आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 11

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

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कार्य में आध्यात्मिकता

गुरू जी को अपने समस्त शिष्यों के प्रति एक समान प्रेम भाव था । इसके बावजूद वे आश्रम में रहने वाले शिष्यों की तुलना में ऐसे शिष्यों के प्रति अपने लगाव को छुपा नहीं पाये जो 'गृहस्थ जीवन' व्यतीत कर रहे थे जैसे - विवाहित, व्यापारी, सैनिक, किसान ............आदि।

जब उनसे इसके बारे में पूछा गया तो वे बोले - "संन्यासी जीवन की तुलना में गृहस्थ आश्रम के कार्यशील जीवन में आध्यात्मिकता का अभ्यास कहीं बेहतर होता है।"

258

अपनी आँखें खुली रखो

दार्जिलिंग में कुछ बुजुर्ग मित्रों का एक समूह था जो आपस में समाचारों के आदान-प्रदान और एक साथ चाय पीने के लिये मिलते रहते थे। उनका एक अन्य शौक चाय की महँगी किस्मों की खोज और उनके विभिन्न मिश्रणों द्वारा नए स्वादों की खोज करना था।

मित्रों के मनोरंजन हेतु जब समूह के सबसे उम्रदराज़ बुजुर्ग की बारी आयी तो उसने समारोहपूर्वक एक सोने के महंगे डिब्बे में से चाय की पत्तियाँ निकालते हुए चाय तैयार की। सभी लोगों को चाय का स्वाद बेहद पसंद आया और वे इस मिश्रण को जानने के लिए उत्सुक हो उठे। बुजुर्ग ने मुस्कराते हुए कहा - "मित्रों, जिस चाय को आप बेहद पसंद कर रहे हैं उसे तो मेरे खेतों पर काम करने वाले किसान पीते हैं।"

"जीवन की बेहतरीन चीजें न तो महंगी हैं और न ही उन्हें खोजना कठिन है।"

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(259)

किस बुक से

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से एक पत्रकार ने पूछा - "कि अपनी किस बुक से आपको सबसे अधिक लाभ प्राप्त हुआ है?"

नामी व्यंगकार बर्नार्ड शॉ ने तत्परता से कहा - "चैक बुक से"।

(260)

मत बदलो

वर्षों तक मैं मानसिक रोगी रहा - चिंताग्रस्त, अवसादग्रस्त और स्वार्थी। हर कोई मुझे अपना स्वभाव बदलने को कहता ।

मैं उन्हें नाराज करता, पर उनसे सहमत भी था। मैं अपने आपको बदलना चाहता था लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाया।

मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी जब दूसरों की तरह मेरे सबसे नजदीकी मित्र भी मुझसे बदलने को कहते। मैं ऊर्जारहित और बंधा-बंधा सा महसूस करता ।

एक दिन उसने कहा - "अपने आप को मत बदलो। तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

ये शब्द मेरे कानों को मधुर संगीत की तरह लगे - "मत बदलो, मत बदलो, मत बदलो ............. तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

मैंने राहत महसूस की। मैं जीवंत हो उठा और अचानक मैंने पाया कि मैं बदल गया हूँ। अब मैं समझ गया हूँ कि वास्तव में, मैं तब तक नहीं बदला था जब तक कि मैंने ऐसे व्यक्ति को नहीं खोज लिया जो मुझसे हर हाल में प्रेम करता हो।

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

टिप्पणियाँ

  1. सभी लघुकथाये सार्थक संदेश दे रही हैं।

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  2. आनन्द देने वाली चीजें बिना मोल मिल जाती हैं।

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  3. वाकई गृहस्थ आश्रम में आध्यात्मिक साधना कठिन है पर उससे अच्छी कोई जगह भी नहीं है, क्योंकि जितना संयम गृहस्थ को रखना पड़ता है उतना सन्यासी को नहीं।

    एक से बड़कर एक शिक्षाप्रद कहानियाँ । चेकबुक तो हमने पता नहीं कब से उपयोग ही नहीं की है, जय हो ऑनलाईन बैंकिंग की, तकनीक की ।

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  4. "जीवन की बेहतरीन चीजें न तो महंगी हैं और न ही उन्हें खोजना कठिन है।" बहुत सुन्दर! चैकबुक वाला भी बढिया रहा। और अन्तिम तो सचमुच बेहतर…

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  5. Very Very Nice Blog Thanks for sharing with us

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  6. रवि जी

    पाठकों की नियमित प्रतिक्रिया पढ़कर अभिभूत हूं। एक सार्थक कार्य से जोड़ने के लिए धन्यवाद।

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  7. परितोष जी,
    आपको बहुत-2 धन्यवाद.
    मुझे विश्वास है कि ह परियोजना आने वाले कई वर्षों तक दुनिया में भला करती रहेगी.

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  8. रवि जी और परितोष जी , दोनों को धन्यवाद,
    आपका विश्वास सही था और है मैंने इन्हें २०१२ में पढना शुरू किया है ...आप दोनों वाकई बहुत पुण्य का काम कर रहे है

    उत्तर देंहटाएं

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