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व्यंग्य जुगलबंदी - हमारा बसंत

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हमारा वसंत यूं तो यह ऋतुओं का राजा कहलाता है, परंतु किसलिए, यह बहुतों को पता नहीं. और, यह कब आता है और कब जाता है यह भी बहुतों को पता नही...


हमारा वसंत

यूं तो यह ऋतुओं का राजा कहलाता है, परंतु किसलिए, यह बहुतों को पता नहीं. और, यह कब आता है और कब जाता है यह भी बहुतों को पता नहीं.  बहुत से अधिकारी-नेता किस्म के लोगों के लिए यह ऋतुओं में निकृष्ट है - यह किसी किस्म       के स्कीम  की संभावना लेकर ही नहीं आता है। इसके आने व जाने के बारे में मौसम विभाग की अपेक्षा कवियों लेखकों को अधिक सटीकता से पता रहता है. बहुधा मौसम विभाग फेल हो जाता है, परंतु प्रेम कविता रचने वाला दूर कहीं नामालूम सी क्षीण आवाज में कोयल के कूक की कल्पना कर घोषणा कर देता है कि वसंत आ गया है।

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अब देखिए न, जब वर्षा का मौसम आता है तो वो भयंकर गर्मी के बाद, तेज आंधी तूफानों के साथ आता है. और जब आता है तो सर्वत्र कीचड़ ले आता है. अब ये बात अलग है कि बहुत से लोग कीचड़, अधिक कीचड़ की कामना करते हैं ताकि वे अपने-अपने कमल खिला सकें. अरे बाबा, जितना अधिक पानी गिरेंगा उतना ही अधिक कीचड़ होएंगा और सड़कों में उतना ही अधिक गड्ढा होएंगा। तो उसे रिपेयर करने का उतना ही तगड़ा एस्टीमेट बनेंगा और उतना ही मोटा टेंडर निकलेंगा। देश में एक ही काम बिलकुल समय पे, चाक चौबंद तरीके से होता है। टेंडर निकालने का काम।


फिर कहीं अतिवृष्टि होती है तो कहीं अल्पवृष्टि। दोनों ही में ही टेंडरिया देश के लिए शासकीय राहत की स्कीमों और योजनाओं के रूप में ढेरों संभावनाएं आती हैं। लगता है कि आजकल इन्द्र देवता भी केवल और केवल अधिकारियों और नेताओं की प्रार्थना सुनते हैं और हर साल, अधिक, और अधिक संभावनाएं लेकर आते हैं। वैसे, होशियार लोगों के लिए संभावनाएं तो रेत में भी तेल की सूरत में निकल आती हैं। जल जनित बीमारियों और महामारियों से सृजित अन्य, पूरित संभावनाएं अलग हैं।


इधर गर्मी भी जब आती है तो सबको जलाते भुनाते ही जाती है। और इस कदर जलाते भुनाते जाती है कि पिछली बरसात में अतिवृष्टि से पीड़ित देश एक-एक बूँद जल के लिए तरसता और त्राहिमाम् करता है। यह चक्र अनंत काल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा। और, इन्द्र देवता की तरह सूर्य देव भी केवल और केवल नेता-अधिकारियों की प्रार्थना सुनकर गहन आग बरसाते हैं और अधिकाधिक बोरवेल और तालाब-सृजन-गहरीकरण के टेंडर की संभावनाएं पैदा करते हैं। लू और डिहाइड्रेशन संबंधित संभावनाएं तो खैर सदा साथ आनी ही हैं।


सर्दी का मौसम तो और भी, उच्च स्तरीय संभावनाओं को साथ लाता है। बरफ बारी होती है कश्मीर में तो शीत लहर चलती है चेन्नई में। और फिर टेंडरिया देश स्वाइन, एवियन फ्लू से लेकर फसलों में पाला पड़ने आदि आपदाओं का शिकार हो जाता है जिसका बेसब्री से इंतजार देश के नेता-बाबू कर रहे होते हैं। जितना जियादा ठंड उतना ही विविध, बड़ा टेंडर और राहत राशि। उतने ही बड़े अपने-अपने परसेंटेज की कटिंग। और, सहृदय, उदार ठंड का देवता ग्लोबल वार्मिंग के बावजूद हर साल नेताओं-बाबुओं की प्रार्थनाओं को ही तरजीह देता है।


अब जरा बताइए कि बसंत आता है तो क्या लाता है? संभावनाओं के नाम पर शून्य और खाली हाथ। न गहन गरमी, न सरदी और न ही जल प्लावन। बसंत का देवता तो राक्षसी प्रवृत्ति का है जो संभावना शून्य समय और मौसम लाता है। और जब तक कोई जला हुआ परवाना फेसबुक पर अपनी गहन गंभीर तड़प से लबरेज प्रेम कविता से स्टेटस अपडेट नहीं करता है, दुनिया को हवा ही नहीं लगती है कि बसंत आया भी है। और, यदि आप वो स्टेटस अपडेट देखने से चूक जाते हैं तो समझिए कि आप उस बरस बसंत से भी चूक जाते हैं।


मैं पिछले कई सालों से बसंत के मौसम से चूकता आ रहा हूँ। क्या कोई बताएगा कि अबके बसंत कब आएगा-जाएगा? आएगा भी या नहीं? कुछ नहीं तो सोशल मीडिया में सद्य: प्रकाशित प्रेम कविता की लिंक ही दे दें। शायद वहां से बसंत का पता चल जाए!

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छींटे और बौछारें: व्यंग्य जुगलबंदी - हमारा बसंत
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