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मेरी व्यवसायिक चिट्ठाकारी का एक (सफल?) साल ...

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पिछले वर्ष, आज ही के दिन, मैंने अपने कदम पूर्ण व्यवसायिक चिट्ठाकारी की दुनिया में रखे थे. मैंने चिट्ठाकारी की शुरुआत ब्लॉगर के इसी चिट...


पिछले वर्ष, आज ही के दिन, मैंने अपने कदम पूर्ण व्यवसायिक चिट्ठाकारी की दुनिया में रखे थे.

मैंने चिट्ठाकारी की शुरुआत ब्लॉगर के इसी चिट्ठे से की थी, पर बीच में कुछ अरसा वर्डप्रेस हिंदिनी पर छींटें और बौछारें में लिखता रहा था. परंतु हिंदिनी की प्रतिबद्धता में व्यवसायिकता का स्थान नहीं होने के कारण मैं वापस अपने पुराने चिट्ठे – यानी इसी चिट्ठे पर आ गया था.

उस वक्त मेरा प्रेरणा स्रोत रहा था सृजनशिल्पी जीरमण जी के चिट्ठा पोस्ट जिसमें हिन्दी चिट्ठाकारी के व्यवसायिक होने-न-होने पर बड़ी अच्छी बहस की गई थी.

हालांकि मेरे उक्त कदम को कई मित्रों ने सहजता से स्वीकार नहीं किया था और, संभवतः वह नाराजगी अभी भी बनी ही हुई है. शुरुआत में मेरे चिट्ठों में विज्ञापनों की बौछार देख कर मेरे कई पाठक बिदक भी गए थे. फ़ुरसतिया जी तो हमेशा मौज लेते रहे और उन्होंने कोई मौका छोड़ा भी नहीं – वे कहते रहे - रतलामी जी के चिट्ठे पर विज्ञापन के बीच पोस्ट है या पोस्ट के बीच विज्ञापन, यह तय करने में किसी बड़े शोधकर्ता को भी पसीना आ जाएगा. परंतु, ये बात भी तय है कि (अंग्रेज़ी के) कुछ महा सफल (व्यवसायिक ही!) ब्लॉगरों की तुलना में मेरे चिट्ठे में हर हमेशा विज्ञापनों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम ही रही है (ऐसा मेरा मानना है). और, मैंने अपने किसी चिट्ठे में यह भी बताया था कि यदि पाठक मेरे चिट्ठे के विज्ञापनों से अपने आप को त्रस्त होता सा महसूस करते हैं तो प्रॉक्सी (जैसे पीकेब्लॉग) के जरिए विज्ञापन मुक्त पढ़ सकते हैं या फ़ीड सब्सक्राइब कर पूरी सामग्री विज्ञापन मुक्त पढ़ सकते हैं.

बहरहाल, विज्ञापन पुराण समाप्त कर आगे चलते हैं – देखते हैं कि क्या मेरी चिट्ठाकारी व्यवसायिक रूप से सफल हुई या नहीं.

जब मैंने अपनी चिट्ठाकारी को पूरा व्यवसायिकता का रंग पहनाया था तो मेरे जेहन में सिर्फ यही विचार था कि इससे जैसे तैसे मेरे इंटरनेट का खर्च निकल आए.

साल भर बाद, आज की स्थिति में मैं यह कह सकता हूँ कि हिन्दी चिट्ठाकारी के जरिए मेरे इंटरनेट कनेक्शन का मासिक बिल बड़ी आसानी से भरा जा रहा है – और, सिर्फ और सिर्फ यही लक्ष्य तो मैंने तय किया था.

मेरे चिट्ठों की कुछ सामग्री प्रभासाक्षी में नियमित प्रकाशित होती रही जहाँ से पत्रम्-पुष्पम् प्राप्त होते रहे. इसी तरह यदा कदा कुछ सामग्री इतर पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही ( अधिकतर बिना पारिश्रमिक के, :)) तो यहाँ से भी प्राप्त आय को मैंने इसमें शामिल माना है.

तो, भविष्य में क्या कोई हिन्दी चिट्ठाकार अपनी दाल रोटी हिन्दी चिट्ठाकारी के जरिए कमा सकता है?

जी, हाँ. बिलकुल. निश्चित रूप से.

परंतु इसमें थोड़ा सा समय लग सकता है. पाठकों के क्रिटिकल मास तक पहुँचने से पहले ये सपना देखना बेमानी होगा. क्रिटिकल मास माने – एक चिट्ठे के नियमित, नित्य, दस हजार पाठक.

कौन जाने कब, पर यह दिन आएगा जरूर.

चिट्ठों और पाठकों की बढ़ती रफ़्तार को देख कर लगता तो है कि हिन्दी चिट्ठाकारी जल्द ही – अपने चिट्ठाकारों के लिए दाल-रोटी का भी प्रबंध करने लगेगी.

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