टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

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I did pasted it on my blog someday more or less similar conditions...Hope it helps...Thanks for visit :)

या तो सुखी हो जाओगे या आत्महत्या कर लोगे:-) दोनो ही अवस्था में मुक्ति तय है।

गारंटी है कि दुःख और नहीं बढेगा ? :)

दुखी होकर ब्लॉगिंग कर रहे हैं या ब्लॉगिंग कर के दुखी हैं लोग।

सही बात है, दूसरों को सुखी क्यों छोड़ा जाए :)

इसे देखकर रवीन्‍द्र प्रभात जी का लिखा हुआ लेख जो पढ़ा था याद हो आया। लेख का शीर्षक है, ''ब्‍लॉगिंग को बनायें तनावमुक्‍त जीवन का हिस्‍सा।''

बहोत अच्छे रवी जी

सच मै बहोत अच्छा लगता है ब्लॉगींग करके !

http://hindiduniyablog.blogspot.com/

दशा कुछ ऐसी होती है -

तौबा मेरी जाम-ए-शिकन,
जाम-ए-मेरी तौबा शिकन,
सामने है ढेर,
टूटे हुए पैमानों का।

http://aikajnabee.blogspot.in

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