बुधवार, 22 नवंबर 2006

जैम - जम के पढ़ो...


जस्ट एनॉदर रीव्यू...

गाहे बगाहे, मैडपंच की याद दिलाती पत्रिका - जैम का मैं नियमित ग्राहक हूं. यह पत्रिका भारतीय डाक विभाग के भरोसे घर पर आती है चूंकि इसके मुरीद रतलाम में और नहीं हैं (यह यहाँ के न्यूज़ स्टैंड पर नहीं मिलती). परंतु सिर्फ आठ रुपल्ली (मैंने इसके बारे में पहले भी लिखा है) में मिलने वाली पत्रिका से पैसे कई गुना वसूल हो जाते हैं. और इसी वजह से बहुत बार डाक विभाग वाले मुझ पर अनुग्रह कर देते हैं - पैसा वसूलने ही नहीं देते.

इस बार (15-29 नवंबर 06) का अंक और ज्यादा पैसा वसूलने वाला लगा. पिछला दो अंक तो डाक विभाग में गायब ही हो गया था. पता नहीं क्यों इस बार डाक विभाग वालों ने इस अंक को छोड़ दिया. बहरहाल, उनका बहुत-बहुत धन्यवाद. इस अंक में रोमन हिन्दी में (अक्षय बकाया जी बहुत खुश होंगे) ग़ज़ल नुमा एक कविता छपी है, जो मुझे मेरे कॉलेज जीवन की याद दिला गई. आप भी याद कर सकते हैं-

इंजीनियरिंग शायरी

मैं स्टूडेंट नंबर 786

जब कॉलेज की सलाखों से बाहर देखता हूँ

दिन हफ़्ते महीनों को सेमेस्टर में बदलते देखता हूँ

इस कैंटीन से किसी सस्ते ढाबे की खुशबू आती है

ये बिल्डिंग मुझे सेंट्रल जेल की याद दिलाती है

ये प्रोफ़ेसर जो शक्ल से ही कैसे लगते हैं

और ये चार साल की डिग्री एक टॉर्चर है जिसे पढ़ाई कहते हैं

वो कहते हैं कि ये कॉलेज है

फिर कैसे मुझे ये जहन्नुम से बढ़कर लगता है

वो कहते हैं कि ये पढ़ाई है

फिर क्यूं मुझे ये टॉर्चर लगती है

मैं स्टूडेंट नंबर 786

- विनय टीएसईसी

(साभार, जैम पत्रिका)

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इसी पत्रिका में यू-ट्यूब के कुछ मनोरंजक वीडियो की कड़ियाँ भी दी गई हैं. एक खास आपके लिए - अपनी बीड़ी आप यहाँ जला सकते हैं अगर आप पीते हैं :)

http://www.youtube.com/watch?v=buf13ZiDAZY

7 blogger-facebook:

  1. ये छोकरे लोग की पत्रिका है बाबा, क्या मसाला भरा होएंगा की आपका पैसा बसूल होता होएंगा. क्लियर करने को मागंता है ना.
    लिंक मजेदार दी है, टाइमपास.

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  2. संजय,
    (भले ही मेरे सिर पर चांद चमकता है, भले ही मैं उम्र में अर्धशती को पार कर रहा हूँ, पर,) मैं तो अपने आपको छोकराईच समझता हूँ :)

    वैसे उसमें मसाला ऐसा भरा होता है कि मेरे बच्चे भी बहुत पसंद करते हैं :)

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  3. जनाब बुरा मत मान लेना, मैने तो 'मौज' ली थी. :)
    आपके कोमेंट से लगता है आपने बुरा नहीं माना है. धन्यवाद.

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  4. पत्रिका का ऑनलाइन संस्करण पढ़ा, वाक़ई बढिया पत्रिका है। आपके इस रिव्यू से पत्रिका का एक ग्राहक तो बढ़ ही गया। जैम वालों से कमीशन वसूलना मत भूलिएगा :)

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  5. मज़ा आ गया। शायरी पढ़ के कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। विडिओ देख कर बीड़ी पीने की इच्छा हुई। फिर याद आया कि मैं तो बीड़ी सिगरेट पीता ही नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. Ravi,
    Bahut hi acchha blog hai aur ati- uttam prayas hai.
    Haardik shubhkamnaon ke saath,
    B Shantanu

    mera blog: http://hindudharma.wordpress.com/

    Aapse prerna le kar kuch hindi mein post karne ka prayatna karoonga. Agar samay ho, to yeh post avashya padhein - aapko acchii lagegi aisi apeksha hai.

    http://hindudharma.wordpress.com/2006/10/16/deprivation-caused-by-english/

    उत्तर देंहटाएं
  7. शांतनु,
    धन्यवाद. आप हिन्दी में लिखेंगे तो हमें वाकई बहुत खुशी होगी. आप आसानी से हिन्दी लिख सकते हैं. इस पृष्ठ पर दिए फ़ोनेटिग ऑनलाइन औजार की मदद से आपने जैसा यहाँ पर अंग्रेज़ी में लिखा है (रोमन हिन्दी) ठीक वैसा ही टाइप करने पर हिन्दी में लिख सकेंगे.

    आज ही शुरूआत करें. शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं

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