रविवार, 27 नवंबर 2011

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 16

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

 

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नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।

अरब के शेख सादी की एक दंतकथा इस प्रकार है -

जंगल से गुजरते हुए एक आदमी ने ऐसी लोमड़ी को देखा जिसके पैर टूट चुके थे और वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी। उसने सोचा कि आखिर वह अपना गुजारा कैसे करेगी। तभी उसने देखा कि एक बाघ अपने मुँह में शिकार को दबाये हुए वहाँ आया। पेटभर खाने के बाद वह बचाखुचा शिकार लोमड़ी के लिए छोड़कर चला गया।

अगले दिन भी ईश्वर ने बाघ को लोमड़ी के लिए भोजन के साथ वहाँ भेज दिया। वह आदमी ईश्वर की महानता के बारे में सोचकर आश्चर्यचकित हो गया और उसने यह निर्णय लिया कि वह बिना कुछ एक कोने में पड़ा रहेगा और ईश्वर उसका भरण-पोषण करेंगे।

अगले एक माह तक वह ऐसा ही करता रहा और जब वह मृत्युशय्या पर पहुंच गया तब उसे एक आवाज़ सुनायी दी - "मेरे बच्चे! तुम गलत राह पर हो। सत्य को पहचानो। नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।"

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एक वादक, एक श्रोता

कई वर्ष पूर्व चीन में दो मित्र रहते थे। एक मित्र अत्यंत कौशलपूर्ण तरीके से सितार बजाता था और दूसरा पक्के पारखी की तरह से सुनता था।

जब पहला मित्र सितार बजाते हुए पर्वतों के बारे में गाता था तो दूसरा कहता - "मुझे साकार रूप में पर्वत यहीं दिख रहे हैं।"

और जब पहला मित्र सितार बजाते हुए पानी के बारे में गाता था तो दूसरा कहता - "बहती हुयी जलधारा तो यहाँ है।"

कुछ दिनों बाद जब श्रोता मित्र की मृत्यु हो गयी तो वादक मित्र ने अपने सितार के तारों को तोड़ दिया और हमेशा के लिए गाना छोड़ दिया

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किसान और गेहूँ के दाने

दुःख के समय दुनिया और दुनिया वाले बेहद जालिम प्रतीत होते हैं. और, दुःख तब होता है जब चीजें आपकी इच्छानुसार नहीं होतीं. परंतु यह भी सच है कि दुनिया की तमाम चीजें सारे समय आपकी इच्छानुसार नहीं हो सकतीं. अपनी स्वयं की प्रकृति के अनुरूप घटनाएँ घटती रहती हैं.

इस प्रकृति को लाओ त्जू ने ताओ नाम दिया. बुद्ध ने इसे धम्म कहा तो महावीर ने परिभाषा दी कि चीजों की प्रकृति कोई नहीं बदल सकता. आग में गर्मी है तो पानी में ठण्डक. क्या इनकी प्रकृति बदल सकती है? कदापि नहीं. बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो धीरज रखे और प्रकृति के साथ तारतम्य बनाए रखे.

जब आप प्रकृति के साथ अपना तारतम्य बिठा लेंगे तो दुःख नहीं होगा. तब दुःख भी आपको प्रकाशवान और सहज लगेगा. ऐसा नहीं है कि दुःख आपके पास आएंगे ही नहीं. वे आएंगे, मगर दुश्मन के रूप में नहीं. मित्रवत रूप में आएंगे क्योंकि तब आपको पता होगा कि जीवन में दुःख भी आवश्यक हैं, जीवन का अभिन्न अंग हैं.

एक प्राचीन दृष्टान्त है. तब ईश्वर मनुष्यों के साथ धरती पर निवास करते थे. एक दिन एक वृद्ध किसान ने ईश्वर से कहा – आप ईश्वर हैं, ब्रह्माण्ड को आपने बनाया है, मगर आप किसान नहीं हैं और आपको खेती किसानी नहीं आती, इसलिए दुनिया में समस्याएँ हैं.

ईश्वर ने पूछा – “तो मुझे क्या करना चाहिए?”

किसान ने कहा - “मुझे एक वर्ष के लिए अपनी शक्तियाँ मुझे दे दो. मैं जो चाहूंगा वो हो. तब आप देखेंगे कि दुनिया से समस्याएँ, गरीबी भुखमरी सब समाप्त हो जाएंगी.”

ईश्वर ने किसान को अपनी शक्ति दे दी. किसान ने चहुँओर सर्वोत्तम कर दिया. मौसम पूरे समय खुशगवार रहने लगा. न आँधी न तूफ़ान. किसान जब चाहता बारिश हो तब बारिश होती, जब वो चाहता कि धूप निकले तब धूप निकलती. सबकुछ एकदम परिपूर्ण हो गया था. चहुँओर फ़सलें भी लहलहा रही थीं.

जब फसलों को काटने की बारी आई तब किसान ने देखा कि फसलों में दाने ही नहीं हैं. किसान चकराया और दौड़ा दौड़ा भगवान के पास गया. उसने तो सबकुछ सर्वोत्तम ही किया था. और यह क्या हो गया था. उसने भगवान को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

भगवान ने स्पष्ट किया – चूंकि सबकुछ सही था, कोई संधर्ष नहीं था, कोई जिजीविषा नहीं थी – तुमने सबकुछ सर्वोत्तम कर दिया था तो फसलें नपुंसक हो गईं. उनकी उर्वरा शक्ति खत्म हो गई. जीवन जीने के लिए संघर्ष अनिवार्य है. ये आत्मा को झकझोरते हैं और उन्हें जीवंत, पुंसत्व से भरपूर बनाते हैं.

यह दृष्टांत अमूल्य है. जब आप सदा सर्वदा खुश रहेंगे, प्रसन्न बने रहेंगे तो प्रसन्नता, खुशी अपना अर्थ गंवा देगी. यह तो ऐसा ही होगा जैसे कोई सफेद कागज पर सफेद स्याही से लिख रहा हो. कोई इसे कभी देख-पढ़ नहीं पाएगा.

खुशी को महसूस करने के लिए जीवन में दुःख जरूरी है. बेहद जरूरी.

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

3 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. तीनों ही अनुकरणीय, हमारा जीवन भी यूँ ही सीमित निकल जाता है।

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  2. किसान वाली कथा प्रेरक…लोमड़ी वाली तो भक्त लोगों के शरणागति के खिलाफ़ है…लेकिन है तो प्रेरक ही…

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