टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

टैगिंग में ग़लतियाँ...

घूमने जाना है? टिक्केट बूक करो होटेल बूक करो

टैगिंग की उत्तर पुस्तिका में रमण ने यह स्वीकारोक्ति की-

मेरी हर टिप्पणी में वर्तनी की मीन मेख निकालने की भी बीमारी मिलेगी आप को, ..यह अलग बात है कि कई बार मुँह की भी खाई है.

और उधर उनके गूगल विज्ञापन पर उनके ही चिट्ठे पर यह क्या नज़र आ रहा है-

तो रमण मियाँ, हमारे आपके तो हिसाब आज बराबर हुए. गूगल देव की सहायता से ही सही, हमने आपके चिट्ठे पर वर्तनी की मीन मेख निकाल ही दी. :)


अब आप करिए ठीक इसे!
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खूब यह हुई न बात, देखते हैं रमण भैया अब इसे कैसे ठीक कराते हैं। :)

रवि भाई, खूब पकड़ा। मैं अपनी डिफेन्स में यह कहना चाहता हूँ कि यह विज्ञापन मुझे कभी दिखा नहीं, वरना... (वरना क्या कर लेता?) दरअसल गूगल वाले बहुत तेज़ हैं। अलग देशों में अलग विज्ञापन दिखाते हैं। यहाँ मुझे अपनी साइट पर हिन्दी विज्ञापन कम ही दिखते हैं। यहाँ के विज्ञापन यहाँ बसे भारतीयों की ओर लक्ष्यित होते हैं। आप के लिए यहाँ फोटो चिपका दी है।

संजय बेंगाणी

सबसे पहले तो आभार व्यक्त करता हूँ, आपने टिप्पणीयाँ जोड़े को ब्लिंक करवाया है.


समझमें नहीं आ रहा, मीन-मेख अभियान कभी सफल नहीं हुआ, क्यों?

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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