व्यंग्य जुगलबंदी - 86 : व्यंग्यकार के मन के भीतर का आंधी-तूफ़ान

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एक व्यंग्यकार जब काग़ज़-कलम लेकर बैठता है – सॉरी, कंप्यूटर कुंजीपट लेकर बैठता है (आजकल कौन निगोड़ा काग़ज़ कलम लेकर बैठता है? और, यदि बैठता भी होगा तो बताता नहीं, और, थोड़ा अत्याधुनिक किस्म का हो तो वो माइक्रोफ़ोन लेकर बैठता है – एलेक्सा और गूगल असिस्टेंट जैसे एआई के जमाने में उंगलियाँ तोड़ने का क्या काम?) तो और लेखकों की तरह, उसके भी मन में विचारों के आंधी तूफ़ान चलते हैं. मगर थोड़े भिन्न किस्म के.

आप पूछेंगे कि कैसे? भिन्न कैसे?

तो भइए, ऐसे –

एक व्यंग्यकार कोई विषय उठाता है – जैसे कि यह “आँधी – तूफ़ान”, तो सबसे पहले वो ये देखता है कि इसमें व्यवस्था का प्रश्न कितना है, किधर से है, जिसे उठाया जा सके, हाईलाइट किया जा सके, उभारा जा सके, छीछालेदर किया जा सके. क्योंकि व्यवस्था का विरोध ही व्यंग्य है. सरोकारी व्यंग्य की पहली शर्त है व्यवस्था का विरोध. यदि उसे इसमें व्यवस्था का प्रश्न नहीं दिखता है तो वो कहीं न कहीं खींच खांच कर लाता है. नहीं ला पाता है तो संबंध दिखाता है, संबंध भी नहीं ला पाता है तो विषयांतर करते हुए व्यवस्था की सूरत सीरत दिखाता है. कुल मिलाकर व्यवस्था तो आनी ही है, नहीं तो व्यंग्य किस काम का?

फिर वो सोचता है कि किस एंगल से लिखे. विरोध के भी कई एंगल होते हैं. नरम, मध्यम, तीव्र आदि आदि. फिर वो सोचता है कि जिस एंगल से वो लिखेगा, उस एंगल से कितने लोग और लिख रहे होंगे. आखिर, मौलिकता भी कोई चीज होती है. वैसे भी इधर कुछ समय से मार्केट में व्यंग्यकारों की फौज आई हुई है. कोई विषय इधर गिरता नहीं है और उधर उठ जाता है. उठाने वाले मुंहबाए तैयार खड़े रहते हैं, और कई कई तो जितने में यह व्यंग्यकार सोचता है, उतने में अगला चार व्यंग्य ठोंक कर पाँचवाँ लिखता होता है. आजकल एक ट्रैंड और चला है – लोग विषय को हलक में से डालकर निकाल ले रहे हैं. जहाँ विषय नहीं है, वहाँ से भी निकाल ले रहे हैं. यह भी बड़ा व्यंग्य है कि नॉन ईश्यूज़ भी व्यंग्य, बल्कि तीखे व्यंग्य के कारक बन रहे हैं, और इधर जनता है कि मजे ले रही है.

आखिर में जैसे तैसे, जब वो लिख लेता है तो उसे फिर-फिर कई मर्तबा संपादित करता है, सजाता संवारता है. इस बीच वो सोचता है कि व्यंग्य के बाज़ार में जान की बाजी लगा रहे दीगर दूसरे व्यंग्यकारों की इस पर क्या, कैसी प्रतिक्रिया होगी. कई कई बार, इसीलिए, लिखा गया प्रखर किस्म का व्यंग्य जनता के सामने नहीं आ पाता कि दूसरे, साथी व्यंग्यकार क्या कहेंगे? क्या इसे व्यंग्य मानेंगे या बस कूड़ा कह देंगे? यदि किसी व्यंग्यकार के कंप्यूटर का हार्डडिस्क चैक किया जाए तो जितना तो वो छपा होगा, शर्तिया, उससे कई गुना उसने बिना छपा लिख रखा होगा. अब आप भले ही कह लें कि इंटरनेट और सोशल मीडिया ने स्व-प्रकाशन को नए आयाम दिए हैं!

जैसे तैसे व्यंग्यकार अपने ताज़ा लिखे व्यंग्य को सजा-संवार कर सोशल मीडिया पर टांगता है, उसके मन में दूसरे तरीके के, नए, तेज आंधी तूफ़ान चलने लगते हैं. कितने लोगों ने पढ़ा, कितने लोगों ने लाइक किया, कितने लोगों ने साझा किया, कितने लोगों ने बिना पढ़े अच्छी प्रतिक्रिया दी, और कितने लोगों ने बिना पढ़े लेख की छीछालेदर कर दी. इन्हीं आंधी तूफ़ानों के बीच वो दूसरे साथी व्यंग्यकारों के दीवारों पर टहलने लगता है और उसके मन के आंधी तूफ़ानों की दशा फिर से बदलने लगती है. कहीं इसी विषय पर किसी दूसरे का लिखा देखता है तो मन में बवंडर उठता है और विचारों की बारिश होती है – क्या कूड़ा लिखा है साला! मैंने तो अपने आलेख में क्या जबरदस्त मौलिक आयाम उठाए हैं. इसने तो विषय का सत्यानाश ही मार दिया. न भाषा है न शैली.

व्यंग्यकार इधर ठीक से टहल भी नहीं पाता कि नया, सरोकारी, सामाजिक-राजनीतिक चिंता का ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश होता है. उसके मन में विचारों का आंधी तूफ़ान नया करवट लेता है और वो फिर से अपने उस सृजन साइकल को जीने के लिए कंप्यूटर कीबोर्ड की तरफ दौड़ लगा देता है.

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