एक पद्म पुरस्कार जो मुझे मिलते-मिलते रह गया!

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जैसे ही मुझे पता चला कि मेरा नाम भी इस वर्ष दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों की सूची में है, मेरे पैरों तले धरती खिसक गई. दिल बैठ गया. वल्लाह! ये क्या हादसा होने जा रहा है मेरे साथ? क्या तुझे मैं ही मिला था इस दुनिया में मुझे इतना दुख दर्द देने को?

पद्म पुरस्कार मिलते ही मेरे आगे पद्मश्री या पद्मविभूषण जबर्दस्ती जुड़ जाता और फिर, नतीजतन मैं मुँह छिपाए फिरता. लोग मुझे भी ठग, झूठा, दीवालिया समझते. सेटिंगबाज किस्म के बॉलीवुड का कलाकार समझते या कोई अमरीकी दीवालिया व्यापारी या चुटकुलेबाज. मैं ऐसी स्थिति के लिए कतई तैयार नहीं था. किसी सूरत तैयार नहीं था.

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मैंने भगवान से विनती की, मंदिर में लाइचीदाने-नारियल चढ़ाए, मजार पर इबादतें की, गुरुद्वारे में अरदास किया और गिरजे में प्रार्थनाएँ की. मगर बहरे भगवान को तो सुनना ही नहीं था. एक ग़रीब मैं ही था जो न जाने किस जन्म की सजा भुगतने वाला था.

जब भगवान ने नहीं सुनी तो मैं डेस्पेरेट हो गया. अब जब पानी नाक से ऊपर जा रहा था तो जिंदा रहने के लिए कुछ जद्दोजहद तो करनी ही थी. मैंने अपने सम्पर्कों को टटोला. एक मंत्री तक जैसे तैसे बात पहुँचाई. चुनावों तक तो मंत्री हर किसी की पहुँच में स्वयं ही बने रहते हैं, पर चुनाव होते ही यकायक हर किसी, यहाँ तक कि स्वयं की भी पहुँच से दूर हो जाते हैं. मंत्री महोदय ने हाथ ऊंचे कर दिए. कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते. पद्म पुरस्कारों का मामला है. गृह विभाग का मामला है. उनकी अपनी सोच है. उनके अपने गुप्त तंत्र हैं जिससे वे ये तय करते हैं कि किसे पुरस्कार दिया जाना चाहिए और किसे नहीं. पता चला है कि आपको तो विशेष रूप से चुना गया है.

विशेष रूप से? हे! भगवान!!! क्या यही दिन दिखाने के लिए तूने मुझे यह जीवन दिया था? एक से बात की जिसकी पहुँच ऊपर तक थी, और जो भेंट-पूजा-पाठ ले-देकर सरकारी-गैर-सरकारी हर विभाग में हर किस्म की सेटिंग करवाने की ताक़त रखता था. उसने कहा कि मामला बड़ा संगीन है. इसे सेट करने में तो बहुत ऊर्जा लगेगी. मैंने कहा कि ऊर्जा की चिंता वो न करे. मैं अपने जीवन की तमाम कमाई इसमें लगा दूंगा. आखिर, इज्जत नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं?

मामला ले-देकर सुलट ही गया. पद्म पुरस्कारों की सूची से मेरा नाम हट गया. भले ही मैं दीवालिया हो गया, इस मामले को सेट करने में मेरे जीवन की सारी पूंजी लुट गई. मगर मैं खुश और प्रसन्न हूं. लोगों को मुँह तो दिखा सकता हूं. लोगों से ऊंची नाक रख कर बात तो कर सकता हूं. अपने नाम के आगे ‘पद्मश्री रहित’ तो गर्व से लगा सकता हूं.

आप मुझे बधाई नहीं देंगे?

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व्यंज़ल

---.

किया है कुछ कभी काम के लिए

या किया तो बस ईनाम के लिए

 

हमने चमका दिए शब्द और हर्फ

थोड़े से और बेहतर दाम के लिए

 

एक टुकड़ा धूप, नीम का पेड़ हो

यही बहुत है अपने राम के लिए

 

सोचते तो वैसे हम भी हैं बहुत

कुछ करने काम तमाम के लिए

 

वो दौर कुछ और रहा होगा रवि

अब तो जी रहे हैं हराम के लिए

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एक टिप्पणी भेजें

बाल-बाल बच गए, बधाई हो :)

मेरी ओर से एक शुभ अवसर पर बधाई का पूरा एक टोकरा कुबूल फरमाएं।
कशमसे, कलम तोड़ दी आपने।
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...का दूध पिया हो तो सामने आ।
पहली औपचारिक भिड़ण्त में आप सादर आमंत्रित हैं।

बेहद खूबसूरत व्याख्या पद्म पुरस्कारों की रवि जी.. सुंदर व्यंग्य.. कभी कभी सीधे चीखकर जब आलोचना थक जाती है तो ये बाण अचूक साबित होते हैं..

वाह! बहुत मारक व्यंग्य!
घुघूती बासूती

:) बधाई दूँ?

बधाई! कितना खर्चा-पानी लगा मामला सलटाने में!

jaan bachi to gangaa nahaye ......................

रवि जी.. जान बची तो लाखो पाए....!

हा हा ! बधाई हो, बधाई…॥ excellent

मैं तो फिर फँसा कि आपको पद्म पुरस्कार कैसे दे दिया सबने?

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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