टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

स्ट्रिक्टली, नो डंकी बिज़नेस प्लीज़!

donkeys to wear diapers

मेरी तरह आप भी बचपन से लेकर अब तक कई कई मर्तबा गधा बनते रहे होंगे – मसलन पहली कक्षा में दो दूनी पाँच बोलने पर आपको आपके शिक्षकों द्वारा गधा कहा गया होगा, मगर बनाया मुर्गा गया होगा. हाल फिलहाल की बातें लें तो इंटरनेट व ब्लॉग तकनालाज़ी पर अपने ज्ञान झाड़ने के चक्कर में तब आप अपनी नजर में गधा बने होंगे जब सामने वाले ने कुछ चीजों को स्पष्ट करते हुए प्रतिप्रश्न किया होगा.

ठीक है, गधा बनें, गाहे बगाहे बनें, जब चाहे बनें, मगर जब भी बनें तो मिस्री गधे बनें. मिस्री क्यों? भाई, मिस्र के गधों का एक स्टैण्डर्ड है. मिस्र के गधे ऐसे वैसे गधे नहीं हैं. उनका एक क्लास है वर्ग है. एलीट क्लास. वहां के गधे डायपर्स पहनते हैं. मिस्र की सरकार ने मिस्र में गधों को सार्वजनिक स्थानों पर पोतड़े (नैपी) पहने बगैर निकलने पर पाबंदी लगा दी है. यदि कोई गधा बिना पोतड़े पहने सड़कों पर नजर आया तो उनके मालिकों को जुरमाना अदा करना होगा. मजबूरी में मालिक भले पहने या न पहने, अपने गधे को वो पोतड़े मजबूरी में पहनाएगा.

मिस्र में अब कुछ मनोरंजक परिस्थितियाँ नजर आएंगी – सड़कों पर हरे नीले पीले लाल रंगों के डिजाइनर पोतड़े पहने गधे जब इतराते हुए, दुलत्ती झाड़ते हुए चलेंगे तो सेंट लारेंस और मनीष मलहोत्रा से डिजाइन किए परिधान पहने मनुष्यों को भी शर्म आएगी. गधों की मालकिनें आपस में बातें करेंगी – मेरे गधे का पोतड़ा तेरे गधे के पोतड़े से सफेद कैसे? बाजार में वर्लपूल का नया फजीलाजिक फुल्ली ऑटोमेटिक वाशिंग मशीन जारी किया जाएगा जो विशेष रूप से गधों के पोतड़े और ज्यादा बेहतर, और ज्यादा साफ, और ज्यादा सूखा धोने के लिए विशिष्ट डिजाइन वाला होगा. किसी गधे की औक़ात अब उसके मालिक नहीं, बल्कि उसके पोतड़े – उसके डायपर से पहचानी जाएगी – कि उसने कितना क़ीमती पोतड़ा पहना है और कि क्या उसने डिस्पोज़ेबल डायपर्स पहन रखे हैं!

जो भी हो, इस मिस्री आदेश से, ऐसा नहीं लगता कि आदमी कुछ सयाना हुआ है और उसका गधापन कुछ कम हुआ है?

(समाचार कतरन – साभार आईबीएन खबर)

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बहुत ख़ूब, बड़ी अनोखी बात है!

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चाँद, बादल और शाम
http://prajapativinay.blogspot.com

हा हा कैसा अद्भुत संयोग आज अपनी कुतिया डेजी ने पहली बार पोतडी पहनी और आप की यह गर्दभ पोतडी की झक्कास पोस्ट आ गयी ! अब गधे भी शर्मोहया वाले हो गए और हम बेशर्म ही रहे ! नए साल का यह गर्दभ घोष लंबे समय तक याद रहेगा रवि भाई !

रवि जी!!
मजेदार ख़बर !! अब तो संभल करही बच्चों को गधा कहना पड़ेगा !!

समाचार और उस पर आपकी तीखी कलम! आनन्‍द आ गया गुरुजी।
गधे अब और अधिक गर्व से कह रहे होंगे - ''हमें 'आदमी कहीं का' जैसे विशेषणों से नहीं नवाजा जाता।''

मिश्री गधे हैं कोई ऐसे वैसे थोडे ही हैं जी . कुछ खयाल तो एक्स्ट्रा रखना पडेगा ही !

आदमी का गधापन कम हो गया या गदहों की आदमियता बढ़ गई ये तो तुलनात्मक है !

हा हा हा ....ये भी खूब रही...रोचक जानकारी दी

दो पैर वाले गधों का नंगपन ढंकने के लिये बई कोई उपाय है क्या?

अश्लिलता केवल गधों के नंगेपन में नजर आई? कमाल है जी.

मजेदार खबर है।

गधों को भी तो २१ वीं सदी जाने लायक बनाना होगा | क्या मिस्र में विपक्षी दल नहीं हैं ? एक जाँच '' कमीशन '' बैठाने की माँग के लिए पर्याप्त आधार है ,''कहीं सरकार के कर्ता-धर्ताओं ने डायपर कंपनियों से ''कमीशन'' तो नही खाया है ? जितना बड़ा डायपर उतना ही ज़्यादा कमीशन अपने कुछ लोगों को रोज़ी मिल जाएगी

mazedaar khabar hai. post karne ka shukriya.

भाई खूब लाये हो, मज़ेदार!

चौपायो में बहुल्ता को द्रष्टिगत रखते हुए हमारी सरकार कुत्तो पर एसा कोई नियम ले आयी तो क्या होगा?

रविजी, टिप्पणी देने के बाद विचार आया कि एक चूक हो गयी है, वह यह कि गधो के तो मालिक होते है,ये बात

अलग है कि बहुत से मालिक भी गधे होते है।मगर अधिकतर कुत्ते मालिक की सरपरस्ती से महरूम ही होते है सो इन्हे

नियम में बांधना केन्सल्। अर्थात पिछली टिप्पणी निरस्त्।

मजेदार खबर है। उससे भी मजेदार है आपका प्रस्तुतिकरण का अंदाज ।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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