पुस्तक चर्चा का उद् घाटन चुंबनों से...


चुंबन ही चुंबन, ढेर सारे चुंबन...



पुस्तक चर्चा का खयाल जब तक मूर्त रुप लेगा, चलिए इसकी शुरूआत इस चिट्ठा-प्रविष्टि से कर डालते हैं. वैसे, मैंने पहले भी एक दो पुस्तकों के बारे में लिखा था जिसे अपने ज्ञानवर्धन के लिए, और दुनिया को बेहतर तरीके से समझने के लिए, मेरे विचार में हर व्यक्ति को पढ़ना ही चाहिए.

कोई बीस साल पहले मैंने एक किताब खरीदी थी. तब मेरी मासिक आय थी छः सौ रुपए (तब मैं विद्युत मंडल में प्रशिक्षु के रूप में कार्यरत था), और किताब की कीमत थी - एक सौ पचहत्तर रुपए. किताब स्थानीय बाजार में उपलब्ध नहीं थी और मुम्बई की किताब दुकान ‘बुक चैनल' के जरिए पंजीकृत डाक से ही मंगाई जा सकती थी. अतिरिक्त खर्च था - पच्चीस रुपए. यानी की मेरी मासिक आय का एक तिहाई हिस्सा इस पुस्तक पर खर्च होना था.

परंतु मैंने दूसरी बार कोई विचार किए बिना ही उस पुस्तक को अग्रिम राशि भेजकर मंगवाया था.

वैसे तो आज भी मैं किताबों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में अपनी आय का अच्छा खासा हिस्सा खर्च करता हूँ, मगर वह किसी सूरत एक तिहाई नहीं होता, और सिर्फ एक किताब के लिए तो कतई नहीं. मैं सोचता हूँ कि उस वक्त उस एक किताब के लिए अपनी आय का एक तिहाई हिस्सा खरीदने के लिए लगा दिया था तो मैंने क्या कोई गलती की थी?

शायद नहीं. वह लाजवाब किताब अमूल्य है. पारखियों के लिए वैसे तो हर किताब अपने हिसाब से अमूल्य होता है. और अगर परख नहीं है तो किताबें रद्दी के भाव भी चले जाते हैं, और उनके पन्ने पान-गुटखों के पुड़िया बांधने के काम आते हैं.

आप पूछेंगे कि ऐसी लाजवाब पुस्तक आखिर है कौन सी?

वह पुस्तक आज भी मेरे पास है.

पुस्तक का नाम है - लाट्स ऑव किसेज़.

यह पुस्तक वस्तुतः चित्रों व कलाकृतियों का एल्बम है जिसमें ‘चुंबन' विषय पर 39 कलाकृतियाँ हैं. लिज़ा टटल द्वारा दो पृष्ठों का प्राक्कथन - चुंबन की महत्ता पर - पुस्तक के प्रारंभ में है. शेष किताब में विश्व के माने हुए कलाकारों की कलाकृतियाँ हैं - सभी एक से बढ़कर एक. प्रत्येक कलाकृति हजार पृष्ठों की भावनाएँ बयान करती है. इस हिसाब से उनतालीस कलाकृतियाँ उनतालीस हजार पृष्ठों की किताब तैयार करती है. इतने पृष्ठों की पुस्तक आज कोई भी अपने पूरे मासिक आय पर भी लेना चाहेगा! और, मैंने तो सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही खरचे थे.

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यूँ तो पुस्तक में चुंबन के तमाम कल्पनातीत भावों को उकेरे गए चित्र हैं, परंतु कुछ चित्र तो अपने आप में संपूर्ण और लाजवाब हैं - जैसे कि, फर्स्ट किस (प्रथम चुंबन), रिलक्टेंट किस (अनिच्छुक चुंबन), ऍरॉटिक किस (रत्यात्मक चुंबन), लांग डिस्टैंस किस (दूर चुंबन), सन किस्ड (सूर्य चुंबन), वेट किस (गीला चुंबन) इत्यादि.


पुस्तक की प्रस्तावना में लीज़ा लिखती हैं - चुंबनों के बिना भला कौन इस विश्व की कल्पना करेगा? प्यार रहस्यमयी होता है, और चुंबन वास्तविक. प्यार भौतिक सुख सुविधाओं के बगैर जिंदा रह सकता है, परंतु चुंबनों के बगैर नहीं. और, चुंबनों को तो सर्वकालिक शानदार सौदा कहा जा सकता है - हर कोई इसे लेना व देना चाहता है! अतः इन्हें विपुल मात्रा में दीजिए और फिर आश्चर्यचकित मत होइए जब वे सारे के सारे आपको वापस मिल जाएँ!

आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस किताब को खरीदकर किसे मैंने भेंट दिया था!

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पुस्तक - लाट्स ऑव किसेज़
उच्च गुणवत्ता के ऑर्ट पेपर पर 80 पृष्ठ
आज की कीमत - पता नहीं (1984 की कीमत 4.95 पौंड)
आईएसबीएन नं. 0 905895894
प्रकाशक - पेपर टाइगर, ड्रेगन्स वर्ल्ड लि, ग्रेट ब्रिटेन. प्रथम संस्करण - 1984
टीप - पाठकों की मांग पर चिट्ठे का रुप रंग संवारा गया है. अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें.
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आपके चिठ्ठे पर किताब-चर्चा की शुरुआत देखकर अच्छा लगा.आप इसे विकिपीडिया पर भी डालिये.चिठ्ठे में बदलाव आकर्षक हैं.बधाई.

काफी खुबसूरत बदलाव दिखे आपके चिट्ठे पर. पुस्तक चर्चा भी बहुत रोचक है.

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चिट्ठे का नया रूप और चर्चा विषय दोनो सुन्दर हैं

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