असहिष्णुता से भरा-पूरा मेरा एक दिन

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सुबह-सुबह मेरे असहिष्णु स्मार्टफ़ोन का उतना ही असहिष्णु अलार्म बजा. अलार्म वैसे भी सहिष्णु कभी भी कतई भी नहीं हो सकते. वैसे भी, मेरा स्मार्टफ़ोन पहले ही पूरी असहिष्णुता के साथ, पूरी रात, हर दूसरे मिनट चीख चिल्ला कर मुझे बताता-जगाता रहा था कि कोई न कोई एक वाट्सएप्पिया एक हजार एक बार फारवर्ड मारे गए सड़ियलेस्ट चुटकुले को मार्किट में नया आया है कह कर फिर से फारवर्ड मारा है. और, लाईन और हाईक और फ़ेसबुक और ट्विटर के स्टेटसों को भी उतने ही स्मार्टनेस से फौरन से पेशतर मुझ तक पहुंचाने का महान असहिष्णु कार्य करता रहा था, थोड़ा अधिक असहिष्णु होकर एकदम सटीक टाइम – पाँच बचकर साठ मिनट – जी, हाँ आपने सही ही पढ़ा, क्योंकि छः बज जाते तो स्मार्टफ़ोन की स्मार्टनेस नहीं ही रह जाती, अपना अलार्म बजा दिया. काश वह मुझ पर थोड़ा सहिष्णु हो जाता - एक दो मिनट के लिए ही सही. अगर वो थोड़ी सी सहिष्णुता दिखाकर छः बजकर दो मिनट पर अलार्म बजा देता तो कम से कम मैं दो मिनट की नींद और मार लेता. या फिर, कमबख्त मुझ पर पूरा ही सहिष्णु हो लेता और रात भर में अपनी बैटरी खतम कर ऐन अलार्म बजने के ठीक पहले बंद हो जाता तो मुझ पर कितना बड़ा उपकार होता उसका. बाद की बाद में देखी जाती, इतने असहिष्णु ढंग से यदि किसी को सुबह-सुबह उठाया जाएगा, तो उसका पूरा दिन असहिष्णुमय हो जाना तो तयशुदा है - यानी डिफ़ॉल्ट सी बात है.

मैं बाथरूम में घुसा यह सोचकर कि आज नल जरा मुझ पर कुछ सहिष्णु होगा और आज आने में थोड़ा देर करेगा. इतने में मैं फिर से एक नींद मार लूंगा. मगर वो तो और असहिष्णु निकला. निगोड़ा आज जरा ज्यादा ही फ़ोर्स से पानी उगल रहा था. मेरी प्लानिंग धरी की धरी रह गई थी.

कहना न होगा कि सुबह बिजली भी नहीं गई, नाश्ता भी टैम से मिला, शर्ट और पैंट भी समय पर प्रेस किए हुए मिल गए. यहाँ तक कि जूते पर पॉलिश भी नई थी, और उसका लैस भी तरतीब से था. आज तो सारी दुनिया मुझ पर असहिष्णु हो रही थी. जम कर. मैं ऑफ़िस जाना नहीं चाहता था, बिस्तर छोड़ना नहीं चाहता था, दो घड़ी आराम करना चाहता था, मगर जैसे कि पूरी दुनिया मेरे पीछे पड़ी थी, साजिश कर रही थी और मुझ पर जरा सी भी सहिष्णुता, नाममात्र की भी सहिष्णुता दर्शा नहीं रही थी. दिमाग में विचारों की किरण कौंधी कि ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ, कहीं और चलके मरना वहाँ! ओह, साला विचार भी सहिष्णु नहीं हो पा रहा है आज तो.

दफ़्तर जाने के लिए मैंने आज सार्वजनिक परिवहन ले लिया कि जितनी देर में दफ़्तर पहुंचेंगे उतनी देर सीट पर झपकी मार लेंगे. मगर आज तो दिन असहिष्णुता का था न तो नाटक-नौटंकी तो होनी थी और आपकी प्लानिंग की वाट लगनी ही थी. आज, पता नहीं क्यों कहीं कोई जाम नहीं था, तो घंटे भर की नित्य की यात्रा महज बीस मिनटों में पूरी हो गई और बैठने को सीट भी मिल गई. अब जब तक चार छः लोगों के बीच, भीड़ में कुचलते-झूलते हुए खडे न हों, अगले को नींद कैसे आ सकती है भला? पिछले कई वर्षों का तजुर्बा क्या क्षण भर में फना हो जाएगा?

दफ़्तर पहुँचा तो यह सोचकर खुश हुआ कि अभी कोई आया नहीं है, और लोगों के आते-आते, चहल-पहल मचते तक मैं अपनी टेबल पर पाँच-दस मिनट का पॉवर नैप तो ले ही लूंगा. लोगों की दफ़्तर देर से पहुँचने की आज की उनकी सहिष्णुता पर मुझे बहुत अच्छा लगा. मगर शायद खुदा को ये मंजूर नहीं था. मैं अपनी कुर्सी पर पसरा ही था कि, दफ़्तर का चपरासी अपने हाथों में चाय का प्याला लिए नमूदार हुआ. दफ़्तर में यदि कोई सर्वाधिक असहिष्णु होता है तो वो दफ़्तर का चपरासी होता है. जब आप आराम करना चाहते हैं तो चपरासी आपके लिए चाय लेकर हाजिर हो जाता है. यह तो असहिष्णुता की पराकाष्ठा है. लोग नाहक अपने बॉसों को बदनाम करते हैं. असहिष्णु का नाम ही चपरासी है. ठीक है, मैं जरा ज्यादा ही असहिष्णु हो रहा हूँ, परंतु दुनिया आज कौन सी मुझ पर सहिष्णु हो रही है!

दफ़्तर में पूरा दिन असहिष्णुता भरा माहौल रहा. मेरी चाय खत्म हुई ही थी कि वर्मा जी आ गए, और अपने मोबाइल टीवी को चालू कर दिया. उन्होंने कोई इंटरनैट पैक ले रखा है जिससे वे लगभग मुफ़्त में, नेट के जरिए क्रिकेट देखते रहते हैं. देखते क्या हैं, दिखाते ज्यादा हैं. खासकर अपना मोबाइल व नेट का प्लान और मोबाइल के स्पैक. जो हो, आज तो ऑस्ट्रेलिया और भारत का मैच आ रहा था. अपने जैसे क्रिकेट के दीवाने सहिष्णुता-असहिष्णुता को भाड़ में फेंक कर वर्मा जी के मोबाइल से चिपक लिए. वर्मा जी की हम पर अतिशय असहिष्णुता का पता तो तब चला जब मैच खत्म हो गया और यकायक हम पर भयंकर रूप से आलस छा गया. कमीने, असहिष्णु लोगों ने आज मेरी दिन की नींद छीन ली – एक एक को देख लूंगा!

शाम को घर वापस आते समय टैक्सी ले ली. सोचा, रास्ते में बैक सीट पर एक झपकी तो निकाल ही लूंगा. मगर पीछे मल्टीमीडिया सिस्टम लगा हुआ था और उस पर दिन में हुए मैच का लाइव रीव्यू आ रहा था. साला यह टैक्सी वाला और यह चैनल वाले सब मिले हुए थे. मुझ पर असहिष्णुता की मार मारे जा रहे थे. उनकी असहिष्णुता के कारण, मजबूरी में मुझे वापसी में अपनी बैकसीट-झपकी का प्लान स्थगित करना पड़ा और वह दिलचस्प मैच रीव्यू देखना पड़ गया. ईश्वर जरूर इन्हें सज़ा देगा जो मेरे जैसे निरीह लोगों के प्रति असहिष्णु होते हैं और जरा भी सहिष्णुता नहीं दिखाते.

घर पहुँचा तो लैपटॉप खुला पाया. अरे! सुबह चहुँओर की असहिष्णुतापूर्ण आपाधापी में इसे बंद करना भूल गया था. दो सौ ईमेल, तीन सौ फ़ेसबुक स्टेटस, चार सौ ट्वीट, पाँच सौ पिंटरेस्ट, छः सौ इंस्टाग्राम आदि आदि के नोटिफ़िकेशन सामने स्क्रीन पर बुगबुगा रहे थे. कितना असहिष्णु हो गया है आज यह निगोड़ा लैपटॉप भी. जरा भी रहम नहीं! जूते के फीते खोलने से पहले मैंने लैपटॉप अपनी ओर खींच लिया. चलो पहले इसे ही निपटा दूं...

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