नारद, ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत् इत्यादि के आगे जहां और भी हैं...

जब नारद-बाजार प्रकरण हुआ था तो मैंने ब्लॉग पोस्ट नारद के आगे जहां और भी हैं.... में कहा था कि किसी संकलक को पूरा अधिकार है कि वो किसी भी चिट्ठे को हटाए या रखे. वो चाहे जिस चिट्ठे को हटा सकता है और चाहे जिसे रख सकता है. अपने लिए नियमावलियाँ बना सकता है. परंतु फिर, कोई तार्किकता तो होनी ही चाहिए. अब इस ताज़ातरीन प्रकरण में दुखद प्रसंग यह दिखाई देता है कि 9-2-11 को उसकी सामग्री के चलते नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्विता के चलते निकाला गया. इस बीच, चिट्ठाजगत् से भी कुछ चिट्ठे निकाले गए ऐसे आरोप भी लगे.

एक चिट्ठाकार होने के नाते मेरे चिट्ठे किसी संकलक पर रहें या न रहें इससे भले ही मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता परंतु लोगों को पड़ सकता है जैसा कि आलोक को पड़ा - उन्हें लगा कि उनके चिट्ठे की सामग्री क्या इतनी आपत्तिजनक है कि एक सार्वजनिक संकलक से बाहर कर दी जाए. अब जबकि बहुत सी बातें जाने अनजाने स्पष्ट हुई हैं, तो यह निश्चित तौर पर लग रहा है कि सारा प्रसंग दुःखद किस्म का ही रहा है. प्रतिद्वंद्विता स्वस्थ क़िस्म की कतई नहीं रह पाई.

वैसे, इस प्रकरण का एक मजेदार, अहम पहलू (टेढ़ी दुनिया पर तिरछी नज़र?) यह रहा कि आदि ब्लॉगर आलोक अब लंबी-लंबी पोस्टें लिखने लग गए हैं. अन्यथा अब तक तो वे एक दो लाइनों में ही मामला निपटा दिया करते थे. इसके लिए उन्हें ब्लॉगवाणी संचालक मंडल का आभार मानना चाहिए व उन्हें हार्दिक धन्यवाद देना चाहिए :)

निरंकुश दुनिया जीने को अंततः सिखा ही देती है!

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यह मामला तो कुछ ज्यादा ही लम्बा खिंचता दिख रहा है।

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