फंसने फंसाने का दैत्याकार नेटवर्क



हिन्दी चिट्ठाजगत में फंसने-फांसने का नेटवर्क दूसरी बार आया है. और, खुदा करे, यह तिबारा-चौबारा, फिर कभी नहीं आए. फंसने-फांसने का क्यों? यह मैं आगे बताता हूं.

उन्मुक्त ने मुझे फांसा (टैग किया) तो मैं नादान बनकर कि मैंने उसकी पोस्ट पढ़ी ही नहीं, पीछा छुड़ा सकता था. और छुड़ा ही लिया था...

परंतु उन्होंने मुझे ई-मेल किया, और उनका ईमेल मेरे गूगल ईमेल के स्पैम फ़िल्टर से जाने कैसे बचता-बचाता मेरे इनबॉक्स में आ गया. उन्होंने लिखा था-

Hi I have a request to make. It is contained here
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/02/blog-post_18.html

I hope you will not mind.

मैंने वह पोस्ट दुबारा पढ़ी (उस पोस्ट को पहले पढ़ कर नादान बन कर भूल चुका था) और यह प्रत्युत्तर लिखा:

well, I DO MIND, but will reply not-so-mindfully in my post :)

जाहिर है, मैं फुल्ली माइंडफुली प्रत्युत्तर दे रहा हूँ.

तो, सबसे पहले फंसने-फांसने का गणित.

पहले स्तर पर एक चिट्ठाकार ने फांसा - 5 चिट्ठाकारों को.

दूसरे स्तर पर पाँच चिट्ठाकारों ने शिकार फांसे - 25

तीसरे स्तर पर पच्चीस चिट्ठाकारों ने फांसे - 125

चौथे स्तर पर 125 चिट्ठाकारों ने फांसे - 625

पर, क्या इतने हिन्दी चिट्ठाकार हैं भी? और, बाकी के बेचारे चौथे स्तर के चिट्ठाकार किन्हें फांसेंगे? चलिए, मान लिया कि अनगिनत चिट्ठाकार हैं - तब भी, दसवें और पंद्रहवें स्तर पर आते-आते तो पृथ्वी की सारी जनसंख्या फ़ंस-फंसा चुकी होगी और वे अपने शिकार को तलाश रहे होंगे. स्थिति भयावह होगी - सचमुच भयावह.

चलिए, अब बारी है माइंडफुल्ली प्रत्युत्तर की :

आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?

अपने प्रिय पुस्तक का वर्णन मैंने अपने चिट्ठा-पोस्ट में किया था - जिसका शीर्षक मैंने दिया था - "आधुनिक युग का वास्तविक धर्मग्रंथ" - इससे ही जाहिर है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कितना आवश्यक है इस पुस्तक को पढ़ना. व्हाई मेन लाई एंड वीमन क्राई नाम की यह पुस्तक स्त्री-पुरुष संबंध - मां-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी (और सास-बहू भी,) को समझने में बहुत मदद करती है. इसे मैंने अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में पढ़ा (यह आई ही अभी!) और लगता है कि इसे मैं पहले पढ़ा होता तो शायद मेरा व्यक्तित्व दूसरा होता और मैं अपने आस पास के व्यक्तियों को समझने में, रिश्ते निभाने में ज्यादा कारगर होता. इसी तरह की एक दूसरी पसंदीदा किताब - हू मूव्ड माई चीज है, जो जीवन के कठिन परिस्थितियों में जूझने के लिए मजेदार तरीके से रास्ता दिखाती है. पिक्चरें वैसे तो मैं कम ही देखता हूं - जब सारी जनता शोले देख रही थी तो भी मैंने नहीं देखा था - परंतु फिर भी, टाइटेनिक का प्रस्तुतिकरण लाजवाब था, और उसे देखने के बाद मेरे जेहन में कुछ समय तक उसका असर भी रहा था. लिओनार्दो का बर्फ में जमा चेहरा और उसका गहरे समुद्र में डूबना अभी भी आँखों में झिलमिलाता है.

आपकी अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी कौन सी है?

अभी तक तो अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी मैंने नहीं लिखी. जिस दिन मेरी चिट्ठी को एक लाख लोग हिट कर पढ़ेंगे, तथा उससे मुझे $999.99 आय हो जाएगी, वह मेरी सबसे प्रिय चिट्ठी हो जाएगी.

इस चुटकुले को छोड़ दें, तो कुछ चिट्ठी हैं जिन्हें मैं याद करता हूँ, या कहें कि मेरे पाठक मुझे याद दिलाते हैं. अभी हाल ही में जगदीश भाटिया जी ने मेरे इस चिट्ठे पर यह टिप्पणी की -

"...और हम जिंदगी की छोटी छोटी बाधाओं से कैसे घबरा जाते हैं।

आज अनूप जी के इंडीब्लागीस वाले लेख से लिंक पढ़ते पढ़ते यहां चला आया।

आंख से अश्रू की एक धार निकल पड़ी।

अब जब भी जिंदगी में कभी निराशा घेर लेगी तो इसे आकर पढ़ लिया करूंगा।

आपको प्रणाम।..."

तो, मुझे लगा कि मेरा लिखा थोड़ा सा सफल हो गया है. इस चिट्ठे का कुछ संशोधित रूप सर्वोत्तम (रीडर्स डाइजेस्ट का हिन्दी संस्करण जो अब बंद हो चुका है) में छप चुका है.

आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसंद करते हैं?

मैं हर तरह के चिट्ठे पढ़ता हूँ. चिट्ठा चर्चा के लिए तो हर तरह के चिट्ठे पढ़ना मजबूरी होती है - भले ही वह हाइकू हो या अति-अति-आधुनिक कविता. वैसे, मुझे तकनॉलाज़ी के चिट्ठे पढ़ने में मजा आता है जिसमें दिमाग का कुछ भुरता बने. नई तकनीक के बारे में, नए गॅजेट्स के बारे में पढ़ने में आनंद आता है. और, सर्वोपरि तो व्यंग्य है ही - बस पठनीयता होनी चाहिए.

क्या चिट्ठाकारी ने आपके व्यक्तित्व में परिवर्तन या निखार किया?

हाँ, यह तो शत-प्रतिशत तय है. और इस बात को मैंने पहले भी स्वीकारा है, अब भी स्वीकारता हूँ. मुहल्ले के लोग मुझे थोड़ा इज्जत देने लगे हैं - कहते फिरते हैं - यह इंटरनेट पर जाने क्या करता रहता है. तो मैं भी थोड़ा सिर उठाकर चलता हूँ :) डिजिटल डिवाइड है यहाँ पर तो - श्रेष्ठी वर्ग वह है जो इंटरनेट इस्तेमाल करता है, और हिन्दी चिट्ठे लिखता है.

भारत वर्ष को बदलने का वरदान -

आह!, क्या सचमुच? ऐसा वरदान मिले तो बिना कोई दूसरी बात सोचे मैं यहाँ की जात-पांत, धर्म-पंथ सबको खत्म करने का वरदान मांग लूंगा. परंतु मुझे लगता है कि इस वरदान की आवश्यकता नहीं है. लोग शिक्षित हो जाएंगे तो यह खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा, या फिर उतना प्रासंगिक भी नहीं रहेगा - संभवत: सन् 2150 तक.

अब फिर से आते हैं - फंसने फांसने के चक्र पर. मैं अपने आपको चौथे और पांचवे चक्र के चिट्ठाकारों के समक्ष खड़ा पाता हूँ - जिनके पास फांसने के लिए कोई शिकार हैं ही नहीं! मैं इस नेटवर्क कड़ी की सबसे कमजोर कड़ी हूँ. मेरा क्रम टूट गया है.

और, वैसे भी, मुझे जिन्हें फ़ांसना है या फांसना चाहिए, या तो वे फंस चुके हैं या अंततोगत्वा फंस ही जाएंगे - ‘इस' या ‘उस' चक्र पर.


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सुबह होते यह चिट्ठी पढ़ी, अच्छा लगा, दिन अच्छा गुजरेगा।
मैंने 'व्हाीई मेन लाई एण्ड वीमेन क्राई' नहीं पढ़ी। मुझे इस तरह की किताबें कम पसन्द आती हैं पर अब पढ़ूंगा।

संजय बेंगाणी

आपके बारे में जितना भी आपने बताया है, जानकर अच्छा लगा. प्रसन्नता होती है, हम भी आप के ही काल में लिख रहे हैं.

Jagdish Bhatia

और मैंने सोचा कि वो टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पायी।
वाकई वह लेख पढ़ कर मेरे मन के जो भाव थे वही इस टिप्पणी में व्यक्त हुए।

मैं भी यही सोच रहा हूँ कि इस टैगिंग के खेल में जल्द ही सब लपेटे जा चुके होंगे आखिर हम लोग कुल जमा चार सौ ही तो हैं एक स्कूल में भी इससे ज्यादा लोग होते हैं।

सभी जवाब रुचिकर रहे। आपने आगे और लोगों को न फंसाकर औरों को राहत दे दी। :)

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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