व्यंग्य जुगलबंदी - नया साल नए सवाल

व्यंग्य, व्यंग्य जुगलबंदी, जुगलबंदी



नया साल, हर साल आता है. कुछ के लिए साल में कई कई बार आता है. और बहुतों के लिए कभी नहीं आता. पर, जब भी नया साल आता है, हर बार नए सवालों के साथ आता है. इस दफा भी नया साल कई कई नए नए सवालों के साथ आया है. एक सवाल तो इस बार ऐसा आया है जिसे साल भर, और आने वाले कई सालों तक, हर भारतीय बारंबार पूछेगा, दोहराएगा, अपने दैनंदिनी जीवन का हिस्सा बनाएगा. यही नहीं, बाकायदा 22 राजभाषाओं सहित तमाम अपनी स्थानीय सैकड़ों बोलियों में भी यही सवाल पूछेगा – दो हजार के छुट्टे हैं क्या?

यह साल सबके लिए कैशलेस आया है. क्या अमीर क्या गरीब. सब कैशलेस. कोई पहले से था, कोई अब हो गया. खुदा ख़ैर करे, बाकी के बचे खुचे प्लास्टिक मनी और मोबाइल ऐप्प से कैशलेस होने वाले हैं. तो, इस साल कैशलेस लोगों के सामने एक बड़ा सवाल होगा – लोग पूरे एटीट्यूड के साथ पूछेगे - कौन सा कार्ड, कौन सा ऐप्प यूज़ करें. यूज़ करें का प्रयोग कर पूछने में जो एटीट्यूड दिखता है वो उपयोग करें या प्रयोग करें में नहीं है.

हाँ, तो इस नए साल में लोग एक दूसरे से सवाल पूछेंगे – हाँ, हाँ, तू-तड़ाक में ही – अबे, तू पेमेंट के लिए कौन सा ऐप्प यूज़ करता है बे? भैं* पेटम तो चीनी है, भारत को लूटता है और चीन में खजाना भरता है. अब यहाँ भरपूर मात्रा में गालियाँ हैं, हर वाक्य में गालियाँ हैं और कुछ गंभीर किस्म की गालियों को बीप भी किया गया है. एक जागरूक पाठक के रूप में आपके मन में भी सवाल उठ रहा होगा कि ऐसा क्यों? तो भइए, आजकल तथाकथित अच्छे, स्थापित व्यंग्य में गाली होना बहुत जरूरी है, नहीं तो खांचे का सवाल उठ जाता है. पर, फिर, पूरे दम खम से स्पष्ट, बिना बीप की गाली लिखने के लिए दम भी तो चाहिए! इसीलिए, मेरे समेत, बहुतों के व्यंग्य में, कितना ही प्रयास कर लें, दम ही नहीं आ पाता.

बहरहाल, सवाल कैशलेस देश में कैशलेस जनता के पेमेंट ऐप्प के उपयोग का हो रहा था. कुकुरमुत्ते की तरह रिलीज हो गए पेमेंट ऐप्प में से सही ऐप्प चुनने का सवाल अच्छे-अच्छों खाँ को इस साल विचलित और विगलित करता रहेगा. क्योंकि राष्ट्रवादियों की तलवार सर पे लटकी रहेगी. अबे तू अपने स्मार्टफ़ोन में चीनी पेटम का यूज़ करता है? भीम का उपयोग कर भीम का! और फिर तलवारें लहराई जाएंगी, जुलूस निकाले जाएंगे. अब ये बात जुदा है कि सारा मजमा चीनी स्मार्टफ़ोनों के जरिए ही होगा.

हर नया साल नई-नई टेक्नोलॉज़ी को लेकर आता है. और हर नई टेक्नोलॉज़ी के साथ ढेर सारे नए सवाल जुड़े होते हैं. इधर को नए साल के आग़ाज के कुछ पहले 4जी और जियो आया है. और धूम-धड़ाके से नया सवाल लाया है – अबे! (अच्छे व्यंग्य के लिए ज़रूरी गालियों पर कृपया ग़ौर करें,) तेरा जियो सिग्नल ठीक आ रहा है क्या? अबे, जियो सिग्नल बढ़ाने के लिए क्या सेटिंग है? अबे, जियो तो इधर चल ही नहीं रहा, तेरे इधर क्या हाल है? इसी तरह के जियो-यक्ष प्रश्न से भारत की अधिकांश जनता रूबरू होती रहेगी – कम से कम, साल की पहली तिमाही यानी मार्च तक तो.

कुछ शाश्वत-से सवाल इस नए साल में भी उठेंगे, सदा सर्वदा से ज्वलंत सवाल, इस साल भी दागे जाएंगे. मगर वे सबको एकदम नए-नवेले से ही लगेंगे. जैसे कि, इस तथाकथित व्यंग्य टुकड़े पर, व्यंग्यात्मक लहज़े में ये सवाल उठेगा – ये व्यंग्य है? क्या यही व्यंग्य है? हज़ल तो सुना था, पर, ये व्यंज़ल क्या होता है? जुगलबंदी जैसे नाटकबाजी से कभी व्यंग्य का भला हो सकता है भला? चुटकुलेबाजी, जुमलेबाजी और तमाम बाजी से व्यंग्य का कोई रिश्ता है भला? एक-लाइना – ओह नहीं, अंडरस्टैंडिंग में प्रॉब्लम हो सकती है – वन लाइनर भी कोई व्यंग्य होता है भला? आदि-आदि.

सवालों की सूची अंतहीन है. परंतु सवाल ये है कि यदि मैंने इन सबको सूचीबद्ध कर भी लिया तो क्या किसी कंप्यूटर नेटवर्क में इतनी कैपेसिटी है कि वो उसे अबाधित अपलोड कर ले, और, सबसे बड़ी बात, आपमें इतना दम है कि आप इसे पूरा पढ़ भी पाएं?
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व्यंज़ल 

नया साल है नए सवाल हैं
क्योंकर नहीं नए खयाल हैं
.
मसले पहले भी कम नहीं थे
और आ गए नए बवाल हैं
.
सियासत में तो नए खयाल
बासी कढ़ी में नए उबाल हैं
.
बातें तो सुन लो उनकी जो
हुए अभी नए नए हलाल हैं
.
राजनीति में अंततः आए रवि
अब वो देश के नए दलाल हैं
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छींटे और बौछारें: व्यंग्य जुगलबंदी - नया साल नए सवाल
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