नुक्ता चीनी कादम्बिनी नवंबर 04 अंक में अवतरित

बधाईयाँ. अंततः प्रिंट मीडिया में भी अपने हिंदी ब्लॉग (ब्लांग? जैसा कि छपा है, पर

उम्मीद है यह प्रूफ़ की गलती है - क्यों गौरी पालीवाल जी?) की चर्चा हो रही है.कादम्बिनी

के नवंबर 04 अंक में नुक्ता-चीनी, अभिव्यक्ति तथा प्रतीक-पुनीत के हिंदी ब्लॉग की चर्चा रही. आइए,

उम्मीद करें कि एक दिन हमारे हिंदी ब्लॉग प्रिंट मीडिया से ज़्यादा पढ़े जाएँगे.

निम्न ग़ज़ल उसी पत्रिका की समस्या 'मुस्कराओ' की पूर्ति है.

*****
ग़ज़ल
***

बात तो तब है जब दर्द में मुस्कराओ
चाहे चीत्कारो भीतर बाहर मुस्कराओ

नायाब दोस्तों की ये फ़ितरत है नई
भोंक के खंजर वो कहते हैं मुस्कराओ

सियासती चालों ने मजबूर किया है
बिसूरती हालातों में तुम मुस्कराओ

गुजरनी है ज़िंदगी जब आँसुओं में
हिचकियों के बीच तनिक मुस्कराओ

सीख लो जमाने से कुछ आदतें रवि
पर-पीड़ा में तुम भी तो मुस्कराओ
विषय:

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That's agreat news Ravi. Having grown up on diet of Kadambini, Navneet, Sarita, Mukta, Parag, Indrajal comics I fondly remeber this literary/cultural magazine though not following it lately. Would try and get it of the stands, I hope I get it at Pune.

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