रविवार, 24 दिसंबर 2006

मोबाइल मेनिया उर्फ मोबाइल मैनर्स


कौन बोल रिया है?

भारत के गांव गांव में मोबाइल पहुँच रहा है. नुक्कड़ की चाय की दुकान पर काम करने वाला छोरा और मुहल्ले का धोबी और खेत में काम करने वाला निरक्षर मजदूर सबके हाथ में मोबाइल दिखने लगा है. मोबाइल पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार नहीं रहा. मोबाइल पर काल करना खर्चीला भी नहीं रहा. आपके मोबाइल में काल टाइम नहीं है, कोई बात नहीं. सामने वाले को दो-तीन मिस काल दे मारिये, वह मजबूरन काल बैक कर आपसे पूछेगा - भइये, क्या बात है?

मोबाइल पर कभी आप कोई महत्वपूर्ण बात कर रहे होते हैं तभी पता चलता है कि उसकी बैटरी खत्म हो गई, और आस-पास बैटरी चार्ज करने का कोई साधन नहीं होता. कभी किसी मित्र को स्थानीय मोबाइल का नंबर लगाते हैं तो पता चलता है कि वह नंबर तो आज दो हजार किलोमीटर दूर है - और आपको एसटीडी चार्ज लग गया और आपके मित्र को रोमिंग चार्ज (या इसके उलट भी हो सकता है). और आपकी मित्रता इस एसटीडी-रोमिंग चार्ज के चक्कर में खतरे में पड़ती दीखती है. कभी किसी मित्र को मोबाइल लगाते हैं तो उधर से मित्र के बजाए भाभी जी का स्वर सुनाई देता है - "हाँ, भाई साहब, आज ये मोबाइल मेरे पास है - बाजार में कुछ काम था ना..."

आपका कोई पुराना मित्र, जिसके दर्शन महीनों से नहीं हुए होते हैं, अचानक-अकारण आपसे बे-वक्त मिलने आ पहुँचता है. यूँ ही आपके दर्शन करने. उसके हाथ में नया, चमचमाता हुआ, लेटेस्ट वर्जन का मोबाइल फ़ोन होता है. आपको देर से ही सही, समझ में आ जाता है कि दरअसल, आपके मित्र को नहीं, आपके मित्र के नए, कीमती, नए-फ़ीचर युक्त मोबाइल को आपसे मिलने की आवश्यकता थी.

आपके हाथ में नया मोबाइल देख कर आपका मित्र पूछता है- वाह! क्या नया मॉडल है. एमपी3 है क्या? फिर मॉडल के फ़ीचर्स देखने के बहाने आपके एसएमएस और एमएमएस संदेशों को पढ़ने लग जाता है. फिर कहता है - वाह! गुरू! क्या बढ़िया मसाला भरा है. एक दो हमको भी भेज देना. आप शर्माते-सकुचाते से हें हें हें करने लगते हैं.

आज रविवार को सुबह-सुबह मोबाइल बजा. निगोड़े मोबाइल ने रविवार की सुबह बरबाद कर दी. एक यही तो दिन मिलता है जहाँ आप देर तक अलसाए से सो सकते हैं. परंतु मोबाइल को पता पड़ गया कि आप अलसा रहे हैं. वह जाने कहीं से कनेक्शन मिला लाया. उसकी बैटरी भी डाउन नहीं थी.

डिस्प्ले पर जो नंबर आ रहा था वह मेमोरी में नहीं था. मुझे लगा कि मेरे चिट्ठे के किसी पाठक ने जाने कहीं से मेरा मोबाइल नंबर हथिया लिया होगा और मुझे बधाई, शुभकामनाएँ देने के लिए रविवार सुबह का यह उचित समय चुना होगा.

"हैलो?" मेरे स्वर में आश्चर्य मिश्रित उत्सुकता थी.

"कौन बोल रिया है" उधर से आवाज आई.

मेरा माथा ठनका. ये तो कोई रांग नंबर वाला मामला लगता है. आवाज यूँ प्रतीत हो रही थी जैसे कि सामने से गब्बर सिंह बोल रहा हो.

मेरे अंदर का वीरू जाग गया.

"आपने क्या नंबर लगाया है? आपको किससे बात करनी है?" मैंने प्रत्युत्तर दिया. मेरे लहज़े में वीरू का जवाबी फ़ायर था.

"सामजी भाई से बात कराओ" उधर से वही गब्बरिया आदेश आया.

"अरे यार आपने रांग नंबर लगाया है - ये नंबर किसी सामजी भाई का नहीं है"

मेरे भीतर का वीरू गरज रहा था. सामान्य टेलिफ़ोन में यह सुविधा तो होती है कि आप रिसीवर पटक कर अपना गुस्सा कम कर सकते हैं. मोबाइल पटकने से तो अपना खुद का नुकसान ज्यादा हो सकता है. मैंने मोबाइल के काल एण्ड बटन को जोर से दबाया और देर तक भुनभुनाता रहा.

मेरे भीतर के वीरू का गुस्सा पूरी तरह ठंडा होता इससे पहले ही मोबाइल फिर से बजा. उसे बजना ही था. वही पहले वाला नंबर डिस्प्ले पर था.

"हैलो, यार आपने गलत नंबर लगाया है, आपको जिससे बात करनी है उसका नंबर यह नहीं है..." सामने वाले के बोलने से पहले ही मैं मोबाइल पर भड़का.

"कौन बोल रिया है - अपना नाम तो बताओ?" सामने से वही गब्बरिया आवाज आई. प्रकटतः वह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा था कि जो नंबर वह लगा रहा था गलत कैसे लग रहा था.

"अरे यार तुम्हें मेरे नाम से क्या मतलब? ये तुमने रांग नंबर लगाया है. जिससे तुम्हें बात करनी है उसका मोबाइल फोन ये नहीं है" मोबाइल पर मैं जोर से चिल्लाया और मैंने काल फिर से काट दिया.

"कैसे बेहूदे गंवार लोग होते हैं.... मोबाइल तो ले लेते हैं परंतु मैनर्स ही नहीं है. एक तो रांग नंबर लगाते हैं फिर भौंक कर बातें करते हैं..." मैं जरा जोर से भुनभुनाया.

रेखा बड़ी देर से मेरी प्रतिक्रिया देख रही थी. "अरे भई, सामने वाला गंवार है तो तुम क्यों उससे उसी भाषा में पेश आ रहे हो? कम से कम तुम तो शांति से, प्रेम से बता सकते हो!" अंतत: उससे रहा नहीं गया.

वह सही कह रही थी. आह! अचानक मुझे अहसास हुआ, कि मैं भी तो उससे उसी गंवरिया लहजे में बात करने लग गया था. मेरे मोबाइल मैनर्स की भी तो वाट लग गई थी. लगता है पहले मुझे अपने मोबाइल मैनर्स को ठीक करना पड़ेगा. ये साली मोबाइल कंपनियों मोबाइलें तो बेचती हैं मगर यूजर्स मैनुअल में दो पन्ने मोबाइल मैनर्स के लिए नहीं रखतीं! मैं फिर भुनभुनाया.

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इसी तेवर का व्यंग्य लेख: आइए, मोबाइल हो जाएँ...

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6 blogger-facebook:

  1. कभी किसी मित्र को स्थानीय मोबाइल का नंबर लगाते हैं तो पता चलता है कि वह नंबर तो आज दो हजार किलोमीटर दूर है - और आपको एसटीडी चार्ज लग गया और आपके मित्र को रोमिंग चार्ज (या इसके उलट भी हो सकता है)

    गलत लिख गए रवि जी। यदि आप स्थानीय नंबर मिलाते हैं तो आपके उतने ही पैसे लगेंगे जितने लगते हैं, एसटीडी और रोमिंग उसकी लगेगी जिसको आपने फ़ोन मिलाया है। ;)

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  2. हे हे, एकदम सही और सटीक मोबाइल-कथा है। :)

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  3. बहुत ही बुरा लगता है जब लोग हमारे ही मोबाईल नम्बर पर फोन कर पूछते हैं "कौन बोल रहा है"?
    और फिर बुरा लगता है जब यार दोस्त पूछते हैं "कहां हो"?

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  4. बेनामी7:28 pm

    बहुत सही ! लेकिन रवि भाई अगर कोई मीठी सुरीली सी आवाज उधर होती ,भले ही राँग न होता तब तो कहानी कुछ और ही होती।

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  5. मैनर्स हमेशा दूसरों के देखे जाते हैं!अपने थोड़ी ही देखे जाते हैं मैनर्स!

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