सोमवार, 23 अगस्त 2010

सदी की सुपर व्यंग्य कथा...

super

आज के जमाने में जब तक आदमी सुपर नहीं बन जाता उसकी पूछ परख नहीं होती. मामला चाहे बग का हो या फिर बेवफाई का.

अभी तक तो बेवफ़ा और बेवफ़ाई का नाम सुना था. मगर यारों को इसमें भी बहुत सारी ईमानदारी नजर आई. लोग बेवफ़ाई का नोटिस नहीं लेने लगे, इसे आम समझने लगे, तो बड़े भाई लोग सुपर बेवफ़ाई ले आए. याने जब तक मामला सुपर तक नहीं जाएगा, काम नहीं जमेगा. सुपर से नीचे किसी चीज का नोटिस नहीं लिया जाएगा, कोई चीज नहीं चलेगी. चाहे सर्फ हो या निरमा. प्लेन से काम नहीं चलेगा. इन्हें सुपर होना होगा.

अभी तक लेखिकाएँ क्या क्या और कैसी कैसी लिख रही थीं, इस पर किसी का कोई ध्यान नहीं था. मगर जब बात नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई अंक में उठी तो हर एक ने नोटिस क्या, सुपर नोटिस ले लिया.

ये भी तो देखिए कि खालिस हिंदी की ‘हिंदी साहित्यिक पत्रिका’ नया ज्ञानोदय अपना चोला बदल कर हिंग्लिश अपनाने का सुपर प्रयास कर रही है. इसीलिए उसने अपने विशेषांक का नाम महा-विशेषांक के बजाय सुपर-विशेषांक अंक रख लिया. महा शब्द में शायद उसे वो महानता, वो सुपरनेस नजर नहीं आया हो, या फिर, हिंदी में होने के कारण महा शब्द में आत्महीनता नजर आया हो, वो सुपीरियरिटी दिखाई नहीं दिया हो जो सुपर में आता है. कोई आश्चर्य नहीं कि ज्ञानोदय, जो बाद में नया ज्ञानोदय हो गया था, आगे चलकर सुपर ज्ञानोदय बन जाए!

सुपर शुद्ध हिंदी-वादी लोगों के लिए तो ये सुपर डूब मरने वाली बात है. अब तक हिंदी की अख़बारी भाषा पर भाषाई बलात्कार की बातें होती थीं, अब हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं ने ये सुपर काम अपने हाथ में ले लिया है तो हिंदी का भविष्य वाकई सुपर है!

आदमी तो ख़ैर अपनी औक़ात जहाँ तहाँ दिखा ही देता है कि वो सुपर है, और इनमें भी नेता और अफ़सर सुपर-डुपर हैं. मगर अब छुद्र कीटाणुओं को भी कम न समझा जाए. वे भी सुपर होने लगे हैं. सुपर बग इसी का उदाहरण है. आदमी को उसकी औक़ात एक सुपर किस्म का बग बता देता है. लगता नहीं कि आदमी इतना सुपर तो पहले शायद कभी नहीं रहा?

इतनी सुपर बातें मैंने आज लिख दीं हैं, हर लाइन में दो तीन सुपर शब्द घुसा दिए हैं मैंने तो मैं सुपर मुतमइन नहीं हो जाऊं कि यह सदी का सुपर व्यंग्य नहीं बन गया है?

बची खुची सुपरता इस व्यंज़ल से पूरा कर देते हैं –

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दोस्तों जमाने में ये क्या हो गया

जिसको देखो वो सुपर हो गया

 

वैसे था तो वो जनता का हिस्सा

अफ़सर बनके वो सुपर हो गया

 

किसके बारे में क्या कहें अब

ये बग भी देखो सुपर हो गया

 

कसर बाकी रह गई थी शायद

बेवफ़ाई भी दोस्तों सुपर हो गया

 

जो भी चला जाति की चाल रवि

सियासत में वो सुपर हो गया

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13 blogger-facebook:

  1. सुपर चर्चा के लिए बधाई। क्यों न अब एक हर्जाई विशेषांक की पेशकश की जाय :)

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  2. बहुत सही बयान किया आपने ! दिल्ली की दुर्दशा देखी ! गड्ढे खोदना भारत का ट्रेड मार्क है
    .

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  3. आपने नब्‍ज पर हाथ रखा है। हिन्‍दी ने अपने इन कपूतो को सब कुछ दिया ' पैसा, प्रतिष्‍ठा, हैसियत और वह सब कुछ भी जिसकी इन्‍हें न तो अपेक्षा-कल्‍पना थी और न ही जिस सबके ये पात्र/अधिकारी थे। बदले में इन कपूतों ने हिन्‍दी को तार-तार कर दिया। अपनी मॉं को बेच कर खा गए, बेशर्मी से खाए जा रहे हैं। हिन्‍दी ने इन्‍हें अभिनन्‍दनीय बनाया और ये हिन्‍दी को निर्वस्‍त्र किए जा रहे हैं।

    आप भोपाल में हैं और खूब जानते हैं कि भोपारल में ऐसे लोगों को 'मॉं के खसम' कहा जाता है। लानत है इन सब पर।

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  4. kya satik mudde pe satik baat kah ke lapeta hai boss, dil khush ho gaya....

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  5. बाकी चीजों में तो सुपर होना चल जाएगा, लेकिन हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका का 'सुपर' विशेषांक निकलना हिन्दी को क्या गुल खिलाएगा, कहा नहीं जा सकता.प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो हिन्दी की दुर्दशा पहले ही कर चुके हैं.

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  6. सटीक. ठीक वहीं चोट की है जहां सबसे ज़्यादा दुखता है.

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  7. सार्थक विचारों पर कल्‍पना के सु-पर.

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  8. ''सुपर शुद्ध हिंदी-वादी लोगों के लिए तो ये सुपर डूब मरने वाली बात है.''.....बहुत सही!

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  9. ऐसे तो हिन्दी का लास्ट सपर (Last Supper) भी हो जाएगा।

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  10. लीजिये इस पर सुपर हंगामा भी देख लिया ।

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