दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट युद्ध : ओडीएफ़ या ओपनएक्सएमएल?

आपकी पसंद क्या है? कल्पना करें कि आपने आज अपने कम्प्यूटर पर किसी अनुप्रयोग में कोई बढ़िया सा आलेख लिखा है और उसे किसी ऑफ़िस दस्तावेज़ फ...


आपकी पसंद क्या है?

कल्पना करें कि आपने आज अपने कम्प्यूटर पर किसी अनुप्रयोग में कोई बढ़िया सा आलेख लिखा है और उसे किसी ऑफ़िस दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट में सहेज कर रख लिया है. इसे कोई सौ बरस बाद आपका पड़-पोता कहीं से ढूंढ निकालता है, और उसे वो पढ़ना चाहता है. तब तक दुनिया बहुत बदल चुकी होगी. अनुप्रयोग बदल चुके होंगे. पठन-पाठन के तरीके बदल चुके होंगे. पर, एक चीज शर्तिया नहीं बदली होगी, वो है आपके दस्तावेज़ का फ़ॉर्मेट. और आपके उस दस्तावेज़ को सौ साल बाद भी पढ़ने के, उसके उपयोग करने के ठोस तरीके रहने चाहिए होंगे. यहाँ, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए कि आपने आज किस प्लेटफ़ॉर्म पर, किस अनुप्रयोग के जरिए कौन सा दस्तावेज़ बनाया है. सौ साल बाद आपके पड़पोते को वो प्रयोग में आने लायक होना ही चाहिए. और, सौ साल बाद क्यों, अभी आप उस दस्तावेज़ को अपने मित्र या संबंधी को जो आपसे भिन्न कम्प्यूटर प्लेटफ़ॉर्म प्रयोग करता है, भेजें तो भी यही स्थिति होनी चाहिए. मगर नहीं है. ओपन ऑफ़िस का ओडीटी फ़ॉर्मेट में सहेजा गया दस्तावेज़ आप एमएसऑफ़िस 2007 में नहीं खोल सकते तो एमएसऑफ़िस 2007 में नवीनतम फ़ॉर्मेट में सहेजा गया दस्तावेज़ आप ओपन ऑफ़िस में नहीं खोल सकते. इनका प्रयोग दूसरे प्लेटफ़ॉर्म में करने के लिए आपको अतिरिक्त प्लगइनों की आवश्यकता होती है. और, यहाँ हिन्दी फ़ॉन्ट की तो बात ही नहीं हो रही है – अंग्रेज़ी सामग्री में भी ये समस्या आती है, जो कि आनी नहीं चाहिए. प्रयोक्ता को ये स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वो किसी भी प्लेटफ़ॉर्म में किसी भी अनुप्रयोग का प्रयोग कर जो दस्तावेज़ बनाए वो हर जगह प्रयोग में आएं. जैसे कि आपके कम्प्यूटर पर ओपनऑफ़िस में बनाए दस्तावेज़ आपके मित्र के विंडोज मोबाइल उपकरण पर भी प्रयोग में आ सकें.

इन्हीं समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ समय से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट के आईएसओ मानकीकरण के प्रयास चल रहे हैं जिनमें दो प्रमुख प्रतिभागी हैं – ओपन डाक्यूमेंट फ़ॉर्मेट (ओडीटी) तथा ओपन एक्सएमएल. पहला ओपन ऑफ़िस व स्टार ऑफ़िस में पहले से समर्थित है तथा दूसरा माइक्रोसॉफ़्ट के प्लेटफ़ॉर्म से आया है. दोनों ही पक्षों में अपने फ़ॉर्मेट को मानकीकृत किए जाने के लिए लॉबीइंग की जा रही ह.ै ओपनडाक्यूमेंट को आईएसओ प्रमाणन मिल चुका है, और माइक्रोसॉफ़्ट ओपनएक्सएमएल के आईएसओ मानकीकरण हेतु प्रयासरत है. मानकीकरण में विभिन्न सदस्य देशों के शासकीय अशासकीय विभागों द्वारा मतदान के जरिए मामला सुलझाया जाना है. और, समस्या यहीं से शुरू होती है.

कुछ दिन पहले रीडिफ़ में ये खबर छपी कि माइक्रोसॉफ़्ट ने भारतीय एनजीओ सदस्यों को अपने ओपनएक्सएमएल फ़ॉर्मेट को समर्थन में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) को पत्र लिखने के लिए दबाव डाला. जाहिर है, दस्तावेज़ के मानकीकरण में बीआईएस के भी महत्वपूर्ण मत हैं. इसी सिलसिले में आईबीएम इंडिया द्वारा भारतीय संगठनों को लिखे गए पत्र के मजमून भी जगजाहिर हुए – जाहिर है उनके विचार अलग ही होंगे – ओडीएफ़ के पक्ष में.

ओडीएफ़ या ओपनएक्सएमएल का ये युद्ध नया नहीं है. पिछले कई वर्षों से जारी है यह युद्ध. और जब तक ओपनएक्सएमएल के लिए आईएसओ प्रमाणन के लिए मतदान नहीं हो जाता तब तक ये जारी रहेगा. अपने अपने तर्कों में, जाहिर है, कोई भी पीछे नहीं हैं. और, आइसोलेशन में पढ़ें तो हर एक का तर्क दमदार लगता है.

एक प्रयोक्ता के तौर पर, आपको क्या चाहिए? ओपनडाक्यूमेंट या ओपनएक्सएमएल? आप कहेंगे भाड़ में जाएं ये दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट. हमें क्या लेना देना, जब तक कि हमारा काम बढ़िया तरीके से चले. सही कहना है आपका. एक प्रयोक्ता के तौर पर किसी दस्तावेज़ के किसी खास फ़ॉर्मेट में होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता जब तक कि दस्तावेज़ों के आपसी साझा में कोई समस्या न आए. अनुप्रयोगों में उन्हें आपस में और कहीं पर भी इस्तेमाल किये जाने लायक तकनॉलाज़ी अंतर्निर्मित होनी ही चाहिए. और, भविष्य में ये होना ही है ये बात भी तय है.

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