रविवार, 20 फ़रवरी 2011

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग...

व्यक्ति आमतौर पर स्प्लिट पर्सनलिटी का साइलेंट शिकार होता है - उसे पता नहीं होता कि उसके कई कई मुखौटे होते हैं. वो घर पर कुछ और मुखौटा धारण करता है तो बाहर कुछ और. ऑफ़िस में कुछ और, सड़क में कुछ और. ड्राइंग रूम में अलग तो बाथरूम में अलग.

पेश हैं कुछ मुखौटे - क्या इनमें से कुछ एक को आप पहचान सकते हैं जो आपके भीतर बाहर कहीं छुपा हुआ होता है और जो जब-तब यदा-कदा बाहर निकल आता है?

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कुछ और -

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14 blogger-facebook:

  1. मस्त हैं सारे मुखौटे, रवि साहब।

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. चेहरों पे चेहरे, वाह.

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  4. सब लग तो बड़े शानदार हैं; पर अपने चेहरे पे इनमें से कोई न लगाना चाहूंगा! :(

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  5. हेडिंग भी सही पोस्ट भी सही.

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  6. खूब बढ़िया...
    इनमें से सभी चेहरे हम सभी के अंदर हैं.. समय-समय पर बाहर आते हैं...

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  7. चेहरे बदलते-बदलते अपना असली चेहरा ही भूल चुका हूँ मैं तो

    प्रणाम

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  8. घर में ही मुखौटा संग्रहालय खोलने का इरादा लग रहा है गुरुजी। आनन्‍दायी है।

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  9. अपना भी लगा दिए होते -या नहीं है ? :)

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  10. @अरविन्द मिश्र -
    मेरा तो सबसे बड़ा वाला है - सबसे ऊपर लगा हुआ - रावण से भी डबल, पूरे 20 चेहरे. :)

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