मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

ए टू जैड ब्लॉगिंग : हिन्दी ब्लॉगिंग की पहली कट-पेस्ट किताब

जब से यह खबर मिली थी कि हिन्दी में ब्लॉगिंग की किताब बाजार में आ गई है, उत्सुकता बनी हुई थी कि कब ये हाथ में आए. कल ही ये किताब मिली और लीजिए, आपके लिए आज हाजिर है इसकी बेबाक समीक्षा.

तीन सौ से ऊपर पृष्ठों की, पॉकेटबुक साइज की इस किताब के लेखक हैं इरशादनामा के श्री इरशाद अली. प्रकाशन रवि पॉकेट बुक, मेरठ का है, और कीमत है एक सौ पचास रुपए. पुस्तक का काग़ज बढ़िया क्वालिटी का है और छपाई उत्तम है. किताब के फ़ॉन्ट पढ़ने में आसान हैं, और पृष्ठों का लेआउट भी बढ़िया है.

किताब निम्न चौदह खंडों में विभाजित है –

1. ब्लॉगिंग क्या है?

2. ब्लॉगिंग का इतिहास

3. ब्लॉग, ब्लॉगिंग, ब्लॉगर

4. ब्लॉग एग्रीगेटरों की दुनिया

5. कैसे जुड़ें ब्लॉगिंग से आप

6. आपका हिन्दी ब्लॉग

7. ब्लॉगिंग का बढ़ता क्षेत्र और लोकप्रियता

8. कैसे बनाएँ प्रभावी ब्लॉग

9. मशहूर ब्लॉग, ब्लॉगर और उनके किस्से

10. मजेदार ब्लॉगिंग

11. ब्लॉगिंग और कुछ सावधानियाँ

12. एडवांस ब्लॉगिंग टिप्स

13. कैसे हो ब्लॉगिंग से कमाई

14. सितारों के ब्लॉग.

अध्यायों को देखा जाए, तो ब्लॉगिंग की एक सम्पूर्ण किताब में जिन बातों को समावेश किया जाना आवश्यक है, वे तो प्रकटतः दिखाई दे रहे हैं. अब आइए, देखते हैं अध्यायों के सामग्री को. शुरूआत करते हैं प्रथम अध्याय से. ब्लॉगिंग क्या है? को पारिभाषित करते हुए (देखें पृ. 17) बताया गया है –

“ब्लॉग अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम

जन्म लेते ही मनुष्य रो कर विश्व को अपनी यह अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का प्रयास करता है कि अब, आज से, जगत में उसका भी कोई अस्तित्व है. अभिव्यक्ति का यह प्रयास उसके महाप्रयाण तक जारी रहता है....”

अरे! यह क्या? यह तो अभिव्यक्ति पर छपे मेरे लेख की कट-पेस्ट प्रतिलिपि है. इसी के कुछ हिस्से फिर से दोबारा पृष्ठ 52 तथा 146 पर छापे गए हैं. प्रथम अध्याय से शुरू कट-पेस्ट का सिलसिला किताब के अंतिम पृष्ठों तक जारी है. पुस्तक जीतेन्द्र चौधरी के लेख अतीत के झरोखे से तथा आप किस किस्म के ब्लॉगर हैं जी, .. इत्यादि इत्यादि, अभिव्यक्ति का मेरे आलेख चलो चिट्ठा लिखें से लेकर और भी तमाम कट-पेस्ट मसालों से अटा पड़ा है. ईपंडित के हिन्दी में व्यवसायिक चिट्ठाकारी आलेख है तो ईस्वामी का हिन्दी चिट्ठाकारी के ट्राल्ल भी. फुरसतिया का आत्मीय सवाल जवाब भी है तो दातुन कर ब्लॉग लिखने के फायदे भी. और तो और, ब्लॉगरों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प जिसे मैंने मजाहिया अंदाज में लिखा था, उसे ब्लॉगिंग टिप्स के रूप में जस का तस उतार दिया गया है.

कट-पेस्ट के ये महज उदाहरण हैं, और लगभग पूरी किताब प्रतीत होता है कि ऐसे ही तैयार की गई है. और भी ढेर सारे हिन्दी चिट्ठाकारों के हिन्दी ब्लॉग संबंधी आलेखों को सीधे सीधे कट-पेस्ट किया गया है.

किताब में ब्लॉग बनाने की विधि के नाम पर सिर्फ ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट को पकड़ा गया है और उतना ही प्रसिद्ध, बल्कि निजी डोमेनों के लिए बहुप्रचलित विकल्प वर्डप्रेस को छोड़ दिया गया है. ब्लॉग संबंधी अन्य तकनीकी ज्ञान प्रदान करने में किताब शून्य है. ब्लॉग संबंधी विजेट, सीएसएस स्टाइल, एडऑन, पॉडकास्ट-वीडियोकास्ट-माइक्रोब्लॉगिंग-ट्विटर इत्यादि विषय लगभग अछूते से हैं.

प्रतीत होता है कि किताब को पॉकेट-बुक पाठकों के लिहाज से, उन्हें सिर्फ ब्लॉगिंग संबंधी सरसरी जानकारी मुहैया कराने  के एकमात्र उद्देश्य को लेकर तैयार किया गया है. पढ़ते समय कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा साफ नजर आता है, और इस किताब से ब्लॉग जगत में चार-छः महीने गुजार चुके चिट्ठाकारों के लिए काम की कोई चीज शायद ही नजर आए, चूंकि सारा माल इंटरनेट पर वैसे भी पहले से मौजूद है, और वो भी शुद्ध हिन्दी में. हाँ, हिन्दी ब्लॉग संसार से सर्वथा अनभिज्ञ व्यक्ति के लिए जरूर ये कुछ जानकारियाँ जुटा सकता है, मगर वो भी सबकुछ इतना बेतरतीब और बिखरा-बिखरा सा है कि वो कहेगा –

 

बहुत सुनते थे ब्लॉगिंग ब्लॉगिंग

हुँह, तो यही है ब्लॉगिंग श्लागिंग

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22 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. दूसरों की मेहनत से अपनी जेब भरना - ये चिट्ठाकार नहीं नेता करते हैं। "ये अच्छी बात नईयै"!

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  2. agar un sabhi ctrl+c ctrl+v ka acknowledgment nahi diya gaya ya mool lekkhak ko nahi avgat karaya gay to ye shayad natik roop bilkul sahi nahi. Haan magar afsoos ki ye vidhik roop se galat nahi hai...(apne alogyan ke adhar pe keh raha hoon shayad main galat ho sakta hoon )

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  3. एक निष्पक्ष समीक्षा के लिए धन्यवाद

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  4. किताब अगर एक ब्लॉगर की अहि तो नियमानुसार बधाई दी जानी चाहिए ;)

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  5. यथेष्ट समीक्षा के लिए आभार.. आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं कि पुस्तक लेखन मौलिक विषयवस्तु पर आधारित होना चाहिए।

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  6. क्या यह कॉपीराईट उल्लंधन का मामला नहीं बनता? आपको प्रकाशक के समक्ष आपत्ति दर्ज करनी चाहिये।

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  7. ऑन लाइन टूल का प्रिंट तर्जुमा कैसे सफल हो सकता है। बस एक खाली स्‍थान को भरने के लिए आड़ा तिरछा रोड़ा फंसाने की कोशिश सी लगती है। इसकी तो मैं बहुत आसान भविष्‍यवाणी कर सकता हूं कि यह किताब पूरे प्रयासों के बावजूद फेल होगी। :)

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  8. बड़ी शर्मनाक बात है। रवि जी, इस विषय पर किताब लिखने के असली अधिकारी तो आप हैं, आप कब ब्लोगिंग पर अपनी किताब निकाल रहे हैं? वह निश्चय ही काटो-चिपकाओ तरह की नहीं होगी और ब्लोग जगत में उसका स्थायी महत्व होगा। वह नए ब्लोगरों को भी आकर्षित करेगा। तो झटपट लिख डालिए यह किताब, हम सबको इसकी प्रतीक्षा है, क्यों, है न भाइयो (और बेहनो)?

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  9. चलो जी कोई बात नहीं...अच्छी किताबें भी आएँगी.

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  10. मै तो इसे अच्छा कदम मानता हू । यह सच है कि यह गैर कानूनी है । लेकिन कोइ हिन्दी पुस्तक तो आयी यही क्या कम बात है वरना आज भी साठ प्रतीशत लोगो को यह मालूम ही नही है कि कम्प्यूटर और इन्टर नेट का हिन्दी मे मे भी कोई उपयोग है ।

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  11. पुस्तक में जिन रचना अंशों का प्रयोग किया गया हैं। वो मूल रूप में लेखक के नाम और आभार के साथ दिया गया हैं। इस पुस्तक को लाने का मकसद हिन्दी में ब्लागों के प्रति जिज्ञासा और लोकप्रियता को बढा़वा देने के लिये किया गया है। तथा ये बताने के लिये कि किस प्रकार से ब्लागर आज हिन्दी को इंटरनेट की भाषा बनाने के लिये काम कर रहे है। जिस दिन पुस्तक का विमोचन था उस दिन एक बड़ा हिन्दी ब्लागिंग सेमिनार भी मेरठ में रखवाया गया था तथा जिन ब्लागर मित्रों ने पुस्तक में योगदान दिया है उनसब ने अपने विचार हिन्दी ब्लाॅगिंग पर रखें। और ये पुस्तक उन लोगों के लिये सहायक है जो अभी तक ये ही समझते है कि ब्लाॅग कोई इंटरनेट की चीज होती है जिसको केवल अमिताभ बच्चन लिखते है। तथा जिन रचनाओं को हमने ब्लाॅग की वास्वविक स्थिति बताने के लिये प्रयोग किया है उनमें खुद रतिलामी की रचनाएं अधिक है जैसा की उन्होने समीक्षा में भी कहा। अभी जब मैंने रतिलामी जी से इस सन्दर्भ में बात की तब उन्होने फिर से ये बात दोहराई कि-’’ मेरे ब्लॉग पर लिखे आलेखों को वैसे भी मैंने क्रिएटिव कामन्स के अंतर्गत जारी किया है, जिसमें कोई भी इसका प्रयोग कर सकता है क्रेडिट व कड़ी देकर. ’’
    अब आप ही बताए कि हम नकारात्मक पक्ष ही क्यों सोचते है, क्या ऐसा नही हो सकता कि इस पुस्तक के कारण ही तीन चार सौ और नये हिन्दी ब्लाग बन जाए। दोस्तो हम सब जानते है हिन्दी ब्लागिंग को अभी अपना एक बड़ा सफर तय करना है। ना जाने कितनी ब्लागिंग कि किताबे आएगी और हिन्दी ब्लाग की कोई किताब उसके ब्लागरो और ब्लाग का जिक्र किये बिना पूरी हो पाएगी।

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  12. बड़े साधुवाद टाइप के विचार हैं इरशाद भाई, अब सिर्फ़ इतना कीजिये कि जिन-जिन लेखकों के लेख इसमें चिपकाये गये हैं, उन्हें कम से कम (जी हाँ कम से कम) 1000/- प्रति लेखक "मानधन" भिजवा दें, पुस्तक तो जब बिकेगी तब बिकती रहेगी… फ़िलहाल यह "टोकन अमाउंट" गरीब लेखकों तक पहुँचाने की भी व्यवस्था करें तो कुछ बात जमे…

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  13. पुस्‍तक नहीं देखी लेकिन तकनीकी तौर पर इरशादजी की बात ठीक ही लगती है कि लाइसेंस नियम का उल्‍लंघन शायद नहीं हुआ है, रविजी क्रिएटिव कॉमन तो नान कमर्शिअल की शर्त भी नहीं रखता। किंतु अकादमिक लिहाज से यदि पुस्‍तक केवल एक गैर मौलिक संकलन भर है तो अहम नहीं कही जा सकती इतनी तो कतई नहीं कि इसे विश्‍वविद्यालय परिसर से लोकार्पित किया जाए।

    खैर उम्‍मीद करते हैं कि रवि भाई की पुस्‍तक रिक्‍त स्‍थान की पूर्ति करेगी।

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  14. इरशाद मियां

    रवि जी के लेख क्रिएटिव कॉमन्स के अंतर्गत हैं तो क्या उस लाइसेन्स का पालन करते हुए रवि जी का नाम और ब्लॉग पता किताब में मूल लेखक के रूप में दिया गया है? यदि हाँ तो रवि जी को काहे नज़र नहीं आया? और रवि जी ने अन्य ब्लॉगरों का माल भी वहाँ पकड़ा है जैसे कि जीतू भाई, अनूप जी, स्वामी जी, श्रीश आदि जिनके लेखों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं और वे उनको क्रिएटिव कॉमन लाइसेन्स अथवा किसी अन्य मुक्त लाइसेन्स के अंतर्गत नहीं रखे हुए हैं! तो क्या यह चोरी नहीं हुई??

    जो व्यक्ति अपनी किसी रचना को किसी भी मुक्त प्रयोग वाले लाइसेन्स के अंतर्गत नहीं दे रहा है उसकी रचना का प्रयोग अपनी मन मर्ज़ी मुताबिक करने पर यह कह देना काफ़ी नहीं होता की धर्मार्थ किया गया है और क्रेडिट दिया गया है!! चोरी चोरी ही होती है, चाहे आप रॉबिन हुड नुमा काम ही क्यों न कर रहे हों!!

    End does not justify the means!!

    यदि आपकी इस किताब को कोई रद्दी कागज़ पर अपने नाम से छाप के 30 रूपए में निकाले तो तब भी आपके विचार यही होंगे कि भई काम तो धर्मार्थ है, लोगों का भला होगा इसलिए जाने दो!! वैसे मुझे विश्वास है कि आपको अपनी पुस्तक की ऐसी चोरी पर ऐतराज़ अवश्य होगा लेकिन यदि न हुआ तो कोई खासा आश्चर्य न होगा क्योंकि प्रायः लोगों को अपनी कृति की चोरी पर ऐतराज़ होता है, दूसरे के माल की चोरी पर कैसा ऐतराज़! :)

    देबू दा से मैं सहमत हूँ, जिन लोगों का माल चुराया गया है उनको प्रकाशक से संपर्क कर इस पुस्तक की छपाई तो नहीं रुकवानी चाहिए लेकिन पुस्तक के लेखकों में अपना नाम और रॉयल्टी में अपना हिस्सा अवश्य माँगना चाहिए!!

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  15. रवि जी अभी तक मैंने यह किताब तो नहीं पड़ी लेकिन जैसा आप कह रहे है अगर ऐसा है तो सच बहुत बुरी बात है !इरशाद जी को चाहिए था की साभार सम्बंद्तिः लेखों का नाम दें!
    चलिए चोरी की चीज़ों से जिंदगी नहीं कटा करती !
    पुस्तक के आने पर आपको बधाई हो

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  16. किताब लिखना कठिन है. किताब छपवाना कठिन नहीं. किताब पढ़कर चार सौ भी लोग ब्लॉग बनाएं तो इरशाद भाई का लिखना सफल हो जायेगा.

    कब विमोचन हुआ इस किताब का? तारीख पता होती तो यह मानकर संतोष कर लेते कि उसदिन के बाद जितने भी ब्लाग्स चिट्ठाजगत में रजिस्टर हुए, सारे के सारे इरशाद भाई की किताब पढने की वजह से हुए हैं.

    इरशाद भाई को बधाई. शुभकामनाएं भी.

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  17. जिन जिन ब्‍लॉगर लेखकों के लेखों को इसमें संकलित किया गया है, उनके नामों की एक सूची तो यहां पर प्रकाशित की ही जा सकती है इरशाद भाई।

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  18. Its better to be thankfuk for the real contributors.We know that ample of knowledge and entertainment is available in form of blog writings but in any case sanctity of writings must be maintained.
    If Irshad ji has used the material he must put an acknowledgement of it.
    With regards
    dr.bhoopendra

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  19. हिंदी को कम से कम बढ़ावा जरूर मिल रहा है भविष्य उज्जवल है बस तेज तर्रार और स्तरी लेखनी करनी है हमारा प्रयास सफल होगा बशर्ते हमें अछा लिखना लोगो जोड़ना है. तकनीक अपना विकास कर हमें हिंदी से आगे बढ़ाना है badhai ke patr hai

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  20. चुरातत्व बढ़िया शब्द है…शब्दकोश के लायक…वैसे इस लेख से पहले भी गुजरा हूँ…पहले सोचता था कि किताब खरीदी जाय जब ब्लाग पर सक्रिय नहीं था। अब जरूरत ही कहाँ है…और आपने बता दिया है ही कि किताब में है क्या…

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  21. बहुत सुनते थे ब्लॉगिंग ब्लॉगिंग

    हुँह, तो यही है ब्लॉगिंग श्लागिंग……इसकी बात करना भूल गया…बहुत अच्छा…

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