टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

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और हिंदी अख़बार में आधी अंग्रेजी छप रही है.

हाँ, शायद ये भी एक वजनी वजह है...

यही अब हर जगह हो रहा है, अभ्यास की बात है।

:) खराब इंगलिस हिंदी के डर से कुछ टिपिया भी नहीं पा रहे। :)

हमारे हिन्‍दी अखबारों ने तो अंग्रेजी प्रसार के लिए पुरस्‍कार प्राप्‍त करने की पात्रता हासिल कर ली है।

अभी अग्रेजी बोलना सिखाने वाला विज्ञापन दिखा यहाँ ब्लाग पर... :)

कुछ नहीं कह पा रहे खबर पर।

umabhatt gadhwali

yah aik wjah ho sakti hai

मानक हिंदी का प्रयोग अवश्यमेव होना चाहिए. हिंग्लिश के चलते हिंदी की स्वाभाविकता प्रभावित हो रही है.

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