंह नाहर अपने दो मित्रों के साथ आ गए थे और उन्होंने वहां न केवल 3 यूनिट खून भी दान में दिया, पूरी शाम रेखा के साथ बने रहे. कुछ और यूनिट खून की जरूरत पड़ी तो रेखा ने स्थानीय रेडक्रॉस में पंजीकृत नंबरों पर कॉल किया तो एक सहृदय सज्जन जो टैक्सी चलाते थे, संयोग से पास में ही थे, चले आए थे और रक्तदान किया था. यही नहीं, रक्तदान करने के बाद वे मिलने भी आए व शुभकामनाएँ भी दीं.

दिल तो बड़ा गड़बड़ है जी


आपको जिज्ञासा होगी, पांच घंटे के जटिल ऑपरेशन में मेरे हृदय में क्या-क्या सुधार किए गए? जानने की मुझे भी जिज्ञासा थी, परंतु ज्यादा कुछ बताया नहीं गया था. जब अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ और मुझे अस्पताल से ऑपरेशन नोट्स और डिस्चार्ज समरी दी गई थी, तब मुझे भी पता चला कि क्या गुल खिले और खिलाए गए हैं मेरे इस रिपेयर्ड दिल में. ऑपरेशन नोट्स में मूल अंग्रेज़ी में लिखी गई बातों का सारांश कुछ यूँ है –

ऑपरेटिव फ़ाइंडिंग्स (ऑपरेशन के दौरान क्या क्या मिला – या नहीं मिला,)

थायमस (मनुष्य के शरीर का एक अंदरूनी ग्रंथि जो इम्यून सिस्टम को बनाए रखने में मददगार होता है) नहीं है. हृदय के चहुँ ओर अतिरिक्त द्रव है. हृदय की नसें अदली बदली हैं – चिकित्सकीय भाषा में LSVC और RSVC है. हृदय का ऊपरी दायाँ हिस्सा सूजा हुआ है. हृदय में ऊपरी हिस्से में भी छेद है और निचले हिस्से में भी एक बड़ा छेद है. हृदय की धमनी अनावश्यक रूप से बहुत बड़ी है. फ़ेफ़ड़े को जाती धमनी में असामान्यता है. पल्मोनरी वाल्व में कैल्शियम का जमाव है. दाएँ फ़ेफ़ड़े के तीन भाग हैं, बाएं के दो.

ऑपरेशन नोट्स (सर्जरी में क्या किया गया – और क्या नहीं)

रास्टेली प्रक्रिया (प्रसिद्ध इतालवी सर्जन गियानकार्लो रास्टेली के नाम पर दिया गया) के तहत हृदय के दोनों छेदों को गोरेटेक्स पैच से बंद किया गया. हृदय के दाएं हिस्से को फ़ेफ़ड़े की धमनी से डेक्रॉन ट्यूब के सहारे जोड़ा गया. पल्मोनरी वाल्व को छेड़ा नहीं गया क्योंकि यह माना गया कि इससे समस्या सुलझने के बजाए बढ़ सकती है.

आईसीसीयू में मुझे नौ दिन रखा गया क्योंकि ऑपरेशन के बाद मुझे बुखार आ गया था जो कम नहीं हो रहा था. खून की जांच में पता चला था कि स्टेफायलोकोकल बैक्टीरिया का संक्रमण हो गया था. एंटीबायोटिक दवाओं से इसे ठीक किया गया और फिर बुखार उतरने के बाद मुझे 17 जून को जनरल वार्ड में – बेड नंबर 329 A में शिफ़्ट किया गया. आईसीसीयू में मरीज को आइसोलेशन में रखा जाता है और किसी परिजन से मिलने नहीं दिया जाता. मुझे मेरे हृदय रोग की सफल सर्जरी की खुशी तो बहुत थी, परंतु परिजनों से इतने दिनों तक नहीं मिल पाने का जरा सा मलाल भी था.

रेखा के भाई व मेरा छोटा भाई मेरी सर्जरी के प्लान के मुताबिक पहले ही छत्तीसगढ़ से मद्रास के लिए निकल चुके थे, और सर्जरी के दूसरे दिन पहुंचे. मगर मुझे केवल उनके बारे में सूचना दी जा रही थी. मुलाकात का प्रश्न ही नहीं था. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. उसे चार छः घंटे के लिए अकेला छोड़ दो बस. साक्षात् नरक के दर्शन हो जाएंगे. परंतु मुझे नरक के कुछ और दिन भुगतना शेष थे. आईसीसीयू की एक बात मुझे भुलाए नहीं भूलती. वातानुकूलित आईसीसीयू होने के बावजूद, मुझे भयंकर प्यास लगती थी. सिस्टर नापतौल कर केवल 5-10 मिली लीटर पानी पीने को देती थी. मैं हर वक्त चिल्ड वाटर की मांग करता रहता. परंतु जिस भी सिस्टर की ड्यूटी होती, वे हमेशा शांति से बात टरकातीं और जितना आवश्यक और लिखा होता, उतना ही पानी देतीं. मेरे जैसे आड़े तिरछे मरीजों को झेलने की बड़ी कूवत होती है उनमें. उन्हें मेरा सलाम! तब मैं सेडेशन में एक बार फिर बच्चा बन गया था और उकड़ूं बैठकर अपने पैरों के अंगूठे को पकड़ कर जिद करता रहता. यह सिलसिला कोई सप्ताह भर चला जब तक कि मैं पूरी तरह सेडेशन से बाहर नहीं आ गया. रेखा यह देख कर सोचती कि हे भगवान् ये क्या हो गया! ठीक होने के बजाये यह तो पागलों जैसी हरकतें कर रहा है!

वार्ड में आने के बाद मुझसे कुछ व्यायाम आदि भी करवाया जाने लगा, जिसमें फुग्गे – बैलून - फुलाना भी शामिल था. यह दिल और फ़ेफ़ड़े की मजबूती के लिए हृदय रोगियों के व्यायाम में शामिल है. अस्पताल में मुझे फुग्गे फुलाने में बड़ा आनंद आता – एक बार मैं फिर से बच्चा बन गया था. और क्यों न, मेरा पुनर्जन्म 8 जून 1995 को जो हुआ था.

और मेरे दिल ने धड़कने से मना कर दिया


जनरल वार्ड में यह मेरा दूसरा दिन था. 18 जून की रात को मैं किसी करवट सो नहीं पाया. मेरी छाती एकदम जाम हो गई थी जैसे कि किसी ने सौ मन पत्थर रख दिया हो. सांस भी जैसे तैसे चल रही थी. 19 जून की सुबह सात बजे मेरा सिर घूमा और मैं बेहोश हो गया.

कोई घंटे भर बाद मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको आईसीयू के एक बेड में लेटा हुआ पाया. एक अस्थाई पेसमेकर की लीड मेरे गले की नस से होती हुई हृदय के भीतर तक डाली गई थी और उससे मिल रही विद्युत तरंगों से मेरा दिल धड़क रहा था.

उस दिन सुबह मेरा टोटल हार्ट ब्लॉक हो गया था – यानी दिल का धड़कना बंद हो गया था. तत्काल मुझे कैथ लैब ले जाया गया था और वहाँ जैसे तैसे मेरे दिल की धड़कन वापस लाई गई और अस्थाई पेसमेकर लगाया गया जिसकी सहायता से दिल की धड़कनों को फिर से चालू किया गया था.

ऑपरेशन के बाद चूंकि मेरा हृदय अपने मूल धड़कन (रिदम) में आ गया था इसलिए उस वक्त पेसमेकर की जरूरत नहीं समझी गई थी. परंतु बाद में जब मेरे दिल की धड़कन रुक गई, टोटल हार्ट ब्लॉक हो गया तो फिर स्थाई पेसमेकर लगाने का विचार किया गया और 22 जून गुरुवार को स्थाई पेसमेकर शाम 5.00 बजे, कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. जायसवाल और डॉ. हरिदास की टीम द्वारा लगाया गया.

पेसमेकर के बारे में जब रेखा ने डॉ. चेरियन से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि यदि मरीज पेसमेकर डिपेंडेंट रहेंगे तो कोई दो साल के बाद इसकी बैटरी खत्म हो जाएगी तब बदलना होगा, और यदि डिपेंडेंट नहीं रहे तो औसतन 5 साल में. रेखा ने पूछा कि इससे बड़ी बैटरी या अधिक साल चलने वाला पेसमेकर नहीं आता, तो डॉ. चेरियन ने मुस्कुरा कर कहा था – 5 ईयर्स इज़ ए लांग-लांग टाइम! और तब यह किसे पता था कि टाइम तो सचमुच लांग-लांग-लांग होने वाला था!

25 जून को सुबह 10 बजे मेरे दिल की धड़कनें फिर से बेकाबू हो गईं. इस बार पल्स 288 तक पहुँच गईं. यह भी एक तरह से बेहद गंभीर स्थिति होती है. दिल वास्तव में धड़कता नहीं, बल्कि केवल फ्लटर करता है, यानी फैलता सिकुड़ता नहीं और नतीजतन शरीर के अंदरूनी हिस्सों में खून की पंपिंग नहीं हो पाती. मुझे छाती में दाँयी ओर बेहद तेज दर्द हुआ और मैं चिल्ला पड़ा. आनन फानन में डॉक्टर जायसवाल को बुलाया गया जिन्होंने पेसमेकर लगाया था. उन्होंने मेरी छाती की को कोई आधा घंटा पंपिंग की. मेरी हालिया सर्जरी हुई थी, छाती के घाव ठीक से भरे भी नहीं थे, फिर भी जान बचाने की खातिर डॉक्टर जायसवाल ने पूरी ताकत से उन्हें रिदमिक तरीके से आधे घंटे तक दबाया और इस तरह दिल को वापस धड़कने लायक बनाया. मारे दर्द के मैं मरा जा रहा था, दर्द के साक्षात नर्क से गुजर रहा था, जोरों से कराहा जा रहा था परंतु उन्होंने कुछ नहीं सुना और लगे रहे.
इसके बाद, मेरे दिल की धड़कनों को काबू में रखने की चौबीसों घंटे ड्रिप से चलने वाली दवाई भी चालू की, अगले 24 घंटे के लिए होल्टर मॉनीटर लगाया और हृदय के प्रत्येक पल के धड़कनों के बारे में पड़ताल की. इस बीच मुझे फिर से बुखार चढ़ गया था. मेरे खून का कल्चर किया गया और फिर उस हिसाब से दवाईंया दी गईं. 28 जून तक मेरा बुखार नहीं उतरा तो लक्षण के हिसाब से मुझे मलेरिया की भी दवाई दी गई. मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा था. डॉ. जायसवाल ने बाद में एक बार कहा भी था – मिस्टर श्रीवास्तव, यू गेव अस मेनी स्लीपलेस नाइट्स. जाहिर है, यदि मरीज तकलीफ में होता है तो उसके साथ-साथ उसके चिकित्सक भी उसी तकलीफ में रहते हैं. मैं लंबे समय से वहां भर्ती रहा था और क्रिटिकल कंडीशन में था तो बहुत सा स्टाफ मुझे व रेखा को जानने-पहचानने लगा था.

19 मई से मैं अस्पताल में भर्ती था, डेढ़ महीने से अधिक का समय हो रहा था और उसमें से अच्छा खासा समय आईसीसीयू (इंटेंसिव कोरोनरी केयर यूनिट) और बाद में आईसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) में गुजर रहे थे. आईसीयू में एक बात अच्छी थी – शाम को चार बजे मरीज को एक परिजन से मिलने दिया जाता था. जो लोग मुझसे मिलने आए थे वे वापस लौट चुके थे और अब केवल रेखा और उनके भाई ही रुके हुए थे. मैं रेखा का इंतजार शिद्दत से करता. शाम की चार कब बजे कब बजे यूँ लगता. सिस्टर ने रेखा से कह रखा था – हृदय रोगियों को अनानास खिलाया करो. वो बड़े प्यार से रोज चार छः टुकड़े अनानास के लाती. मैं अनानास चूसता और वो बाहरी दुनिया की बातें बताती रहती – आज ये हुआ, यहाँ गई, ये किया. घंटे भर का समय देखते ही देखते निकल जाता और फिर बेसब्री के तेईस घंटे का इंतजार चालू हो जाता.

आईसीयू में जो हेड सिस्टर थी वो उम्रदराज थी, और बहुत ही अनुभवी और उतनी ही दयार्द्र थीं. नित्य वो हर मरीज के पास जाती उनका हाल चाल पूछती उनके माथे पर हाथ रखती और ईश्वर से जल्द ठीक होने की दुआ मांगती. उसका दैवीय स्पर्श अकसर चमत्कृत करता और मेरे डूबते मन में उत्फुल्लता भरता. मैं उसे देवी माँ कहता. यदि आईसीयू में मैंने जीवन की लड़ाई में सफलता पाई तो उन देवी माँ का भी बड़ा योगदान रहा है. बाहर वह रेखा को ट्रेनिंग देती – वो कहती जब तुम मरीज के पास जाओ तो उसके हाथों पैरों को हल्के से सहलाते हुए पॉजिटिव बातें करो. उसकी बीमारी की बात मत करो. दुनिया जहान के किस्से कहानी बताओ. निरंतर बोलते रहो. उसे महसूस न होने दो कि वो बीमार है. अपनी आँखों में आँसू तो आने ही मत दो. यदि तुम उसके सामने रोईं तो वो तो मर ही जाएगा. रेखा जब मिलने आती तो वो सिस्टर बाहर रह कर खिड़की की झिर्री से या कभी आसपास रह कर रेखा पर नजर रखती कि कुछ गड़बड़ तो नहीं कर रही है. एक बार रेखा थोड़ी इमोशनल होने लगी तो सिस्टर ने टाइम अप कह कर उसे समय से पहले बाहर कर दिया और बाहर ले जाकर खूब डांट लगाई कि तुम तो मरीज को मार ही दोगी. वो सिस्टर रेखा से पहले एक्टिंग करवाती, कि तुम क्या बोलोगी कैसे बोलोगी फिर संतुष्ट हो जाने का बाद ही वो उसे अंदर आने देती. मरीज केवल दवा से नहीं, बल्कि दुआ और आत्मबल से भी ठीक होता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह ख़ाकसार है. आगे आपको इस बात के कुछ और दमदार प्रमाण मिलेंगे.

आईसीयू चालीस फुट बाई चालीस फुट का एक बड़ा कमरा था. सुबह-सुबह वातानुकूलन एक घंटे के लिए बंद कर उसकी खिड़कियाँ खोल दी जाती थीं. परंतु बाहर चारों तरफ बिल्डिंग होने से कोई बाहरी दृश्य दिखाई नहीं देता था. वातानुकूलित कमरे की खिड़कियां जब खोली जाती और वातानुकूलन बंद कर दिया जाता तब मद्रास की सुबह सुबह की चिलचिलाती पसीने भरी गर्मी भी अच्छी लगती. वातानुकूलन से थोड़ी सी नफरत और दहशत भी तब से मन में बैठी हुई है. कमरे के चारों तरफ मरीजों के बेड लगे थे. पूर्वी दिशा में एक बड़ा सा दरवाजा था और बीचों बीच नर्सों की टेबल लगी थी जिसमें चार-पांच नर्सें हमेशा मौजूद रहतीं. उस समय मेरे अलावा एक और युवा क्रिटिकल कंडीशन में लंबे समय से भरती था, नहीं तो और मरीज एकाध दिन के लिए लाए जाते, और फिर वार्ड में शिफ़्ट कर दिए जाते. उस युवक को मायोकार्डाइटिस जैसा कुछ रोग हो गया था जिसमें हृदय की मांसपेशियां इन्फ़ैक्शन के कारण लाइलाज रूप से शिथिल हो गई थीं और उसका हृदय आकार में दोगुना हो गया था. उसका इलाज केवल हार्ट ट्रांसप्लांट था.

आईसीयू में होने वाले कुछ रूटीन के कामों से मुझे सख्त नफरत थी. रोज सुबह-सुबह एक नर्स आती, एक्सक्यूज मी, स्माल प्रिक कहती और खून का सेंपल निकाल कर ले जाती. खून में नित्य पोटेशियम लेवल की जांच होती – न जाने क्यों. फिर उस रिपोर्ट को लेकर कोई दूसरी नर्स आती और लाल रंग की बेस्वाद पोटेशियम सिरप पिलाती जिससे दिन भर के लिए मुंह का जायका बिगड़ जाता. इस बीच स्वीपर आता और मेरे शरीर का स्पंज कर साफ करने के नाम पर गीला कपड़ा फेर कर और गंदा कर जाता. मगर मैं बिस्तर पर था, चलने फिरने की कतई मनाही थी तो कर क्या सकता था. बिस्तर भी पिंजरे नुमा था जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बेध्यानी में मरीज कहीं उठकर चला न जाए.

हर मरीज के बेड के पास नेबुलाइजर से लेकर ऑक्सीजन पाइप और तमाम तरह के मॉनीटरिंग उपकरण मौजूद रहते. मरीज को केवल लेटे रहना होता था, बहुत हुआ तो कभी बैठ गए, पर वह भी बेड पर. टायलेट जाने की भी मनाही थी. यानी कि स्नान-ध्यान सबकुछ बेड पर. मुझे सबसे बड़ी नामुराद चीज लगती बिस्तर में ही, पॉट में मलमूत्र विसर्जन. यथासंभव मैं बचने की कोशिश करता मगर असफल ही रहता. ऊपर से कुछ दवाइयों के प्रभाव से मुझे ड्रग इंड्यूस्ड डायरिया हो गया तो यह मुसीबत और बढ़ गई. अस्पतालों में इसके लिए कोई नई, नायाब व्यवस्था ईजाद करनी चाहिए, जो सुविधाजनक भी हो और बेहतर हो.

अकसर रेजीडेंट डॉक्टर मरीजों से गपियाते और इस तरह उनके मन के भीतर के नेगेटिव विचारों को दूर करने का प्रयास करते. इंदौर के रहने वाले डॉ शैलेन्द्र त्रिवेदी उस समय वहाँ डीएम कर रहे थे, अकसर मेरे पास रात में आते और घंटा आधा घंटा दुनिया जहान की चर्चा करते. वे मेरे लिए एक दो किताबें भी ले आए थे. परंतु मैं इतना पस्त हो चुका था कि कुछ सूझ ही नहीं पड़ता था और पढ़ वढ़ नहीं पाता था. अलबत्ता मैं मद्रास के एफएम स्टेशनों में बजने वाले तमिल संगीत को हेडफ़ोन से सुना करता. मैंने माचिस की डिब्बी के आकार का एक एफएम रेडियो रोड साइड बाजार से लिया था वो सिंगल पेंसिल सेल से चलता था और बढ़िया काम करता था.
डॉक्टर चेरियन भी नियमित वार्ड में चक्कर लगाते. वे इस बात से खिन्न थे कि सफल सर्जरी होने के बाद, मरीज की यानी मेरी हालत खराब क्यों हो रही है. वे इस बात से भी नाराज रहते कि हर कार्डियोलाजिस्ट या ड्यूटी डाक्टर लक्षण के हिसाब से या तो इंजैक्शन या दवाई दे दे रहा है. व्हाई एवरी बॉडी इज़ प्रिकिंग – वो कहा करते.

पद्मश्री डॉ. चेरियन की दैवीय, आध्यात्मिक चिकित्सा


1 जुलाई 1995 को सुबह 11 बजे डॉ. चेरियन सदा की तरह वार्ड के निरीक्षण पर आए. वे वहाँ कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख भी थे, अतः इस लिहाज से भी निरीक्षण करते थे. आते ही उन्होंने रोज की तरह पूछा – हाऊ आर यू?

फ़ीलिंग वेरी बैड. मैंने जवाब दिया. मैं सचमुच मरणासन्न सा महसूस कर रहा था. कहां तो हृदय की जटिल सफल सर्जरी के बाद जहाँ मैं वार्ड में शिफ़्ट हुआ था और कुछ व्यायाम कर रहा था, वहीं अब बाद में उभरी कुछ समस्याओं के कारण वापस आईसीयू में पड़ा जीवन और मृत्यु की रस्साकशी में फंसा हुआ था.

उन्होंने मेरे पैरों में दबी चादर खींची, मेरे पैरों को अनावृत किया और मेरे तलवों में हल्की सी मालिश की. फिर बोले, डोंट वरी. एवरीथिंग विल बी आलराइट. दीज़ मैडिसिन्स आर रीयली वेरी बैड. यह एक बड़े ख्याति प्राप्त, पद्म पुरस्कार प्राप्त सर्जन की एक और आध्यात्मिक किस्म की चिकित्सा थी – होलिस्टिक सर्जरी थी. जाहिर है, मुझे अच्छा महसूस हुआ. सुकून महसूस हुआ. ऐसा लगा कि जैसे कोई दैवीय शक्ति मेरे भीतर पहुँच रही है और मुझे ठीक कर रही है.

और फिर उन्होंने मेरी फ़ाइल देखी. मुझे कोई दर्जन भर से अधिक दवाईयाँ - गोलियाँ और इंजैक्शन के रूप में दिए जा रहे थे. उन्होंने साथ चल रहे कार्डियोलॉजिस्ट से प्रत्येक दवाई का नाम लेकर पूछना शुरू किया – क्या यह बेहद जरूरी है? क्या यह जरूरी है?

कार्डियोलॉजिस्ट कहते – शायद. तो वे तुरंत कहते इस दवाई को बंद कर दो. फिर अंत में दो दवाइयाँ बची. डॉ. चेरियन ने पूछा – इज इट एसेंशियल? कार्डियोलॉजिस्ट ने जवाब दिया – मे बी. डॉ. चेरियन ने पूछा – व्हाट मे बी? इज इट एब्सल्यूटली एजेंशियल? और तब जब डाक्टर ने कहा कि हाँ, ये दोनों दवाई बेहद जरूरी हैं, तब उन्होंने वे दो दवाई चालू रखीं और बाकी सभी को बंद कर दिया.

डॉ. चेरियन के इस दैवीय, आध्यात्मिक इलाज के बाद मेरी स्थिति में तेजी से परिवर्तन हुआ. दूसरे दिन कुछ ड्यूटी डॉक्टर आए और मुझसे मेरी स्थिति पूछी तो मैंने उन्हें बताया कि बहुत बेहतर महसूस कर रहा हूँ तो उन्होंने भी डॉ. चेरियन के बारे में आपस में बातचीत की कि डॉ. चेरियन पेशेंट के लिए बहुत ही रीएश्योरिंग होते हैं और उनसे यह बात हमें भी सीखना चाहिए.

और इसके बाद तो मैं सप्ताह भर में इतना ठीक हो गया कि 10 जुलाई को तो मुझे अस्पताल से डिस्चार्ज भी कर दिया गया.

परंतु कहानी अभी खत्म नहीं हुई...


बाएँ कंधे पर जहाँ मेरी मांसपेशियों को काटकर, पॉकेट बना कर एक माचिस की डिब्बी जितना पेसमेकर लगाया गया था, वहाँ का एक स्टिच जाने कैसे खुल गया और वहाँ से सीरम बहने लगा. पहले तो डाक्टर हरिदास ने उस सीरम का कल्चर करवाया और इन्फ़ैक्शन नहीं होने पर वहाँ बिना लोकल एनेस्थेसिया के ही एक स्टिच लगाया. उनका कहना था कि एनेस्थेसिया के लिए एक इंजैक्शन लगाउंगा तो उतने ही दर्द में मैं एक स्टिच लगा दूंगा.
अस्पताल में भर्ती हुए मुझे चालीस दिन के करीब हो रहे थे और हमारे पास का पैसा खत्म हो गया था. हम एक सप्ताह के इलाज के पैकेज के अनुमानित रकम का जुगाड़ कर आए थे. इससे पहले सालभर यहाँ वहाँ भटकते रहने से पहले ही कर्ज में डूबे हुए थे और दीवाला पहले ही निकला हुआ था. रेखा ने अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर चेरियन से बात की और आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए यथासंभव छूट प्रदान करने का आवेदन दिया. आश्चर्य और राहत की बात थी कि डॉक्टर चेरियन ने अपनी फीस तो माफ की ही, अस्पताल के बिल में से पचास हजार रुपए की राशि भी माफ कर दी गई. यह हमारे लिए बहुत बड़ी राहत की बात थी. जहाँ खबरें आती हैं कि निजी अस्पताल अपना बिल क्लीयर करने के लिए दबाव बनाने के लिए मरीज के डेड बॉडी को बंधक बना कर रख लेते हैं, वहाँ इस तरह की मानवीय सहायता पाना अजूबा ही है.

17 जुलाई 95 को हम वापस रतलाम के लिए चले. नागपुर से बच्चों को हम साथ ले जाने वाले थे. बच्चे इस दौरान अपने ननिहाल में थे जहाँ वे अपनी नानी, मामा-मामी व बड़ी अम्मा के संरक्षण में थे. पुत्र अन्वेष चार वर्ष का हो रहा था, उसे कुछ-कुछ याद था तो वो तो समझ गया, परंतु पुत्री अनुश्री महज दो साल की थी, तो वो इन दो महीनों में अपने माता-पिता दोनों को भूल चुकी थी. वो पूरे रास्ते रोती रही- मम्मी (यानी बड़ी मम्मी) के पास जाना है. और रोते रोते सो भी गई. उसे सामान्य होने में थोड़ा समय लगा.

तकनीकी रूप से मैं ठीक तो हो गया था, मेरे रुग्ण हृदय का सर्जरी से सफल इलाज हो गया था, और मैं अपने घर आ चुका था. पर कमजोरी इतनी थी कि कभी तो लगता कि इससे बेहतर स्थिति तो सर्जरी से पहले, इलाज से पहले थी, और नाहक ही सर्जरी करवाई. एक दिन नहाते नहाते मेरा हाथ पेट पर एक सूखे घाव पर पड़ा. सर्जरी के दौरान छाती व पेट पर अनगिनत जगह पर काटपीट हुई थी और टांके लगे थे जिन्हें हटाया गया था. कुछ घाव सूख गए थे, कुछ रह गए थे. मैंने उस सूखे घाव पर फिर हाथ फेरा तो पता चला कि वहाँ कुछ फंसा है. मैंने ध्यान से देखा तो पाया कि कोई नस काटी गई थी और उसे बंद करने के लिए टांका लगाया गया था, वह टांका अभी भी मौजूद था. बेध्यानी में अस्पताल के स्टाफ ने उसे निकाला नहीं था. रेखा के पिता प्रायमरी हेल्थ सेंटर में डॉक्टर थे और रेखा को थोड़ा बहुत नर्सिंग व ड्रेसिंग आदि का अनुभव था तो उसने देखा कि घाव भर चुका है तो एक छोटी कैंची से उस टांके को एक तरफ से काट कर निकाल दिया. जबकि मैं भारी डरा हुआ था.

तीन महीने बाद मुझे रीव्यू जांच के लिए बुलाया गया था, ताकि जांच परख की जा सके कि स्थिति कैसी है और तदनुसार आवश्यक दवाई आदि में जरूरी बदलाव किया जा सके. मुझे कुछ टॉक्सिक दवाईयां दी जा रही थी जो आंखों की रौशनी में असर डालती थीं और उनका भी एनालिसिस किया जाना था. ऑपरेशन के बाद मुझे मधुमेह भी हो गया था उसके बारे में भी पड़ताल की जानी थी.

इस बार हम बच्चों को साथ लेकर गए. बच्चे अब थोड़े समझदार हो रहे थे. पुत्र अन्वेष तो इतना समझदार हो गया था कि कहीं कुछ खिलौने आदि देखता तो लालच भरी निगाहों से देखते हुए पूछता – क्या यह महंगा है? वो कभी किसी खिलौने को लेने या खरीदने के लिए नहीं मचला. उसने हमें हमारे खर्चों में कटौती करते देखा था. हमने बेहद मितव्ययिता बरतनी चालू कर दी थी क्योंकि साल भर चले इस गंभीर घटना क्रम ने न केवल हमारा दीवाला निकाल दिया था, बल्कि हमें कर्जदार भी बना दिया था और हम पाई-पाई की बचत कर लोगों का पैसा लौटा रहे थे. रेखा ने तो घरेलू कामों के लिए बाई भी हटा दिया था और सब काम खुद ही करने लगी, जबकि उसे नौकरी करने कॉलेज भी जाना होता था. वो इतनी थक जाती कि रात में सोते समय बोलती – हे ईश्वर तूने अच्छा किया कि रात बनाई!

मैं सर्जरी व उसके बाद के हुए कॉम्प्लीकेशन से हुई शारीरिक कमजोरी से, धीरे धीरे ही सही रिकवर हो रहा था, और मैंने ड्यूटी भी जॉइन कर ली थी. यूँ मेरी फ़ील्ड ड्यूटी थी, मगर मैंने ऑफ़िस का कार्य ले लिया था और अपना कार्य तेजी से और दक्षता से निपटाने के लिए एक सेकंड हैंड लैपटॉप 15 हजार रुपए में ले लिया था. मैं अपने कार्यालय में स्वयं के लैपटॉप से शासकीय कार्य निपटाने वाले व्यक्तियों में पहला उदाहरण था, मगर इसके फायदे भी मुझे मिल रहे थे – न्यूनतम श्रम में अधिकाधिक आउटपुट से कार्यालय में किसी को मुझसे कोई समस्या नहीं थी, और वर्क फ्रॉम होम का कंसेप्ट तो अभी आई टी में आया है, मैंने सरकारी सेवा में रहते हुए, उस वक्त बहुत समय ऐसा किया. वह भी तब जब मेरा ऑफ़िस मेरे घर से महज 200 मीटर दूर था. इस समय मेरे तब के बॉस रहे अरुण कुमार कामरिया ने बहुत साथ दिया और कभी कोई परेशानी नहीं खड़ी की.

मेरी रीव्यू जांच के दौरान सभी चीजें सामान्य थीं, और मैं तेजी से रिकवर कर रहा था. डॉक्टर संतुष्ट थे. फिर अगले दिन पेसमेकर एनालिसिस किया जाना था. मुझे जो पेसमेकर लगाया गया था वो सीमेंस कंपनी, जर्मनी का पेससेटर था. उसको कैलिब्रेट करने वाला टेक्नीशियन कंपनी से आता था. कैलिब्रेट करने के लिए एक बड़ा सा मैग्नेटिक प्रॉड पेसमेकर के ऊपर रखा जाता और फिर लैपटॉप के सहारे सॉफ़्टवेयर से कंट्रोल कर हृदय को देने वाले आंतरिक बिजली के झटके की तीव्रता, वोल्टेज, एम्पीयर, हिस्टेरेसिस आदि को नियंत्रित किया जाता. डॉक्टरों के मुताबिक मेरे हृदय को न्यूनतम बिजली के झटकों की जरूरत थी और इससे मेरे पेसमेकर का जीवन और ज्यादा हो जाना था.

पेसमेकर को मेरी बाईं छाती में ऊपरी ओर बांह के पास की मांसपेशी में एक पॉकेट बनाकर लगाया गया था. यूं तो यह माचिस की डिब्बी जैसी छोटे आकार की होती है, मगर उसे शरीर द्वारा अपनाए जाने में कुछ समय लगता है. लंबे समय तक तो किसी बाहरी वस्तु के आपके शरीर के भीतर होने के कारण समस्या आती है, ऊपर से यह उपकरण हाथ और कंधे की मांसपेशी के भीतर लगाया गया था जो कि हमेशा आपके हाथों की गतिविधि से हिलता डुलता है. तो यह अकसर मांसपेशी के लेयर में फंस जाता. एक बार ट्रेन की यात्रा में एक फाल्टी डिब्बे में आरक्षण था जिसमें पूरी यात्रा के दौरान डिब्बा बेतरह हिलता डुलता रहा था और नतीजतन मेरे पेसमेकर का ओरियंटेशन ही तिरछा हो गया. कई वर्षों तक तो मैं बाएँ बाजू सो ही नहीं पाता था – क्योंकि पेसमेकर सीधे ही कहीं न कहीं गड़ने अड़ने लग जाता.

एक बार फिर मौत के मुंह में


मरीजों को बहुत सी समस्याएँ चिकित्सकीय असावधानियों के कारण होती हैं. मरीजों के पेट में कैंची छूट जाने की घटनाएँ भले ही चुटकुला प्रतीत होती हों, मगर ऐसी घटनाएँ होती तो हैं. मैं स्वयं भुक्तभोगी हूँ.

तो, उस दिन टेक्नीशियन ट्रैफ़िक में फंस जाने की वजह से थोड़ी देर से आया. कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर हरिदास और डॉक्टर जायसवाल अपने कुछ और कार्डियोलॉजिसट के साथ मुझे लगाए गए पेसमेकर के एक नए किस्म के, वेरियो फंक्शन को टेस्ट करने वाले थे. यानी कोई समस्या नहीं थी. मेरी आँखों की जांच भी हो गई थी और दवाई के टॉक्सिक प्रभाव के कोई लक्षण नहीं थे. लंग-फंक्शन टेस्ट में मेरे फेफड़े पूरी तरह सक्षम पाए गए थे.
पेसमेकर टेस्ट करने के लिए जैसे ही टेक्नीशियन ने मेरी छाती में जहाँ पेसमेकर लगा था, वह मैग्नेटिक प्रॉड रखा, मुझे कुछ अजीब अनुभूति हुई. मेरा दिल जोरों से और अधिक रिदम में धड़कने लगा. लगातार. मेरे दिल की नैसर्गिक रिदम से हटकर थी जो अजीब लग रही थी. तीन महीने से मुझे पेसमेकर लगा था, और मुझे महसूस हो जाता था कि पेसमेकर कब चालू है और कब बंद है. दरअसल पेसमेकर हृदय की गति को सेंस करता रहता है चौबीसों घंटे और जब वह देखता है कि हृदय अपनी धड़कन भूल रहा है तो वो बिजली की तरंगें भेज कर हृदय को धड़काता है और याद दिलाता है, उठाता है कि भई, तुम्हारा काम है धड़कना, तो धड़को.

मैंने टेक्नीशियन से कहा मुझे अजीब लग रहा है, अच्छा नहीं लग रहा है. पर वो बोला कोई बात नहीं, थोड़ी देर की बात है. डॉक्टर मॉनीटर पर कुछ देख कर आपस में चर्चाएँ करने लगे. मेरी स्थिति बिगड़ रही थी. मैंने डॉक्टर जायसवाल से कहा कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है. पर वे पेसमेकर फंक्शन के तकनीकी डिस्कशन में उलझे रहे और इस बीच आधा घंटा हो गया. मुझे हल्की हल्की खांसी आ रही थी. हृदय की सर्जरी वाले मरीजों को खांसी आना आम बात है चूंकि ऑपरेशन के दौरान उनके खून को मशीन के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है और इस हेतु दवाइयां मिलाई जाती है तो वो सब फेफड़े में चला जाता है जिसे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र बाहर फेंकता है.
मेरी खांसी बढ़ने लगी. अचानक मैं जोरों से खांसने लगा. तब डॉक्टरों का ध्यान मुझपे गया. तुरंत ही मेरे पेसमेकर की सेटिंग वापस पुरानी में सेट की गई और वह मैग्नेटिक प्रॉड हटाया गया. पर तब तक देर हो चुकी थी. मेरी खांसी इतनी भयंकर हो गई कि मैं खांस खांस कर न केवल अधमरा हो गया, बल्कि खांसने के साथ मैं ताज़ा, लाल खून उगलने लगा.

अब तो इमर्जेंसी हो गई. तत्काल ही मुझे कई इंजैक्शन ठोंके गए. मेरी खांसी रुक नहीं रही थी और इतनी भयंकर थी कि डॉक्टर जायसवाल मेरे माथे की दोनों तरफ की नसों को पूरी ताकत से दबाकर खड़े रहे ताकि ब्रेन हैमरेज जैसी स्थिति न हो जाए. मेरे पेसमेकर के ऊपर रखे प्रॉड ने कुछ ऐसा कर दिया था कि पेसमेकर से अधिकतम करेंट हृदय को मिलता गया और जिसके फलस्वरूप कोई आधा घंटा मेरा हृदय मेरे शरीर से खून लेकर फेफड़े में अनावश्यक रूप से भरता गया. जिससे मेरे शरीर में खून के बहाव का संतुलन बिगड़ गया और मुझे जानलेवा खांसी आने लगी. खांसी थी कि बंद ही नहीं हो रही थी. तो डाक्टरों ने शरीर से फ्लूड निकालने की दवा का इंजैक्शन ठोंका. सेडेशन दिया. ले दे कर घंटे भर की कोशिशों के बाद मेरी खांसी में लगाम लगी. और इस बेवजह की इमरजेंसी से मैं मरणासन्न हो गया.

मैं यहाँ मद्रास मेडिकल मिशन के ओपीडी में अपने हृदय की सर्जरी के बाद रीव्यू के लिए हंसता मुस्कुराता आया था, और डॉक्टरों की असावधानी से मैं समस्या में घिर गया था और फिर से एक बार आईसीयू में भर्ती कर दिया गया था. मुझे लैसिक्स का हाई डोज दिया गया था जो शरीर से पानी निकालता है. मैं बेड पर लेटा था, और जिस तरह से लैसिक्स का डोज दिया गया था उसके हिसाब से मूत्र विसर्जन जरूरी था. मैंने पहले ही कहीं लिखा है कि बेड पर लेटे हुए मल मूत्र त्याग में पता नहीं क्यों मुझे समस्या होती रही है. सिस्टर को निर्देश थे मरीज को मूत्र विसर्जन करवाओ. वो कहती – मिस्टर श्रीवास्तव, यू नीड टू यूरिनेट. मैं पूरी ताकत लगाता मगर एक बूंद नहीं निकलता.

आखिर कोई दो घंटे बाद मेरा पेट फूलने लगा और जब वहां दर्द बढ़ने लगा तो मैंने फिर कोशिश की. इस बार मूत्र निकलना चालू हुआ तो फिर बंद ही नहीं हुआ. पूरा पॉट भर गया और ओवरफ्लो होकर पूरे पूरे बिस्तर में फैल गया. हालाँकि मुझे तीसरे दिन छुट्टी दे दी गई थी, मगर मेरी स्थिति सर्जरी के ठीक बाद की स्थिति जैसी हो गई थी, और मैं बाद में रीव्यू जांच करवाने के नाम पर दहशत में आने लगा था.

इट्ज ए लांग लांग टाइम


मेरे हृदय की सर्जरी हो चुकी थी, यथा संभव उसकी यांत्रिक खराबी को सर्जरी से दूर कर दिया गया था और मेरे हृदय में स्थाई पेसमेकर भी लगा दिया गया था. यानी अब कोई गुंजाइश नहीं थी किसी अनहोनी की. मैं मजाक मजाक में कहता – मैं अब मरूंगा नहीं. मैं अमर हो गया हूँ. मेरे मरने के बाद भी मेरा दिल धड़कता रहेगा – पेसमेकर हृदय को धड़काता रहेगा, भले ही मैं मानसिक या मस्तिष्कीय मौत मर जाऊं! और, क्या पता कल को चिकित्सा विज्ञान सचमुच इतनी तरक्की कर ले कि मनुष्य अमर हो जाए! अपने जर्जर पुराने हो चुके अंग प्रत्यंग को नए 3डी प्रिंट से बने अंगों से बदलता रहे.

मैंने बारीकी से अनुभव किया कि कुछ विशेष खानपान आदतों और योग मुद्राओं के जरिए पेसमेकर पर निर्भरता से निजात पाई जा सकती है. मैंने तदनुसार अपने को ढाला और नित्य योग की कुछ मुद्राएँ – जिसमें सूर्य-नमस्कार की कुछ मुद्राएँ सम्मिलित हैं, करने लगा. इससे मैं शीघ्र ही पेसमेकर इंडीपेंडेंट हो गया यानी पेसमेकर की जरूरत मुझे फिर यदा कदा ही होती, मेरी निर्भरता पेसमेकर में नहीं ही थी. यह एक बड़ी उपलब्धि थी मेरे लिए क्योंकि जब भी पेसमेकर चालू हो जाता था तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता था. जहाँ पेसमेकर था, वहाँ की मांसपेशियाँ भी करेंट से उछलने लगती थीं, वह भी अजीब स्थिति होती. अब मैं प्रारंभ में कुछेक साल रीव्यू जांच के लिए नियमित जाता रहा. मद्रास के बाद डॉक्टर जायसवाल कुछ समय के लिए लुधियाना, पंजाब के किसी अस्पताल में सीनियर कार्डियोलाजिस्ट के रूप में गए तो मैं वहाँ भी गया. खान-पान में नियंत्रण कर – जिसमें तेल-घी-नमक-मसाले-शक्कर आदि का सीमित प्रयोग व अधिकाधिक शाक-सब्जियों-फलों का उपयोग सम्मिलित है, मैंने किसी अन्य रोग को अपने पास फटकने नही दिया.

डॉक्टर चेरियन ने कहा था – फ़ाइव ईयर इज ए लांग लांग टाइम. पर, मैंने तो सचमुच, इससे कहीं बहुत लंबा समय गुजार लिया. कोई तेईस साल गुजर गए बिना किसी समस्या के. सर्दी खांसी बुखार तो खैर वाजिब है, पर फिर से मलेरिया नहीं हो इसके लिए बेहद एहतियात बरती मैंने. फिर भी, इंसान चाहे कुछ भी कर ले, समस्याएँ पीछा नहीं छोड़तीं. हृदय की चीरफाड़ की हुई मांसपेशियों में कहीं कुछ दबी छिपी समस्याएं बाहर निकलने को उतावली हो रही थीं. और एक दिन वह भी हो गया.

किसी घर में यदि कोई क्रिटिकल, लंबे समय के लिए बीमार होता है तो पूरे परिवार पर आर्थिक-मनोवैज्ञानिक समस्याएँ आती ही हैं. मेरी दिल की बीमारी के बारे में सुन सुन कर मेरी बेटी अनुश्री, जो अभी तीन साल की हो रही थी, उसने कहा कि उसके दिल में भी दुखता है. हमें लगा कि कहीं उसे भी किसी तरह की जन्मजात हृदय संबंधी समस्या तो नहीं है. बिना कोई देरी किए हमने इंदौर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर भराणी को उसे दिखाया. डॉक्टर भराणी ने उसका परीक्षण किया और बताया कि वो पूरी तरह से ठीक है, और यह कि परिवार में दिल की बीमारी आदि की बातें चलती हैं तो बच्चों में मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और कभी कभी वे भी स्वयं को बीमार महसूस करने लग जाते हैं. उन्हें थोड़ा स्वस्थ माहौल दो तो सब ठीक हो जाएगा. दरअसल, मेरी बीमारी की पहली पड़ताल, फिर साल भर बाद सर्जरी और उसके एक साल बाद रीव्यू में समस्या होने से दो-तीन साल तक का समय व माहौल पूरा मरीजमय हो गया था और इस बीच रिश्तेदारों-मित्रों के सद्भावना-शुभकामना विजिट में भी बीमारी व उससे संबंधित चर्चाओं ने बच्चों के कोमल मन पर विपरीत असर डाला था, जिससे उबारने में अच्छा खासा समय लगा.

जब मेरे विभाग में 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की स्कीम आई तो इस स्कीम के तहत सबसे पहले सेवानिवृत्ति लेने वालों में मैं था. विद्युत मंडल में नौकरी करते हुए मुझे बीस साल हो रहे थे और अतिरिक्त कार्यपालन अभियंता के रूप में जो वेतन मुझे उस वक्त मिल रहा था, उसका कोई पचहत्तर प्रतिशत पेंशन के रूप में मुझे मिलना था. यानी मैं केवल पच्चीस प्रतिशत अतिरिक्त के लिए कार्य कर रहा था. ऊपर से, उस वक्त कार्य का माहौल विद्युत मंडल के घोर राजनीतिकरण की वजह से बेहद खराब हो गया था, और लोगों को बिजली मिलती नहीं थी, बेतहाशा बिजली बंद होती थी, लोड शेडिंग लागू थी, और बिजली नहीं मिलने से जनता बिजली अधिकारियों को कभी जूते की माला पहनाती कभी मुंह काला कर गधों की सवारी करवाती कभी चूड़ियाँ भेंट करती. ऐसे माहौल में काम करना तो मेरे जैसे दिल के मरीजों के लिए और भी मुश्किल भरा होता था. तब तक मैं अपने अतिरिक्त समय में इंटरनेट व कंप्यूटरों से जुड़कर कंप्यूटरों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने वाली कई संस्थाओं, जिनमें इंडलिनक्स प्रमुख था, ऑनलाइन जुड़ चुका था. और हमने अतिरिक्त प्रयास कर भारतीय भाषाओं में जिनमें हिंदी भी शामिल थी, मिलन व रंगोली नाम से लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम भी जारी कर दिये थे. उसी समय रेडहैट लिनक्स पुणे में हिंदी भाषा का लैब तैयार कर रहा था, के द्वारा मुझे वहाँ हिंदी भाषा की टीम में ज्वाइन करने का ऑफर भी दिया गया, जिसे मैंने विनम्रता से ठुकरा दिया क्योंकि मैं रतलाम में एक तरह से सेट था और रीलोकेशन में पारिवारिक दिक्कतें थीं.

कंप्यूटरों के प्रति मेरी दिलचस्पी प्रारंभ से ही रही है. मैंने अपना पहला कंप्यूटर अपने जीपीएफ की राशि से लोन लेकर लिया था – तब मेरा वेतन पांच-सात हजार रुपए हुआ करता था और मैंने 30 हजार रुपए में इंटेल 486 डेस्कटॉप कंप्यूटर लिया था. जिसमें 16 मेबा (जी हाँ, मेगा बाईट, गीगा बाइट यानी जी.बी. नहीं,) मेमोरी थी, हार्ड डिस्क उस समय की उच्चतम – 1 जीबी थी, और प्रोसेसर था 32 मेगा हर्त्ज! अभी आप अपने स्मार्टफ़ोन के स्पेसिफ़िकेशन जांच लें. हजार रुपल्ली के फ़ीचरफ़ोन में भी इससे अधिक क्षमता होगी!

सेवानिवृत्ति के बाद मैंने अपना समय सॉफ़्टवेयर लोकलाइजेशन यानी कंप्यूटर व ऑनलाइन एप्लिकेशन के अनुवादों तथा इंटरनेट पर हिंदी सामग्री के उपयोग व सृजन को बढ़ाने में दिया जिससे मुझे एक पहचान तो मिली ही, नौकरी छोड़ने पर जो वित्तीय नुकसान हो रहा था उसकी थोड़ी बहुत भरपाई भी हुई.

और फिर, लंबे समय तक चिकित्सकीय भाषा में एसिम्प्टोमेटिक रहने के बाद, 24 साल बाद, 2018 आया - जिसने मेरे दिल की धड़कनें बढ़ा दीं. एक न एक दिन तो यह होना ही था. गनीमत यह रही कि समय लंबा रहा...

दोगुनी, चौगुनी रफ्तार से धड़कता मेरा दिल


26 मार्च 2018 को दोपहर को मुझे लगा कि मेरा दिल बेकाबू हो गया है – उम्र के इस पड़ाव में, जहाँ मैं 60 का होने जा रहा हूँ, कोई अन्यथा कयास न लगाएँ कृपया. मेरा दिल सचमुच, अकारण बेकाबू हो गया था. वो अकारण ही 120 से लेकर 200 बीट्स प्रति मिनट तक धड़कने लगा. नतीजा, उठते बैठते, सोते जागते बेचैनी. इससे पहले मेरे दिल की धड़कनें यदा कदा असामान्य रफ़्तार लेती रही थीं, परंतु वे जल्द ही अपनी सामान्य रफ़्तार में चली आती थीं. अकसर मैंने पाया है कि भारतीय मसालों में डाली जाने वाली कुछ खास चीजें और बिना ब्रांड की चायपत्तियों के सेवन से तथा कुछ विशेष सौंदर्य प्रसाधन उत्पाद जैसे कि माइश्चराइजर आदि के उपयोग से हृदय की धड़कनें असामान्य, अनियमित होती हैं. अतः इनका प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए.

मैंने स्थानीय चिकित्सक से सलाह लेने के बजाय डॉ जायसवाल से सलाह व इलाज लेना उचित समझा. मेरे अब तक के चिकित्सकीय अनुभव ने यह पक्के तौर पर सिखाया है कि सही इलाज के लिए सही डायग्नोसिस और सही डॉक्टर ज्यादा जरूरी है, अन्यथा अर्थ का अनर्थ होना ही है. मेरी छोटी बहन के पति को मामूली सा हृदयाघात हुआ था, उन्हें एंजियोग्राम के लिए कहा गया था, फिर उनकी एंजियोप्लास्टी को कहा गया और फिर एंजियोप्लास्टी के दौरान ही उनकी अकाल मृत्यु हो गई. जिस अस्पताल में उनका इलाज चला वहाँ आईसीसीयू में मृत्यु पश्चात्, कवर-अप करने के नाम पर सात दिन और वेंटीलेटर पर रखा गया था – मरीज तो रहा नहीं, ऊपर से अस्पताल का एवरेस्ट के शिखर जितना बड़ा बिल! करोड़ों रुपए इन्वेस्ट कर नर्सिंग होम बनते हैं, करोड़ों रुपयों के उपकरण आते हैं, तो इन इन्वेस्टमेंट की कीमत जल्द से जल्द रिकवर करने का दबाव ऐसे अस्पतालों और डॉक्टरों पर निःसंदेह रहता है. ऐसे में कोई भी पेशेंट वहाँ जाएगा, तो उसे तो हलाल होना ही है. इसीलिए, अपने अस्पतालों का चयन सावधानी से करें, और डॉक्टर का तो विशेष तौर पर. और हाँ, यथासंभव मेडिकल इंश्योरेंस अवश्य लें.

संयोग से डॉक्टर जायसवाल लुधियाना - पंजाब, छोड़कर वापस चेन्नई में एसआरएम अस्पताल में आ चुके थे. 9 अप्रैल को उन्होंने मुझे देखा और बताया कि आपकी समस्या हृदय में धड़कनों को नियंत्रित करने वाले करंट पैदा करने वाले मांस-पेशियों में आई समस्याओं की वजह से हो रही है. इस तरह की समस्याएं आजकल बहुतों को होती हैं और इस रोग के विशेषज्ञ अलग होते हैं. उन्होंने अपोलो अस्पताल चेन्नई के हृदय रोग विभाग के कंसल्टेंट कार्डियोलाजिस्ट तथा इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. कार्तिगेशन को मेरा केस रेफर कर दिया.

डॉ. कार्तिगेशन ने इकोकार्डियोग्राफ़ी आदि से जांच परख कर बताया कि मेरा हृदय 2:1 कंडक्शन कर रहा है. यानी हृदय का ऊपरी चैंबर कोई 200 बीट्स प्रति मिनट धड़क रहा है तो नीचे का चैम्बर 100 बीट्स प्रतिमिनट. उनके मुताबिक कभी भी कुछ भी हो सकता था, और यदि मैं उनके सामने जीवित खड़ा था तो महज वो केवल एक इत्तफ़ाक था, एक चमत्कार था.


बहरहाल, उन्होंने मेरे लिए निम्न तीन विकल्प सुझाए –


पहला – हृदय की एंजियोग्राफी की जाकर उसके जरिए हृदय के मांसपेशियों की 3डी मैपिंग की जाए और जो मांसपेशियाँ अधिक विद्युत करेंट बना रही हैं उन्हें बिजली के तरंग के द्वारा जला देना,

दूसरा – बिजली के तेज झटके से (कार्डियो वर्सन) हृदय की धड़कन को पूरी तरह से बंद करना और फिर हल्का झटका देकर फिर से चालू करना – मगर इसमें बाद में दवाईयों पर निर्भरता अधिक होती.

तीसरा – दवाईयों के तेज डोज के द्वारा धड़कनों पर नियंत्रण पाना – जिसकी सफलता संदिग्ध थी.

उन्होंने यह भी बताया कि मेरे लिए पहला विकल्प सबसे बेहतर है. और यह हालांकि इन्वेसिव तकनीक है, मगर प्रोसीजर के एक दिन के बाद छुट्टी दे दी जाती है.

अब तक तो मेरा पुत्र अन्वेष बड़ा, समझदार हो चुका था, नौकरी पेशे में लग चुका था, और अब वो मेरे साथ था. उसने डाक्टर कार्तिगेशन से पूछा – इस प्रोसीजर में कितना रिस्क है?

डॉक्टर कार्तिगेशन ने जवाब दिया – कोई 5%.
मेरे मुँह से निकला – यह तो बड़ी ही आश्वस्त करने जैसी बात है.
डॉक्टर कार्तिगेशन ने कहा – नो सर, दिज 5% इनक्लूड्स एवरीथिंग.
उनका इशारा स्पष्ट था. फिर भी, जाहिर है, मैंने पहले विकल्प को ही चुना. मुझे पक्के तौर पर पता था कि 5% का रिस्क फ़ैक्टर क्या होता है. जहाँ मैं 90% से अधिक के रिस्क फ़ैक्टर से जूझ कर, मृत्यु का साक्षात्कार कर जीवन में लौट चुका था वहां, प्रकटतः यह कोई रिस्क जैसा मामला ही नहीं बनता था.

फिर से एक बार अपोलो अस्पताल मद्रास की शरण में


1994 में अपोलो अस्पताल मद्रास – (अब चेन्नई) द्वारा लतियाए जाने के कोई चौबीस साल बाद, 11 अप्रैल को मैं वहां फिर से इलाज के लिए भर्ती हो गया. मेरी किस्मत मुझे वहाँ वापस खींच लाई थी. जिस जनरल वार्ड में चौबीस साल पहले मैं भर्ती हुआ था उसका कायाकल्प हो गया था, और पहले जो वार्ड खुला खुला, खूबसूरत-सा था, अधिकाधिक मरीजों को रखने के लिए बहुत ही काम्पैक्ट, भीड़ भरा और कोठरी-नुमा सा हो गया था जहाँ मरीजों के बिस्तर ही बिस्तर लगे थे.

12 अप्रैल को 1 बजे दोपहर मुझे कैथ लेब ले जाया गया. इस बार मैं थोड़ा भयभीत था. किसी अनहोनी की आशंका में अपना अंगदान का फार्म भी मैंने भर दिया था. फिर भी, जब मुझे कैथ लेब ले जाया जा रहा था तो मैंने रेखा व अन्वेष से गले मिल कर कहा – आई विल बी बैक.

डॉ. कार्तिगेशन ने मेरे हृदय की 3डी मैपिंग प्रारंभ की. उन्होंने कई मर्तबा अपने सहयोगियों और अन्य चिकित्सकों से कहा कि यह एक चैलेंजिंग टास्क है, क्योंकि मेरी टिपिकल सर्जरी हुई है, हृदय की भीतरी बनावट टिपिकल है और कैथेटर के जरिए हृदय के अंदरूनी भागों में पहुँच बनाना आसान नहीं है. सामान्य हृदय में यह प्रोसीजर करने में उन्हें घंटा भर लगता, मगर इसमें अप्रत्याशित रूप से अधिक समय लगने की संभावना व्यक्त की थी और समय लगा भी – 6 घंटे से अधिक.

उन्होंने मेरे हृदय के भीतर एक साथ तीन जगह से एंजियोग्राफ़ी के तार - कैथेटर डाले. दोनों जांघ की शिराओं से एक-एक तथा एक गले के पास दाएँ तरफ से. चौथी तरफ, गले के बाईं और की शिरा से तार डालने का उनका प्रयास नाकाम रहा – नस नहीं मिली. उनका कहना था कि मेरे शरीर में हृदय की दिशा उल्टीपुल्टी है, अतः 3डी मैपिंग में अधिक समय लगेगा. उन्होंने कोई 6 घंटे में यह कार्य संपन्न किया और प्रोसीजर सफल रहा. उन्होंने मेरे हृदय के भीतर तार डालकर अत्याधुनिक मशीनों से, हृदय के भीतर प्रत्येक इंच में जाकर यह पता किया कि हृदय में अनावश्यक करेंट कहाँ-कहाँ से निकल रहा है और उन सभी अनावश्यक करेंट जनरेट करने वाले मांसपेशियों को रेडियो फ्रिक्वेंसी तरंग के द्वारा जला दिया ताकि वे अनावश्यक करेंट पैदा न कर सकें.

उन्होंने अपनी रपट में लिखा –

इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी स्टडी 3डी मैपिंग कार्टो आरएफ एबलेशन

हृदय के दाएँ हिस्से से पैदा हो रहे फ्लटर (हृदय की असामान्य तेज धड़कन) की 3डी इलैक्ट्रो वोल्टेज मैपिंग की गई. 2:1 एवी कंडक्टिंग एट्रियल फ्लटर बेसलाइन पर मिला.

घड़ी की उल्टी दिशा का फ्लटर पता चला.
30 वाट बिजली ऊर्जा तथा 20 मिली/प्रतिमिनट सेलाइन फ्लो से लीनियर एबलेशन किया गया और फ्लटर बंद किया गया.
3 बार अतिरिक्त विद्युत प्रवाह दे कर उकसाने के बाद भी यह फ्लटर फिर से चालू नहीं हुआ.
प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई.
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इस प्रोसीजर में, जो कि लोकल अनीस्थीसिया में किया जाता है, कोई खास समस्या तो नहीं हुई, मगर उस सुबह मुझे यूरीन के डिस्चार्ज के लिए कैथेटर लगाया गया. जिस रेजीडेंट डॉक्टर ने मुझे यह कैथेटर लगाया वो थोड़ा अनाड़ी था या उससे उस समय कोई गलती हो गई, तो कैथेटर ठीक से लगा नहीं और मूत्र डिस्चार्ज होने के बजाए बहुत ही दर्दनाक तरीके से लीक होने लगा. मैं पूरे प्रोसीजर के दौरान भयंकर पीड़ा से गुजरता रहा और दो तीन बार डॉक्टर से निवेदन किया कि कैथेटर को दिखवा दें. मगर उन्होंने कहा कि जेल लीक हो रहा होगा और यह सामान्य बात है – ऐसा होता है. इधर मेरी पीड़ा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

मुझे पीठ के बल लेटाया गया था, हिलने डुलने से मना किया गया था. मेरा मस्तिष्क जागृत था और मैं इस स्थिति में कोई चौबीस घंटे और पड़ा रहने वाला था. इस बीच कई बार मुझे लगा कि मेरा शरीर मृत हो चुका है और जैसे मेरी आत्मा शरीर के बाहर आ चुकी है. मृत्यु का भय न केवल अब समाप्त हो चुका था, बल्कि वह भावना और वह अहसास सुखद सा था.

रात नौ बजे मुझे वार्ड में शिफ्ट किया गया तब बाहर बेसब्री से रेखा और अन्वेष इंतजार कर रहे थे. मैंने खुशी से उनकी ओर हाथ का अंगूठा उठाया और चिल्लाया – आयम बैक विथ ए बैंग. हम सब की आंखों में खुशी के आंसू थे. व्यक्ति को मृत्यु का भय नहीं होता, अपनों से समय-कुसमय बिछुड़ने का भय होता है.

यूरीन कैथेटर के स्थान पर दर्द बढ़ता जा रहा था. किसी करवट चैन नहीं था. वो जनरल वार्ड था. आजूबाजू भी मरीज थे. मैं हर दूसरे क्षण कराह रहा था, तो बाजू में भर्ती मरीज के एक परिजन ने कहा कि हल्ला क्यों कर रहे हो. कम ही लोग दूसरों के दर्द को समझ सकते हैं. मगर मेरी कराहटों से उन्हें भी शायद परेशानी हो रही होगी. अंततः जब मामला असहनीय हो गया तो नर्सिंग में दोबारा खबर किया गया. अबकी बार कोई नई नर्स आई. उसने ध्यान से देखा कि यूरीन का लीकेज वास्तविक है तो फिर उसने स्थिति गंभीर जानकर इमर्जेंसी डॉक्टर को खबर किया. आनन फानन में इमर्जेंसी ड्यूटी डाक्टर आया. उसने कैथेटर निकाल कर नया कैथेटर फिर से लगाया तब कहीं जान में जान आई. अगर डॉक्टर कार्तिगेशन मेरी बात पर पहले ही भरोसा कर लेते तो इतनी पीड़ा नहीं झेलनी होती. बाद में मुझे तो इस समस्या के कारण बुखार भी आ गया था. और मेरे शरीर के निचले हिस्से में असामान्य रूप से सूजन आ गई थी जिसे ठीक होने में तीन हफ़्ते लगे.

मेरा दिल अब अपनी सामान्य गति पर वापस आ गया है. और मेरी दिनचर्या भी. मनुष्य ने प्रकृति की गलतियों को सुधारने व उसकी मार पर विजय पाने का अपना अभियान सदियों से निरंतरता से जारी रखा है और परिणाम स्वरूप चिकित्सा में विज्ञान की आश्चर्यजनक खोजों ने सचमुच क्रांति ला दी है, नहीं तो मेरे जैसा, जन्मजात हृदय रोगी यहाँ आपको अपनी कहानी सुनाने नहीं बैठा होता. वो तो कब का भगवान को प्यारा हो चुका होता!

शायद किसी दिन मनुष्य प्रकृति पर पूरी तरह से विजय पा ले.

अभी ही वह उसे अंगूठा दिखाने में तो कामयाब हो ही गया है.
--
रवि रतलामी
raviratlami@gmail.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 6
  1. हौलनाक दास्तान। एक सांस में पढ़ गया। आप स्वस्थ सानंद रहें। बहुत बहुत शुभकामनाएं

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  2. पहली पंक्ति से ही दिल को ज़ोर से थाम कर पढ़ रहा था। किन्तु पढ़ते-पढ़ते कई बार दिल बिफर गया। लेकिन फिर भी उसे थाम कर अंत तक पढ़ा। ऐसे लगा कि प्रत्येक क्षण आपके साथ था। एक जन्मजात और लगभग असाध्य रोग से संघर्ष और उस पर विजय की अद्भुत, रोमांचक और प्रेरक कथा। आपकी जिजीविषा, आपकी सहधर्मिणी के साहस, और डॉक्टरों व नर्सों के कौशल और समर्पण को नमन। आगे आने वाले समय में आपके स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। यह कथा रोगी और उसके प्रियजनों और परिजनों के अनुभव का जीवंत विवरण तो है ही किन्तु हमारे देश के सरकारी और निजी क्षेत्र के शीर्ष अस्पतालों की दशा का दस्तावेज़ भी है। प्रत्येक डॉक्टर और प्रत्येक गंभीर रोगी को आपकी यह आपबीती पढ़नी चाहिए। प्रशिक्षु डॉक्टरों और मेडिकल-प्रशासकों को तो अवश्य ही। अगर इसका अङ्ग्रेज़ी अनुवाद सुलभ हो सके तो आपके अनुभवों से और बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरणा मिल सकेगी। आपबीती लिखने और साझा करने के लिए बहुत आभार।

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  3. बहुत-2 धन्यवाद. अंग्रेज़ी अनुवाद के बारे में विचार करता हूँ.

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