बने रहिए सदैव मूर्ख और भुक्खड़

Stay hungry stay foolish by rashmi bansal

वैसे तो ये बात स्टीव जॉब्स ने कही है. स्टे हंगरी स्टे फ़ूलिश. परंतु अगर यही बात आईआईएम अहमदाबाद से निकले 25 चुनिंदा छात्रों की जीवनी से भी सिद्ध होती हो, तो आप क्या करेंगे?

यकीनन आप भी बने रहेंगे सदैव – मूर्ख और भुक्खड़.

सदा के लिए मूर्ख और भुक्खड़ बने रहने की प्रेरणा पाने के लिए आपको पढ़नी होगी युवाओं की हास्य-व्यंग्य से भरपूर मनोरंजक पत्रिका जैम की संपादिका  यूथ-करी रश्मि बंसल की किताब – स्टे हंगरी स्टे फ़ूलिश.

इस किताब में आईआईएम अहमदाबाद से निकले चुनिंदा 25 छात्रों की संक्षिप्त जीवनी दी गई है कि कैसे उन्होंने पारंपरिक जॉब आफर्स और रुपया और ग्लैमर से भरी नौकरियों को ठुकराकर अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिनाई से भरे चुनौतीपूर्ण पगडंडियों को चुना और इस प्रकार प्रेरणास्पद - नए पायदान, नए रास्ते गढ़े.

सभी पच्चीस की पच्चीस कहानी एक से बढ़कर एक प्रेरणास्पद है तथा हर कहानी मानवीय मूल्यों और मानवीय क्षमताओं की पराकाष्ठा को सिद्ध करती है. हर कहानी पठनीय है, और पाठक के मन में स्फूर्ति और आशा का संचार भरने में सक्षम है.

इस पुस्तक को सेंटर फार इन्नोवेशन इनक्यूबेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप – अहमदाबाद तथा वाधवानी फ़ाउंडेशन के सहयोग से, एक परियोजना के तहत प्रकाशित किया गया है, और इसीलिए 325 पृष्ठों की इस अमूल्य किताब की बहुत ही वाजिब, सब्सिडाइज्ड कीमत मात्र 125 रुपए रखी गई है.

पुस्तक की भाषा सरल है और पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है. पुस्तक को मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित किया गया है – द बिलीवर्स, द अपार्च्यूनिस्ट और द आल्टरनेट विज़न. हर जीवनी के उपरांत ‘यंग एंटरप्रेन्योर्स के लिए शिक्षा’ नाम से पाठ का प्रेरक संक्षेप भी दिया गया है.

प्रस्तुत है बेतरतीब रूप से चुने गए, इस किताब के पृष्ठ 104 से सुनील हांडा की जीवनी के कुछ चुनिंदा अंश (हिन्दी भावानुवाद)

“ जब मैंने 11वीं में हैदराबाद पब्लिक स्कूल में एडमीशन लिया तो पाया कि वहां हर कोई अपने सिलेबस से अलग कोई न कोई किताब पढ़ रहा है – कोई एनिड ब्लायटन पढ़ रहा है तो कोई बिली बंटर. मैंने आज तक कोर्स से बाहर न कोई किताब पढ़ी थी और न ही समाचार पत्र. मैं लाइब्रेरियन के पास गया और उनके सामने रोते हुए बोला कि क्या वे मुझे इन किताबों को पढ़ने में मदद करेंगी कि शुरूआत किससे करनी चाहिए. लाइब्रेरियन को शुरू में विश्वास ही नहीं हुआ कि 11 वीं क्लास का कोई बच्चा ऐसा भी हो सकता है. मगर जल्द ही मैंने लाइब्रेरी की सारी की सारी किताबें पढ़ डालीं...

कक्षा दसवीं में मेरे 45 % औसत अंक थे. 11 वीं में बच्चे मुझे गंवारु कह कर चिढ़ाते थे. मेरी अंगरेजी भी कमजोर थी. पर मैंने निम्न फंडे को आजमाया –

मैं परिस्थितियों को दोष नहीं दूगा. मैं मौसम को दोष नहीं दूंगा. मैं शासकीय नियम कायदे कानूनों को दोष नहीं दूंगा. मैं ये नहीं कहूंगा कि मेरे पालकों ने मेरे लिए ये किया या ये नहीं किया. मैं कहूंगा कि अब ये हो चुका है, और मुझे कुछ करना होगा, मुझे मेरी जिम्मेदारी समझनी होगी. यदि कुछ अच्छा भला होगा तो मैं अपनी पीठ थपथपाऊंगा, और यदि कुछ बुरा हुआ तो भी मैं अपने आप से मुहब्बत करूंगा. अपनी सफलता-असफलता के पीछे मैं स्वयं हूँ न कि मेरे आसपास का वातावरण या कोई अन्य कारण...”

ठीक है, आप भी अपनी स्वयं की सफलता-असफलता के पीछे खुद आप ही होंगे, मान लिया, मगर कुछ अलग करने के लिए, कुछ नया सा करने के लिए प्रेरणा पाने के लिए इस किताब को दोष तो दे ही सकते हैं. किताब का अन्य विवरण निम्न है:

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स्टे फ़ूलिश स्टे हंगरी

रश्मि बंसल

प्रकाशक – सीआईआईई, आईआईएम अहमदाबाद

आईएसबीएन नं. 978-81-904530-1-1

पृष्ठ – 325, मूल्य रु. 125.00

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इस पुस्तक को सेंटर फार इन्नोवेशन इनक्यूबेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप – अहमदाबाद तथा वाधवानी फ़ाउंडेशन के सहयोग से, एक परियोजना के तहत प्रकाशित किया गया है, और इसीलिए 325 पृष्ठों की इस अमूल्य किताब की बहुत ही वाजिब, सब्सिडाइज्ड कीमत मात्र 125 रुपए रखी गई है.
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स्टे फ़ूलिश स्टे हंगरी
रश्मि बंसल
प्रकाशक – सीआईआईई, आईआईएम अहमदाबाद
आईएसबीएन नं. 978-81-904530-1-1
पृष्ठ – 325, मूल्य रु. 125.00

ravi ji
namaskaar
vistrit jaan kaari ke liye aabhaar

क्या बात है बने रहो पगला और काम करो अगला .

.प्रेरणादायक. आभार.

इस पुस्‍तक को जल्‍द ही पढने की कोशिश करूंगी....जानकारी देने के लिए बहुत बहुत आभार।

और जो दिल्‍ली में ही खरीदना चाहैं तो कित मिल्‍लेगी ?

कयोंकि यही भावनायें हमें आगे बढ़ने की प्रेणना देती हैं

जानकारी के लिये शुक्रिया!

he bhagwan bilaspur me bhee is kitab ko laa de.
bilaspur me is kitab ko kaise khareeden?
..............

मैं परिस्थितियों को दोष नहीं दूगा. मैं मौसम को दोष नहीं दूंगा. मैं शासकीय नियम कायदे कानूनों को दोष नहीं दूंगा. मैं ये नहीं कहूंगा कि मेरे पालकों ने मेरे लिए ये किया या ये नहीं किया. मैं कहूंगा कि अब ये हो चुका है, और मुझे कुछ करना होगा, मुझे मेरी जिम्मेदारी समझनी होगी. यदि कुछ अच्छा भला होगा तो मैं अपनी पीठ थपथपाऊंगा, और यदि कुछ बुरा हुआ तो भी मैं अपने आप से मुहब्बत करूंगा. अपनी सफलता-असफलता के पीछे मैं स्वयं हूँ न कि मेरे आसपास का वातावरण या कोई अन्य कारण...”

gareeb ghar me paida hona aapki galti nahi hai par gareebi me marna zaroor aapki galti hoti hai.

महत्वपूर्ण जानकारी के लिए शुक्रिया !

एक दिलचस्प किताब के बारे में जानकारी देने के लिये आभार। जल्दी ही मंगा कर पढ़ूंगा।

जानकारी के लिए शुक्रिया

नव वर्ष के आगमन पर मेरी ओर से शुभकामनाएं स्वीकार कर अनुग्रहीत करें

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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