टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 9

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

13

वास्तविकता – प्रश्न एक उत्तर अनेक

वास्तविकता का बोध मस्तिष्क के स्तर और व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है. कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1 व्यास ने चार्वाक से पूछा – चार्वाक! क्या कभी तुमने यह अनुभव किया है कि तुम कहाँ से आए हो, कहाँ तुम्हें जाना है और इस जीवन का उद्देश्य क्या है?

चार्वाक का उत्तर था – मैं अपने चाचा जी के घर से आया हूँ, और बाजार जा रहा हूँ. मेरा उद्देश्य है अच्छी सी ताजी मछली खरीदना.

 

2 यही प्रश्न नारायण ने सुरेश से पूछा. सुरेश का उत्तर था:

मैं अपने अभिभावकों से इस जगत् में आया हूँ. भाग्य जहाँ ले जाएगा, वहाँ मुझे जाना है. जो मुझे मिला है उससे अधिक इस संसार को अर्पित करूं यह मेरे जीवन का उद्देश्य है.

 

3 और जब यही बात गोविंदप्पा ने शंकर से पूछा तो शंकर जा जवाब था – मैं संपूर्णता से आया हूँ और संपूर्णता में ही वापस लौटना है. और जीवन की इस यात्रा में पग-दर-पग संपूर्णता को महसूस करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है.

 

4 बुद्ध के प्रश्न पर महाकश्शप का प्रत्युत्तर था – मैं शून्य से आया हूँ, शून्य में मुझे जाना है और मेरे जीवन का उद्देश्य भी शून्य ही है.

 

5 अष्टावक्र ने जनक से जब यही प्रश्न पूछा तो जनक ने जवाब दिया – मैं न तो आया हूँ, न कहीं जाऊंगा. और न ही कोई उद्देश्य है.

 

6 कृष्ण मुस्कुराए, और कुछ नहीं पूछे. भीष्म मुस्कुराए और कोई जवाब नहीं दिए.

सत्य के बोध के लिए हर एक का दृष्टकोण अलग होता है.

--

14

मैं कैसे बताऊँ...

नसरूद्दीन एक बार एक किचन गार्डन में दीवार फांद कर घुस गया और अपने साथ लाए बोरे में आराम से जी भर कर जो भी मिला सब फल सब्जी तोड़ कर भरने लगा.

इतने में माली ने उसे देखा और दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया –

 

“ये तुम क्या कर रहे हो?”

 

“मैं चक्रवात में फंसकर उड़ गया था और यहाँ टपक पड़ा”

 

“और ये सब्जियाँ किसने तोड़ीं?”

 

“तूफ़ान में उड़ने से बचने के लिए मैंने इन सब्जियों को पकड़ लिया था तो ये टूट गईं.”

 

“अच्छा, तो वो बोरे में भरी सब्जियाँ क्या हैं?”

“मैं भी तो यही सोच रहा था जब तुमने मेरा ध्यान अभी खींचा.”

--

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

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जो भी है, बस यही एक पल है।

सब्जी खुद बोरे में आ जाती है, जैसे नेताओं-मंत्रियों के यहाँ पैसे खुद चले जाते हैं।

प्रेरक कहानी १३ वाली और नसरूद्दीन आजकल वापिस कमाल दिखा रहे हैं ।

दोनो ही शानदार्।

नाम ही काफी है

सत्य के बोध के लिए हर एक का दृष्टकोण अलग होता है

kamal hai ,itni badiya kahani padhwane ke liye aapko dhanywaad

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