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वेबारू : इंटरनेट खोज का नया आयाम एक अनुमान के अनुसार इंटरनेट पर 20 अरब जालपृष्ठ हैं जिनका कुल सम्मिलित आकार लगभग 10 लाख जी.बी. है। इसे खं...

वेबारू : इंटरनेट खोज का नया आयाम

एक अनुमान के अनुसार इंटरनेट पर 20 अरब जालपृष्ठ हैं जिनका कुल सम्मिलित आकार लगभग 10 लाख जी.बी. है। इसे खंगालना आसान नहीं और सर्च इंजन, निर्देशिकायें और न जाने किन किन और माध्यमों से हम इसकी थाह पाने में जुटे रहते हैं। जाहिर है कि यह खोज आनलाईन रहकर ही करना संभव है।

वेबारू एक विंडोज़ एप्लीकेशन है जो आपको किसी भी वेब ब्राउजर पर ऑफलाइन खोज तथा ब्राउज़ करने की सुविधा देता है।

ताज़ातरीन इंटरनेट स्टार्टअप वेबारू ने एक ऐसा अनोखा मुफ्त उत्पाद प्रस्तुत किया है जो विशिष्ट अल्गोरिद्म यानि समीकरण का प्रयोग कर इस 10 लाख गीगाबाइट डाटा को महज़ 40 गीगाबाइट में कंप्रेस यानि संपीडित कर विषयवार टुकड़ों में विविध वेब पैकों की रचना करता है जिन्हें पर्सनल कम्प्यूटरों के हार्डडिस्क, पीडीए और स्मार्टफ़ोनों में संचित करना संभव होगा। इन वेब पैकों में संपीडित जानकारी में से इंटरनेट की तमाम सामग्री तीव्र गति से, ऑफलाइन रहते हुए ढूंढी जा सकती है। समय-समय पर इस डाटा को अपडेट यानि अद्यतित भी किया जा सकता है। वेबारू की इन वेब पैकों को विविध मीडिया, जैसे कि सीडी रॉम, मेमोरी स्टिक, बाहरी हार्डडिस्क इत्यादि के जरिए भी वितरित किए जाने की योजनाएँ हैं।



वेबारू की स्थापना की है सफल एंटरप्रेन्योर तथा प्रोग्रामर राकेश माथुर ने, जिनके पहले के तीन स्टार्टअप भी काफी सफल रहे थे। कई वर्ष पूर्व "जंगली कॉर्प" (जिसे बाद में अमेज़ॉन ने खरीदा) की सफलता के दौरान कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.ई.ओ.) राकेश ने एक मार्केटिंग स्टंट में स्त्रियों वाली पोशाक पहन कर बहुत ध्यान आकर्षित किया। इसे "सफलता हेतु क्रॉस-ड्रेसिंग" का नाम दिया गया, और 1998 के बेहतरीन जनसंपर्क अभियान के रूप में पहचाना गया।

राकेश माथुर: क्रॉसड्रेसिंग फ़ॉर सक्सेसनिरंतर ने राकेश से पूछा कि "क्रॉसड्रेसिंग फ़ॉर सक्सेस" अभियान का विचार उन्हें कैसे आया तो राकेश का कहना था, "अगर नतीजों के साथ जीने को तैयार हों तो एन्टरप्रेन्योर्स को सफलता प्राप्ति के लिये हर संभव काम करने को तैयार रहना होगा ही। इस स्टंट के जरिए जंगली को काफी शोहरत मिली और देखिये मुझे 8 सालों बाद भी क्रासड्रेसिंग के बारे में पूछा जा रहा है! मैंने उस परिधान को जंगली कम्पेरिज़न शॉपिंग इंजिन का इस्तेमाल कर तकरीबन $150 डालर में खरीदा था और उससे पब्लिक रिलेशन का अब तक का सर्वश्रेष्ठ परिणाम मिला।" वाकई एक ड्रेस से कार्पोरेट सफलता का यह एक विशिष्ट उदाहरण होगा!

और एक भारतीय नेटप्रेन्योर होना क्या मायने रखता है राकेश के लिये? उनका जवाब था, "इंटरनेट एंटरप्रेन्योर्स अब हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं, और यह वैश्विक परिदृश्य से अपेक्षित भी है। मैं भारत में वेबारू का विकास करते हुये रोमांचित हूँ। यदि एस्तोनिया एक स्काईप बना सकता है तो...भारत की सीमाएँ वास्तव में अनंत हैं।" हम भी सहमत हैं राकेश!

वेबारू दरअसल एक तरह का विंडोज़ एप्लीकेशन यानि अनुप्रयोग है जो आपको किसी भी वेब ब्राउजर पर ऑफलाइन खोज तथा ब्राउज़ करने की सुविधा देता है। परंतु यह सुविधा आपको या तो विशेष तौर पर तैयार किए गए वेब पैक के जरिए (जिसे कम्प्यूटर हार्डडिस्क पर पहले से भंडारित किया जाता है) या निर्दिष्ट जाल स्थलों के वेबारू द्वारा पहले से डाउनलोड किए हुए व आपके कम्प्यूटर के हार्डडिस्क पर भंडारित किए गए पृष्ठों में ही मिलती है।

वेबारू अनुप्रयोग का बीटा संस्करण तकरीबन 5 मे.बा. का डाउनलोड है। इसके विविध विषयों पर केंद्रित सैकड़ों मेगाबाइट के वेब पैकों को पृथक रूप से डाउनलोड करना होगा, जैसे कि स्वास्थ्य संबंधी वेब पैक 186 मे.बा. का है, विकिपीडिया का समग्र डाटा 8 जी.बी. वेब पैक में समाया हुआ है और मुम्बई का वेब पैक 26 मे.बा. का है। यह एक मुफ्त उत्पाद है, तो कमाई का ज़रिया बनेंगे सन्दर्भ आधारित यानि कंटेस्टचुअल विज्ञापन होंगे जो ढूंढे गए तथा ब्राउज़ किए गए पृष्ठों में अंतर्निहित होंगे। वेबारू को बनाने वाली अभियांत्रिकी टोली में अधिकांशतः भारतीय हैं।

लेखक ने पाया कि मुम्बई वेब पैक प्रयोग करने पर मुम्बई शहर से संबंधित तमाम चित्रमय जानकारियाँ ऑफलाइन ही उपलब्ध हो जाती हैं। हाँ, बहुत सी अतिरिक्त जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पातीं पर उनके लिए वेबारू आपको ऑनलाइन ढूंढने का विकल्प प्रदान करता है। अभिव्यक्ति तथा छींटें और बौछारें की सामग्रियों को वेबारू के जरिए ऑफलाइन डाउनलोड कर सामग्रियों की खोज करने की कोशिश की गई तो यह औजार जाल कड़ियों के सिर्फ एक कड़ी भीतर तक जाकर ही सामग्रियों को डाउनलोड कर सका। लिहाजा दोनों ही जाल स्थलों में प्रारंभ के 70-80 पृष्ठ ही डाउनलोड हो पाए। इस लिहाज से यह निर्दिष्ट जाल स्थलों की सामग्रियों को ऑफलाइन ढूंढने में प्रायः असमर्थ ही रहा। वेबारू अगर किसी जालस्थल का संपूर्ण वेब पैक तैयार करे तो संभवतः उसमें ऐसी समस्या न आए। इसी तरह, उपयोक्ता द्वारा स्वयं का या सामाजिक वेब पैक तैयार करने का विकल्प भी नहीं है। वेबारू ने निरंतर को बताया कि ऐसी मांग पहले भी आई है और वे इस पर विचार कर रहे हैं। सामग्री से जुड़े कॉपीराईट के मसले भी जुड़े हैं और यह स्पष्ट नहीं कि वेबारू ऐसी सामग्री कैसे पेश कर पायेगा।

ऑफ़लाइन ब्राउजर की कल्पना ब्राउज़रों के इतिहास के साथ से ही चली आ रही है। वेबारू इसे नए ढंग से परोसने की कोशिश कर रहा है। वेबारू के दल से बातचीत के बार निरंतर ने यह पाया कि उनका मुख्य ध्यान मोबाईल उपभोक्ताओं पर है और भारत जैसे देशों में, जहाँ अच्छी कनेक्टीविटी के अभाव के कारण उत्पाद चल तो सकता है पर बैंडविड्ट्थ भी बड़ी समस्या है, वे शायद छोटे वेब पैकों पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

जो भी हो, यदि वेबारू के जरिए आपके पास सिर्फ एक डीवीडी में विकिपीडिया की संपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो जाए, या फिर एक सीडी में संपूर्ण अभिव्यक्ति की सामग्री उपलब्ध हो जाए, तो आपको बिना ऑनलाइन हुए इंटरनेट की सामग्री का इस्तेमाल लायक भंडार प्राप्त तो हो ही जाता है। सौदा बुरा नहीं है!

सर्च अनप्लग्ड

वेबारू का नारा है "सर्च अनप्लग्ड", यानी खोज बेलगाम। वेबारू से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये निरंतर ने वेबारू की टीम से संपर्क किया। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के कुछ महत्वपूर्ण अंश।

आजकल हम इंटरनेट की बढ़ती पहुँच की बात करते हैं। फिर आप की कंपनी ने ऐसे उत्पाद के बारे में कैसे सोचा जो एक तरफ तो इंटरनेट के घटिया कनेक्शनों से त्रस्त लोगों के लिए बना है, और दूसरी तरफ वेब पैकेट डाउनलोड करने के लिए बढिया बैंडविड्ट्थ की भी उम्मीद रखता है?

इन दोनों निष्कर्षों में कोई विरोधाभास नहीं है कि इंटरनेट का बेतार संपर्क (वायरलैस कनेक्टीविटी), आम तौर पर बेकार होता है, और तारयुक्त संपर्क (वायर्ड कनेक्टीविटी), आम तौर पर बढ़िया। विस्तार से कहें तो, बेतार नेटवर्क न तो सर्व-व्याप्त हैं (कवरेज बहुत सीमित है), न तेज ( 3G भी वेब-खोज के लिए धीमा है) और न ही सस्ता (उदाहरणतः EVDO महीने के अस्सी डॉलर लेता है), और फिलहाल इस में सुधार होने की भी उम्मीद नहीं है। वेबारू का लक्ष्य है मोबाइल यन्त्रों तक वैसा ही बढ़िया वेब अनुभव पहुँचाने की, जिस के हम तारयुक्त यन्त्रों पर आदी हो चुके हैं। इसी तरह के यन्त्रों में आइ-पॉड भी है, जो इंटरनेट से सामग्री कैश यानि इकट्ठा कर बाद में उसे प्रयोग करता है -- साफ तौर पर लोग इस तरह की प्रणाली को पसंद करते हैं।

प्रतीत होता है कि आप के उत्पाद का मूलमन्त्र है कंप्रेशन यानि संपीडन। पर गूगल जैसे खोज-इंजन के भीमकाय डाटा को देखा जाए तो यह कितना असरदार होगा?

हमारे उत्पाद का मूलमन्त्र है डाटा का सही चुनाव, न कि कंप्रेशन। हम पूरे विश्वजाल में क्रॉल कर गिने चुने पृष्ठों को चुनते हैं और उन्हें स्थानीय रूप से डाउनलोड करते हैं। औसतन हर 25,000 रेंगे गए पृष्ठों में से एक ही चुना जाता है। वेबारू की तकनीक का निरालापन इस में है कि हमारा चयन अल्गॉरिद्म बेहतरीन सामग्री-घनत्व के लिये बना है, यानी ज्यादा से ज्यादा विषयों तक पहुँचना और न्यूनतम फाइल आकार में सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली सामग्री एकत्रित करना।

आप के उत्पाद द्वारा डाउनलोड की गई सामग्री ऑफलाइन पठन के लिए जिन वेब पैकों में रखी जाएगी, उस के लिए 40 गीगाबाइट की अतिरिक्त जगह दरकार होगी। आप प्रयोक्ता से 1 गिगाबाइट रैम और ब्रॉडबैंड संपर्क की भी उम्मीद कर रहे हैं। यह भारत जैसी बाजा़र में यह कुछ ज़्यादती की बात नहीं हुई? और धनी देशों में किसी को वेबारू की ज़रूरत ही क्या है?

हमारे छोटे वेब पैक 10 मैगाबाइट से शुरू होते हैं, और बड़े से बड़े 40 गीगाबाइट तक हो जाते हैं। हमारे उत्पाद विश्व के विभिन्न भागों में प्रयोग होंगे और विभिन्न प्रकार के यन्त्रों पर। भारत जैसे बाज़ार में प्रयोक्ता हमारे छोटे वेब पैकों का लाभ उठा पाएँगे। धनी देशों में भी लोग वेबारू प्रयोग करते हैं क्योंकि, जैसा कि हमने पहले कहा, बढ़िया बेतार संपर्क की वहाँ भी कमी है।

वेबारू उन पृष्ठों को कैसे देखता है जो डाइनमिक सामग्री होती हैं या स्क्रिप्टों के पीछे छिपे होते हैं? आजकल के जालपृष्ठों में यह सामान्य सी बात है।

वेबारू स्थिर (स्टैटिक) एचटीएमएल पृष्ठों के बढ़िया काम करता है, जाल पर ज्यादातर पृष्ठ ऐसे ही हैं। हम यह भी जानते हैं कि कुछ पृष्ठों के लिए इंटरनेट संपर्क ज़रूरी है, और उन्हें ऑफलाइन नहीं पढ़ा जा सकता। यही बात कई खोज-इजनों पर भी लागू होती है, जो अभी भी कूटशब्दों द्वारा सुरक्षित या अन्य डाइनैमिक सामग्री को नहीं खोज पाते। संक्षेप में, उत्पाद का महत्व इस बात से है कि यह किए गए वादे पूरे करता है या नहीं, और प्रयोक्ताओं के लिए उपयोगी है या नहीं। हमारा विश्वास है कि जितनी सामग्री वेबारू लोगों तक पहुँचाएगा, उस कारण यह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

मुम्बई के लिए विशेष तौर पर तैयार वेबारू पैक पर ढूंढने के दौरान बहुत बार वेबारू द्वारा सामग्रियों को देखने हेतु ऑन-लाइन देखने की सलाहें दी गई। क्या यह उपयोक्ताओं में खीज पैदा नहीं करेगा जो वेबारू के जरिए इंटरनेट की सामग्री को पूर्णतः ऑफ-लाइन देखने की आशा करते हैं? वेबारू में कितनी ‘गहराई' या ‘स्तर' तक डाउनलोड सामग्रियाँ उपलब्ध रहेंगीं?

मोबाइल पर वेब के प्रयोग की बात करें तो ऑफलाइन स्थिति में खोज या ब्राउज़ बिल्कुल ही न कर सकने की स्थिति की तुलना में तो यह काफी बेहतर अनुभव होगा। वेबारू पर उपलब्ध कड़ियों को नीले रंग से दर्शाया जाता है ताकि उपयोक्ता यह जान सके कि जानकारी ऑफलाइन उपलब्ध होगी या नहीं। वेबारू डाउनलोड कितने लेवल या "गहराई" तक करे यह सामग्री पैक पर निर्भर करेगी - जैसे कि विकि जैसे विशिष्ट पैक में आनलाईन होने की ज़रूरत नहीं होगी।


अतिरिक्त सामग्री व सहयोग - देबाशीष चक्रवर्ती व रमण कौल

सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?


एड्स के बारे में एक तथ्य से शायद हर पढ़ा लिखा परिचित हो, और वह है "जानकारी ही बचाव है"। अलबत्ता जानकारी क्या होनी चाहिये यह बिना लागलपेट परोसने में हर माध्यम की घिग्घी बंध जाती है। हमारे समाज में खुले तौर पर और वह भी यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम, यह हिचक साफ दिखती है। भारत के एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक में सरकारी विज्ञापन की बानगी देखें,

"कॉन्डोम जरूरी है। कई बार टीवी पे देखा है। अखबारों में पढ़ा है। लेकिन कभी, किसी ने मुझे खुल कर, इसके बारे में कुछ नहीं समझाया। एक दिन जब मैं कॉन्डोम के बारे में छुप कर पढ़ रहा था तो बड़े भैया ने देख लिया। उन्हें सब झट से समझ आ गया। उन्होंने मुझे कॉन्डोम के बारे में अच्छी तरह समझाया। एचआईवी / एड्स और सेक्स के बारे में भी खुल कर बात की। दाद देनी पड़ेगी भैया की। उनकी हिम्मत की। काश सबको ऐसे ओपन-माइंडेड भैया मिलें!"

"मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।"

हम इस क्रियेटिव माध्यम की कुव्वत या रचनाधर्मिता कि बात अलग रखें तो बात अभी भी चाहरदिवारी के अंदर ही है। पढ़ने वाला अगर जागरूक न हो तो कॉन्डोम क्या है और इसका सही प्रयोग कैसे किया जाता है यह जानकारी इन महंगे विज्ञापन से नहीं मिलती (इसी अंक में पढ़ें - एड्स से कैसे बचा जाय)। सरकार ने बात करना शुरु किया पर असल जानकारी पाने का जिम्मा "ओपन-माइंडेड भैया" पर डाल दिया। तमाम मीडिया एड्स से बचने के ऐसे ही अस्पष्ट संदेशों से अटा पड़ा दीखता है। अलबत्ता यह पता नहीं कि ये विज्ञापन दर्शकों में एड्स के प्रति कोई जागरूकता जगा पाने में सक्षम भी हैं या नहीं।

एड्स जैसी अभूतपूर्व घटना के प्रति प्रतिक्रिया भी अभूतपूर्व होनी चाहिये। लोगों को जानकार बनाने के लिये हर संभव माध्यम और तरीके की भी सहायता लेनी चाहिये। और क्या संदेश कुछ मज़ाकिया ढंग से नहीं दिते जा सकते? थाईलैंड में एड्स एक्टीविस्ट और पूर्व काबिना मंत्री मेचाई वीरवैद्य, जो "काँडोम किंग" के नाम से लोकप्रिय हैं, ने हास्य, जिंगल जैसे अपरंपरागत तरीके से जागरूकता फैलाने का काम लिया। पर भारतीय विज्ञापन एजेंसिया भारत के पाठकों को रुख को देखते हुए ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती, हास्य का शुमार तो दूर की बात है। निरंतर ने कई नामी विज्ञापन एजेंसियों से पूछा कि क्या वे हास्य विनोद को शामिल कर कोई कैंम्पेन बना चुके हैं या बनाने वाले हैं, पर केवल मुद्रा ने ही जवाब दिया और वह भी ना में।


"एक बढ़िया कार्यक्रम जो बढ़िया काम कर रहा है"

Om Puriलोकप्रिय अभिनेता ओम पुरी टी.वी धारावाहिक "जासूस विजय" में दर्शकों के साथ पारस्परिक बातचीत के एक अंश की मेज़बानी करते नज़र आते हैं जिसमें दर्शक केस को सुलझाने में जासूस विजय को भी पछाड़ने का प्रयास करते हैं। एक लिहाज़ से वे कार्यक्रम के सूत्रधार भी हैं। ओम का परिचित और सम्माननीय व्यक्तित्व दर्शक और शो के मध्य संवाद स्थापित करने में मदद करता है।

ओम दर्शकों को एड्स और एच.आई.वी के बारे में खुलकर बोलने और अपने सवाल उन तक भेजने को भी उत्साहित करते हैं। "यह एक बढ़िया कार्यक्रम है जो बढ़िया कार्य कर रहा है।", ओम पूरी कहते हैं, "मैं भारत में जहाँ भी गया, लोग जासूस विजय के बारे में जानते हैं। हाल ही में लद्दाख गया तो वहाँ देखा कि उत्सुक लोग हस्तचालित जनरेटर चलाकर भी यह कार्यक्रम देखते हैं"।

हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। निरंतर एक ऐसे ही प्रयास की अनुशंसा करता है जो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम) यानि भारानी ने दूरदर्शन और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के साथ संयुक्त रूप से निर्मित किया है।

एड्स के विज्ञापनों का श्रोता वर्ग चाहे जो भी हो संदेशों से दुरुहता कम होगी और बात सीधे सादे तरीके से कही जाय जो "शिक्षा देने" जैसी न लगे तो गले उतरना आसान होता है। भारानी ने शायद यही सोचकर 15‍‌‍‍‍‍‍ से 40 साल के आयुवर्ग पुरुषों के लिये एक ऐसे ही कार्यक्रम की परिकल्पना की (यह आयुवर्ग यौनिक रूप से ज्यादा सक्रीय होता है और इनको एड्स का खतरा सर्वाधिक है)। इसके फलस्वरूप बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट ने दूरदर्शन पर प्रसारण हेतु दो टी.वी कार्यक्रम "जासूस विजय " और "हाथ से हाथ मिला " के रूप में शुरु किया देश का सबसे बड़ा एचआईवी एड्स सजगता कार्यक्रम।

जासूस विजय कार्यक्रम की रुपरेखा रोमांचक है, जिसमें ऐक्शन और ड्रामा के द्वारा एड्स की जानकारी, संक्रमण के मार्ग, गुप्त रोग की पहचान व इलाज और काँडोम के फायदों का संदेश दर्शकों तक पहुँचाया जाता है। और यह वाकई असरकारक रहा है, यह धारावाहिक हर महीने करीब 75 लाख लोगों द्वारा देखा जाता हैं। इतना ही लोकप्रिय है ट्रस्ट का बनाया दूसरा कार्यक्रम "हाथ से हाथ मिला" जिसे हर माह 40 लाख दर्शक देखते हैं। "हाथ से हाथ मिला" एक साप्ताहिक रियेलिटी शो के प्रारूप में प्रसारित होता है, हर कथा एक युवा सितारे पर केंद्रित होती है जिसने एड्स की जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। कार्यक्रम में बॉलीवुड के सितारों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है।

पर मनोरंजक कारयक्रमों की वजह से कहीं निहित संदेश हंसी में ही इधर उधर तो नहीं हो जाते। बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के युवा कार्यक्रमों की निर्माता प्रियंका दत्त कहती हैं, "मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।" जासूस विजय सीरियल के मुख्य पात्र विजय को एच.आई.वी पॉसिटिव चित्रित किया गया है, इससे अनायास ही दर्शकों में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव न करने का संदेश पुख्ता रूप में चला जाता है।

"हाथ से हाथ मिला" मे बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदाय के लिये कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, हाल ही के एक एपिसोड में फिल्म स्टार फरदीन खान ने युवा सितारे हसीना खारबीह को शिलाँग मे रॉक कॉनसर्ट के आयोजन का चैलेंज दिया ताकी मेघालय के युवा एड्स के बारे में जानें।

पर क्या वाकई ये कार्यक्रम उपाय कारगर हैं। व्यूअरशिप ठीक है पर क्या इनके असर को मापा तोला भी गया है। 2005 में बी.बी.सी ने एड्स के ज्ञान, रवैये और व्यवहारों पर एक फील्ड स्टडी की। 2001 के राष्ट्रीय बिहेवियरल सेंटीनल सर्वेलेंस सर्वे के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे था। इस सर्वे से पता चला कि, आम तौर पर, टीवी देखने वाले लोगों में, न देखने वालों कि तुलना में एड्स और इससे बचाव के तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी और बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के इन कार्यक्रमों के दर्शकों मे यह जागरूकता कहीं अधिक पायी गई।

बी.बी.सी जासूस विजय की तर्ज पर और कार्यक्रमों पर विचार कर रहा है बस किसी प्रायोजक की तलाश है। संस्थान ने दोनों कार्यक्रमों से संबंधित वेबसाईट्स का निर्माण भी किया है जहाँ पर इन कार्यक्रमों के अलावा एड्स की भी जानकारी उपलब्ध है। एक खास बात है इन जालस्थलों पर उपलब्ध एड्स पर छोटी सी बुकलेट, प्रियंका ने बताया कि यह बुकलेट अब तक 56,000 से ज्यादा लोगों को डाक से भेजी जा चुकी है।

अतिरिक्त सामग्री व सहयोग - देबाशीष चक्रवर्ती

स्पाउस - शादी का सच: दुहराया वक्तव्य



पेंगुइन इंडिया द्वारा शोभा डे की अंग्रेज़ी पुस्तक ‘स्पाउसस्पाउस' का हिन्दी अनुवाद अभी हाल ही में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद वैसे तो ठीक-ठाक है, परंतु साफ़ झलकता है कि पुस्तक एक ‘अनुवाद' ही है। 150 रुपयों की पुस्तक को पेंगुइन ने बढ़िया गेटअप और अच्छे, मित्रवत्-पठन प्रारुप में जारी किया है। काग़ज रिसायकल्ड लगता है, मगर है उम्दा श्रेणी का।

रहा सवाल पुस्तक की ‘सामग्री' का, तो डेल कॉर्नेगी और दीपक चोपड़ा के लिखे व्यक्ति-सुधार वाले पुस्तक जब लाखों में बिक सकते हैं, तो शोभा डे की विवाह-सुधार की पुस्तक क्यों नहीं। शायद यही कारण रहा होगा शोभा डे के पास इस पुस्तक को लिखने का - जिनका अपना खुद का प्रथम विवाह घोर असफल रहा था।

स्पाउस के हर पृष्ठों पर आपको प्रवचन मिलेंगे। अपने प्राक्कथन में ही शोभा डे खुद की कहानी कुछ यूँ लिखती हैं-

"सालों पहले, डे (शोभा की दूसरी शादी के, वर्तमान पति) ने एक बार कहा था कि सलवार-कमीज़ एकदम रसहीन पोशाक है। ‘यह तुम पर कोई असर नहीं छोड़ती,' एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए निकलने के कुछ पल पहले उन्होंने इसे ख़ारिज करते हुए कहा। फिर क्या था! मैं तुरंत अपने कमरे में गई और साड़ी पहन आई। उस दिन के बाद मैंने सलवार-कमीज़ नहीं पहनी! हमारे मित्र अजीब बात मानते हैं। वे अकसर इस ‘विरोधाभास' पर टिप्पणी करते हैं कि वे मुझ जैसी महिला से यह उम्मीद नहीं करते कि मैं पुरुषों की इस पसंद से इत्तफ़ाक रखूं कि उनकी पत्नी को कैसा लगना चाहिए। सच कहूँ तो, उनकी ‘हैरानी' से मुझे हैरानी होती है! मेरे खयाल से ऐसा करना तो बहुत स्वाभाविक बात है। और इसमें कोई शर्मिंदगी भी नहीं है। अहम की लड़ाइयों को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए सहेज कर रखें। एक सलवार-कमीज़ के लिए अपनी शाम बर्बाद न करें।"

ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है - सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के
यह बात तो हर पति-पत्नी को मालूम होती है। परंतु शामें इसी तरह की बहुत सी अन्य छोटी-छोटी बातों से ही बर्बाद होती रहती हैं। रिश्ते किसी किताब में लिखे नियमों व उसमें दर्शाए गए उदाहरणों से नहीं बनते-बिगड़ते। अगर ऐसा होता तो हर विवाह बंधन आदर्श बंधन होता चूँकि इस तरह की सैकड़ों किताबें बाजार में पहले भी बिकती रही हैं। विवाह बंधन के समय ही पति-पत्नी को एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध और दयालु रहने की कसमें खिलाई जाती हैं। परंतु विवाह टकराव का दूसरा नाम बन जाता है। यही वजह है कि तमाम विश्व में समाज सुधारकों, वैवाहिक-परामर्शदाताओं का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ा।

शोभा एक कदम आगे जाकर आपको सीधे-सीधे उपदेश देने लगती हैं। पूरी किताब में ऐसे फूहड़ उपदेशों की भरमार है। कुछ उपदेश आपकी खातिर उद्घृत करते हैं, और कोष्ठक में शोभा से स्पष्टीकरण मांगते हैं -

* अगर लड़ना ही है, तो कायदे से लड़ें। (कायदा पारिभाषित करेंगी शोभा जी?)
* झगड़ा साफ़ और उसी मुद्दे पर हो। (झगड़ा गंदा भी होता है, या गंदा ही होता है? झगड़ा साफ़ भी होता है यह तो अब पता चला। चलिए, आपकी दूसरी राय मान लेते हैं कि झगड़ा जब चालू करेंगे तो पुरखों की बातों को फिर शामिल नहीं करेंगे!)
* मुद्दों को उलझाएँ नहीं। झगड़ा पैसों को लेकर है, तो उसे पैसों पर ही रखें। बच्चों, सास-ससुर, कुत्ते या पड़ोसियों को इसमें न घसीटें। (ऊपर की पंक्ति में दी गई समझाइश अस्पष्टथी अतः यह पंक्ति वैसे भी जरूरी थी!)
* मन में एक रूपरेखा बना लें और एजेंडे के अनुसार ही चलें। एक झगड़े में उतनी ही बात तय हो सकती है। (आह! क्या बात है। पति-पत्नी का झगड़ा पति-पत्नी का नहीं, भारत-पाकिस्तान का हो गया। योजना बनाओ, प्लान बनाओ, एजेंडा बनाओ फिर झगड़ो। वाह! शोभा जी वाह! क्या बात है। आपकी मौलिक विचारधारा के कायल हो गए हम।)
* झगड़ा पूरा निबटाएँ - कुछ अनकहा न छोड़ें। कोई नतीजा निकलने तक झगड़ा करें, फिर वह किसी के भी पक्ष में क्यों न हो। (वाह! पति-पत्नी के आपसी रिश्ते सुधारने के लिए एक और मौलिक तरीका। झगड़ा तभी बंद करें जब किसी एक का सिर न फूट जाए या पत्नी मायके न चली जाए या पति पता नहीं क्या कर ले!)
* अपने झगड़ों की योजना बनाएँ, यह मुश्किल तो है, पर असंभव नहीं। (हा हा हा ... झगड़ों की योजना... सचमुच शोभा जी, आदमी अगर ठान ले तो कुछ भी संभव नहीं। परंतु यहाँ अच्छा होता कि आप अपनी कुछ योजनाओं की रूपरेखा उदाहरण स्वरूप देतीं, तो पाठकों का भला होता। वे दुनिया की एक नई तकनीक, एक नया विषय सीख लेते!)
* झगड़ों को निजी रखें। सबके बीच झगड़ने से बुरा कुछ नहीं हो सकता।
* अपने नियम तय कर लें और कभी भी मर्मस्थल पर चोट न करें। (परंतु आपने अभी ऊपर कहा है कि झगड़ा पूरा होते तक, परिणाम मिलते तक करें - यह दुहरी बात क्यों?)
* जरूरी हो तो रोएँ। आँसुओं को रोकना बेमानी है- किसलिए रोकें? (जरूरी? कैसे पता पड़ेगा कि अब रोना जरूरी है? कोई नियम कायदा कानून है क्या?)
* कभी आपा न खोएँ। बेकाबू होते ही आप अस्पष्ट और तर्कहीन हो जाते हैं। आपका पक्ष भी कमजोर हो जाता है।
* जब नियंत्रण खोने का खतरा हो, तो गिनती करें या कोई मंत्र पढ़ने लगें। जरूरी नहीं है कि कुछ धार्मिक मंत्र-प्रार्थना ही हो। पहाड़ा पढ़ सकते हैं। मूल बात यह है कि आप अपना ध्यान झगड़े से हटा कर किसी और चीज़ पर लगाएँ। (और, सामने वाले को जीतने का भरपूर मौका दे दें?)

जाहिर है, ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है - सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के?

पर उपदेश कुशल बहुतेरे। ‘उपदेश', ‘कायदे' का भी तो हो! ‘स्पाउस' पढ़कर अपना वैवाहिक रिश्ता सुधारने के बारे में सोचने से तो अच्छा है कि उस पैसे से मियाँ-बीवी कोई फ़िल्म देख आएँ और कम से कम अपनी एक शाम तो सुहानी बना ही लें।

व्यंग्य

इंटरनेट बुराइयों की जड़ है!


मैं अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। तब इंटरनेट नहीं था, ईमेल नहीं था (और न ही पॉर्न साइटें थीं)। आज के शोध छात्रों के विपरीत, मुझे अपनी परियोजना फ़ाइलों को पूरा करने के लिए विद्यालय के ग्रंथालय तक नित्य दौड़ लगानी होती थी, सैकड़ों भारी भरकम पुस्तकों को उठापटक कर हजारों पृष्ठों में से मसाला खोजना होता था, टीप लिख-लिख कर रखना होता था, अपने प्रोफ़ेसर के साथ घंटों बैठकर दिमाग खपाकर प्रत्येक महत्वपूर्ण बात को दुबारा-तिबारा ढूंढ ढांढ कर लिखना होता था।

तब अगर आज की तरह मेरे पास इंटरनेट होता तो मुझे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं होती। मैं अपने शोध विषय के कुछ शब्दों को लेकर गूगल पर कुछ खोजबीन करता और कम्प्यूटर तंत्र की सबसे बढ़िया ईजाद - ‘नक़ल कर चिपका कर' यानी कि कॉपी/पेस्ट के जरिए देखते ही देखते मेरा बेहतरीन, तथ्यपरक, मौलिक शोध ग्रंथ तैयार हो जाता। किसी तरह की कोई झंझट नहीं होती। आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास इंटरनेट है। गूगल है।

आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास गूगल है।
मैं किसी सूरत अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। पुराने दिनों में चिट्ठियों को बड़े ही सोचविचार कर लिखना होता था, दो चार बार तो उन्हें पढ़ना होता था और फिर आवश्यक बदलाव कर, डाकटिकट चिपकाकर उन्हें पोस्ट करना होता था। क्या पता किसी चिट्ठी में गलत भाषा या कुछ गलत लिख लिखा गया हो और सामने वाले को समस्या हो जाए? डाक के डब्बे के मुँह पर डालते समय भी अगर मुझे कुछ याद आता था तो वह पत्र फाड़ कर नए सिरे से फिर से अच्छी भाषा में अच्छी बात लिख कर चिट्ठी भेजता था। कई ख़तों से इत्र की खुशबु आती थीं जो सामने वाले अपना अभिन्न समझ कर पत्र में खुशबू लगाकर मुझे भेजते थे, परंतु उन्हें यह नहीं पता होता था कि मुझे हर किस्म के इत्र से एलर्जी है। मैं पत्रों के जरिए फैलने वाले एंथ्रेक्स किस्म के वायरस जन्य बीमारियों तथा बढ़ते आतंकवाद के चलते पार्सल बम के फोबिये से भी ग्रसित था। धन्य है इंटरनेट। इसने मेरी सारी समस्या का समाधान कर दिया है।

अब तो मुझे अपना पत्र लिखने और पत्र का प्रत्युत्तर देने के लिए लिफ़ाफ़े और डाकटिकट तो क्या, सोचने की जरूरत ही नहीं होती। अब मैं अपने कम्प्यूटर के ईमेल क्लाएंट पर ‘जवाब भेजें' बटन को क्लिक करता हूँ, एसएमएस जैसी संक्षिप्त किस्म की नई, व्याकरण-वर्तनी रहित, स्माइली संकेतों युक्त भाषा में संदेशों को लिखता हूँ, और ‘भेजें' बटन को क्लिक कर देता हूँ। मेरा ईपत्र दन्न से सामने वाले के कम्प्यूटर पर हाजिर हो जाता है।

वैसे भी, स्पैमों की मार से मर चुके ‘बेचारे' सामने वाले के पास आपके ईपत्र की भाषा और वर्तनी के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ होता है! वह आपके ईपत्र को पढ़ ले यही आपके लिए बहुत है। पहले मैं पत्र लिखने में कोताही करता था। तमाम झंझटें थीं। पत्र लिखो, सुधारो, लिफ़ाफ़े में डालो, चिपकाओ, टिकट चिपकाओ, लाल डिब्बे में डालो। अब ईपत्र तो मुफ़्त में उपलब्ध है बिना झंझट। लिहाजा हर संभव ईपत्र को अपने सभी जानने वालों को अग्रेषित करता रहता हूँ। मेरे इस काम में कुछ वायरस भी मेरा हाथ बटाते हैं जो मेरे नाम से कई परिचितों-अपरिचितों को अपनी ही प्रतिकृति युक्त ईपत्र भेजते रहते हैं।

अहा! इंटरनेट। जीवन आज से पहले इतना आसान कभी नहीं था। पहले मुझे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के यहाँ उनसे मिलने - जुलने - बोलने - बताने - खेलने - गपियाने हेतु आवश्यक रूप से जाना होता था। कितना कष्टप्रद होता था भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़कों पर से गुजर कर अपने अनन्य के पास जाना। उन तक पहुँचते-पहुँचते सारा उत्साह ठंडा हो जाता था और मन में अपराध बोध-सा आ जाता था कि ऐ अनन्य मित्र हमने तेरी खातिर कितने कष्ट सहे! परंतु अब तो मुझे सिर्फ इंटरनेट से जुड़ा एक अदद कम्प्यूटर और एक वेबकैम चाहिये बस। अब मैं अपने ही कयूबिकल से ही विश्व के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति से रूबरू बात कर सकता हूँ, उसके साथ रूबरू शतरंज खेल सकता हूँ और अगर सामने वाला दोस्त राज़ी हो तो कुछ दोस्ती यारी और प्यार रोमांस की भी बातें कर सकता हूँ - और यह सारा कुछ अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट से! मैं एक साथ, चैट और मैसेंजर के जरिए दर्जनों लोगों से, दर्जन भर अलग अलग विषय पर, जो दर्जन भर अलग अलग जगह से होते हैं, एक ही समय में एक साथ बात कर सकता हूँ। और देश-काल-भाषा-संस्कृति और समय की सीमा से परे बातें करते रह सकता हूँ।

मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ।
यहाँ तक कि मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ। जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठकर आराम से चाय के घूँट सुड़कता हुआ चैट के जरिए लोगों से बातें कर सकता हूँ तो फिर इसके लिए उनके पास जाकर बात करने की आवश्यकता ही क्या है? इसी तरह से अब जब मैं अपने घर से इंटरनेट के जरिए पिज्जा हट से घर पर ही पिज्जा मंगवा सकता हूँ - तो क्या मैं बेवकूफ हूं जो इसे खरीदने के लिए चार मोहल्ला पार कर भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़क पार कर पिज्जा खरीदने पिज्जा हट जाऊँ? हट!

इंटरनेट उपयोक्ता के रूप में मैं अपने आपको एलीट श्रेणी यानी कि - उस श्रेष्ठी वर्ग में गिनता हूँ - जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। विश्व में अब दो ही किस्म के लोग हैं - एक जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं। प्रगतिशील, समृद्ध, श्रेष्ठी वर्ग इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। गरीब फ़ूहड़ इंटरनेट इस्तेमाल नहीं करता है। इंटरनेट के जरिए मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन पर तमाम विश्व की ताज़ा जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं और विश्व के ताज़ा समाचार मेरी उंगलियों पर रहते हैं। अपने कुंजीपट के कुछ कुंजियों को दबाने की देर होती है बस। धन्यवाद इंटरनेट।

इंटरनेट के जरिए जब आप सही में वैश्विक हो जाते हैं, तो फिर आपको ये छोटे मोटे बेकार के घरेलू या आसपड़ोस की घटनाओं से क्या लेना देना। इज़राइल की गाज़ा पट्टी पर ताज़ा हमले और ओसामा के नए वक्तव्य के समाचार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बजाए इस समाचार के कि पड़ोस के सूने मकान में पिछली देर रात तब चोरी हो गई जब मैं चैट में व्यस्त था। वैसे, कुछ खटपट की आवाजें मैंने भी सुनी थीं, परंतु उससे मुझे क्या - भई, यह तो स्थानीय पुलिस का काम है खोजबीन करे और चोरों को पकड़े। और, वैसे भी, मुझे तो अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ना था, ढेरों ईपत्रों का जवाब देना था और कुछ चिट्ठों पर टिप्पणियाँ करनी थीं - कुछ चिट्ठाकार टिप्पणियाँ नहीं करने से नाराज से चल रहे दीखते हैं।

इंटरनेट ने लाखों लोगों को लाखों तरीकों से रोजगार दिया हुआ है। अगर इंटरनेट नहीं होता तो सैकड़ों फ़िशर्स, स्पैमर्स, वायरस लेखक तो भूखे ही मर जाते। हैकरों और क्रैकरों का क्या होता। पॉर्न इंडस्ट्री कहां जाती? इंटरनेट - तेरा भला हो, तूने आधी दुनिया को भूखे मरने से बचा लिया। अगर हैकर्स और क्रैकर्स नहीं होते तो दुनिया में पायरेसी कहाँ होती और पायरेसी नहीं होती तो दुनिया में कम्प्यूटर और इंटरनेट का नामलेवा भी नहीं होता - यह मात्र अभिजात्य वर्ग की रखैल माफ़िक बन रहती। धन्यवाद इंटरनेट। तमाम तरह के कीज़ेन व क्रेक के जरिए मेरे कम्प्यूटर में लाखों रुपयों के सॉफ़्टवेयर संस्थापित हैं - भले ही उनकी आवश्यकता मुझे हो या न हो - मैं और मेरा कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के मामले में अमीर तो हैं ही! अगर इंटरनेट नहीं होता तो मैं विश्व के बहुत से महान सॉफ़्टवेयर जिनमें ऑडियो वीडियो सीडी नक़ल करने के औजार व कम्प्यूटर खेल इत्यादि भी सम्मिलित हैं, का इस्तेमाल ही नहीं कर पाता।

इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है।
इंटरनेट ने दुनिया को मनोरंजन युक्त जानकारियों का नया, नायाब माध्यम दिया है। हजारों लाखों पॉर्न साइटों के जरिए आप चीन और चिली की सभ्यता के प्रेम-प्यार के आचार-व्यवहार-बर्ताव का बढ़िया और बारीकी से अध्ययन कर सकते हैं। इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है। आप इंटरनेट से हर चीज मुफ़्त में पा सकते हैं - एमपी3 से लेकर वीडियो तक। और यदि कोई चीज मुफ़्त नहीं मिल रही हो तो उसे मुफ़्त करने का क्रैक चुटकियों में पा सकते हैं। इंटरनेट इज़ अ ग्रेट लेवलर।


ले दे कर अभी तीन-चार साल ही हुए हैं मुझे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए और मैं तो इसके पीछे पागल हो रहा हूँ। मैं भोजन के बगैर कुछ दिनों तक जी लूंगा, पानी के बगैर कुछ घंटों जी लूंगा, शायद हवा के बिना भी कुछ मिनट टिक जाउं। परंतु इंटरनेट के बगैर, एक पल भी नहीं! इंटरनेट तो अब मेरी मूलभूत आवश्यकता में शामिल हो गया है। भोजन, पानी और हवा की सूची में पहले पहल अब इंटरनेट का नाम आता है।

और आप चाहते हैं कि मैं कहूँ - इंटरनेट बुराइयों की जड़ है? माफ़ कीजिएगा महोदय, मेरे विचार आपसे मेल नहीं खाते। बिलकुल मेल नहीं खाते!

लड़कर वही निर्मल ज़माना लाना होगा

सुंदरलाल बहुगुणा

संवादपर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा पिछले दिनों रतलाम प्रवास पर थे। जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर उनका व्याख्यान था। इस दौरान उन्होंने पर्यावरण डाइजेस्ट नामक पत्रिका के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण भी किया तथा जालघर की अपने तरह की अकेली व पहली चिट्ठा-पत्रिका निरंतर का अवलोकन भी किया। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण विषयों पर सुंदरलाल बहुगुणा से खास बातचीत की निरंतर के वरिष्ठ संपादक रविशंकर श्रीवास्तव ने। संवाद में प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश:

आप चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे हैं। कश्मीर से कोहिमा तक वन को बचाने के लिए आपने गंभीर आंदोलन चलाए हैं। अपनी इस यात्रा के बारे में कुछ प्रकाश डालेंगे?

मनुष्य प्रकृति को अपनी निजी संपत्ति मानने की भूल कर बैठा है तथा इसके अंधाधुंध दोहन की वजह से संसार में अनेक विसंगतियाँ और समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। प्रकृति के असंतुलन से मौसम का चक्र ही बदल गया है नतीजतन दुनिया के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप बढ़ चला है। प्रकृति को बचाने के लिए प्रकृति को प्रकृति के पास वापस रहने देने के लिए ही चिपको आंदोलन की सर्जना की गई थी। संतोष की बात यह है कि देश में ही नहीं तमाम विश्व में इस मामले में जागृति आई है। वृक्षों को काटने के बजाए वृक्षों की खेती करना जरूरी है यह बात बड़े पैमाने पर महसूस की जा रही है और इस क्षेत्र में प्रयास भी किए जा रहे हैं।

टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए आपका दो दशकों का लंबा, गहन आंदोलन भी फलीभूत नहीं हो पाया। आपका यह आंदोलन असफल क्यों हो गया?

ऐसा मानना तो अनुचित होगा। जन जागृति तो आई है कि बड़े बाँध नहीं बनेंगे। बड़े बाँध स्थाई समस्याओं के अस्थाई हल हैं। नदी का पानी हमेशा प्रवाहमान रहता है। बाँध कुछ समय बाद गाद से भर जाते हैं और मर जाते हैं। दूसरी बात यह है कि बाँध जिंदा जल को मुर्दा कर देते हैं। पानी के स्वभाव पर अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई है कि रुके हुए जल में मछलियों व अन्य जीव जंतुओं, जिनका जीवन प्रवाहमान पानी के अंदर होता है उनके स्वभाव में विपरीत व उलटे परिवर्तन हुए हैं। बड़े बाँध एक दिन अंततः सर्वनाश का ही कारण बनेंगे।

परंतु इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि बड़े बांधों के निर्माण के पीछे नदियों के जल की विस्तृत क्षेत्र में वितरण की भावना होती है तथा पर्यावरण अनुकूल जल विद्युत निर्माण का उद्देश्य होता है?

यह भी एक दुष्प्रचार है। भारत जैसे जनसंख्या बहुल देश में जहाँ प्राकृतिक संसाधन जैसे कि वर्षा का जल व सौर ऊर्जा बहुलता से मिलते हैं इनका इस्तेमाल चहुँ ओर जल तथा विद्युत उत्पादन-वितरण के लिए बखूबी किया जा सकता है। भारत में प्रायः हर क्षेत्र में वर्षा इतनी होती है कि हर गांव में हर कस्बे - मुहल्ले में तालाब बना कर वर्षा का जल रोका जा सकता है और इससे पानी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इसी तरह सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में किया जा सकता है।

एक मजेदार वाकया आपको सुनाता हूँ। एक बार मैं नार्वे गया। वहाँ जब मैं पहुँचा तो देखा कि सभी घरों में ताले लगे हैं, और शहर में कोई नहीं है। मुझे लगा कि क्या मैं गलत समय पर आ गया या हूँ। परंतु मुझे बताया गया कि यहाँ धूप बहुत कम खिलती है लिहाजा लोग बाग़ समुद्र किनारे धूप स्नान के लिए गए हुए हैं। भारत में बारिश के चार महीनों को छोड़ दें तो यहाँ धूप का अकाल कभी नहीं रहता। यह प्राकृतिक, अक्षय ऊर्जा है। पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा है। इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता। आप देखेंगे कि जब अंधाधुंध दोहन के कारण पृथ्वी के संसाधन समाप्त हो जाएंगे तो अंततः यही अक्षय ऊर्जा ही काम आएगी। मनुष्य को अभी से चेत जाना चाहिए।

ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। ग्राम स्वराज के इस उद्देश्य कोे अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा

आप विनोबा जी के ग्राम स्वराज आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं। आज की पीढ़ी यह सब भूल चुकी है। वर्तमान पीढ़ी के लिए ऐसे आंदोलनों की सार्थकता आप महसूस करते हैं?

विनोबा जी के ग्राम स्वराज योजना में भी शाश्वत सत्य का अनुष्ठान किया गया है। ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। यही ग्राम स्वराज का उद्देश्य था और इसे अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा।

आज हम भारत की मिट्टी के उपजाऊपन को निर्यात कर रहे हैं। खेतों की मिट्टी अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग के कारण नशेबाज हो गई है। खेत मरूस्थल बनते जा रहे हैं। खेतों में इंडस्ट्री की तरह उत्पादन लिया जा रहा है। अंततः धरती बांझ हो जाएगी। हमें इससे बचना है तो वृक्षों की खेती शुरू करनी होगी। धरती की गोद में वृक्ष सदाबहार रहेंगे तो उनसे प्राप्त वनोपजों से पर्यावरण स्वच्छ तो रहेगा ही, सर्वत्र प्रचुरता में पानी, भोजन व वस्त्र भी सुलभ हो सकेंगे।

आपने बहुत भ्रमण किया है और अपने विचारों को तमाम क्षेत्रों में रखा है। लोगों में आपके विचारों के प्रति किस तरह की भावना जाग्रत हुई है, क्या आपके इन विचारों को मान्यता मिली है?

चिपको आंदोलन उत्तर भारत में हिमालय से शुरू हुआ और दक्षिण में कर्नाटक तक पहुँच गया। वहाँ इसका नाम पिक्क हो गया है। तो इन विचारों को मान्यता तो चहुँ ओर मिली ही है।

बहुत समय से देश की कुछ बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में बातें की जा रही हैं - गंगा-कावेरी जैसी योजना के बारे में आपके क्या विचार हैं?

यह भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। देश की नदियों को जोड़ना मूर्खतापूर्ण कदम होगा। लाभ के बजाए हानि ही ज्यादा होगी। नदियों का जलस्तर घटेगा व नदी अपनी स्वयं की शुद्ध करने की शक्ति खो देगी। एक नदी प्रदूषित होने पर वह सारी नदियों को प्रदूषित करेगी। इसे रोकने के लिए, लोकशक्ति जागृत करने के लिए हिमालय से कन्याकुमारी तक पदयात्राएँ करने की आवश्यकता है।

हमारी न्यायपालिका काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। न्यायपालिका ने सरकार को कई संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर किया है।

बड़े बाँध और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर राज्य व केंद्र की सरकारों की भूमिका पर अकसर सवाल उठाए जाते रहे हैं। आप इन्हें कहाँ तक उचित समझते हैं?

यह तो सर्वविदित है कि राज्य अपने अल्पकालिक लाभ के लिए कार्य करते हैं। परंतु खुशी की बात यह है कि हमारी न्यायपालिका बहुत मजबूत है, काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। बहुत से मामलों में न्यायपालिका ने सरकार को इन संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर भी किया है।

आपके पश्चात इस आंदोलन की गति क्या होगी?

यह कतई जरूरी नहीं है कि आंदोलन, चलाने वाले के जीवनकाल में सफल हो जाए। मनुष्य तो नाशवान है। परंतु सत्य हमेशा शाश्वत रहता है। इटरनल ट्रुथ, शाश्वत सत्य तो अमर रहेगा।

उत्तरांचल में आपने व आपकी पत्नी ने नशाबंदी के लिए भी बहुत कार्य किए। आज जब आधुनिक समाज में मद्यपान को सामाजिक उन्नति का प्रतीक समझा जाने लगा है तब नशाबंदी की अवधारणा कहाँ तक उचित प्रतीत होती है?

यह सामाजिक उन्नति तो नहीं, सामाजिक अवनति है। कोई भी नशा उन्नति की ओर नहीं ले जा सकता यह तो तय है। हमारे प्रयासों से हिमाचल के तमाम जिलों में जागरूकता फैली है। चिपको आंदोलन के कारण वनों की कटाई पूर्णतः बन्द है। पाँच जिलों में संपूर्ण मद्यनिषेध अपनाया गया है। ये बातें कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

मैं फिर कहूंगा कि सत्य हमेशा जिन्दा रहता है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि आज मैं जिंदा हूँ। वन माफिया और शराब माफिया ने मेरे जीवन को समाप्त करने के बहुत से कुचक्र चले। एक बार मुझे गंगा में डुबो दिया गया था। इस तरह की समस्याएँ हर आंदोलनकारी के जीवन में तो आती ही हैं। परंतु हार अंततः असत्य की ही होती है।

निरंतर के पाठकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?

हमारे समय स्वच्छ जल, पवित्र धरती और निर्मल आकाश (वायु) था। उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है और सर्वनाश फैलाया है। आज सभी प्रदूषण के शिकार हैं। समस्या गंभीर होती जा रही है। हमें लड़कर नया जमाना लाना होगा, जो वही, पुराना - स्वच्छ, पवित्र और निर्मल था। युद्ध तो छेड़ना ही होगा। और यही उपयुक्त समय है।

विकिलीक्स बतायेगा पर्दे के पीछे का सच



तमाम विश्व के हर क्षेत्र के स्वयंसेवी सम्पादकों के बल पर मात्र कुछ ही वर्षों में विकिपीडिया आज कहीं पर भी, किसी भी फ़ॉर्मेट में उपलब्ध एनसाइक्लोपीडिया में सबसे बड़ा, सबसे वृहद एनसाइक्लोपीडिया बन चुका है। कुछेक गिनती के उदाहरणों को छोड़ दें तो इसकी सामग्री की वैधता पर कहीं कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा। इसी की तर्ज पर एक नया प्रकल्प प्रारंभ किया जाने वाला है विकिलीक्स ।

विकिलीक्स में हर किस्म के, बिना सेंसर किए, ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ शामिल किये जा सकेंगे जिन्हें सरकारें और संगठन अपने फ़ायदे के लिए आम जन की पहुँच से दूर रखती है।

Wikileaksविकिलीक्स तकनीक में तो भले ही विकिपीडिया के समान है - विकि आधारित तंत्र पर कोई भी उपयोक्ता इसमें अपनी सामग्री डाल सकेगा, परंतु इसकी सामग्री पूरी तरह अलग किस्म की होगी। इसमें हर किस्म के, बिना सेंसर किए, ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ शामिल किये जा सकेंगे जिन्हें सरकारें और संगठन अपने फ़ायदे के लिए आम जन की पहुँच से दूर रखती हैं। यही विकिलीक्स का मूल सिद्धान्त है।

विकिलीक्स में कोई भी उपयोक्ता ऐसे दस्तावेज़ों को मुहैया करवा सकता है। विकिपीडिया के विपरीत जहाँ उपयोक्ताओं के आईपी पते दर्ज किए जाते हैं, विकिलीक्स में क्रिप्टोग्रॉफ़िक तकनॉलाजी के जरिए इसके उपयोक्ताओं के पूरी तरह अनाम व अचिह्नित बने रहने की पूरी गारंटी दी जा रही है। जाहिर है, बहुत से दस्तावेज़ जिन्हें आम जनता तक पहुँचना चाहिए, परंतु गोपनीयता कानूनों, दंड और कानूनी कार्यवाही के भय से दबे और छुपे रह जाते हैं निश्चित रूप से आम पाठक तक प्रचुरता में पहुंचेंगे।

विकिलीक्स को अभी आम जन के लिए प्रारंभ नहीं किया गया है, मगर इसकी भावी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ इसकी सूचना मात्र से ही इसे 12 लाख गोपनीय दस्तावेज़ विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध कराए जा चुके हैं।

ऐसी आशंका भी निर्मूल नहीं कि विकिलीक्स का इस्तेमाल ग़लत कार्यों के लिए भी हो सकता है। राजनीतिक दल, संगठन व व्यक्ति एक दूसरे की पोल खोलने व ब्लेकमेल करने के अस्त्र के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। गोपनीय दस्तावेज़ों की असलियत पर प्रश्न चिह्न भी बना रहेगा। पर सचाई यह है विकिपीडिया की विश्वसनीयता पर भी शुरूआती दिनों में प्रश्नचिह्न लगाए जाते रहे थे। गोपनीय दस्तावेज़ों के विकिलीक्स पर उपलब्ध होते ही इसकी सत्यता तथा इसकी आलोचना-प्रत्यालोचना संगठनों व सरकारों द्वारा तो की ही जा सकेगी, मतभिन्नता रखने वाले विभिन्न समूहों द्वारा भी इनका विश्लेषण खुलेआम किया जा सकेगा ऐसे में इस तरह के प्रयोग की बातें बेमानी ही होंगी - ऐसा विकिलीक्स का मानना है।

विकिलीक्स का शुभारंभ फरवरी या मार्च 2007 को प्रस्तावित है। देखते हैं इंटरनेट पर सैद्धांतिक अवज्ञा की यह गांधीगिरी क्या गुल खिलाती है!

मोबाइल फ़ोन तेरे कितने रूप?

मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल अब महज फोन करने के लिए तो नहीं रह गया है। एकदम प्रारंभिक स्तरों के सेलफ़ोनों में भी अंतर्निर्मति कैमरा, एमपी3 प्लेयर, एफ़एम रेडियो इत्यादि की सुविधाएँ तो मिल ही रही हैं, उच्च स्तर के मोबाइल फ़ोन तो संपूर्ण इंटरनेट इनेबल्ड, मल्टीमीडिया कम्प्यूटरों से कम नहीं हैं जिनमें आप अपने ऑफिस के भी तमाम काम निपटा सकते हैं। मोबाइल फ़ोन में हाल ही में एक और विशेषता जोड़ी गई है - आप इसका इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड के विकल्प के रूप में बखूबी, आसानी से और ज्यादा सुरक्षित तरीके से कर सकते हैं।

क्रेडिट कार्ड के जरिए इंटरनेट पर सौदे हमेशा ही खतरे में बने रहते थे। तमाम तरह के ट्रोजन व की-लॉगर्स, फ़िशिंग साइटें हर साल ग्राहकों व क्रेडिट कार्ड कम्पनियों को करोड़ों का चूना लगाती रही हैं, और इनमें साल-दर-साल वृद्धि होती रही है। अब इन सौदों को मोबाइल फ़ोन के जरिए एक अतिरिक्त द्वितीय स्तरीय प्रमाणीकरण की व्यवस्था की जाकर सुरक्षा को और पुख्ता बनाए जाने की कोशिशें की जा रही हैं। वर्तमान में इस हेतु दो तरह की तकनीक काम में लाई जा रही है - एक तो एसएमएस आधारित तकनीक पे-मेट तथा दूसरी मोबाइल एप्लीकेशन आधारित तकनीक एम-चेक।

पे मेट: SMS से सुरक्षित खरीदारी


PayMate पे-मेट एसएमएस आधारित सेवा है जो आपके मोबाइल फ़ोन को एक अत्यंत सुरक्षित क्रेडिट कार्ड के रूप में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। हालांकि अभी इसके द्वारा दी जा रही सेवाओं की संख्या कम है, परंतु भविष्य में इसके व ऐसे ही अन्य सेवाओं के आने की पूरी संभावना है। पे-मेट का इस्तेमाल आसान है। यदि आपके पास सिटीबैंक का क्रेडिट कार्ड है तो 2484 पर एसएमएस संदेश - PayMate भेजें। आपको कॉलबैक किया जाएगा व आपके मोबाइल को पंजीकृत कर लिया जाएगा। जब आप पे-मेट के साथ सक्रिय व्यापारिक संस्थान से कोई खऱीदारी करते हैं तो आपको भुगतान हेतु वह संस्था आपको एक रेंडम जनरेटेड अल्फ़ा कोड के साथ आपके मोबाइल पर एक एसएमएस संदेश भेजती है। आपको उस संदेश को अपने पिन संख्या (गुप्त पासवर्ड) के साथ जवाब देना होता है। बस। और इस तरह सुरक्षित भुगतान हो जाता है। चूंकि यह सारा कार्य स्वचालित कमप्यूटरों द्वारा होता है और आपके संदेशों को कोई जीवित व्यक्ति नहीं पढ़ता और यह आपके पंजीकृत मोबाइल फ़ोन के जरिए ही होता है अतः यह अत्यंत सुरक्षित होता है।

भले ही पे-मेट के जरिए भुगतान को सुरक्षित माना गया है फिर भी आप इसके जरिए प्रति सौदे पाँच हजार रुपए तथा प्रति चौबीस घंटे में दस हजार रुपए से अधिक का भुगतान नहीं कर सकते। अतः यह सेवा अभी सिर्फ छोटे मोटे सौदों के लिए ही है और इसी वजह से इसके लोकप्रिय होने में समय लगेगा।
एम-चेक: मोबाइल बना क्रेडिट कार्ड

MChek एम-चेक आपके क्रेडिट कार्ड के अस्तित्व को खत्म करने की संभावनाएँ लेकर आया है। परंतु यह उन्हीं उच्च वर्ग के मोबाइल फ़ोनों में काम में आ सकेगा जिसमें अतिरिक्त मोबाइल एप्लीकेशन संस्थापित करने की सुविधा होगी। अगर एम-चेक जैसी सेवाएँ लोकप्रिय होंगी तो बहुत संभव है कि भविष्य में मोबाइल फ़ोन ऐसे अनुप्रयोगों के साथ ही जारी हों। हालाकि यह भी आपके इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में द्वितीय स्तरीय सुरक्षा प्रदान करता है, परंतु फिर भी, मोबाइल वायरस भी इस मोबाइल एप्लीकेशन को निशाना बना सकते हैं, और सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं।

एम-चेक का इस्तेमाल भी बहुत आसान है। आपको अपने मोबाइल फ़ोन को एम-चेक के लिए अपने बैंकर से पंजीकृत करवाना होगा और अपने मोबाइल में एम-चेक अनुप्रयोग संस्थापित करना होगा। फिर जहाँ भी आप ऑनलाइन खरीदारी करते हैं, या व्यावसायिक संस्थान में खरीदारी करते हैं, वहाँ क्रेडिट कार्ड से भुगतान के लिए नंबर के स्थान पर आपके मोबाइल के एम-चेक अनुप्रयोग द्वारा रेंडम जनित पास कोड को डालना होगा। बस। चूंकि आपके मोबाइल में संस्थापित एम-चेक अनुप्रयोग हर बार नया पास कोड देता है, अतः यह कोड सिर्फ एक ही सौदे के लिए काम में आता है, और इस तरह से क्रेडिट कार्ड नंबर चुरा कर धोखा करने वालों के मंसूबे नाकाम कर देता है। अच्छी बात यह है कि इसके प्रयोग के लिये आपको कोई अनुप्रयोग डाउनलोड नहीँ करना होता और न ही सिम में कोई परिवर्तन लगता है

पिप्पी के मोज़ों में कबाड़ से जुगाड़



रविशंकर व देबाशीष

निरंतर की पुस्तक समीक्षा स्तंभ में हम इस अंक की भावना के अंतर्गत कुछ ऐसी नायाब पुस्तकें प्रस्तुत कर रहे हैं जो निश्चित ही भारत की नौनीहाल को समृद्ध करेंगी। यहाँ विभिन्न प्रकाशकों की इन पुस्तकों की समीक्षा नहीं वरन् परिचय दे रहे हैं।

Joy of making Indian toysपहले बात दो ऐसी एक्टीविटी पुस्तकों की जो कम कीमत में, या कहें तो बिना कीमत में, खिलौने बनाना सिखाती हैं, ऐसे खिलौने जिन्हें बच्चे बेफिक्र हो जोड़ व तोड़ सकें। घरेलू खिलौनों द्वारा बच्चों में विज्ञान के प्रसार के लिये इन पुस्तकों के लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कार व ख्याति मिली है। ये खिलौने सामान्य चीजों से बने हैं, पर इस कारण से इन्हें फैक्टरियों में निर्मित महंगे खिलौनों से दोयम न समझें। क्योंकि ये खिलौने प्रयोग और रचनात्मकता की जो भावना जगाते हैं वह अद्वितीय है, साथ ही इनमें से कई विज्ञान के नियमों को सरलता से समझाने में भी काम आ सकते हैं।

भारत में ऐसे खिलौनों के प्रयोग की पुरानी संस्कृति रही हैं पर दुःख की बात है कि महंगे खिलौनों की बहुतायत से ये भुलाये जा रहे हैं। हमारे पारंपरिक खिलौनों से बच्चे स्वयं कुछ करते हुए सीखते हैं - और इस तरह का उनका अर्जित ज्ञान स्थायी होता है। इन पुस्तकों में दिए गए क्रियाकलापों तथा व्यावहारिक ज्ञान के लिए किसी तरह के खर्चीले साधनों की आवश्यकता नहीं होती और रोज़ाना इस्तेमाल में आने वाली चीजें और आमतौर पर बेकार हो चुकी वस्तुएं जैसे कि बोतलों के ढक्कन, स्ट्रॉ, अख़बारी काग़ज, पैकिंग के पुस्टे इत्यादि की सहायता से ज्ञान-विज्ञान की बातें आसानी से समझाने का प्रयास किया जाता है।

पहली पुस्तक भोपाल की संस्था एकलव्य द्वरा प्रकाशित कबाड़ से जुगाड़ - Little Science : विज्ञान के कुछ सस्ते सरल और रोचक खिलौने। पुणे स्थित अरविंद गुप्ता अपने इस प्रयोग के लिये विख्यात हैं। वे बेकार हो चुकी दैनिक प्रयोग की वस्तुओं के जरिए वैज्ञानिक खिलौने बनाने में सिद्धहस्त हैं। इस पुस्तक में चित्रमय विधियों द्वारा ये सिखाया गया है। उदाहरण के लिए इसमें कैमरा फ़िल्म की प्लास्टिक की डिब्बी, प्लास्टिक की थैली, साइकिल की स्पोक, टूटी चप्पल की रबर शीट के टुकड़े तथा रबर या प्लास्टिक के पाइप के जरिए पानी के पम्प बनाने की आसान विधि बताई गई है। इस चित्रमय विधि को पढ़कर बच्चे आसानी से स्वयं ही अपना एक पानी का पम्प बना सकते हैं और जान सकते हैं कि पानी का पम्प आखिर कैसे काम करता है। यह पुस्तक द्विभाषी है - यानी अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में है जिससे इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। 70 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य है मात्र 20 रुपये (ISBN क्रं 81-87171-03-0, संस्करण 2002, चित्र अविनाश देशपांडे)। ये पुस्तक विद्या आनलाईन पर पीडीएफ प्रारूप में मुफ्त भी उपलब्ध है।

दूसरी पुस्तक है नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़। इसके लेखक सुदर्शन खन्ना नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन, अहमदाबाद में काम करते हैं। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक में 101 हस्तनिर्मित खिलौने हैं जो खेल खेल में विज्ञान भी सिखाते हैं। 125 पृष्ठों की इस पुस्तक की छपाई उम्दा है व चित्र बेहतरीन। इसकी कीमत है 40 रुपये तथा इसे आप नेशनल बुक ट्रस्ट की वेबसाईट से भी खरीद सकते हैं (ISBN क्रं 81-237-2244-3)। साथ में दिये चित्र में आप इसी पुस्तक में दी गई कलाबाज़ कैप्सूल बनाने की विधि पढ़ सकते हैं (विवरण अंग्रेज़ी से अनुवादित है)। पुस्तक का हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध है पर उसकी कीमत 90 रुपये रखि गई है। हिन्दी अनुवाद अरविंद गुप्ता का ही किया हुआ है।

खेल खेल में विज्ञान से जुड़ी किताबों के अलावा अरविंद गुप्ता ने ढ़ेरों अन्य पुस्तकों को अंतर्जाल पर मुफ्त उपलब्ध कराया है जिनमें हिन्दी व मराठी पुस्तकें भी शामिल हैं। उन के जालस्थल पर नज़र डालें और उन्हें धन्यवाद कहें।

एकलव्य का एक और प्रकाशन है - खिलौनों का खज़ाना Toy Treasures। इसमें जापानी ओरिगामी विधि से यानी काग़ज के टुकड़ों को काट-जोड़-चिपका कर इत्यादि तरीके से दर्जनों खिलौनों को कैसे बनाना यह बताया गया है। आसान सी उड़ने वाली मछली हो या जटिल बातूनी कौआ - चित्रों के जरिए इन्हें बनाने का तरीका बड़ी स्पष्टता से समझाया गया है। इसके लेखक भी अरविंद गुप्ता हैं। यह पुस्तक भी हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में छपी है। (ISBN क्रं 81-87171-37-5, पृष्ठ संख्या 36, मूल्य - रू 20/-, संस्करण 2001) ये पुस्तक पीडीएफ प्रारूप में मुफ्त भी उपलब्ध है।

केवल 8 रुपए मूल्य की एक और पुस्तक है - नज़र का फेर - दृष्टिभ्रम के खेल। आओ माथा पच्ची करें श्रेणी की यह आठवीं पुस्तक है। इस छोटी सी पुस्तिका में दृष्टिभ्रम पैदा करने वाले ड्राइंग, रेखांकनों, रेखाचित्रों व कलाकृतियों को समेटा गया है। इनके जरिए बच्चे द्वि-त्रिआयाम के बारे में तो समझते ही हैं, कलाकृति के पर्सपेक्टिव को शीघ्र समझ सकते हैं (ISBN क्रं 81-87171-58-8, पृष्ठ संख्या 20, संस्करण 2004)।

और अंत में बात चैन्नई स्थित तुलिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों की।

Samandar Aur Meinसमंदर और मैं संध्या राव की मूल अंग्रज़ी पुस्तक का बढ़िया हि्न्दी अनुवाद है। ये एक ऐसे लड़के की कहानी है जो दिसंबर 2004 में आये सुनामी से प्रभावित हुआ पर शायद ये ऐसे किसी भी बालक की कहानी हो सकती है को प्रकृति की गोद में पल बढ़ रहा हो। पुस्तक में मनमोहक स्थिर चित्र हैं, रेत शंख और तट रेखा के रंग क्रेयान से मिलकर मानों उस मर्म पर मरहम लगाते हैं जिनका इस त्रासदी में सब कुछ सागर की गर्त में समा गया।

ये कहानी भले गमग़ीन करती है पर अच्छी बात ये है कि पुस्तक का रुख आशावादी और प्रेरणास्पद है। चित्रों से शायद क्रंकीट के जंगलों में रहते बच्चे नौका, पानी, रेत और समंदर के संबंधों को समझ सकें और प्रकृति का सम्मान करना सीखें। पुस्तक की भाषा कई जगह अस्पष्ट है पर छपाई बेहतरीन है। छ वर्ष या ज्यादा उम्र के बच्चों पर केंद्रित ये 24 पृष्ठ के इस पुस्तक की कीमत है 100 रुपये। चिकने कागज़ की छपाई के लिहाज़ से न देखें तो कीमत ज़्यादा तो है। (ISBN क्रं 81-8146-114-2)

Pippi Lambemojeपिप्पी लंबेमोज़े ऐस्ट्रिड लिंडग्रन की नामचीन स्वीडिश पुस्तक पिप्पी लाँगसट्रम्प का संध्या राव द्वारा किया हिन्दी अनुवाद है। ऐस्ट्रिड का भारत के लिये भले नया नाम हों पर उनकी कम ही किताबें हैं जिन पर फिल्म नहीं बनीं। स्वीडन में छोटे बड़े सभी उनकी रचनाओं को पसंद करते रहे हैं। सरल भाषा, उम्दा विचार, हंसी मजाक और गंभीरता, ऐस्ट्रिड के लेखन में ये सभी रंग प्रचुरता से मिलते हैं। वे मानतीं थीं कि वे सिर्फ बच्चों के लिये ही लिखना चाहती हैं क्योंकि सिर्फ बच्चे ही पढ़ते समय चमत्कार कर सकते हैं।

ये पुस्तक ऐस्ट्रिड ने अपनी बीमार बेटी को कहानियाँ सुनाने के लिये लिखी। किताब से न केवल पुराने स्वीडन की संस्कृति का पता चलता है बल्कि ये भी कि पिप्पी बच्ची होने पर भी कितनी स्वतंत्र है। साठ साल पहले लिखी ये किताब आज भी बड़ी सार्थक है, भले ही भारतीय पाठक कई बातों को पचा ना पायें। 50 रुपये की इस किताब में 102 पेज हैं और अनेक सुंदर रेखांकन हैं (ISBN क्रं 81-86895-91-4)।

टेरापैड: ब्लॉगिंग से आगे की सोच?



शायद नहीं। या शायद हाँ। चिट्ठाकारों के लिए अब बहुत से अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं और इनमें नित्य प्रति इजाफ़ा होता जा रहा है। एक नया, आल-इन-वन किस्म का ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म - टेरापैड जारी किया गया है जो कि न सिर्फ मुफ़्त है (यदि आप विज्ञापनों से नहीं चिढ़ते हैं तो, चूंकि इसकी मुफ़्त सेवा विज्ञापन समर्थित है), ढेरों अन्य सुविधाओं से भी लेस है।

Terapad टेरापैड कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। यदि आप टेरापैड के जरिए अपना चिट्ठा लिखने की सोच रहे हैं तो आपको प्रमुखतः इसमें निम्न अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी जो अन्य ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म में अनुपलब्ध हैं:

* पेपॉल रेडी शॉप - इसका अर्थ है, आप अपने ब्लॉग को ई-बे जैसा शॉपिंग माल मिनटों में बना सकते हैं।
* पूरा सीएसएस नियंत्रण - माने कि बोरिंग ब्लॉगर व सीमित वर्डप्रेस टैम्प्लेटों से पूरा छुटकारा। आप अपने ब्लॉग को मनचाहा रूपाकार दे सकते हैं।
* प्रोब्लागिंग औजार- (ये क्या है भई? हमें भी नहीं पता)
* WTSIWYG संपादन सुविधा - यह तो सभी में है, परंतु इसमें यह उन्नत किस्म का है।
* सामग्री प्रबंधन - आप अपने चिट्ठा पोस्टों के अतिरिक्त भी अन्य सामग्री डाल सकते हैं।
* समाचार व आरएसएस फ़ीड जोड़ सकते हैं (यह कोई नई सुविधा नहीं है)
* इमेज गैलरी
* पाठकों की आवाजाही पर निगाह - (यह तो सबसे जरूरी वस्तु है)
* परिचर्चा फोरम (वाह! क्या बात है)
* नौकरी तथा कर्मकुण्डली खोज- बेरोजगारों के लिए बढ़िया है।
* कैलेण्डर
* मुफ़्त मासिक 10 गीबा बैंडविड्थ / तथा कुल 2 गीबा डाटा

चलिए अब कुछ खामियों की बातें भी करें। वैसे तो कुछेक ही हैं, पर हैं तो :

एक ही स्थल पर बहुत सी चीजें एक आम चिट्ठाकार के लिए अनावश्यक ही होंगी। इसका इंटरफ़ेस अनावश्यक रूप से अव्यवस्थित है और सारा मामला घालमेल प्रतीत होता है। इसका यूजर इंटरफेस छोटे-छोटे कार्यों के लिए अवांछित नेविगेशन मांगता है जो खीझ भरा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आपको नया ब्लॉग पोस्ट बनाने के लिए कड़ी तब तक दिखाई नहीं देती जब तक कि आप कोई श्रेणी बना कर उसे क्लिक नहीं करते! कौन नया चिट्ठाकार इसे समझ सकेगा भला?

एक नया व्यापारिक जोखिम जिसे गूगल खरीद लेगा? बहुत संभव है, परंतु फिर इसके उपयोक्ता आधार को करोड़ों में भी तो पहुँचना चाहिए। संभावना तो कम ही नजर आती है!

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. रविरतलामी जी,
    आपका यह चिठ्ठा ब्लोगिंग के इस नये माध्यम के विषय मे काफ़ी उपयोगी जानकारी वाला है। अन्त मे आपकी तुलनात्मक टिप्पणी , पाठक को सही सोचने मे काफ़ी मददरूप है।

    आज बहुत सारी ब्लोग सुविधाए उपलब्ध हैं । जब तक सर्च एंजिन है और बन्दे को इसका उपयोग करना आता है, तब तक सब चलेगा ।

    अच्छे लेख के लिये आभार

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छींटे और बौछारें: निरंतर के पिछले अंकों में प्रकाशित रचनाएँ
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