नारद के आगे जहाँ और भी हैं

जी हाँ, नारद के आगे जहाँ और भी हैं...

यूं मैंने तो अपनी बात अपरोक्ष और व्यंग्यात्मक लहज़े में पहले ही कह दी थी, परंतु जब ई-पंडित की ये भयंकर चेतावनी मिली -

"...नारद के इस कदम के प्रति अपना समर्थन (या विरोध) जाहिर करें। यदि आज भी उन्होंने ऐसा न किया तो यह बहुत बड़ा नैतिक अपराध होगा जैसा कि कहा भी गया है, "जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके अपराध"।..."

तो फिर से कुंजीपट को गंदा करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया.

अब, पहली बात पहले.

कल ही मैं किसी एक वेब अनुप्रयोग में पंजीकृत हो रहा था तो उसमें सेवा-शर्तों में से एक यह भी था -

"...upload, post or otherwise transmit any content that is unlawful, harmful, threatening, abusive, harassing, tortious, defamatory, vulgar, obscene, libelous, invasive of another's privacy, hateful, or racially, ethnically or otherwise objectionable;... will be removed immediately and user will be banned..."

आपके गूगल ब्लॉगर खाते के ऊपर नेविगेशन बार में ये लिंक भी रहता है - रिपोर्ट एब्यूज. यह लिंक भी ऐसी ही सामग्री की रपट ब्लॉगर को देने के लिए ही होता है ताकि उचित कार्यवाही की जा सके. गूगल ने तो एक स्पैम चिट्ठा जिसने मेरे अंग्रेज़ी चिट्ठे की सामग्री को लेकर एडसेंस रेवेन्यू कमाने के लिए स्पैम ब्लॉग बनाया था - उसका एडसेंस खाता मेरे कहने पर ही प्रतिबंधित किया था. वर्डप्रेस पर आधारित वह चिट्ठा स्वयं के डोमेन पर था, अतः वर्डप्रेस वाले तो कुछ नहीं कर पाए, मगर डोमेन रजिस्ट्रार को रपट करने पर वह चिट्ठा इंटरनेट से ग़ायब हो गया. औरों के भी ऐसे कुछ अनुभव होगें ही. :)

श्रीश ने कई चिट्ठों पर अपनी टिप्पणियों के जरिए पहले ही कई मर्तबा तथा अपने इस पोस्ट में इस बार फिर से लिखा है - नारद पर पंजीकृत चिट्ठों में भाषा और सामग्री को लेकर न्यूनतम मानक हैं, और, नारद की सेवा शर्तों के अनुसार उन मानकों का पालन करना हर पंजीकृत चिट्ठे को अनिवार्य है अन्यथा उसे नारद से निकाल बाहर किया जाएगा.

क्या मैं नारद के इस प्रतिबंध वाले कदम का समर्थन करता हूँ?

जी हाँ.

हर संस्था को अपने नियम कायदे कानून पालन करवाने का हक है. हर पालक को अपने बच्चों को चपतियाने का हक है यदि वे गलती करते हैं और, दूसरी ओर, हर बच्चे को अपने पालक को उनकी गलती बताने का भी उतना ही हक है - यदि वे मानते हैं कि उनके पालक गलती पर हैं. तो, नारद ही क्या - नारद जैसी किसी भी संस्था को ऐसी सामग्री को हटाने का पूरा अधिकार है. डिग ने भी ऐसी सामग्री को हटा दिया था व उन उपयोक्ताओं पर प्रतिबंध लगा दिया था. अब ये जुदा बात है कि हजारों लोगों के दबाव के आगे डिग को अपना वो कदम पीछे खींचना पडा था.

परंतु यह प्रतिबंध क्या फलदायी है?

नहीं.

चूंकि नारद का कार्य सिर्फ चिट्ठों की उपस्थिति बताना है और उसकी कड़ी देना है, अतः यह प्रतिबंध किसी काम का नहीं है. जब तक कि वह चिट्ठा इंटरनेट से उसके उपयोक्ता द्वारा खुद या वेब-सेवा प्रदाता द्वारा नहीं मिटा दिया जाता, उसका वजूद इंटरनेट पर रहेगा अतः ऐसे किसी भी प्रतिबंध के कोई मायने नहीं है. लोग-बाग़ ऐसी सामग्री के लिंक झपट्टा मारकर लेते-देते हैं और ऐसी सामग्री के पाठक नियमित पाठकों से दसियों गुना ज्यादा होते हैं.

नारद पर हो हल्ले के पीछे क्या कारण हैं?

दरअसल, एक नए चिट्ठे को, जिसमें सामग्री कम होती है, उसे पाठक प्रदान करने का कार्य नारद करता है. नारद के कारण चिट्ठों को पाठक, क्लिक और पेज-लोड मिलते हैं. परंतु आपका चिट्ठा जब सामग्री से भरपूर हो जाता है, तो नारद के जरिए आने वाले पाठकों की संख्या दूसरे जरिए - मसलन नियमित सब्सक्राइब किए व गूगल खोज इत्यादि के जरिए आने वाले पाठकों की संख्या से बहुत कम हो जाती है. और, यकीन मानिए, जिस दिन आपके चिट्ठे में एक हजार से ऊपर सार्थक सामग्री युक्त पोस्ट होगी तो आपको नारद की आवश्यकता ही नहीं होगी.

उदाहरण के लिए, रचनाकार का हालिया 500 पृष्ठ-लोड का स्टेटकाउंटर एनॉलिसिस देखें. इसमें आप पाएंगे कि 500 पृष्ठ लोड में से सिर्फ 14 नारद के जरिए आए हैं. रचनाकार पर आज की वर्तमान स्थिति में प्रतिदिन 200 के आसपास पृष्ठलोड हो रहे हैं. जाहिर है, यदि आपके चिट्ठे में सामग्री है, प्रासंगिक सामग्री है तो आपके चिट्ठे को नारद की उतनी आवश्यकता नहीं है. परंतु नए चिट्ठों को अनिवार्य रूप से नारद की आवश्यकता है. उन्हें अपना पाठक आधार बनाने में सामग्री जोड़ने में समय लगेगा. और, शायद इसीलिए नारद पर जब एक नए चिट्ठे को उसकी असंयत, अशिष्ट भाषा के कारण प्रतिबंधित किया गया तो तमाम तरफ़ से विरोध और विरोध के विरोध में सुर उठे.

इस बीच, एक अच्छी बात ये हुई कि उस तथाकथित अशिष्ट भाषा युक्त चिट्ठा-पोस्ट को उसके लेखक ने अपने चिट्ठास्थल से हटा दिया. और, संभवतः प्रतिबंध लगाने का यही उद्देश्य भी था. उम्मीद है, भविष्य में वह चिट्ठा नारद पर पुनः शामिल हो जाएगा. प्रतिबंध कहीं पर भी कोई जन्म-जन्मांतर के लिए नहीं लगाया जाता है.

यहाँ यह बताना भी समीचीन होगा कि जिस चिट्ठाप्रविष्टि को लेकर विवाद हुआ वह असग़र वजाहत की कहानी शाह आलम कैम्प की रूहें को लेकर हुई, जो कि वास्तव में दुखद है. वास्तव में शाह आलम कैम्प की रूहें नाम की कहानी में कोई दर्जन भर छोटे-छोटे वर्णन हैं, जिन्हें किसी चिट्ठे पर अलग-अलग कर शरातरपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया गया, और एकांगी पठन-पाठन में निश्चित ही वे किसी खास वर्ग को अप्रिय लगेंगे. और उस चिट्ठा प्रविष्टि का शायद उद्देश्य भी यही था. शाह आलम कैम्प की रूहें रचनाकार में पहले ही प्रकाशित हो चुकी है. यह कहानी असगर वजाहत के कहानी संग्रह - मैं हिन्दू हूं की अंतिम व अत्यंत मार्मिक कहानी है. अकसर रचनाकार अपनी कहानी कह देते हैं और पाठक को ये सोचने के लिए छोड़ देते हैं कि वह क्या समझता है. पर इसके लिए पाठक को संपूर्ण कहानी, संपूर्ण रचना को पढ़ना जरूरी है. मात्र कुछ हिस्से पढ़ने पढ़वाने से पाठक भ्रमित हो जाता है. जैसा कि इस प्रकरण में हुआ था. साथ ही, रचनाकार - असग़र वजाहत ने आगे की भी बातें कहने की कोशिश की है यदि आप समझ सकें. शाह आलम का नाम दिल्ली के नानक गुरुद्वारे कैम्प या छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित गांव के कैम्प का नाम के प्रतीक रूप में रख कर और पात्रों के नाम अपने स्थान-रूप-और-धर्म के नाम रख देखें. वे आपके ही मोहल्ले के, आपके साथ हुए हादसे की सच्ची कहानी होंगे. इसमें किसी खास वर्ग या समुदाय का उल्लेख तो बस इशारा मात्र है. यह कहानी हर समुदाय, हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है. प्रियंकर ने जब इस कहानी को अपने पूरे रूप में पढ़ा - तो उनका कहना है कि उनकी आंखों में आँसू आ गए. आपकी सुविधा के लिए इस कहानी को रचनाकार पर यहाँ पर अपने संपूर्ण रूप में पुनः प्रकाशित किया जा रहा है. वैसे, यह कहानी अपने संपूर्ण रूप में रचनाकार में इस संग्रह पर उपलब्ध है. जिस सलेक्टिव तरीके से इस रचना को आधे अधूरे रूप में शरारत पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया, और प्रतिरोध स्वरूप अजगर ... नाम से घटिया लघुकथा पैरोडी पोस्ट की गई ये सब दुःखद और शर्मसार है. परंतु ये भी मान लें कि ऐसी घटनाएँ दिन ब दिन बढ़ेंगी हीं. दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेंगी. चार समझदार होते हैं तो चालीस और चार सौ ना-समझ. आप हर किसी को समझाने का ठेका नहीं ले सकते. हिन्दी इंटरनेट पर नासमझों की अपनी अलग दुनिया होगी. ये बात जुदा है कि शुरूआती चर्चाओं के बाद इन्हें कोई नहीं - जी हाँ, कोई भी नहीं पूछेगा.

अब वापस अपने धंधे पर आते हैं. नारद अपने कलेवर, अपनी सुविधा के कारण खासा लोकप्रिय है. नारद से पहले देबाशीष का बनाया चिट्ठा-विश्व था - हिन्दी का पहला ब्लॉग एग्रीगेटर जो कि वर्तमान नारद से भी ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुविधाओं युक्त था, बहुभाषी था, और अपने समय में वह नारद से ज्यादा लोकप्रिय था और रहता. परंतु चूंकि मुफ़्त की सुविधा पर होस्टेड था और सेवा-प्रदाता के बिजनेस मॉडल पर नहीं होने से वह वित्तीय कठिनाइयों से जूझता अपनी 500 - सर्वलेट एक्सेप्शन की बेमौत मौत मर रहा है. नारद की आरंभिक संरचना के समय मैंने साथियों को नारद के बिजनेस मॉडल की ओर इंगित भी किया था. :) और, साथी इसे स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना से लें - क्या यह चिट्ठा-विश्व को पुनर्जीवित करने का उचित समय नहीं है?

अभी बढ़िया काम कर रहे ब्लॉग एग्रीगेटरों में पीयूष प्रतीक का हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम भी है, जिसे मैंने सब्सक्राइब किया हुआ है, और जिसमें किसी चिट्ठे पर कोई प्रतिबंध नहीं है - सेक्स-क्या जैसे चिट्ठों पर भी - क्योंकि ऐसा हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम की सेवा शर्तों में शामिल ही नहीं है. हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट नाम का ब्लॉगर आधारित हस्तचालित एग्रीगेटर भी है - जिसमें भी प्रतिबंध इत्यादि की समस्या नहीं है. एक नया, स्वचालित चिट्ठा एकत्रक जाल पर उपलब्ध कुछ मुफ़्त वेब सेवाओं का इस्तेमाल कर बनाया गया है जिसका विस्तृत जिक्र यहाँ पर किया गया है - वह भी ठीक-ठाक ही काम कर रहा है - और उसमें ऐसी तकनीक है ही नहीं कि किसी चिट्ठे को प्रतिबंधित किया जा सके. कुछेक हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर - चिट्ठा एकत्रक बीच में उभरे थे, परंतु वे चूंकि वे दूसरी सेवाओं के साथ जुड़े थे अतः अधिक ध्यान नहीं दिए जाने के कारण उतने प्रचलित नहीं हो पाए.

सार यह कि प्रतिबंध लगाने व हटाए जाने का जो अनावश्यक हो हल्ला तमाम ओर से किया जा रहा है वह ग़ैर जरूरी तो है ही, उसमें कोई दम नहीं है. नारद को हर चिट्ठे को जिसे वह अपने तईं आपत्तिजनक समझता है, प्रतिबंध का अधिकार है. उसकी अपनी सेवा शर्तें हैं. परंतु यह भी, कि नारद के प्रतिबंधित किए जाने से किसी चिट्ठे के स्वास्थ्य में कुछ असर पड़ेगा - तो यह भी बहुत बड़ी भ्रांति है. सिर्फ और सिर्फ उस विशिष्ट चिट्ठे के चिट्ठापाठकों की संख्या भर में कमी आएगी - या शायद नहीं आएगी - सेक्स क्या के स्टैट्स किसी ने देखे हैं क्या? वह भी तो नारद पर प्रतिबंधित है. और, यकीन मानिए, जनता प्रतिबंधित वस्तुओं के पीछे जरा ज्यादा ही दीवानी होती है!

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रवि भाई मैंने तय किया था कि इस मुद्दे पर किसी भी दूसरे ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं करूँगा। पर आपकी पोस्ट देख कर रुक गया। हम विरोध के लिए विरोध के खिलाफ हैं। बाजार 1 की भाषा का किसने समर्थन किया है... मेरी जानकारी में किसी ने नहीं। बाजार 1 को जिस तरह से और जिस शब्दावली के साथ हटाया गया, उसका विरोध है। उसके बाद जो उकसाने का तरीका अपनाया जा रहा है, उसका विरोध है। आज कई ऐसे पोस्ट है, जिनसे मेरी क्या, कोई भी जो संवेदनशीनल होगा, उसे तकलीफ होगी। एक शख्स का नाम आपने लिया भी है। पर आप देखिये कि नारद के संचालक उनकी पीठ थप थपा रहे हैं। सवाल विचार का है। शाह आलम कैम्प... पूरा भी छापा जाता तो क्या आप समझते हैं, असगर वजाहत को वे जान जाते। या शाह आलम पर यह कोई पहली टिप्पणी है। पूरी की पूरी फाइनल सोल्यूशंस और परजानिया देख कर भी लोगों को लगता है कि सब झूठ है... सवाल इससे बडा है... सवाल है नारद जैसे सार्वजनिक मंच का व्यवहार कैसा होगा... किसी को देख लेने की धमकी देना ... किसी को आतंकवादी कहना... बम फोडने वाला कहना... मक्कार कहना... क्या यह शिष्ट जबान है... चूंकि यह सब संचालकों के विचार को तुष्ट करते हैं, इसलिए सही है... जब असगर साहब मजहबी दर्द के स्थान पर इंसानी दर्द को लिखने लगेगें, मैं उन्हे भी जानने लगूँगा... किसे पता है असगर वजाहत का धर्म... इन्हें लगता है वो मुसलमान है... ऐसी टिप्पणियों से मुझे चोट पहुंची है...नारद क्या करेगा... नारद के आगे जहां और भी है... है...दिखेगा भी...

Hindiblogs.com PIYUSH ka nahi, Prateek ka hai.

नासिर भाई ने बिल्कुल सही लिखा है...

"जब असगर साहब मजहबी दर्द के स्थान पर इंसानी दर्द को लिखने लगेगें, मैं उन्हे भी जानने लगूँगा"
यह मैने लिखा था. कभी मुकरूँगा भी नहीं. जिस दूष्टता के साथ असगर साहब के लिखे का प्रयोग किया गया है, उसका विरोध किया जाता रहेगा. तकलिफ सबको होती है, दिल भगवान ने केवल आपको ही नहीं दिया है.

यह नसिरूद्दीन के लिखा गया है.

खूब, आपने भी अपनी बात सही ढंग से कही है रवि जी। :)

रवि रतलामी जी
आपका लेख पढा, उसमें मुझे ब्लोग और गूगल से संबंधित प्रभावपूर्ण जानकारी मिली।
दीपक भारतदीप

रवि जी बहुत वर्तमान स्थिति का आकलन करता बहुत ही सुन्दर लेख लिखा है। मैं खुद इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता था, बल्कि मैं खुद व्यर्थ विवादों की बजाय रचनात्मक लेखन को महत्व देता हूँ। परंतु इस विषय पर अपना मत सपष्ट करना मुझे आवश्यक लगा।

आपसे सहमत हूँ, जब हिन्दी की दुनिया विस्तृत होती जाएगी तो और भी एग्रीगेटर भूमिका में आएंगे।

यथास्थिति का विश्लेषण करता बहुत ही अच्छा लेख आपने लिखा, इसीलिए आप मेरे पसंदीदा चिट्ठाकारों में शामिल हैं।

रवि भाई इतनी पोस्टों पर टिप्पणी से बचते बचाते पहली ऐसी पोस्ट दिखी है जो मेरे दिल की बात कहती है। मैंने भी सोच रका था कि इस विषय को जरुरत से ज्यादा तूल देना उचित नहीं है। पर आपके हाँ और नहीं और उसके पीछे के तर्क इतने सशक्त लगे कि इस लेख की तारीफ किये बिना रहा नहीं गया।
हिट्स के मामले में आपका विश्लेषण मेरे अनुभवों से मेल खाता है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की बात अपनी सौंवी पोस्ट पर मैंने भी कही थी । एक बार फिर शुक्रिया इस संतुलित लेख के लिए ।

जरूरी बात कही आपने और चूंकि आपने कही इसलिए गनीमत है सुनी गई- -राहुल का लिखा बदमजा था और नारद को कोई चिट्ठा हटाने का अधिकार है' मुझे ये दोनो ही तथ्‍य बहुत पहले से स्‍पष्‍ट रहे हैं, लेकिन जैसे कि नसीर भाई ने स्‍पष्‍ट किया, दिक्‍कत इस प्रतिबंध पर मचे उत्‍सव (विजयोत्‍सव ??) पर रही और उससे भी अधिक असहमत स्‍वरों को जबरन चुप करने की कोशिश और उनकी पहचान एक गैरजरूरी नस्‍ल के रूप में करने से लेकर रही है।

आपके इस सब के लिख देने के लिए शुक्रिया- अब हमें इस विषय पर पोस्‍ट की जरूरत नहीं रह गई है।

बहुत सही लिखा आपने, मुझे लगता है इस विवाद को आपकी इस बेहद संतुलित पोस्ट के बाद थम जाना चाहिये।

@ नसीर भाई जी
सवाल है नारद जैसे सार्वजनिक मंच का व्यवहार कैसा होगा... किसी को देख लेने की धमकी देना ... किसी को आतंकवादी कहना... बम फोडने वाला कहना... मक्कार कहना... क्या यह शिष्ट जबान है... चूंकि यह सब संचालकों के विचार को तुष्ट करते हैं, इसलिए सही है...
तो किसी को यह कहना कि मैं मुल्क को इन हिन्दू आतंकवादियों से बचाने की गुजारिश करता हूँ और आप गुजरात में थे आपने कितने मुसलमानों को मारा क्या यह शिष्ट जबान है?
जब आपने शायद लिखना शुरु नहीं किया था तब इस तरह के सवाल भी पूछे गये थे तब भी नारद ने कोई एक्शन नहीं लिया था।

@ रवि भाइ साहब
अगर शाह आलम की रुहें कहानी सत्य है तो आप ऐसा कैसे मान सकते हैं कि अजगर के नाम से प्रकाशित हुई कहानी घटिया है? वह भी उतनी ही सत्य घटना हो सकती है जितनी शाह आलम की रूहें है। बस यही कारण है कि एक बहुत बड़े लेखक ने लिखी है और एक नये नवेले ने?

जगदीश भाटिया

आपने बहुत ही सही विश्लेषन किया है।
वाकई पुराने चिट्ठाकारों के लिये नारद की उपयोगिता केवल नयी पोस्ट की सूचना देने तक रह जाती है मगर जो लोग शुरूसे नारद के साथ जुड़े हैं उन्हें नारद की फजीहत होते देख दुख होता है।
आज अगर किसी की पोस्ट नारद पर दो घंटे के लिये देर से आती है तो हो हल्ला मचाने लगता है।
कल्पना कीजिये यदि नारद आठ दस दिन के लिये बंद हो जाये तो क्या हो?

भाई संजय नाराज क्यों होते हैं। मैंने कहीं कहा कि दिल सिर्फ मेरे पास है, बाकि बेदिल हैं। आपने दुरूस्त कहा कि तकलीफ सबको होती है। यही बात तो मैं भी रवि भाई से कह रहा था... पूरा शाह आलम कैम्प पढ्ने के बाद भी किसी के दिल को चोट लगे तब क्या होगा... हो सकता है आप पूरा पढें तो न लगे... पर...क्या असगर वजाहत को ऐसा लिखना चाहिए था...जिससे किसी को चोट पहुँचे... क्या उन्हें लिखने और नेट पर डालने से सौहाद्र नहीं बिगडेगा... असगर साहब या कोई ऐसा क्यूं लिखता है कि दूसरों का दिल दुखे... ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाये ये सुझाव दीजिये।
... ऐसे एक जानकारी बांटना चाहता हूँ... आपने अपने ब्लॉग पर जो क्ल्कि कमेंट लगाया है, वह अब हिनदुस्तानी में हो गया है। पता कीजियेगा किसने किया है। हालांकि पता चल जाये तो हटा मत लीजियेगा।

पिछ्ले कुछ दिनो से चल रही इस बहस मे लोग हर प्रकार के नजरिये रख रहे है। सार यह है कि नारद सही है । मेरा मानना है कि जहां तक कार्यवाही का सवाल है, यह नारद पर निर्भर करता है कि वह एक छोटा समूह बनना चाहता है या फ़िर एक वैश्विक मंच।
यदि एक वैश्विक मंच बनना चाहता है तो इस प्रकार की कार्यवाही नही होनी चाहिये।
रतलामी जी के इस लेख ने यह भी सिध्ध कर दिया कि यह कदम किस प्रकार से बेमानी है।
खैर जैसा मैने एक और टिप्पणी मे भी कहा था कि सवाल सही और गलत का नही पर नारद की सोच का है ।

आपका नजरीया बिल्कुल तार्किक है जो ज्यादा व्याख्यात्मक रुप में नजर आ रहा है…मेरा मानना है की आने बाले वक्त में काफी संख्या में लोग इस हिंदी मुहीम से जुड़ेगें तब तो समस्या और मुंह और जोड़दार तरीके से सामने उठेगें।

सही और अच्छा लिखा है।

रवी जी आप ठीक फरमाते हैं।
मुझे यह भी लगता है कि बहुत से चिट्टाकार बन्धु फीड एग्रेगेटर की भूमिका नहीं समझ पाते हैं। नारद, या हिन्दी बलॉग डॉट कॉम या हिन्दी चिट्ठे एवं पाडकास्ट न किसी की स्वतंत्रता छीन सकते हैं न ही छीनते हैं। वे केवल आपको हटा सकते हैं। हटाने का अर्थ यह नहीं है कि उस चिट्ठे की स्वतंत्रता समाप्त हो गयी। वह चिट्टाकार लिखने के लिये स्वतंत्र है।
मेरा एक चिट्टा लेख है। जहां तक मैं समझता हूं यह किसी भी यह किसी भी फीड एग्रगेटर में नहीं आता, कम से कम नारद में नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि किसी ने मेरी स्वतंत्रता छीन ली है। इस पर लोग वीकिपीडिया या फिर सर्च करके और अब कुछ कैफे हिन्दी से आते हैं। इस की प्रत्येक चिट्ठी ११० बार से ज्यादा बार पढ़ी गयी है। मेरा उन्मुक्त चिट्ठा, इन तीनो फीड एग्रेगेटर पर आता है फिर भी इसकी प्रत्येक चिट्ठी ९० से कम बार पढ़ गयी है। यानि कि जो कहीं नहीं आता है उसकी चिट्ठियां ज्यादा बार पढ़ी गयी हैं और जो आता है वह कम बार पढ़ गयी।
यह तीनो व्यक्तिगत फीड एग्रेगेटर हैं इनके बनाने वालों के अपने सपने हैं वे उसे पूरा करने के लिये स्वतंत्र हैं यदि आप उनके सपनो में नहीं आते तो कोई जरूरी नहीं कि वे आपको अपने साथ रखें। यदि किसी को अपने सपने पूरे करने हैं तो उसे अपने बल बूते पर करना चाहिये न कि किसी फीड एग्रेगेटर के कन्धे पर। यदि आप अच्छा लिखेंगे तो कोई शक नहीं कि लोग आपके पास आयेंगे तब सारे फीड एग्रेगेटर आपको स्वयं रखने के लिये आगे आयेंगे। यदि आप कूड़ा लिखेंगे तो चाहे आप सारे फीड एग्रेगेटर पर आयें, आपको कोई नहीं पढ़ेगा।

नसीर साहब क्लिक कोमेंट का हिन्दी (आपकी हिन्दुस्तीनी) संस्करण लगाने से पूर्व ही पता था की किसने भाषांतर किया है. हम नेट पर हिन्दी की हलचल पर नजर रखते है.

रविशंकर जी; आपकी निगाह में एक ब्लाग एग्रीगेटर में क्या क्या खूबियां होनी चाहिये? आपकी चाहत का ब्लाग एग्रीगेटर कैसा हो, क्या कभी इस पर भी एक पोस्ट लिखेंगे?

मैथिली जी,
जी हाँ जरूर. शीघ्र ही. :)

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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