नक़ली नोट – तेरी महिमा अपरम्पार!

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महीने की पहली तारीख़ को जैसे ही मैंने अपनी पत्नी के हाथ में अपनी तनख्वाह के हजार हजार के नए-नए करारे नोट रखे, उसने उन नोटों को आगे-पीछे स...

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महीने की पहली तारीख़ को जैसे ही मैंने अपनी पत्नी के हाथ में अपनी तनख्वाह के हजार हजार के नए-नए करारे नोट रखे, उसने उन नोटों को आगे-पीछे से और रौशनी में ले जाकर इस तरह से जाँचा परखा कि गोया मैं कोई नक़ली नोट छापने वाला क्रिमिनल होऊँ, और उसके हाथ में नक़ली नोटों का बंडल थमा रहा होऊँ.

मेरे चेहरे पर उभर आए अप्रसन्नता के भावों को वह ताड़ गई. पत्नियाँ वैसे भी ताड़ने में माहिर होती हैं जैसे कि पड़ोसिन ने आज नई साड़ी पहनी है तो क्यों और नहीं पहनी है तो क्यों. य़ा फिर पतिदेव आज नीला सूट पहन कर ऑफ़िस जा रहे हैं तो क्यों, और लाल सूट पहन कर नहीं जा रहे हैं तो क्यों. बहरहाल, चूंकि उसके हाथों में मेरी महीने भर की कमाई थी, तो उसने मिश्री-घुली आवाज में स्पष्टीकरण दिया – तुम्हारा क्या, जो सामने वाले ने पकड़ाया ले के चले आते हो – बाजार से सड़ी धनिया पत्ती की तरह. क्या पता इनमें से कोई नक़ली नोट हो? अख़बार में आए दिन नक़ली नोटों की खबरें छपती रहती हैं. उसके कहे गहरे अर्थ वाले भावों को मैं समझ गया था – शायद वो कम से कम एक मामले में तो सही कह रही थी - काश विवाह के समय मैं कुछ देख-दाख लिया होता!

मैंने पूछना चाहा कि मैं कब ऐसे नक़ली नोट ले के आ गया था जो मुझे संदेहास्पद समझा जा रहा है. मगर मैं चुप कर गया. वैसे भी एक सफल पति को अधिकतर मामलों में चुप लगा जाना चाहिए. और, पत्नी ही क्या, आप अपने अजीज, लंगोटिया दोस्त को हजार रुपए टिका कर देखें कि भइए, जरा छुट्टा देना तो. वो उस नोट को यूँ एक्जामिन करेगा जैसे कि वास्तव में दुनिया का वही एक अकेला नक़ली नोट है, और उसे उसका बेहद अजीज दोस्त टिका रहा है, फंसा रहा है. आप शर्म से पानी पानी हो जाएंगे ये सोच कर कि साला देखो, दोस्ती का दम भरता है, औक़ात एक हजार की नहीं. नोट को नक़ली समझ कर मुआयना कर रहा है. क्या मैं उसे नक़ली नोट टिकाऊंगा? और यदि टिका भी दिया तो क्या दोस्ती के इतने माने भी नहीं?

अभी पिछले दिनों बिजली विभाग के दफ़्तर में बिल जमा कराने पहुँचा. बिजली वैसे तो यूँ रहती नहीं, मगर बिल बाकायदा बिला नागा चला आता है और हर बार बढ़-चढ़कर. कभी कभी तो लगता है कि महंगाई बिजली के बिल पर ज्यादा, दो-गुना चौ-गुना असर करती है. तो, दो हजार नौ सौ निन्यान्बे रुपए के बिल के साथ हजार हजार के तीन नोट मैंने बिजली बाबू को टिकाए तो उसने बड़ी वितृष्णा से कहा – छुट्टे नहीं हैं? वह तो एक तरह से नोटों को लेने से इंकार कर रहा था, और मुझे घूरता बैठा रहा था थोड़ी देर तक जब तक कि पीछे वाले हल्ला नहीं करने लगे कि क्या बाबू घास खाने लग गया है जो इत्ती देर हो रही है. मजबूरी में उसने मेरे हाथों से हजार के तीन नोट लिए और उनका बारीकी से मुआयना करने लगा. उसकी निगाहों में भी मैं वही वाला क्रिमिनल था जो देश में नक़ली नोट छाप-छाप कर सप्लाई करता है और जैसे कि ये तीन नोट अभी ही छापकर मैंने लाए हैं.

मैंने उससे पूछा कि साहब जी, आपके पास वो जो नक़ली नोट चेक करने की मशीन लगी है उससे चेक क्यों नहीं करते? काम जल्दी होगा और परफेक्ट होगा. तो उसने बताया कि सप्लायर और साहब की मिली भगत से नक़ली मशीन सप्लाई हो गई है और वो असली नोट को नक़ली और नक़ली को असली बताता है. इसलिए तमाम नोटों में से नक़ली को पहचानने के लिए उसे अपने इंट्यूशन (किसी भी नोट को नक़ली बता कर नहीं लेने का अधिकार) और अनुभव का सहारा लेना पड़ता है.

फिर उसने नोट पर मेरा बिजली का कनेक्शन नंबर लिखा और मेरा मोबाइल नंबर मांगा. मैंने पूछा कि भइए, बिल जमा करवाने पर मोबाइल नंबर की क्या आवश्यकता. उसने बेरूखी से कहा हजार पाँच सौ के नोट लाओगे तो मोबाइल नंबर देना पड़ेगा, नहीं तो बिल जमा नहीं होगा. यदि तमाम जाँच पड़ताल के बाद भी नोट बाद में नक़ली निकल गया तो मोबाइल के जरिए तुरंत पकड़ तो सकेंगे. मरता क्या न करता – टेलीमार्केटियरों से बचने की असफल कोशिश में अपना मोबाइल नंबर मैं बेहद सीक्रेट रखता हूँ, अपने बॉस को भी नहीं बताता, मगर यहाँ बिजली विभाग के बाबू को नोटों के असली नक़ली के चक्कर में बताना पड़ गया.

कल ही की तो बात है. पार्किंग वाले ने छुट्टे के पाँच रुपए मुझे वापस लौटाए तो देखा-देखी मैं उसे उलट पलट कर और रौशनी में वाटरमार्क की तसदीक कर उसकी असलियत पहचानने लगा. पार्किंग वाला बेसाख्ता और बेतहाशा हँसने लगा. बोला – मजाक काहे करते हो साहब. कभी कोई पाँच रुपए का नक़ली नोट निकला है क्या? मैं झेंप गया और बात को हँसकर सम्हालने की कोशिश की कि यार, आदत बनी रहे तो ठीक है नहीं तो कौन जाने हजार – पाँच सौ के नकली नोट भरोसे पे टिका जाए. फिर भाई लोग तो दो अठन्नी को फेविक्विक से चिपका कर पाँच रुपए के सिक्के के नाम पर चला देते हैं.

सरकार भी नक़ली नोटों के पीछे असफल हो रही है. उसकी नाक के नीचे लोग भारतीय करेंसी नोट छाप रहे हैं. इससे बचने को सरकार को या तो अमरीकी डालर को अपनी करेंसी बना लेनी चाहिये या फिर यूरो को. वैसे, पाकिस्तानी करेंसी को अपनाने में कोई बुराई नहीं दीखती. कश्मीर में इस करेंसी को चलाने की मांग तो दशकों से हो रही है, ऊपर से भारतीय नक़ली नोटों को पाकिस्तानी आईएसआई ही छपवा रही है ऐसी खबरें है. ऐसे में आईएसआई को मात देने का एक ही तरीका है – पाकिस्तानी करेंसी अपना ली जाए!

भारतीय नोट अपने नक़ली पन के चक्कर में रिश्ते-नातों, मित्रता, जान-पहचान तक को खतरे में डाल रहा है. आइए, इसका बहिष्कार करें. प्लास्टिक नोट अपनाएँ – अरे – वही क्रेडिट कार्ड. जब तक नोट का अपना भरोसा वापस नहीं आता है, जब तक बीवी मेरे हाथ से लिए नोट को नक़ली समझ कर देखना बंद नहीं करती, मैंने नोटों का प्रयोग बन्द कर दिया है. और क्रेडिट कार्ड अपना लिया है! आपकी अपनी आप जानें!

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छींटे और बौछारें: नक़ली नोट – तेरी महिमा अपरम्पार!
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