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आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 41

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

317

प्रसन्न चीनी नागरिक

यदि आप अमेरिका के चाइनाटाउन इलाके में घूमने जाये तो प्रायः हर जगह कपड़े का थैला लादे एक मोटे व्यक्ति की मूर्ति देखने को मिलेगी। चीनी व्यापारी उसे प्रसन्न चीनी नागरिक या लाफिंग बुद्धा कहते हैं।

होतेई नामक यह व्यक्ति चीन के प्रसिद्व तांग साम्राज्य काल में रहता था। उसे अपने आप को प्रसिद्व चीनी विद्या “ज़ैन” का विद्वान कहलाने और आसपास कई शिष्यों के जमावड़े में कोई रुचि नहीं थी। इसके बजाए वह उपहार, टाफियाँ, फल, और मेवों से भरा कपड़े का बैग उठाकर सडक पर टहलता रहता थ। वह अपने आस-पास जुटे बच्चों को उपहार व टाफियाँ बांटा करता था। एक तरह से उसने सडक पर ही बच्चों का स्कूल स्थापित कर लिया था।

लेकिन जब भी वह किसी “ज़ैन विद्या के अनुयायी” से मिलता, अपना हाथ फैलाकर उनसे पैसे मांगता।

एक दिन वह अपने रोजमर्रा के कार्य में लगा हुआ था कि एक ज़ैन गुरू वहाँ आये और पूछने लगे- “बताओ ज़ैन विद्या का क्या महत्व है?”

होतेई ने उत्तर देने के बजाए सांकेतिक रूप से अपना बैग जमीन पर पटक दिया।

गुरू जी ने फिर प्रश्न किया - “तब बताओ कि ज़ैन विद्या की क्या वास्तविकता है?” प्रसन्न चीनी नागरिक होतेई ने तुरंत थैले को फिर से अपने कंधे पर लाद लिया और अपने रास्ते चलते बना।

हमेशा अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।

318

विजिटिंग कार्ड

चीनी के मैजी साम्राज्य काल में कैचू नामक चीनी ज़ैन विद्या के एक गुरू हुआ करते थे। वे क्योटो के एक किले में रहते थे। एक दिन क्योटो प्रांत के गर्वनर पहली बार उनसे मिलने आये।

उन्होंने गुरूजी के शिष्य को अपना विज़िटंग कार्ड दिया जो शिष्य ने गुरूजी के समक्ष प्रस्तुत किया, जिस पर लिखा था “किटागाकी, गवर्नर ऑफ क्योटो”

कार्ड को पढ़कर गुरूजी बोले - “मझे ऐसे किसी आदमी से नहीं मिलना। उससे कहो कि यहां से चला जाये।”

इसके बाद शिष्य ने अफसोस जताते हुये वह विजिटिंग कार्ड गवर्नर को वापस कर दिया।

गर्वनर ने बात समझते हुए कहा - “दरअसल मुझसे ही गलती हो गयी है।”यह कहकर उन्होंने “गवर्नर ऑफ क्योटो” शब्द काट दिये और पुनः वह कार्ड देते हुए कहा - “एक बार गुरूजी से फिर पूछ लो।”

जब गुरूजी ने पुनः वह कार्ड देखा तो तत्परता से बोले - “अच्छा! किटागाकी आया है। उसे तुरंत बुलाओ, मैं उससे मिलना चाहता हूँ।

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70

समर्पण और खुशहाली

एक बार एक राजा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक प्रसिद्ध मठ पर गया. मठ में गुरु के अलावा बाकी सभी राजा को देख कर अति उत्साहित थे.

राजा ने मठाधीश से अपने आने का मंतव्य बताया और कहा – गुरूदेव, मैं आपके ज्ञान व प्रसिद्ध मठ से बेहद प्रभावित हूँ, और मैं अपने राज्य में अपने शासन से खुशहाली लाना चाहता हूँ. कृपया कुछ दिशा दर्शन करें.

गुरुदेव ने कहा –अच्छी बात है, मगर खुशहाली शासन व नियंत्रण से नहीं आती है, बल्कि सभी के अपने कार्यों के प्रति समर्पण से प्राप्त होती है.

अपने कार्य के प्रति समर्पण का भाव पैदा करें, खुशहाली, प्रगति स्वयमेव प्राप्त होगी

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71

प्रार्थना -2

एक मठ में यह सर्व-प्रचलित नियम नहीं था “शांति बनाए रखने के लिए वार्तालाप नहीं करें”

बल्कि यह नियम था – “यदि शांति को बेहतर बना सकते हैं तो वार्तालाप जरूर करें”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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हम भी अपना थैला पटकते उठाते जिन्दगी काट रहे हैं!

विजिटिंग कार्ड पर चीन में अंग्रेजी! वैसे कथा अच्छी है।

अपने कार्य के प्रति समर्पण का भाव पैदा करें, खुशहाली, प्रगति स्वयमेव प्राप्त होगी

सुन्दर बात। सपर्पित काम।

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