गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

जूते की अभिलाषा

चाह नहीं मैं नेता मंत्री के

ऊपर फेंका जाऊँ,

 

चाह नहीं प्रेस कान्फ्रेंस में

किसी पत्रकार को ललचाऊँ,

 

चाह नहीं, किसी समस्या के लिए

हे हरि, किसी के काम आऊँ

 

चाह नहीं, मजनूं के सिर पर,

किसी लैला से वारा जाऊँ!

 

मुझे पहन कर वनमाली!

उस पथ चल देना तुम,

संसद पथ पर देस लूटने

जिस पथ जावें वीर अनेक।

 

(श्रद्धेय माखनलाल चतुर्वेदी की आत्मा से क्षमायाचना सहित,)

(चित्र – साभार : सीएवीएस संचार)

वैसे, एक लट्ठ की मार्मिक अभिलाषा भी आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

18 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. चले लुटेरे संसद पथ-
    पर जूता साथ नही देता।
    पत्रकार से उलझे नेता,
    बूता साथ नही देता।

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  2. behtarin bahut bahiya,jute ki bhi koi chah hoti hai apni.

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  3. शानदार अभिलाषा है। इस पर सारा देश निसार होने को तैयार है।
    ----------
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

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  4. वाह वाह ! अब तो आपके द्वारा लिखी हुई 'जूते की आत्मकथा' भी पढने का मन हो रहा है ! एक श्रृंखला लिख डालिए.

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  5. Juton ki pida bhi chipi hai in panktiyon mein.

    उत्तर देंहटाएं
  6. मुझे पहन कर वनमाली!

    उस पथ चल देना तुम,

    संसद पथ पर देस लूटने

    जिस पथ जावें वीर अनेक।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढिया पैरोडी ---बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. माखन लाल जी की आत्मा आशीष दे रही होगी आपको!!! आजकल के नेताओं के यही पुष्प हैं. :)

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  9. और अगर श्रद्धेय माखनलाल चतुर्वेदी की आत्मा ने क्षमायाचना स्‍वीकार नहीं की, तो क्‍या विकल्‍प है ?

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  10. जय हो .... जय हो बडे भईया ।
    भंदई पनही अप गोड ले मूड कोती जाये चाहत हे, दुनिया बदलत हे, अब पागा के जघा पनही ह नेता मन के मूडी म बने सुघ्‍घर फबही तईसे लागत हे।

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  11. दु:ख की बात कि यह कविता पहले नहीं पढ़ पाया। जूते से उसकी अभिलाषा भी जान लेनी चाहिए।

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