टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 14

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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265

अपने भीतर के प्रकाश को देखो

एक गुरूजी लंबे समय से अचेतावस्था में थे। एक दिन अचानक उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को अपने नजदीक बैठे हुए पाया।

उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा - "तुम इतने समय तक मेरे बिस्तर के नजदीक ही बैठे रहे और मुझे अकेला नहीं छोड़ा?"

शिष्य ने रुंधे हुए गले से कहा - "गुरूदेव मैं ऐसा कर ही नहीं सकता कि आपको अकेला छोड़ दूं।"

गुरूजी - "ऐसा क्यों?"

"क्योंकि आप ही मेरे जीवन के प्रकाशपुंज हैं।"

गुरूजी ने उदास से स्वर में कहा - "क्या मैंने तुम्हें इतना चकाचौंध कर दिया है कि तुम अपने भीतर के प्रकाश को नहीं देख पा रहे हो?"

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266

शेर और लोमड़ी

एक लोमड़ी, जंगल के राजा शेर के अधीनस्थ एक नौकर के रूप में कार्य करने को सहमत हो गयी। कुछ समय तक तो दोनों अपने स्वभाव और सामर्थ्य के अनुसार भलीभांति कार्य करते रहे। लोमड़ी शिकार बताती और शेर हमला करके शिकार को दबोच लेता। परंतु लोमड़ी को जल्द ही यह ईर्ष्या होने लगी कि शेर शिकार का ज्यादा हिस्सा स्वयं चट कर जाता है और उसे बचाखुचा हिस्सा ही मिलता है। वह सोचने लगी कि आखिर वह किस मायने में शेर से कम है। और उसने यह घोषणा कर दी कि भविष्य में वह अकेले ही शिकार करेगी। अगले ही दिन जब वह एक भेड़शाला में से भेड़ के बच्चे को दबोचने ही वाली थी कि अचानक शिकारी और उसके पालतू कुत्ते आ गए और उसे अपना शिकार बना लिया।

"जीवन में अपना स्थान नियत करो और यह स्थान ही आपकी रक्षा करेगा।"

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19

अर्जुन या एकलव्य

यदि आपसे पूछा जाए कि क्या बनना बेहतर है – अर्जुन या एकलव्य तो आपका उत्तर क्या होगा? हममें से अधिकतर का उत्तर होगा कि अर्जुन बनना बेहतर है क्योंकि उन्हें गुरु द्रोण से सीखने का प्रत्यक्ष अवसर मिला. यह संभवतः सही चुनाव हो सकता है. आइए, इसे जरा दूसरे दृष्टिकोण से सोचते हैं.

कल्पना कीजिए कि अर्जुन धनुर्विद्या की शिक्षा चल रही है और वे अभ्यास कर रहे हैं. वे एक लक्ष्य पर निशाना लगाते हैं और प्रत्यंचा खींच कर तीर छोड़ते हैं. तीर लक्ष्य से दो इंच बाईं ओर लगता है. द्रोण अर्जुन को निशाने पर तीर लगाते बारीकी से देख रहे होते हैं और बताते हैं कि उन्होंने क्या गलती की. अपने अगले अभ्यास में अर्जुन ने उस गलती को दोहराया नहीं और तीर निशाने पर लगा.

अब कल्पना कीजिए कि एकलव्य धनर्विद्या स्वयं सीख रहे हैं. उनके पास उनकी गलतियों को बताने वाला कोई गुरु नहीं है, उनके पास कोई रेडीमेड हल नहीं है. उनका निशाना कई दिनों के अभ्यास के बाद सही नहीं लग रहा. आज उनका तीर लक्ष्य से तीन इंच दूर रह जाता था. मगर एकलव्य ने आस नहीं छोड़ी. कुछ दिनों के अभ्यास से उनको अपनी गलती समझ में आ गई. अब उन्होंने अपनी गलती सुधार ली और तीर अब निशाने पर लगने लगा.

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि कौन सी परिस्थिति चुनने योग्य है? आप अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य. यदि आप अर्जुन बनते हैं तो आपको अपनी प्रत्येक गलती को सुधारने के लिए एक अदद गुरु की जरूरत होगी. एकलव्य अपनी गलतियोँ को खुद ही ढूंढता है और खुद ही उनका समाधान प्राप्त करता है.

अंत में, यही प्रश्न एक बार फिर से आपके सामने है – आप अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य?

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22

धार्मिकता और अंधभक्ति

आप धार्मिक हैं या अंधभक्त? व्यक्ति को धार्मिक तो होना चाहिए, मगर अंधभक्त नहीं.

आर्मी के एक कमांडिंग ऑफ़ीसर की यह कहानी है –

कमांडिंग ऑफ़ीसर ने अपने नए-नए रंगरूटों से पूछा कि रायफल के कुंदे में अखरोट की लकड़ी का उपयोग क्यों किया जाता है.

“क्योंकि इसमें ज्यादा प्रतिरोध क्षमता होती है” एक ने कहा.

“गलत”

“इसमें लचक ज्यादा होती है” दूसरे ने कहा.

“गलत”

“शायद इसमें दूसरी लकड़ियों की अपेक्षा ज्यादा चमक होती है” तीसरे ने अंदाजा लगाया.

“बेवकूफी की बातें मत करो.” कमांडर गुर्राया – “अखरोट की लकड़ी का प्रयोग इस लिए किया जाता है क्योंकि यह नियम-पुस्तिका में लिखा है.”

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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इस बार बहुत अच्छा…बेहतरीन…अंधभक्ति भी खूब रही…अप्प दीपो भव वाली बुद्ध कथा याद हो आई…

अपना मूल्य तो जानना ही पड़ेगा।

हरेक बात में अंदाजा लगाना ठीक नहीं है।

अर्जुन या एकलव्य - शायद एकार्जुन बनना चाहूंगा।

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