टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

लाभकारी अश्लीलता..

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अश्लीलता का लाभांश - भाग 2

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पूर्व में आपने पढ़ा कि किस तरह मेन स्ट्रीम की मीडिया चाहे वह टेलिविजन हो या अख़बार-पत्रिकाएँ - अपने प्रसार और टीआरपी रेटिंग के लिए अश्लीलता का खंभा ऐन केन प्रकारेण थामे ही रखती हैं.

क्या कला जगत् इससे अछूता है?

मुम्बई में पिछले दिनों एक कला प्रदर्शनी लगाई गई जिसका तो नाम ही अश्लील था - टिट्स एन क्लिट्स एन एलीफ़ेंट्स डिक. प्रदर्शनी में उत्थित लिंगों के विविध स्वरूपों के कल्पनीय-अकल्पनीय कला स्वरूपों की नुमाइशें थीं. वैसे, कोकाकोला की तिरछी रखी, अस्सी अंश कोण बनाती बोतल से कला के जिस स्वरूप का आभास दिलाया जा रहा था वह किसी पेय के कर्वी बोतल की मार्केंटिग स्ट्रेटेजी से भिन्न कतई नहीं था.

कला ऐसी होनी चाहिए?








फ़वद तमकंत की पेंटिंग - स्ट्रीट कल्चर का विज्ञापन

आर्ट इंडिया का ताज़ा अंक (वॉल्यूमXI, संस्करण II, तिमाही II) भी चिल्ला चिल्ला कर इसी धारणा को सत्यापित करता दीखता है.

इसके भीतर के पृष्ठों में स्थापित, स्थापित होने के लिए संघर्षशील और नौसिखिए - तमाम किस्म के कलाकारों की तमाम तरह की कलाकृतियाँ हैं. कुछ कलाकृतियों को आर्ट गैलरी के विज्ञापनों में उद्धृत किया गया है तो कुछ कलाकृतियों को कलाकारों व कला समीक्षा हेतु उद्धृत किया गया है. पत्रिका में प्रकाशित अधिकांश कलाकृतियों को एक सामान्य-सी नज़र में देखकर ही अश्लील करार दिया जा सकता है. निश्चित रूप से इस तरह की तथाकथित कलाकृतियाँ अभिजात्य वर्ग में खासी पसंद की जा रही हैं और ये मुँह मांगे दामों में खरीदे बेचे जा रहे हैं. तभी तो ऐसी कलाकृतियों की बाढ़ सी आई हुई है और प्रदर्शनियाँ भी लग रही हैं जिनका नाम ही टिट्स एन क्लिट्स एन डिक्स से प्रारंभ होता है.

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या कला ऐसी होनी चाहिए?










के.जी.सुब्रमण्यन की पेंटिंग की समीक्षा

यूं तो नग्न आदमी/औरत का मॉडल के रूप में व्यक्ति चित्र बनाना चित्रकला संकाय के विद्यार्थियों के प्रथम असाइनमेंट में ही सम्मिलित होता है. इसके बगैर उसका व्यक्ति चित्रण का कॉसेप्ट ही साफ नहीं होता. मगर इसका अर्थ यह नहीं कि वह सिर्फ नग्नता ही चित्रित करता फिरे. विख्यात चित्रकार अंजली इला मेनन ने कभी अपनी सालगिरह पर ऐसा केक काटा था जो स्तन के आकार का था, तो उस वक्त इस धमाकेदार खबर को पृष्ठ-3 पर और कला जगत् में बढ़िया, लाभप्रद प्रतिक्रियाएँ मिलीं. संभवतः इस केक ने अंजली की कला के और कलाकृतियों के मूल्यों में और इजाफ़ा किया हो.

या फिर कला ऐसी हो-








जोगेन चौधरी की पेंटिंग - कपल

समकालीन कलाकारों को लगता है अश्लीलता चित्रण रास आने लगा है. नए खरीदार नए बाजार पैदा हो गए हैं - तभी तो धड़ल्ले से ऐसी कलाकृतियाँ बनने बिकने लगी हैं. अश्लीलता में कला निश्चित रूप से नया प्रयोग है, जो लगता है कि सबको रास आ रहा है.

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कलाकार को अपना पेट भी भरना हैं और जितना मिलता हैं वह भूख को और बढ़ा देता हैं. सारा दोष अतृप्ति का हैं. खरिददार को आँखे तृप्त करनी हैं तो कलाकार को पेट.

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