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धार्मिक टीवी चैनलों के साथ एक दिन

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टीवी पर रीयलिटी शो, डांस, ड्रामा, एक्शन, चहुँओर भ्रष्टाचार के सड़ियल समाचारों और मुन्नी-शीला जैसे गीत संगीत देखते देखते एक दिन वैराग्य-सा उत्पन्न हो गया तो सोचा कि चलो आज धार्मिक चैनलों का लाभ लिया जाए. कुछ पुण्य कमाया जाए. आखिर अपने अगले जन्म और मृत्यु के बाद के जीवन का उद्धार करने का भी तो कोई फर्ज बनता है ना!

अब जब बात अपने अगले जन्म और मृत्यु के बाद के जीवन के उद्धार की हो तो यूँ तो कई तौर तरीके हैं मगर सबसे बढ़िया और आसान तरीका आपका टीवी है और टीवी का रिमोट है. आपकी सेवा-सुविधा के लिए दर्जनों धार्मिक चैनल हैं. बस दोनों हाथ जोड़ कर भक्तिभाव से टीवी ऑन कीजिए, रिमोट के बटनों को धार्मिक चैनल के लिए दबाइए, और बस देखते सुनते बैठे रहिए.

मैंने अपने भीतर कुछ धार्मिक संस्कार लाने के लिए, नामानुरूप, संस्कार चैनल लगाया. एक स्वामी का प्रवचन चल रहा था. मनुष्य मात्र को वे तमाम दुखों-सुखों से ऊपर रहने का ज्ञान बांट रहे थे. माया-मोह से दूर रहने का सलाह दे रहे थे. दिमाग के किसी कोने में मेमोरी रीकाल हुआ तो याद आया कि स्वामी महोदय तो रेप केस में फंस चुके हैं और अभी जमानत पर चल रहे हैं. मगर महोदय का जनता को माया-मोह से ऊपर बने रहने का प्रवचन जारी है.

चैनल बदला. सोचा अभी तो और भी धार्मिक चैनल हैं, और भी धार्मिक साधु संत हैं. आस्था पर एक बापू जी का प्रवचन चल रहा था. मैंने अपनी मेमोरी को जबरन दबाया जो बारंबार यह बताने की कोशिश कर रही थी कि इन बापू जी के आश्रम में बच्चों की हत्याएँ हुई हैं. बापू बड़े ही सम्मोहक आवाज और स्टाइल में प्रवचन दे रहे थे. आत्मा और परमात्मा की बातें बता रहे थे. गुरु के महत्व की बात कर रहे थे. जीवन को सफल बनाने के लिए, जीवन में सफलता पाने के लिए , अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के लिए, गुरु की महिमा का बयान कर रहे थे. एक अदद गुरू की आवश्यकता प्रतिपादित कर रहे थे. सुनकर लगा कि अब तक का जीवन तो सारा पूरा असफल हो गया है. गुरु जो अब तक किसी को नहीं बनाया था. पिछले कुछ समय से किसी को जो कुछ गुरु अब तक मानता रहा था वो था गूगल जो मेरी अज्ञानता में प्रकाश कुछ कीवर्ड के सहारे सर्च करने के उपरांत डालता रहा था. मैं पूरी तैयारी में था कि आज बापू को गुरु महाराज बना ही लिया जाए कि इतने में ब्रेक बन गया और एक कमर्शियल आने लगा.

कमर्शियल था – राम रक्षा यंत्र का. वैसे तो कमर्शियलों में बहुत सी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है मगर किसी ने बताया था कि इन दिनों सरकार की विज्ञापन रेगुलेटरी बॉडी थोड़ी सक्रिय हुई है. तो लगा कि इस कमर्शियल पर थोड़ा-मोड़ा भरोसा तो कर ही सकते हैं. तो इस कमर्शियल में बताया गया कि राम रक्षा यंत्र को पहनने मात्र से ही व्यक्ति का जीवन सफल हो सकता है. वो जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकता है. सुख-समृद्धि मिल सकती है. आत्मा-परमात्मा से डायरेक्ट कनेक्शन यह राम रक्षा यंत्र करवाने में पूरी तरह सक्षम था.

मैंने कमर्शियल को धन्यवाद दिया कि उसने मेरे मन में गुरु बनाने के भाव को समाप्त कर दिया था. अब मुझे एक अदद गुरु नहीं, इस एक अदद राम रक्षा यंत्र की आवश्यकता थी. इसकी कीमत थी मात्र तीन हजार नौ सौ निन्यान्बे रुपए मात्र. निन्यानबे का फेर यहाँ भी था. चलिए, निन्यानबे रुपए तो गोलू की गुल्लक से निकल गए. बाकी का जुगाड़ जल्द से जल्द कर जीवन को सफल बना ही लिया जाए.

परंतु अभी चंद चैनल और शेष थे. शायद ये जीवन को और अधिक सफल बनाने में योगदान दें. रिमोट का बटन आगे दबाया तो श्रद्धा चैनल चला आया. धार्मिक चैनलों के साथ अच्छी बात ये है कि ये सब्सक्रिप्शन चैनल नहीं हैं, नहीं तो पता चले कि आप बड़ी श्रद्धा से श्रद्धा चैनल का लाभ लेने चलें तो पता चले कि इसका सब्सक्रिप्शन लेना होगा. ये अच्छी बात है कि तमाम जनता को उनके जीवन को सफल बनाने, उनका उद्धार करने ये चैनल पूरी भक्ति भाव से मुफ़्त, फ्री चैनलों के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं.

तो, श्रद्धा चैनल में मैंने देखा कि एक स्वामी बड़ी संख्या में मजमा लगाए लोगों को योग सिखा रहे हैं. उन्होंने बड़े विस्तार से बताया कि व्यक्ति का जीवन तभी सफल है जब वो योग को अपने नित्य जीवन में अपना ले. कोकाकोला को टायलेट साफ करने के लिए प्रयोग करे और हरिद्वार की खास कंपनी की बनी आयुर्वेदिक दवाई का प्रयोग करे. आह! मेरा तो योग के बगैर इहलोक ही असफल था, तो मैं परलोक की बात क्या खाक करता! तुरंत ही मन में मैंने प्रण किया कि कल से – क्योंकि आज तो मैं धार्मिक चैनलों को देखने का प्रण ले चुका था – योग को प्राणपण से अपनाऊंगा और अपना जीवन सफल करूंगा. और, अभी तो कुछ और धार्मिक चैनल बचे थे देखने में.

अगला चैनल था – गाड चैनल. ये तो साक्षात ईश्वरीय चैनल था. सूट-बूट में लकदक एक प्रवचनकर्ता ने बताया कि एक धार्मिक किताब के अध्याय 14 उप अध्याय 13 लाइन 12 में ईश्वर ने बताया है कि सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को विश्वास करना सीखना चाहिए. यदि उसे विश्वास हो कि सामने जो पहाड़ है वो राई बन जाए तो सचमुच में वो पहाड़ राई बन जाएगा. वाह! क्या अद्भुत बात बताई बंदे ने. अब तक का धार्मिक चैनलों से बटोरा ज्ञान तो कोरा बकवास था. मुझे बस विश्वास करना था कि मेरा जीवन सफल है. मेरा इहलोक सफल है. मेरा परलोक बहुत ही सुंदर है. बस. और फिर सब कुछ मेरे विश्वास के मुताबिक ही होगा. मैं अपने विश्वास को पुख्ता करने में जुट गया. अब कुछ और करने की जरूरत ही नहीं है.

अबकी मैंने टीवी का रिमोट बेतरतीबी से दबाया. एएक्सएन चैनल लगा. अब आप कहेंगे कि अभी तो और भी धार्मिक चैनल बचे हैं दर्शन लाभ लेने के लिए. पर, भाई, विश्वास नाम की कोई चीज होती है कि नहीं. मुझमें भरपूर विश्वास है. यकीन रखिए.

तो, एएक्सएन पर जैकी चैन की फ़िल्म आ रही थी. एक्शन अपने चरम पर था. मैं उसमें डूब गया. हर काम में डूब कर, उसे मन लगा कर करना चाहिए. किसी धार्मिक चैनल पर अभी अभी हाल ही में सुना था. उस पर अमल तो करना ही चाहिए. है न?

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टिप्पणियाँ

  1. इन स्वामियों, तथाकथित अवतारों /भगवानों पर बहुत ही सटीक व्यंग्य किया है सर!

    सादर

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  2. क्या कहें भारत है ..यहाँ सब चल जाता है ...आपकी पोस्ट कई सारी बातों को सोचने का अवकाश देती है ...आपका आभार

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  3. व्यावसायिक धार्मिक चॅनल और व्यावसायिक धार्मिक नेताओं से धर्म ना सीखें , टीवी की जगह धार्मिक किताबों का इस्तेमाल करें.

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  4. पूरे मनोयोग से पढ़ लिया, आपका तरीका भी आजमा लेंगे.

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  5. एक्‍शन तो अपनी भी कमजोरी है। इस वजह से अक्‍सन घर में डांट सुननी पडती है। :)
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    ध्‍यान का विज्ञान।
    मधुबाला के सौन्‍दर्य को निरखने का अवसर।

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  6. अब तो सब के अलावा कुछ भाता ही नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सम्‍भवत: ऐसे ही 'साधुओं' के लिए विवेकानन्‍द ने कहा था कि इन्‍हें खेत जोतने के लिए बैलों की जगह जोत दिया जाना चाहिए।

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  8. ` स्वामी महोदय तो रेप केस में फंस चुके हैं '

    तभी तो वे अपने तजुर्बे से कह रहे है कि मोह माया को छोडॊ वर्ना फंस जाएंगे बच्चू :)

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  9. गज़ब का एक्शन लिया आपने!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. टिप्पणियों में भी व्यंग्य के समान ही लगभग एक ही स्वर है लेकिन इसके दूसरे पहलू पर भी विचार किया जा सकता है। विरोध या आलोचना मेरा लक्ष्य नहीं है बस दूसरी ओर जाकर उस दिशा से देखने का प्रयास भर है। बापू, बाबा, स्वामी या महाराज जो भी हो यदि उनके आश्रम या संस्थान में दवाएँ या जो भी उत्पाद बन रहे हैं तो ये मात्र अतिरिक्त विकल्प के रूप में हमारे सामने है। जैसे च्यवनप्राश के लिए डाबर, झंडू, ऊंझा, वैद्यनाथ आदि कंपनियाँ हैं, वैसे ही किसी भक्त या फ़ॉलोअर को उसके बाबा या स्वामी के उत्पाद के रूप में एक और विकल्प मिलता है बल्कि वह स्वामीजी के उत्पाद को अधिक शुद्ध और प्रामाणिक मानता है, यदि ऐसा है तो क्या बुराई है। और जो फ़ॉलोअर नहीं हैं उन्हें भी तो इतने अतिरिक्त विकल्प मिलते हैं।
    आयुर्वेदिक उत्पादों और योग को बाबा लोगों ने ही आम जनता में लोकप्रिय बनाया है। रोगी शरीर के लिए योग लाभदायक है लेकिन रोग की जटिलता और गंभीरता की स्थिति में योग के साथ आयुर्वेद के संयोजन की आवश्यकता होती है। यदि दवा बाबा की है तो क्या हुआ। मै सोचता हूँ कि निशाने पर योग की दुकानदारी ही है योग नहीं।
    हत्या या अन्य उपद्रवों के लिए बाबा या बापू का दोष यही है कि वे लोगों या उनके भक्तों की प्रवृत्ति नहीं बदल सके।
    क्या मैं एक भक्त या फ़ॉलोअर के रूप में बोल रहा हूँ? यदि उपरोक्त बातें ठीक हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं फ़ॉलोअर हूँ या नहीं। फिर भी हो सकता है कि मैं अपनी बात ठीक से नहीं रख सका हूँ या फिर इस व्यंग्य या लेखन के मंतव्य को नहीं समझ सका हूँ।
    इसलिए क्षमायाचना सहित।

    उत्तर देंहटाएं
  11. भूसा तो चारों ओर दिखता है साहब. ज़रूरत है कि उसमें से तत्त्व चुन लिया जाए. टीवी पर प्रवचन सुनने को तो ये एक बहुत बड़ा फायदा है. आपको किसी के आश्रम में जाकर वहाँ की पद्यति का शत प्रतिशत अनुसरण करने कि ज़रूरत ही नहीं है. बस टीवी पर जो ज्ञान की बात, या काम की बात अपने पर लागू हो, उसे ग्रहण करें और आगे बढ़ चलें. यह मनुष्य का स्वाभाव है कि दूसरे की बुराई पहले देखता है, और उसमें छुपी हुई अच्छाइयों को तर्कों की तराजू पर तोलता रहता है. आपका सभी को एक ही चाबुक से हाँकना टीस दे गया.

    उत्तर देंहटाएं

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