शनिवार, 21 जुलाई 2007

गूगल ने गूगल से कुछ कहा...

सागर जी ने गूगल एडसेंस की मजेदार कहानी सुनाई तो मसिजीवी जी आतंकित से दिखे कि क्या वे अपने चिट्ठे पर एडसेंस दिखाना बंद कर दें?

एडसेंस मिसयूज़ का किस्सा तो एडसेंस के आरंभ से ही चला आ रहा है, हालाकि अब हालात काफी कुछ सुधर गए हैं. मुझे याद आ रहा है सात आठ साल पहले का वाकया जब यहाँ रतलाम में भी किसी नेटवर्क कंपनी ने लोगों को किश्तों में पीसी बांटे थे और उन लोगों को इंटरनेट पर कुछ खास साइटों के विज्ञापनों को क्लिक करते रहने होते थे और बदले में बहुत सा पैसा मिलने का झांसा दिया गया था. उनके पीसी को हर हफ़्ते फ़ॉर्मेट किया जाता था ताकि कुकीज वगैरह से पहचान स्थापित दुबारा नहीं की जा सके. शायद तब आईपी पते से पहचानने की सुविधा नहीं जोड़ी गई रही हो.

इसी बीच, हाल ही में मेरे खाते में एडसेंस रेफ़रल की सुविधा भी मिल गई. यानी कि अब मैं अपने चिट्ठों पर तीन और (हे! भगवान) गूगल विज्ञापन लगा सकता हूँ. एक अतिरिक्त तो मैंने लगा ही दिया है – सबसे नीचे पाद टिप्पणी के रूप में.

मगर फिर भी, यदि आप मेरे चिट्ठों के विज्ञापनों से आतंकित दिखते हैं तो आपको आतंकित होने या अपना बीपी बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है. मेरे सभी चिट्ठों की पूरी फ़ीड उपलब्ध है जिसे आप सब्सक्राइब कर या ईमेल के जरिए पढ़ सकते हैं – आमतौर पर बिना विज्ञापनों के.

एडसेंस के क्लिक किस्से की बात करते हुए असली एडसेंसी बात तो रह ही गई. नीचे दिया गया चित्र देखें –

यह चित्र मेरे एक चिट्ठे में विज्ञापन स्वरूप हाल ही में प्रकट हुआ था.

एडसेंस फ़ॉर एडवर्ड्स. गेट टाइम एंड मनी टुडे.

याने कि गूगल के पास आपको समय भी मिलेगा और पैसा भी. पैसा बंटते तो सुना था, परंतु टाइम? बलिहारी गूगल देव की (भजें गूगल आरती 1 , गूगल आरती 2 ) . अब वो समय भी बांट रहा है. पर, अब सवाल है कि वो अच्छा समय बांट रहा है या बुरा. पैसा काला-सफेद होता है. तो लोगों का समय भी काला सफेद हो सकता है. ऐसे में वह काला समय बांट रहा है या सफेद?

गूगल का वह समय किसी को मिला हो तो बताएँ.

5 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. एक् समय हम कहा करते थे रतलामीजी के ब्लाग् में मसाला विज्ञापनों के जंगल् में खोजना पड़ता है। आज् ऐसा नहीं हुआ।

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  2. उनके पीसी को हर हफ़्ते फ़ॉर्मेट किया जाता था ताकि कुकीज वगैरह से पहचान स्थापित दुबारा नहीं की जा सके. शायद तब आईपी पते से पहचानने की सुविधा नहीं जोड़ी गई रही हो.

    कुकीज़ साफ़ करने के लिए पीसी फॉर्मेट करते थे??!!! लानत है!!!

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  3. रवि जी,हमारे लिए तो एकदम नयी जानकारी है कि उनके पीसी को हर हफ्ते फार्मेट किय़ा जाता था। सच है धन की खातिर इन्सान क्या-क्या कर गुजरता है।

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  4. अनूप भाई,
    शुक्र है, आज आप खुश हुए :)

    अमित जी,
    हाँ, ये सच है. लोगों को पता ही नहीं होता है आमतौर पर कि कुकीज़ कहाँ और किस फ़ाइल में किस फोल्डर में होते हैं. तो एक ही सीधा रास्ता बचता है - हार्डडिस्क फ़ॉर्मेट करो यार!

    परमजीत जी,

    हाँ, और जो साइबर कैफ़े विंडोज 98 चलाते हैं, उनके पीसी में हर दूसरे दिन तक ढेरों वायरस आ जाते हैं - तो वे भी आमतौर पर यही करते हैं - हार्डडिस्क फ़ॉर्मेट. कारण ये भी है - छोटी जगहों में उतनी तकनीकी दक्षता वाले लोग नहीं होते आमतौर पर.

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  5. वाह, रोचक जानकारी।

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