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बेहतर लिखना तो ठीक है साहब, बेहतर पढ़ने वालों में असली बुद्धिमत्ता कहाँ से लाएँगे?

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... पत्थर का एक टुकड़ा भी! कृत्रिम बुद्धिमत्ता से अब उच्चकोटि का साहित्य लिखा जाएगा. कविताई-शविताई, ग़ज़ल-शज़ल, व्यंग्य-श्यंग्य  सब. एक बात ...

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... पत्थर का एक टुकड़ा भी!


कृत्रिम बुद्धिमत्ता से अब उच्चकोटि का साहित्य लिखा जाएगा. कविताई-शविताई, ग़ज़ल-शज़ल, व्यंग्य-श्यंग्य  सब. एक बात तो इससे बढ़िया हो जाएगी. एक कवि दूसरे से नहीं जलेगा. एक व्यंग्यकार दूसरे व्यंग्यकार के व्यंग्य में सरोकार या मार्मिकता या पंचादि ढूंढने की कोशिश नहीं करेगा, बल्कि एआई ऐप्प को थ्रीस्टार, फाइवस्टार रेटिंग देगा - ये वाला ऐप्प बढ़िया व्यंग्य लिखता है. इस ऐप्प ने तो इस बार व्यंग्य में व्यंग्य नहीं, फूहड़ हास्य भर दिया. इसलिए, जीरो रेटिंग.

पर एक यक्ष प्रश्न उठेगा. कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बढ़िया साहित्य रच लिया जाएगा. पढ़ेगा कौन? उच्च कोटि के साहित्य को पढ़ने व समझने के लिए असली बुद्धिमत्ता भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से गढ़नी होगी. और आदमी अपने बुद्धूपन की ओर एक कदम और बढ़ा लेगा Smile

जै हो तकनीक की!

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (28-03-2018) को ) "घटता है पल पल जीवन" (चर्चा अंक-2923) पर होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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छींटे और बौछारें: बेहतर लिखना तो ठीक है साहब, बेहतर पढ़ने वालों में असली बुद्धिमत्ता कहाँ से लाएँगे?
बेहतर लिखना तो ठीक है साहब, बेहतर पढ़ने वालों में असली बुद्धिमत्ता कहाँ से लाएँगे?
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