शनिवार, 1 अगस्त 2015

देखिए, कहीं आपके भीतर से एकाध एनजीओ न निकल आए...

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वैसे भी, जब चहुँ ओर हाहाकार, मारामारी, अव्यवस्था हो तो चहुँ ओर एजीओओं की दरकार तो होगी ही...

 

व्यंज़ल

 

देखिए जरा कौन एनजीओ हो गया है

वो प्रेमी भी आज एनजीओ हो गया है

 

यूं उसने भी ली थीं नींदें बहुत मगर

ख्वाब उसका अब एनजीओ हो गया है

 

कभी रहते थे लोग  भी इस शहर में

हर शख्स यहाँ एनजीओ हो गया है

 

बहुत सुनते थे तख़्तापलट की बातें

शायद वो एक एनजीओ हो गया है

 

बहुत काम का था रवि भी कभी

सुना है अब वो एनजीओ हो गया है

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